उचित अवसर की प्रतीक्षा में लोग प्रायः बैठे रहते हैं। वे सोचते हैं कि उचित समय आएगा तो वे कुछ विशेष कार्य करके सारी दुनिया को दिखा देंगे। ऐसे साधारण प्रकृति के लोग होते हैं जो उसकी राह देखने रहते हैं। न उन्हें उचित अवसर मिल पाता है और न ही वे कोई ऐसा चमत्कार कर पाते हैं कि संसार उनके कार्यों को उनके जाने के बाद याद कर सके अतः अपने जीवन में ये लोग पिछड़ जाते हैं।
इसके विपरीत असाधारण व्यक्तित्व के लोग इन अवसरों को जन्म देते हैं। वे कभी किसी अवसर की प्रतीक्षा नहीं करते बल्कि ऐसा लगता है कि वही उन्हें तलाशता हुआ आ जाता है। उनके लिए हर अवसर विशेष होता है। उसका लाभ उठाना वे कभी नहीं चूकते। इसलिए वे जीवन के हर कदम पर सफलता को गले लगाते हैं।
इस दुनिया की रीति है कि यहाँ पर कठोर-से-कठोर लोहे को भी चाहें तो तोड़ा जा सकता है। बिना श्वास की धौंकनी का प्रयोग करके जब चाहे लुहार लोहे को तोड़-मरोड़ सकता है। उसे मनचाहा आकार दे सकता है। लोहे की मजबूती उस लुहार के आड़े नहीं आती।
कहते हैं कि जब कई झूठे व्यक्ति इकट्ठे हो जाते हैं तो बे बार-बार सच को झूठ में बदलने का प्रयास करते हैं। तब सच टूटा हुआ-सा दिखाई देने लग जाता है। परन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है। सत्य तो सत्य ही रहता है।
वह कुछ समय के लिए सूर्य कि तरह बादलों की ओट में जाकर छुप सकता है पर फिर हमें चमकता हुआ, मुस्कुराता हुआ दिखाई देने लग जाता है। वेदमन्त्र कहता है-
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
अर्थात स्वर्णिम पात्र से सोने का मुख ढका हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती। अतः नकली और असली की पहचान करने की मनुष्य को परख होनी चाहिए।
इसीलिए मनीषी समझाते हैं कि यदि सत्य को सौ परदों में भी छुपाकर रख दिया जाए तो भी वह समय आने पर स्वयं प्रकट हो जाता है। तब वह झूठों का मुँह काला कर देता है। उन्हें सबके समक्ष शर्मसार करने से पीछे नहीं हटता।
मनुष्य को अपनी सच्चाई और ईमानदारी से अपने निर्धारित मार्ग पर सदा बढ़ते जाना चाहिए। किसी कंकड़ और पत्थर की क्या हैसियत कि वह उसकी राह रोक सके। रास्ता यदि ऊबड़-खाबड़ हो अथवा उस पर कंकड़-पत्थर हों तो एक अच्छा जूता पहनकर उस मार्ग चला जा सकता है। अपने गन्तव्य पर पहुँचा जा सकता है।
लेकिन यदि एक अच्छे जूते के अन्दर ही कंकड़ आ जाएँ तो एक अच्छी सड़क पर कुछ कदम चलना भी कठिन हो जाता है। इसलिए रास्ते की चुनौतियों से हारकर नहीं बैठ जाना चाहिए बल्कि उन्हें मुँहतोड़ जवाब देते हुए सफलता प्राप्त करने से घबराना नहीं चाहिए।
कहने का तात्पर्य यही है कि बाहरी चुनौतियों से नहीं बल्कि मनुष्य को अपने अंतस में विद्यमान कमजोरियों से लड़ना होता है जिनसे वह हार मानता रहता है। उसका निश्चय यदि दृढ़ हो तो किसी भी प्रकार का आँधी-तूफान उसके मार्ग में किसी तरह से बाधा नहीं बन सकता।
वह इन्सान ही क्या जो कठिनाइयों के आने से मुँह मोड़ ले, आगे बढ़ने का विचार ही छोड़ दे। रास्ते में सौ झूठों की भीड़ भी आ जाए तो उसके मजबूत इरादों को रौंद नहीं सकती। ये सब उसे जीवन में बहुत कुछ सिखा जाते हैं। उनसे अनुभव लेकर उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचना ही होता है।
मनुष्य को तथाकथित उस उचित अवसर की प्रतीक्षा किए बिना ही जीवन के हर झंझावात को सहन करते हुए अनवरत आगे बढ़ते ही रहना चाहिए तभी उसकी सोने-सी चमक हर किसी को चौंधियाकर रख सकती है। ऐसे साहसी जनों की ईश्वर भी सदा सहायता करता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail. com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
बुधवार, 23 नवंबर 2016
अवसर की प्रतीक्षा नहीं करें
मंगलवार, 22 नवंबर 2016
ईश्वर को जीवों की चिन्ता
मनीषी कहते हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित होते हैं, उनकी चिन्ता वह मालिक स्वयं करता है। इस संसार के सभी जीव परमात्मा का ही अंश हैं। इस भौतिक संसार के माता-पिता जैसे अपने बच्चों की सारी सुविधाएँ देते हैं, उसी तरह परमपिता भी अपने सब बच्चों के सुख-दुख और सुविधाओं के विषय में सदा सोचता रहता है।
वैसे तो वह परमपिता परमात्मा सभी जीवों के विषय में सोचता है, उसके लिए सभी जीव एक समान हैं। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता क्योंकि वह महान न्यायकारी है। हर जीव को उसके कृत कर्मों के अनुसार समय पर देता रहता है। वह उनके भरण-पोषण की व्यवस्था वह स्वयं करता है।
बाबा फरीद साहब कहते हैं-
फिकर करे सो बावरा। जिक्र करे सौ बार।
उठ फरीदा जिक्र कर। फिकर करेगा आप।
अर्थात बाबा जी मानव से कहते हैं कि हे मनुष्य, तू फिक्र मत किया कर। कुछ करना है तो सद् गुरु का जिक्र सौ बार कर, यह तेरा काम है। जिक्र करना यानी ईश्वर का सिमरण करना, भजन करना। तेरी फिक्र करना सत्गुरु का काम है। जब तू उसे याद करेगा तो वो मालिक भी तेरी फिक्र या चिन्ता करेगा।
मनुष्य को स्वयं अपने अंतस में ही आत्मिक विकास करना होता है। कोई भी अन्य व्यक्ति उसको कुछ सिखा नहीं सकता। मनुष्य स्वयं ही अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करके, सज्जनों की संगति में रहकर और ईश्वर की उपासना करके ही आध्यात्मिक बन सकता है।
मनुष्य को कोई भी आध्यात्मिक नहीं बना सकता। यह कोई ऐसा लड्डू नहीं कि जिसे खिलाकर मानव को हाथोंहाथ प्रभु का प्रिय बना दिया जाए। मनुष्य को सिखाने वाला कोई और नहीं होता बल्कि उसकी अपनी ही अन्तरात्मा होती है। उसे आत्मचिन्तन करते हुए स्वयं ही अपने अंतस में विद्यमान दुर्गुणों को त्याग करके स्वयं में सद् गुणों का विकास करना होता है। ईश्वर के बनाए हुए सभी जीवों साथ सदा ही समनता का व्यवहार करना होता है। उन सब जीवों में ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करना होता है।
मनीषी कहते हैं कि ईश्वर सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। उसे ढूँढने के लिए जंगलों में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। तथाकथित धर्मगुरुओं अथवा तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के पास जाकर अपना अमूल्य धन व समय को बरबाद नहीं करना चाहिए। उसे जब भी खोजना हो, बस अपने घर मे एकान्त में बैठकर मन में झाँककर देख लो। वह वहीं मिल जाएगा।
मालिक को मन में देखने के लिए उसे मन्दिर की तरह शुद्ध और पवित्र बनाना पड़ता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि आन्तरिक शत्रुओं को वश में करना होता है। अपनी दसों इन्द्रियों को साधना होता है।
जो व्यक्ति अपने अंतस में ईश्वर का ध्यान करता है तथा दूसरे जीवों में ईश्वर को देखता है और ईश्वर की विद्यमानता का सर्वत्र अनुभव करता है, वास्तव में वही ज्ञानी कहलाता है।
स्वयं को ईश्वरमय बनाना कोई खाला जी का घर नहीं है। उसके लिए कठोर यम और नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है। सभी सांसारिक भोगों को भोगते हुए जल में कमल की तरह उनसे निर्लिप्त रहना होता है।
ईश्वर ने हम सबको इस संसार में एक खाली चेक की भाँति भेजता है। हमें स्वयं अपने गुणों तथा योग्यताओं के आधार पर ही कीमत उसमेँ अपनी भरनी होती है।
यदि स्वयं को मूल्यवान बनाना है तो उपरोक्त बातों पर गम्भीरता से मनन करना होगा। आत्मचिन्तन करके ईश्वर का कृपा पात्र बनने का भरसक प्रयास करना होगा। ताकि इस असार संसार से विदा लेते हुए कोई कसक न बच सके। पूर्ण रूपेण अपनी जीवन नैया उस परमेश्वर के हवाले कर देनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail. com
Twitter : http//tco/86whejp
सोमवार, 21 नवंबर 2016
स्त्री का अपना घर
एक स्त्री सारी आयु यही सोचती रहती है कि उसका अपना घर कौन-सा है। जिस घर में उसका जन्म होता है, वह तो बाबुल यानी पिता का घर होता है। वहाँ से युवती होते ही उसे पराए घर यानी पति के घर में शादी करके भेज दिया जाता है।
वह घर माता-पिता यानी सास-ससुर का होता है। उनके पश्चात पति का घर कहलाता है। फिर समयानुसार वह पुत्र का घर बन जाता है।
यही प्रश्न उसके सामने मुँह बाए खड़ा रहता है कि उसका अपना घर कौन-सा है?
दिन में वह अपने घर को लेकर तरह -तरह के स्वप्न संजोती रहती है। रात में नींद को मनाने में गुजार देती है। बच्चों का पालन-पोषण करते हुए, गृहस्थी का बोझ सम्हालते हुए वह अपनी सारी उम्र उस वह घर को सजाने-संवारने में व्यतीत देती है जिस घर में उसके नाम की तख्ती भी नहीं होती।
आजकल सरकार ने एक कानून बनाया है कि यदि घर को खरीदा जाए और उसमें स्त्री का नाम भी होगा तो उस घर की रजिस्ट्री कराने में रिबेट मिलेगी। इस लालच में अब उसका नाम भी घर खरीदते समय लिखा जाने लगा है। यह उसके लिए प्रसन्नता की बात है।
स्त्री के हर रूप यानी बेटी, पत्नी, बहू, माता से घर के सब लोगों की अपेक्षाएँ होती हैं जिनका कोई अन्त नहीं होता। जहाँ उससे चूक हो जाती है वहीं पर सब लोग उसमेँ बुराई निकालने लगते हैं। तब लोग उसकी सारी पिछली अच्छाइयों को भूल जाते हैं। असन्तुष्ट होकर उसकी टीका-टिप्पणी करने में देर नहीं लगते।
ऐसा कहा जाता है कि हर रिश्ते का अपना एक अर्थ होता है। हर अर्थ के पीछे एक तर्क होता है। अपने जीवनकाल में उसे सन्तुलन बनाकर रखना चाहिए। किसी से नफरत न करके सबके साथ सहृदयता और समानता का ही व्यवहार करना चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि किसी को शिकायत का मौका न दिया जाए।
स्त्री को जीवन में पीछे भी देखना चाहिए जहाँ से उसे अनुभव मिलेगा। यदि वह अपने जीवन में आगे की ओर देखेगी तो आशा की किरण दिखाई देगी। दाएँ-बाएँ देखने पर अपने उसे जीवन का यथार्थ सामने दिखाई दे जाएगा।
स्त्री को एक शख्स बनकर नहीं बल्कि एक विशेष शख्सियत बनकर जीना चाहिए। शख्स तो किसी एक दिन विदा हो जाता है। परन्तु उसकी शख्सियत हमेशा जिन्दा रहती है।
उसे हर समय कभी पति की, कभी बच्चों की, कभी घर-परिवार की चिन्ता में नहीं डूबे रहना चाहिए। सबके खान-पान, स्वास्थ्य की चिन्ता के साथ-साथ उसे घर को सुचारु रूप से चलाने की चिन्ता भी रहती है। उसे हर स्थिति का डटकर सामना करना चाहिए।
उसे इस बात को सदा याद रखना चाहिए कि सुबह से शाम तक काम करके उसे उतनी थकावट नहीं हो सकती जितना क्रोध और चिन्ता करने से एक क्षण में हो जाती है।
उसे अपने जीवन को अपनी इच्छा के अनुरूप जीना चाहिए। जिस दिन वह ऐसा कर पाएगी यानी जिन्दगी को अपनी शर्तों से जी लेगी, वही दिन उसका अपना बन जाएगा। बाकी सारे दिन तो केलेंडर की तारीखें मात्र ही होती हैं।
उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका असली मुकाबला केवल अपने स्वयं से है। यदि वह अपने आज को बीते कल से बेहतर पाती है तो यह उसकी अपनी जीत ही होगी।
उसके अपने नाम की पट्टी चाहे घर के बाहर नहीं लगी हो पर वही घर की धुरी होती है। उसके बिना घर-घर नहीं रहता, श्मशानवत हो जाता है। सब बिखर जाता है। कुछ अपवादों को छोड़कर बेशक वह सारा जीवन अपनी पहचान ढूँढती रहती है फिर भी वह घर-परिवार की अहं ईकाई है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail. com
Twitter : http//tco/86whejp
रविवार, 20 नवंबर 2016
असहिष्णु बनते हम
इक्कीसवीं सदी में महान वैज्ञानिकों ने जहाँ आश्चर्यजनक चमत्कार किए हैं वहीं दूसरी ओर हम मनुष्य आवश्यकता से अधिक असहिष्णु बनते जा रहे हैं। यह समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हो रहा है?
आजकल समाज में जनमानस की बढ़ती हुई असहिष्णुता के समाचार नित्य प्रति टी.वी. पर, समाचार पत्रों में और सोशल मीडिया पर देखे एवं पढ़े जा सकते हैं।
पति या पत्नी के आपसी झगड़े में अथवा विवाहेत्तर सम्बन्ध के चलते पति ने पत्नी की हत्या की या करवा दी। इसी तरह पत्नी ने पति की हत्या की या करवा दी। पति अथवा पत्नी से मनमुटाव हो जाने पर दोनों में से किसी ने अपने बेटों या बेटियों को मार दिया और स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया या फाँसी लगा ली अथवा आत्महत्या कर ली।
पुश्तैनी झगड़ों में किसी की हत्या करना आम बात है। व्यापार में अपने ही पार्टनर की हत्या का षडयन्त्र करके उसे मरवा दिया जाता है। कुछ रुपयों के कारण किसी को मार दिया जाता है। सड़क पर चलती गाड़ी में टक्कर लग जाने पर सामने वाले को पीट-पीटकर मार दिया जाता है। जरा-सी कहासुनी हो जाने पर सामने वाले की हत्या कर दी जाती है।
मौज-मस्ती करते हुए कब तकरार बढ़कर साथी की हत्या करा देती है, पता ही नहीं चलता। राजनैतिक शत्रुता भी इस खेल में पीछे नहीं है। आज विश्व के लिए नासूर बना आतंकवाद धार्मिक कट्टरता का ही विध्वंसक रूप है। इसके अतिरिक्त सयम-समय पर इस धार्मिक असहिष्णुता के कई अन्य रूप भी हमारे समक्ष प्रकट होते रहते हैं।
बच्चे भी आजकल के माहौल में कम असहिष्णु नहीं है। देश और विदेश से ऐसे समाचार मिलते रहते हैं जहाँ बच्चों ने अपने ही साथियों पर स्कूल में गोलियाँ चलाईं अथवा उन पर चाकुओं से वार किया। इससे भी बढ़कर अपने ही अध्यापकों पर चाकुओं से प्रहार करना अथवा उन्हें जान से मार देना भी बच्चों की नृशंसता का ही द्योतक है।
समाज में बढ़ते हुए नित्य प्रति के बलात्कार और अपहरण इसी असहिष्णुता के ही परिणाम हैं। दहेज के कारण अपनी बहुओं को जला देना भी कम नृशंसता नहीं है। एक शक्तिशाली देश दूसरे निर्बल देशों को अपने अधीन करने की फिराक में रहते है।
जल, थल और आकाश भी मानव की इस असहिष्णुता के शिकार बन रहे हैं। हर तरफ जहाँ देखो मारामारी हो रही है। गोले ही बरसते हुए बस दिखाई पड़ते हैं।
इस तरह मनुष्य की असहिष्णुता का परिणाम दो देशों के बीच होने वाले युद्ध भी हैं जिनमें अगणित निर्दोषों के जान और माल की हानि होती है। इसकी भरपाई किसी भी तरह नहीं हो सकती।
अपने दोषों को दूसरों के सिर पर मढ़ने से इसका कोई भी हल निकलने वाला नहीं है। सबसे पहले अपने अंतस में झाँकने की आवश्यकता है। यह विचार भी सबको करना चाहिए कि क्या हममें सहिष्णुता की कमी होती जा रही है? यदि हाँ तो इसका कारण क्या है?
अपने सांस्कृतिक जीवन मूल्यों का त्याग करना ही इस असहिष्णुता का सबसे बड़ा कारण है। इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवारों का होता जा रहा विघटन भी कम दोषी नहीं है। संयुक्त परिवार में रहते हुए लोगों को मिलजुल कर रहना, एक-दूसरे को बर्दाश्त करना, अपनी प्रिय वस्तुओं को बाँटना, दूसरों की परवाह करना आदि स्वभाविक गुण आ जाते हैं।
आज एकल परिवारों के चलते बच्चे जिद्दी, नकचढ़े, अहंकारी बनते जा रहे हैं। इनमें सहिष्णुता का अभाव है। वे अपनी कोई भी वस्तु किसी से साझा नहीं करना चाहते। हर किसी को देख लेने वाली प्रवृत्ति बहुत घातक है। इसके अतिरिक्त खानपान का भी बहुत प्रभाव पड़ रहा है। मनीषी कहते हैं-
'जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।'
प्रत्येक मनुष्य को सहनशीलता रूपी गुण अपनाना चाहिए। हम सभी लोगों को आत्मचिन्तन करना चाहिए और अपने मन को शान्त रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से इन्सान को मानसिक सुख तो मिलता ही है और साथ ही समाज को भी असहिष्णुता नामक इस घातक बिमारी से मुक्ति मिल सकती है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail. com
Twitter : http//tco/86whejp
शनिवार, 19 नवंबर 2016
ताली एक हाथ से नहीं बजती
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। हम अपने दोनों हाथों का प्रयोग करते हैं तभी ताली बजा सकते हैं। हाँ, एक हाथ से मेज थपथपाकर अपनी सहमति अथवा प्रसन्नता अवश्य ही प्रदर्शित कर सकते हैं।
घर, परिवार अथवा समाज में लोगों के व्यवहार को देखते-परखते हुए ही हम इसका अनुभव कर सकते हैं।भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्रों अथवा संबंधियों आदि में यदि मनमुटाव या झगड़ा होता है तब हम एक-दूसरे को दोष देकर अपना-अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं। यदि दोनों पक्षों की बात निष्पक्ष होकर सुन ली जाए तो पता चलता है कि गलती दोनों की होती है।
यह तो हो ही नहीं सकता कि किसी एक की गलती के कारण झगड़ा हो जाए या वैमन्स्य हो। जब तक दोनों पक्ष आपस में न टकराएँ तब तक दुश्मनी की नौबत नहीं आ सकती। इसलिए सावधानी रखनी आवश्यक है।
यदि एक व्यक्ति चुप लगा जाए तो दूसरा कब तक बकझक करेगा। आखिर वह भी यह कहकर चुप हो जाएगा कि यह तो कुछ बोलता नहीं, कौन दीवारों से सिर फोड़े? समस्या तभी बढ़ती है जब दोनों ही बराबर की टक्कर दें। कोई भी व्यक्ति अपने आपको छोटा कहलाना पसंद नहीं करता। इसलिए कोई भी झुकने के लिए तैयार नहीं होता। सब एक-दूसरे को देख लेने की धमकी देते हैं। तभी ऐसी कटु स्थिति बनती है।
इसी प्रकार कार्यक्षेत्र में भी आपसी कटुता के कारण ही बास व कर्मचारियों के बीच मनमुटाव बढ़ता रहता है। इस कारण वहाँ कामबंदी, तालाबंदी अथवा धरने- प्रदर्शनों आदि की नौबत आती है।
रिश्तों में भी अलगाव की स्थिति के लिए भी दोनों ही व्यक्ति जिम्मेदार होते हैं। एक का पक्ष लेकर दूसरे पर दोषारोपण करना अनुचित होता है। सभी समझदार लोगों को जागरूक रहना चाहिए और दूसरों को भी सचेत करना चाहिए।
रिश्तों में यदि झूठे अहम को छोड़कर दोनों थोड़ा-सा गम खा लें तो बिखराव के कारण होने वाली बिनबुलाई समस्याओं से बचा जा सकता है।
यह तो हो सकता है कि किसी एक की गलती दूसरे पर भारी पड़ जाती है। पर कमोबेश स्थिति यही होती है कि दोष दोनों का ही होता है। यह चर्चा हमारे भौतिक संबंधों की है।
प्रकृति को हम दोष देते नहीं थकते कि वह हम पर अत्याचार करती है। कभी बाढ़ आ जाती है, कभी भूकम्प आ जाते हैं, कभी अतिवृष्टि होती है, कभी अनावृष्टि होती है, बीमारियाँ फैल रही हैं, हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है आदि। परन्तु क्या हमने कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखा है कि इन सारी प्राकृतिक आपदाओं के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हमने स्वयं ही इन सब मुसीबतों को न्यौता दिया है।
प्रकृति से हम स्वयं छेड़छाड़ करते हैं। हम खुद को बहुत विद्वान मानते हैं। तभी प्राकृतिक संसाधनों का हम आवश्यकता से अधिक दोहन करते हैं। जब हम अपनी इन हरकतों से बाज नहीं आएँगे तो उसका दण्ड कोई दूसरा नहीं हमें स्वयं को ही तो भोगना पड़ेगा। आज तक मुझे यह समझ नहीं आया कि फिर हम इतनी हाय तौबा क्योंकर करते हैं।
प्रयास यही करना चाहिए कि जीवन में छोटी-मोटी कटुताओं को अनदेखा कर दिया जाए। उन्हें अनावश्यक तूल देकर आपसी संबंधों की बलि न चढ़ाई जाए। संबंधों को तोड़ने के लिए ताली को दोनों हाथों से न बजाएँ बल्कि उनमें मधुरता लाने का यथासंभव यत्न करें।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail. com
Twitter : http//tco/86whejp
शुक्रवार, 18 नवंबर 2016
जीव की यात्रा अकेले
जीव को जन्म-जन्मान्तरों की यात्रा अकेले ही तय करनी पड़ती है। सारे सुख और सारे दुख उसे अकेले ही झेलने होते हैं। दूसरा व्यक्ति उससे सहानुभूति रख सकता है, उसकी सेवा-सुश्रुषा कर सकता है, अपने हाथ से उसे खिला सकता है परन्तु उसकी होने वाली शारीरिक अथवा मानसिक किसी भी प्रकार की पीड़ा को साझा नहीं कर सकता।
सृष्टि का यह नियम है कि जीव इस संसार में जन्म लेता है और अपने कृत कर्मों के अनुसार निश्चित अवधि भोगकर विदा ले लेता है। उसके चले जाने से कुछ भी नहीं बदलता। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड यथावत अपने ढर्रे पर चलता रहता है। वही भोग भोग नहीं पाता जो इस दुनिया से कही दूर चला जाता है। वह अपने भाई-बन्धुओं के मन में केवल एक मीठी याद बन करके रह जाता है।
दूसरी ओर यह जीव अपना रूप परिवर्तन करके इस संसार में वापिस आ जाता है। कुछ अपवादों को छोड़कर प्रायः जीवों को अपने पिछले जन्म का कुछ भी स्मरण नहीं होता। जिन जीवों का पुराने जन्म की कुछ बातें याद रहती हैं, वे कुछ समय पश्चात उन्हें भूलने लगते हैं। वह वर्तमान जीवन में नए सिरे से अपने जीवन को आरम्भ करता है।
जीव को नए जीवन में माता-पिता, भाई-बन्धु, पड़ोसी, सहकर्मी आदि अनेक लोगों का साथ मिलता है। उनमें से कुछ उसके साथ कदम मिलाकर चलते हैं और कुछ उसके लिए जी का जंजाल बनते हैं। इन सबसे घिरा हुआ वह अपने जीवन की यात्रा में बढ़ता रहता है। अपने सुखों और दुखों को अपनों से बाँटता है। कभी उन पर डर्व करता है और कभी किसी की गलती पर वह उसे कोसता रहता है।
मनुष्य अपने बन्धु-बान्धवों से दूर रहकर अकेला रह सकता है। पड़ोसियों और सहकर्मियों से भी किनारा कर सकता है। एक समय में अपने माता-पिता को नौकरी अथवा व्यवसाय के लिए छोड़कर जा सकता है। अपने बच्चों को सैटल करके, उनकी शादी करके उनसे भी दूर रह सकता है।
यह सब लिखने का यही अभिप्राय है कि मनुष्य अपने सारे परिजनों से दूर होकर रह सकता है। उस समय पति और पत्नी ही एक-दूसरे का आश्रय बनते हैं। दोनों ही आपस में दुख-सुख बाँटते हैं। एक इस रिश्ते के लिए सभी रिश्तों को दाँव पर लगाया जा सकता है। यही इस रिश्ते की विशेषता है जो अन्य सभी रिश्ते-नातों पर भारी पड़ जाता है। इसका कारण है मन से इस सम्बन्ध को निभाने की कामना।
इस तरह से पति-पत्नी के दो शरीर और एक जान होने पर, दुख-सुख का साथी होने के बावजूद भी जीव अकेला ही होता है। उसका पति अथवा पत्नी उसके होने वाले कष्टों में सान्त्वना दे सकते हैं, उसका हाथ थामकर सहारा बन सकते हैं परन्तु उसे कम नहीं कर सकते। यहाँ भी जीव स्वयं को असहाय ही पाता है और परेशान होता है।
जीव को तथाकथित अच्छे या बुरे बन्धु-बान्धव अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही मिलते हैं। फिर भी सबके बीच में घिरा हुआ जीव स्वयं को सदा अकेला ही पाता है। जिस भी ऊँचाई से वह देखता है, उसे यही प्रतीत होता है कि कोई उसके साथ नहीं है, वह अकेला ही है।
जिन परिवारी जनों के लिए वह सब पाप-पुण्य, छल-प्रपञ्च, हर प्रकार की चोरी, भ्रष्टाचारी आदि करता है वे भी उन कर्मों में उसके सहायक नहीं बनते। सभी सुकर्मों और दुष्कर्मों का भुगतान अकेले ही उसे करना पड़ता है।
ईश्वर जीव को समय-समय पर शुभकर्म करने और दुष्कर्म न करने के लिए चेतावनी देता रहता है। परन्तु उसके साथ जबरदस्ती नहीं करता। उसे यह भी चेताता है कि अब आयु बीतती जा रही है। इसलिए सांसारिक मोह-माया का त्याग करके ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाओ।
अन्ततः अकेले ही इस भौतिक संसार का परित्याग करके उसे चौरासी लाख योनियों के चक्र में भटकने के लिए तब तक जाना पड़ता है जब तक वह मुक्त होकर परमात्मा में लीन न हो जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail. com
Twitter : http//tco/86whejp