शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

खिलौना लेकर सोते बच्चे

खिलौना लेकर सोते बच्चे

आधुनिकीकरण के कारण आज के एकल परिवारों में प्रायः बच्चों को कोई न कोई खिलौना या स्टफ टॉय यानी टेडी बियर या कोई गुड़िया आदि लेकर सोने की आदत हो जाती है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए घर में एक सुन्दर-सा डिजाइनर बेडरूम बनवा देते हैं। उसमें उनकी आवश्यकता का सारा सामान रखवा देते हैं, ताकि छोटे बच्चे आकर्षित होकर उस कमरे में सोने के लिए तैयार हो जाएँ।
           दूसरे शब्दों में कहें तो माता-पिता बच्चे को अलग कमरे में रात को सोने के लिए एक प्रकार से रिश्वत देते हैं। हम कह सकते हैं कि पश्चिमी देशों के अँधानुकरण का ही यह परिणाम है कि माता-पिता द्वारा छोटे बच्चे को जबरदस्ती अलग कमरे में रात को सोने के लिए विवश किया जाता है। छोटी आयु में बच्चा माता-पिता के साथ ही सोने की जिद करता है। परन्तु वे उसे बहला फुसलाकर, लालच देकर वहाँ सोने के लिए तैयार करते हैं। 
           बहुत बार बच्चा उन्हें अपने पास सोने के लिए मजबूर करता है। उस समय माता या पिता उसके साथ सोने का नाटक करते हैं और बच्चे के सोते ही अपने कमरे में आ जाते हैं। बड़े ही दुख की बात है कि माता-पिता यह जानने का प्रयास ही नहीं करते कि बच्चा अलग क्यों नहीं सोना चाहता? वे बस अपने साथियों में अपनी शान बघारते नहीं थकते कि उन्होंने अपने छोटे बच्चे को सभी सुविधाओं से लैस एक सुन्दर-सा बेडरूम दिया हुआ है।
          कई बार ऐसा होता है कि बच्चा रात को टॉयलेट जाने के लिए उठता है, तब माता या पिता को अपने पास न पाकर रोने लगता है अथवा उनके कमरे में आकर उनके पास ही सो जाता है। बड़ी आयु के बच्चों को प्राइवेसी चाहिए होती है, वे बड़ी कक्ष में आ जाते हैं। तब उनकी पढ़ाई डिस्टर्ब न हो, इसलिए उन्हें अपना अलग कमरा चाहिए होता है। पर छोटे बच्चों के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती।
         एकल परिवार में प्रायः माता-पिता दोनों ही नौकरी अथवा व्यवसाय करते होते हैं। इसलिए उनके पास अपने बच्चों के लिए समय कम ही निकल पाता है। वे बच्चे के पास अधिक समय तक लेटकर या बैठकर उसे कहानी नहीं सुना सकते और न ही उसके साथ ज्यादा समय तक कुछ खेल सकते हैं। इसके लिए उन्हें कोई दोष नहीं दिया जा सकता। उनकी अपनी विवशता है कि वे चाहकर भी बच्चे को अधिक समय नहीं दे पाते।
         परन्तु एक सच्चाई यह भी है कि बच्चा उनसे मनचाहा समय पाना चाहता है, नहीं तो वह उदास हो जाता है। उस समय बच्चा खिलौने को ही अपने एकाकीपन का साथी बन लेता है। रात को जब उसे डर लगता है, तो वह कसकर उसे पकड़ लेता है। उसे यह अहसास होता है कि कोई उसके पास है, डरने की कोई बात नहीं है। उसे ऐसा लगता है कि कोई उसका साथी है, जो उसके साथ सो रहा है। 
           दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चे के दुख और सुख का साथी वह खिलौना बन जाता है। वह उसी के साथ सोता है और उसी के साथ जागता है। उसी खिलौने से वह झगड़ा करता है, उसी से प्यार भी करता है। उससे मित्रवत बातें करके अपना मन बहलाता है। जब कभी उसे माता या पिता से डाँट पड़ती है, तब वह उसे ही जाकर बताता है। इस तरह वह अपने मन का गुबार निकल करके स्वस्थ हो जाता है।
          संयुक्त परिवारों के रहते बच्चों को इन सब समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता था। वहाँ उनकी देखभाल के लिए दादा-दादी या परिवार के अन्य सदस्य होते हैं। दादा-दादी की गोद उनका सबसे बड़ा सम्बल होती है। रात को उनसे कहानी सुनते, उनके साथ मस्ती करते हुए, सोते और जागते हुए बच्चे कब बड़े हो जाते हैं, यह पता ही नहीं चल पाता। वहाँ रहने वाले माता-पिता भी बच्चों की ओर से निश्चिन्त रहते हैं।
           इस चर्चा का सार यही है कि बच्चे की सुरक्षा और भलाई के लिए माता-पिता कृतसंकल्प रहते हैं। उसकी छोटी-छोटी समस्याओं को समझने के लिए उन्हें अपने व्यस्त समय में से थोड़ा समय निकालना चाहिए और उनका समाधान करना चाहिए। बच्चे के ऊपर जबर्दस्ती अपनी मर्जी नहीं थोपानी चाहिए, उसे सदा प्यार से समझना चाहिए। इससे बच्चे के मन में माता-पिता के लिए कडवाहट नहीं आती।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

चोरों से सावधान

 चोरों से सावधान

'अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करो।' या 'जेबकतरों से सावधान।' घूमने-फिरने के स्थान, फिल्म हाल, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट आदि किसी भी स्थान पर चले जाओ वहाँ ये वाक्य लिखे रहते हैं। इसका तात्पर्य यही है कि मनुष्य चाहे घर पर है अथवा घर से बाहर है, उसे चोर-डाकुओं से सावधान रहने की आवश्यकता होती है। यदि कहीं थोड़ी-सी भी लापरवाही हो जाती है, तो उसे हानि उठानी पड़ जाती है।
        मनुष्य अपने घर को सुरक्षित बनाने का हर सम्भव प्रयास करता है। आज वह कच्चे घर में न रहकर सीमेंट, लोहे और ईंटों से अपना मजबूत घर बनाता है। अपनी सुरक्षा को और सुदृढ़ बनाने के लिए वह अपने घर के अन्दर और बाहर सीसीटीवी कैमरे लगवाता है। ताकि वह हर तरफ ध्यान दे सके। अपने धन को बैंक में जमा करता है। अपने खरीदे सोने, हीरे आदि के आभूषणों और आवश्यक कागजों को बैंक के लाकर में रखता है।
        चोरों, लुटेरों, जेबकतरों, गला काटने वालों, भ्रष्टाचारियों, चोरबाजारी करने वालों आदि को पकड़ने और सजा देने के लिए ही न्याय-व्यवस्था है। वह उन्हें उनके दोषों के अनुसार ही दण्ड दे देती है। इन लोगों पर वह अंकुश लगा सकने में पूर्णरूपेण सक्षम है। उन लोगों पर विशेष नजर रखने के लिए पुलिस भी सतर्क रहती है। इस तरह इन असामाजिक तत्त्वों पर नकेल कसने का प्रबन्ध किया जाता है।
          मनुष्य के मन में आलस्य, ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, नकारात्मक विचार आदि अनेक चोर डेरा जमाकर बैठ जाते हैं। ये सभी चोर मनुष्य का सुख और चैन सब हर लेते हैं। उसे किसी तरह से शान्त होकर नहीं बैठने देते। उन सबसे मनुष्य की रक्षा कौन कर सकता है? इन सबसे बचने के लिए अभेद्य सुरक्षा कवच किस प्रकार बन सकेगा? ये प्रश्न वास्तव में विचारणीय हैं। जिनका हल खोजना ही होगा।
          ये सभी नकारात्मक विचार मनुष्य को असफलता की राह पर ले जाते हैं। वह आलसी बनकर आज का काम कल पर टालता रहता है। परन्तु वह कल कभी आ ही पाता। इस तरह मनुष्य जीवन की रेस में पिछड़ जाता है। उस पर नालायक होने या नाकामयाब होने पा ठप्पा लग जाता है। वह स्वयं भी अपनी इस आदत के कारण घर, दफ्तर हर स्थान पर पिछड़कर, तिरस्कृत होता रहता है। 
          ईर्ष्या और द्वेष आदि चोरों की तरह मनुष्य के अन्तस् में अपना घर बना लेते हैं। उसे हर समय परेशान करते रहते हैं। किसी की अच्छी पोशाक हो, उसका उच्च जीवन स्तर हो, उसका खान-पान अच्छा हो, उसके बच्चे संस्कारित हों, कोई सुन्दर हो, उसका घर, उसकी गाड़ी उनसे बेहतर हो यानी किसी व्यक्ति से ईर्ष्या करने का कोई भी कारण हो सकता है। 
            इससे दूसरे व्यक्ति का तो कुछ भी नहीं बिगड़ता क्योंकि उसे कुछ पता ही नहीं चलता। पर वह अनावश्यक जल-जलकर अपना नुकसान कर बैठता है। मनुष्यअपने ही मन में घुलता रहता है। अपने ही स्वास्थ्य की हानि कर बैठता है। जितना अपने पास है, उसमें उसे सन्तोष करना चाहिए। मनुष्य नाम का जो यह जीव है, वह दूसरों की होड़ में परेशान रहता है। इसका कारण है, वह सर्वश्रेष्ठ कहलाना चाहता है।
         अपनी अनावश्यक इच्छाओं को पूरा करने की आँधी दौड़ में वह कब गलत रास्ते पर चल पड़ता है, उसे पता ही नही चलता। फिर वह स्वयं को सिद्ध करने के लिए हिंसा का मार्ग अपना लेता है। सारी दुनिया पर हकूमत करने की उसकी प्रवृत्ति, अपने विरोध में उठने वाले किसी भी सिर को कुचलने के लिए तैयार हो जाती है। फिर उसका धीरे-धीरे पतन होने लगता है और तब व्यक्ति समाज की आँखों में खटकने लगता है।
             मानव की मानवता को दाँव पर लगाने वाले इन सब चोरों से जितना हो सके बचना चाहिए। इन्हें मन में प्रश्रय देने के स्थान पर इनसे किनारा करना बुद्धिमानी कहलाती है। मनुष्य इसीलिए संसार के सभी जीवों से अलग है कि उसके पास बुद्धि है, विवेक है। उसे सोच-विचार करके अपना कदम उठाना चाहिए। बिना विचारे कार्य करके वह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करता है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम

स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम

जीवन में स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम करना बहुत आवश्यक होता है। मानव शरीर प्रकृति की एक सुन्दर और परिपूर्ण रचना है।यह शरीर जितना चलता-फिरता रहता है, उतना ही स्वस्थ, मजबूत, और लचीला बना रहता है। इसीलिए आजकल जिम जाने का फैशन बढ़ता जा रहा है। वहाँ जाकर लोग वर्कआउट करते हैं। बहुत-सा धन देकर वे स्वयं के लिए प्रवेश पाते हैं। लड़की हो या लड़का यानी हर युवा जिम में जाकर अपनी बॉडी बनाकर फिट रहना चाहता है। नौजवान सिक्स पैक बनाने में गर्व का अनुभव करते हैं। जिम जाकर वे कई प्रकार की एक्सरसाइज करते हैं। 
      व्यायाम की रूपरेखा इंसान के स्वास्थ्य, जीवनपद्धति, व्यवसाय और आयु को ध्यान में रख कर निश्चित करनी चाहिए। किसी एक इंसान द्वारा किया जाने वाला व्यायाम दूसरे व्यक्ति को भी सूट कर जाएगा, यह आवश्यक नहीं है। कुछ युवा लोग सी डी चलाकर उसके साथ एक्सरसाइज करते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ लोग सैर करना स्वास्घ्य के लिए बहुत आवश्यक मानते हैं। कुछ लोग भागकर, वेट ट्रेनिंग लेकर, स्विमिंग करके, कोई खेल खेलकर या डांस करके द्वारा व्यायाम करते हैं। तरीका कोई भी अपनाया जा सकता है। 
        वास्तव में व्यायाम एक ऐसी गतिविधि है जो मनुष्य के शरीर को स्वस्थ रखती है और साथ ही उसके समग्र स्वास्थ्य को भी बढाती है। माँसपेशियों को मजबूत बनाने, हृदय प्रणाली को सुदृढ़ करने, एथलेटिक कौशल बढाने, वजन घटाने या फिर केवल मात्र आनन्द आदि किसी भी कारणवश इसे किया जा सकता है। कारण कोई भी हो सकता है, पर उद्देश्य एक ही है कि शरीर स्वस्थ रहना चाहिए, नीरोग रहना चाहिए।
          व्यायाम अथवा कसरत से जी चुराने वाले आलसी लोग तर्क देते हैं कि एक खरगोश अपने जीवनकाल में दौड़ता है, उछलता कूदता है, मस्ती करता है और फिर भी केवल पन्द्रह वर्ष तक ही जीवित रहता है। इसके विपरीत एक कछुआ है, जो न दौड़ता है और न ही कुछ करता है, फिर भी वह तीन सौ वर्ष तक जीवित रहता है। इसलिए एक्सरसाइज जाए भाड़ में, कौन शरीर को कष्ट दे। अतः निश्चिन्त होकर अच्छी गहरी नींद में सो लिया जाए। आराम से बढ़कर इस जीवन में और कुछ भी नहीं है।
        प्रतिदिन दौड़ लगाना भी एक व्यायाम है। दौड़ने से शरीर में बदलाव होते हैं। तनाव से दूर रहने में भी मदद मिलती है। शरीर में जमी वसा नष्ट होती है। इस कारण मोटापा घटाने में मदद मिलती है। इससे अच्छी नींद आती है, इन्सान प्रसन्न रहता है। तनाव से दूर रहने में भी मदद मिलती है और सकारात्मक मानसिकता तैयार होती है। मनुष्य दिन भर फ्रैश रहता है और उसे थकावट नहीं होती। नियमित रूप से दौड़ने से स्ट्रोक, रक्तचाप, डायबिटीज जैसी बीमारियों से दूर रहना संभव होता है।
        व्यायाम करते समय कुछ बिन्दुओं की ओर ध्यान देना बहुत आवश्यक होता है। व्यायाम सदा विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के बाद ही करना चाहिए। इस बात को समझना आवश्यक है कि व्यायाम की शुरुआत में बदनदर्द होता है, लेकिन बाद में लाभ होता है। व्यायाम हमेशा उतना ही किया जाना चाहिए, जिससे शरीर में थोड़ी थकावट बेशक हो जाए, पर अनावश्यक रूप से थककर चूर नहीं होना चाहिए। व्यायाम के बाद विश्राम करना बहुत आवश्यक होता है।
       व्यायाम हमेशा शुद्ध वायु में खाली पेट और शौच के बाद प्रातःकाल करना चाहिए। यदि सम्भव न हो तो भोजन के कम-से-कम चार घण्टे बाद इसे किया जा सकता है। शरीर पर मौसम के अनुसार ढीले वस्त्र होने चाहिए। व्यायाम के तुरन्त बाद पानी पिया जा सकता है, लेकिन उसके आधे घण्टे बाद ही कुछ खाना चाहिए। व्यायाम के पन्द्रह मिनट बाद गुनगुना दूध पीना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। तेज चलते हुए पंखे के सामने या उसके नीचे व्यायाम नहीं करना चाहिए। इससे अच्छा है कि पंखा धीमा कर दें और पसीना निकलने दें। व्यायाम करते वक्त पसीना पोंछने के लिए अपने पास सूती नैपकिन रखना चाहिए।
       झटके से कभी व्यायाम नहीं करना चाहिए। व्यायाम में विविधता बनाए रखनी चाहिए। लगातार एक ही तरह का व्यायाम करने से हमारे शरीर को  उसकी आदत होने लगती है। इसलिए धीरे-धीरे उसका सकारात्मक परिणाम दिखाई देना बन्द हो जाता है।  
        सबसे आवश्यक बात यह है कि व्यायाम में निरन्तरता बनाए रखना जरूरी होता है, अन्यथा सब बेकार हो जाता है। यदि लाभ लेना चाहते हैं, तो व्यायाम नियमित रूप से करना चाहिए। यदि कभी कोई समस्या आ जाए तो सप्ताह में कम-से-कम  पाँच दिन व्यायाम अवश्य करना चाहिए।
         कुछ लोग ऐसे भी हैं जो योगाभ्यास करके स्वयं को चुस्त और दुरुस्त रखने का प्रयास करते हैं। अधिकाँशत: लोग योगासन तथा व्यायाम दोनों को एक ही समझते हैं परन्तु ऐसा नहीं है। दोनों ही विधाओं में बहुत अन्तर है और इन दोनों का ही अपना-अपना महत्व है। योग सिर्फ कसरत मात्र नहीं है। व्यायाम में केवल शारीरिक प्रक्रिया की जाती हैं ताकि शरीर स्वस्थ रहे। दूसरी ओर योग मनुष्य को शारीरिक, मानसिक एवं भावानात्मक रूप से सुदृढ़ बनाता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

पाँच प्राण

पाँच प्राण

मनुष्य के शरीर में जब तक प्राण रहते हैं, तब तक वह जीवन्त रहता है। इन प्राणों के शरीर से निकलते ही वह निष्प्राण हो जाता है। तब उसे लोग शव के नाम से पुकारते हैं। सभी बन्धु-बान्धव अपने उस प्रियजन को कुछ समय के लिए भी घर में नहीं रहने देते। श्मशान में ले जाकर उसका अन्तिम संस्कर कर देते हैं। मनीषी कहते हैं कि उसके बाद यह भौतिक शरीर पाँच तत्त्वों यानी पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश में जाकर मिल जाता है।
          प्राण ऊर्जा और तेज है, जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। प्राण उस प्रत्येक वस्तु में प्रवाहित होता है, जिसका अस्तित्व होता है। यह समस्त जीवन का आधार और सार है। प्राण भौतिक संसार, चेतना और मन के मध्य सम्पर्क सूत्र है। प्राण श्वास,ऑक्सीजन की आपूर्ति, पाचन, निष्कासन-अपसर्जन आदि बहुत से कार्य करता है। मनुष्य जब प्राण को नियन्त्रित करने का अभ्यास करता है, तब उसका शरीर और मन स्वास्थ्य व समन्वय को प्राप्त कर लेते हैं। 
            प्राण मुख्य रूप से पाँच कहे जाते हैं- प्राण, व्यान, अपन, उदान और समान। इनके विषय में चर्चा करते हैं-
प्राण -  प्राण मानव के शरीर को अनिवार्य ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। स्वच्छ वायु स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक होती है। दूषित वायु से कई बीमारियाँ हो जाती हैं। हमारा स्वास्थ्य केवल बाह्य कारणों से प्रभावित नहीं होता है। स्वास्थ्य प्रतिरोधक शक्ति से अनुशासित होता है। दैनिक जीवन में योगाभ्यास हमारी जीवनी शक्ति को सुदृढ़ करता है। इसके लिए भस्त्रिका, नाड़ी शोधन और उज्जायी प्राणायाम किए जा सकते हैं।
अपान - यह नाभि से पैरों के तलवों तक यानी शरीर के निम्न-भाग को प्रभावित करता है। यह प्राण निष्कासन-प्रक्रिया को नियमित करता है। अपान पेट के निचले हिस्से को प्रभावित करता है- आंतों, गुर्दे, मूत्र मार्ग, टाँगों आदि सभी अपान प्राण की अवस्था का परिणाम होते हैं। अग्निसार क्रिया, नौलि, अश्विनी मुद्रा और मूलबन्ध विधियाँ अपान प्राण को मजबूत और शुद्ध करने का कार्य करती हैं।
व्यान - व्यान प्राण मानव शरीर के नाड़ी मार्ग से प्रवाहित होता है। इसका प्रभाव पूरे शरीर पर होता है। व्यान प्राण में कमी होने से रक्त प्रवाह में कमी, नाड़ी संचरण में खराबी और स्नायु सम्बन्धी गति हीनता होने लगती है। व्यान प्राण कुम्भक के अभ्यास से सुदृढ होता है। नाड़ी तन्त्र को प्रोत्साहित करता है। इस कुम्भक का अभ्यास करने के उपरान्त मनुष्य अच्छी तरह ध्यान लगा सकता है। 
उदान - उदान प्राण उच्च आरोही ऊर्जा है। यह हृदय से सिर और मस्तिष्क में प्रवाहित होती है। उदान प्राण कुण्डलिनि शक्ति के जाग्रत होने पर उसके साथ होता है। उदान प्राण के नियन्त्रित करने से शरीर इतना हल्का हो जाता है कि व्यक्ति में हवा में उठ जाने की योग्यता आ जाती है। जब उदान प्राण मनुष्य के नियन्त्रण में होता है, तब बाह्य बाधाएँ बाधा नहीं डाल सकती। श्वास व्यायाम का गहन अभ्यास जल पर चलने और आकाश में तैरने की स्थिति बन सकती है। यह व्यायाम नाडिय़ों और विचारों को शान्त करके एकाग्रता को बढ़ाता है तथा मनुष्य को स्व यानी आत्मा के सम्पर्क में ले जाता है।
समान - समान एक महत्त्वपूर्ण प्राण है। यह अनाहत एवं मणिपुर चक्रों को जोड़ता है।
यह आहार की ऊर्जा को सम्पूर्ण शरीर में वितरित करता है। जब योगी समान प्राण पर नियन्त्रण कर लेते हैं, तब उनके अन्दर शुद्ध ज्योति होती है। समान प्राण को पूर्ण करने से प्रभामण्डल से प्रदीप्त हो जाता है। यह अग्निसार क्रिया एवं नौलि के अभ्यास से सुदृढ़ होता है। संक्रमणशील बीमारी और कैंसर का प्रतिरोध करने की क्षमता को भी सुधारता है। समान प्राण को क्रिया योग से जाग्रत किया जा सकता है। इसका अभ्यास शरीर को गरम रखता है। 
          इसके अतिरिक्त पाँच उपप्राण कहे जाते हैं- नाग, कूर्म, देवदत्त, कृकल और धनञ्जय। ये शरीर के महत्त्वपूर्ण कार्यों को संचालित करते हैं। इन प्राणों का बिना मनुष्य का जीवन संचालित ही नहीं हो सकता। जब तक प्राण शरीर में रहते हैं, तब तक मनुष्य गतिशील बना रहता है। उसमें ऊर्जा व स्फूर्ति बने रहते हैं। इन प्राणों का बिना इस भौतिक शरीर का कोई मूल्य नहीं रह जाता। वह बस रख की ढेरी बनकर रह जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

त्रिगुणात्मक सृष्टि

 त्रिगुणात्मक सृष्टि

यह सृष्टि त्रिगुणात्मक है, जो तीन गुणों अर्थात् सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण पर आधरित है। इस सम्पूर्ण सृष्टि में कोई भी तत्व ऐसा नहीं है, जो इन त्रिगुण तत्वों से परे हो। ये तीनों गुण इस संसार के समस्त प्राणियों में विद्यमान रहते हैं। मनुष्य शरीरधारी जीवात्मा को छोड़कर किसी और प्रकार के शरीरधारी जीवात्मा को तीन गुणों वाली प्रकृति को जानने और समझने का अधिकार ही नहीं है।
          भगवान श्रीकृष्णजी अर्जुन को त्रिगुणात्मक प्रकृति के गुण धर्म के विषय में समझाते हुए गीता में कहते हैं-
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत।।
अर्थात् हे अर्जुन! सत्त्व गुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में लगाता है तथा ज्ञान को छोड़कर तमोगुण के कारण मनुष्य प्रमादी बन जाता है। 
           भगवान श्रीकृष्ण के कथन का यह तात्पर्य है कि प्रकृति के तीनों गुण सत्त्व, रज और तम स्थूल प्रकृति के हर अंश में विद्यमान हैं। परन्तु जब प्रकृति के सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म और स्थूल रूपों को एकसाथ जानने-समझने की बात आती है, तो केवल मनुष्य शरीरधारी जीवात्मा ही इस रहस्य को समझ पाता है। अर्थात् प्रकृति का सम्पूर्ण ज्ञान हम मनुष्य शरीर के द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। 
          मनुष्य जन्म से ही इन तीनों गुणों से प्रभावित होता है। कोई भी मनुष्य इन तीनों गुणों से बच नहीं पाया है। प्राणी में जिस गुण की प्रधानता होती है, उसका चरित्र भी उसी प्रकार का हो जाता है। मनुष्य को सदैव अपने तमोगुण यानी तामसी प्रवृत्ति का त्याग करना चाहिए। उसे रजोगुण यानी राजसी प्रवृत्ति को अपने अनुकूल करना चाहिए। सतोगुण या सात्त्विक प्रवृत्ति को ही जीवन भर अपनाना चाहिए।
           यद्यपि तीनों गुण सृष्टि में विद्यमान हैं, परन्तु सतोगुण के दर्शन बड़ी कठिनता से होते हैं। सत्त्वगुण को प्राप्त करके ही जीवात्मा को सुख की प्राप्ति हो सकती है, अन्यथा नहीं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यदि कोई व्यक्ति सुख भोग रहा है, तो यह समझ लेना चाहिये कि वह प्रकृति के सत्त्वगुण के प्रभुत्व में है। इस सत्त्वगुण के विकसित होने पर ही ज्ञान उत्पन्न होता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य मोक्षगामी बन जाता है।
            राजसी प्रवृत्ति की कामना में मनुष्य सुख, ऐश्वर्य एवं अधिकाधिक धन प्राप्त करने में लगा रहता है। यदि कोई व्यक्ति दुःख भोग रहा है, तो यह कह सकते हैं कि वह प्रकृति के रजगुण के अधीन हो चुका है। रजोगुणी व्यक्ति निष्क्रिय नहीं बैठ सकता। रजोगुण का प्रधान लक्षण सक्रियता ही है। रजगुण विकसित होने पर ऐश्वर्य प्राप्ति की कामना बलवती होती है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य विभिन्न प्रकार के भौतिक सुख-सुविधा के साधनों का संग्रह करता है।
          तामसी प्रवृत्ति आलस्य, प्रमाद , क्रोध एवं नकारात्मकता को प्रकट करती है। आज यह अधिक देखने को मिल रही है। जब मनुष्य युवावस्था में प्रवेश करता है तो संगति-कुसंगति में पड़कर नकारात्मक होकर कर्म-कुकर्म करने लगता है। तब उसमें तमोगुण प्रभावी होते हैं। जीवन भर दुर्दान्त बनकर वह तमोगुण से घिरकर ही जीवन यापन करता है। यदि कोई व्यक्ति हमेशा आलस्य का अनुभव करता है; और आज का काम कल पर टालता रहता है तो ऐसी स्थिति में हमें यह समझ लेना चाहिये कि वह प्रकृति के तमगुण के प्रभाव में अपना जीवन-यापन कर रहा है। तमोगुण प्रधान व्यक्ति की बुद्धि उसे सुख में दुःख का और दुःख में सुख का अनुभव कराती है। 
           सतोगुण सुख का, रजोगुण दुःख का और तमोगुण मोह का प्रतिनिधित्व करता है। सतोगुण की न्यूनता चिन्ता का विषय कही जा सकती है। मनुष्य के जीवनकाल में तीनों गुण विद्यमान रहते हैं। जिसकी जो इच्छा हो उसे अपना सकता है। लोग अपनी-अपनी बौद्धिक क्षमता से ही सुख प्राप्ति का प्रयास करते हैं। यद्यपि ये तीनों गुण एक ही शरीर में विद्यमान रहते हैं। फिर भी एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।
         मनुष्य इन तीनों गुणों को जानता हो या न जानता हो इस बात से त्रिगुणों के आपसी व्यवहार में कोई अन्तर नहीं पड़ता। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रकृति के तीनों गुणों का सम्पूर्ण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति प्रकृति के तमोगुण और रजोगुण को नियन्त्रित करके सभी दुःखों से स्वयं को मुक्त कर सकता है और केवल सुख भोगते हुए ही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। तभी मनुष्य अपने इस जीवन को सार्थक बना सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

विधि का विधान

 विधि का विधान बहुत कठोर है। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। विधि या होनी जो न कराए वही थोड़ा है, वह बहुत ही बलवान है। उसके प्रकोप से आज तक कोई भी नहीं बच सका। मनुष्य के कर्मों के अनुसार जो भी सुख-दुख, जय-पराजय, लाभ-हानि आदि उसे मिलते हैं, उनमें रत्ती भर की भी कटौती नहीं की जाती। मनुष्य को उनसे भोगकर ही छुटकारा मिलता है। इसके अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता है।
             भगवान राम और भगवती सीता का विवाह और राम का राज्याभिषेक, दोनों कार्य शुभ मुहूर्त में किए गए थे। परन्तु  उनका सम्पूर्ण वैवाहिक जीवन कष्टों से भरा रहा। प्रातः राज्याभिषेक होने को था, सब तैयारियाँ हो चुकी थीं। परन्तु रात ही रात में ऐसा कुछ घटित हो गया कि उन्हें सब कुछ त्याग देना पड़ा। राजसी ठाठबाट और वस्त्रों का परित्याग करके उन्हें मुनि वेश में ही वन में जाना पड़ गया।
           अयोध्या के राजगुरु मुनि वसिष्ठ से इन विषय मे पूछा गया, तो तुलसीदास जी के शब्दों में उन्होंने स्पष्ट उत्तर दिया-
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।
लाभ हानि, जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।।
अर्थात् हे भरत सुनो! जो विधि ने निश्चित किया है वही होकर रहेगा। लाभ-हानि, जीवन-मरण, यश-अपयश सब भाग्य के अधीन हैं। 
          भगवान कृष्ण की चर्चा करते हैं। यह सर्वविदित है कि उनको जन्म माँ देवकी ने भाई कंस के कारगर में मथुरा में दिया था। उनके पैदा होते ही उन्हें पिता वासुदेव ने गोकुल में नन्द बाबा के घर पहुँचा दिया। वहाँ उनका लालन-पालन माता यशोदा ने किया। बचपन से ही अनेक अवाँछनीय स्थितियों का सामना उन्हें करना पड़ा। फिर उन्हें माँ यशोदा और पिता नन्द बाबा को भी छोड़कर मथुरा वापिस जाना पड़ा। 
           माता सती भगवान शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में भाग लेने गईं। वहाँ पति का अपमान सहन न कर सकेने के कारण वे सती हो गईं। भगवान शिव माता सती की मृत्यु को टाल नहीं सके, जबकि महामृत्युंजय मन्त्र उन्ही का आह्वान करता है। भगवान शिव और भगवती पार्वती की जोड़ी को तोड़ा नहीं जा सकता।
          रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि तथाकथित स्वयंभू ईश्वर कहलाने वालों के पास समस्त शक्तियाँ थीं। फिर भी इन सबका दुखद अन्त हुआ। इनका और इन जैसे सभी लोग इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। महाभारत काल में भीष्म पितामह को शर शैय्या पर शयन करने पड़ा। भक्ति काल में रानी मीराबाई को उसके देवर ने ही विष दे दिया। कृष्ण भक्ति में मस्त वे मन्दिर-मन्दिर भटकती रहीं।
           दानवीर राजा हरिश्चन्द्र को ऋषि विश्वामित्र को दान देने के कारण स्वयं को ही एक चाण्डाल के पास बेचना पड़ा। उन्हें उसके  पास श्मशान घाट पर नौकरी करनी पड़ी। उन्हें अपनी पत्नी को एक दासी के रूप में बेचना पड़ा। इससे बढ़कर और उनका दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि अपने पुत्र का दाह संस्कार करने के लिए उन दोनों पति और पत्नी के पास कर देने तक के लिए धन नहीं था।
          आधुनिक काल में बहुत-सी घटनाएँ हृदय को विदीर्ण करती हैं। आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द को उनके रसोइए के द्वारा विष दिया गया। ईसा मसीह को उनके शत्रुओं के द्वारा जीवित ही सूली पर लटका दिया गया, जिनके अनुयायी पूरे विश्व में विद्यमान हैं। महात्मा गांधी को गोली मार दी गई। इतिहास के पन्नों को खंगालने पर ऐसी अनेक घटनाएँ मिल जाएँगी।
          इस सारी चर्चा का सार यही है कि होनी बहुत बलवान है। उससे इस संसार का कोई भी जीव नहीं बच सकता। विधि के इस विधान की दृष्टि में साधु-सन्यासी, राजा-रंक, योगी-भोगी, अमीर-गरीब आदि सभी ही एक बराबर हैं। मनुष्य चाहे स्वयं को कितना ही तीसमारखाँ क्यों न समझ ले विधि के इस विधान के समक्ष उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं। इसलिए मनुष्य को हर कदम फूँक-फूँककर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

पढ़ने से जी चुराते बच्चे

 पढ़ने से जी चुराते बच्चे

प्रायः माता-पिता परेशान रहते हैं कि बच्चे पढ़ने में मन नहीं लगाते। वे अपनी पुस्तकों को देखना भी नहीं चाहते। विद्यालय से मिले हुए गृहकार्य को जल्दबाजी में करके वे अपना पिंड छुड़ाते हैं। उन्हें किसी वस्तु की कमी माता-पिता नहीं रहने देते, फिर भी वे उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते। घूमने-फिरने, खेलने-कूदने, टी वी देखने और सारा दिन मोबाईल पर अपना समय व्यतीत करना चाहते हैं। 
           कहने का तात्पर्य यह है कि बच्चे हर समय अपनी मनमानी करना चाहते हैं। क्या कभी इस बात का पता करने का यत्न किया है कि आखिर बच्चे मनमानी क्यों करते हैं? बच्चों का पढ़ने से जी चुराने का कारण क्या है? उनका ध्यान दूसरी ओर क्यों रहता है? वे आखिर खेल-कूद में क्यों लगे रहते हैं? टी वी और मोबाईल उन्हें क्यों अधिक अच्छे लगते हैं? बच्चे आखिर पढ़ने के लिए कहने पर अपने माता-पिता की अवहेलना क्यों करते हैं? 
            ये कुछ प्रश्न हैं, जिनके हल खोजे जाने चाहिए। आजकल बच्चों को खिलौनों से भी अधिक टीवी और मोबाईल पसन्द आते हैं। इसका बहुत बड़ा कारण है। बच्चा जब छोटा होता है, उस समय माँ उसे उसका मनपसन्द गाना या टीवी कार्यक्रम लगाकर बिठा देती है या मोबाईल दे देती है, ताकि उन्हें देखता हुआ बच्चा आराम से नाश्ता या खाना खा ले। उस समय बच्चे ने क्या खाया, कितना खाया, उसे पता ही नहीं चलता।
           इसके अतिरिक्त यदि माता-पिता कोई कार्य करना चाहते हैं और बच्चों की डिस्टरबेंस नहीं चाहते, तो उस समय वे बच्चों को टीवी चलाकर बैठने के लिए कह देते हैं या उन्हें व्यस्त रखने के लिए मोबाईल पकड़ा देते हैं। यही कारण हैं कि धीरे-धीरे बच्चे टीवी और मोबाईल के अभ्यस्त हो जाते हैं। उन्हें इनमें आनन्द आने लगता है। माता-पिता आवाज लगाते रहें, वे उसे अनसुना कर देते हैं। 
            यदि बच्चों से जबर्दस्ती उनसे टीवी बन्द करवाया जाए या उनसे मोबाईल ले लिया जाए, तो वे चीख-पुकार मचाते हैं। यह कुछ प्रमुख कारण हैं, जो बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए बाधक बन रहे हैं। इनके अतिरिक्त बच्चा घर में खिलौनों से खेलना पसन्द करते हैं। घर के बाहर जाना बहुत से बच्चों को अच्छा नहीं लगता। आजकल घर में एक या दो बच्चे होते हैं, उन्हें माता-पिता अनावश्यक लाड़-प्यार करके बिगाड़ देते हैं।
         बच्चों का पढ़ाई में मन न लगने का कारण भी टीवी, मोबाईल और खेलकूद है। बच्चे सारा दिन यदि टीवी और मोबाईल में व्यस्त रहेंगे, तो निश्चित है कि उन्हें पढ़ने का समय नहीं मिल पाएगा। वे जब पढ़ाई से जी चुराने लगते हैं, तब वे पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। इन सबमें उन्हें आनन्द आता है, पर पढ़ाई बहुत बोरिंग होती है। उन्हें अपनी पुस्तकें लेकर बैठने में अच्छा नहीं लगता, वे उससे बचने का बहाना ढूंढते रहते हैं।
          जब माता-पिता बच्चों को पढ़ने के लिए कहते हैं, उस समय उन्हें पानी की प्यास लग जाती है, भूख लगी है कुछ खाने को दो, टॉयलेट जाना या फिर कुछ और ऐसे बहाने याद आते हैं, जिन्हें रोक पाना सम्भव नहीं हो पाता। अपने पाठ्यक्रम के अतिरिक्त कॉमिक्स, कहानी की पुस्तक या उपन्यास पढ़ने में उन्हें अधिक रुचिकर लगता है। इन पुस्तकों को पढ़ने में उन्हें मजा आता है।
          आजकल करोना काल में जब बच्चे विद्यालय नहीं जा सक रहे, तब उनकी ऑनलाइन क्लासेस चल रही हैं। उसी पर उनका गृहकार्य भी मिलता है। परीक्षाएँ भी ऑनलाइन हो रही हैं। इसलिए सारा दिन वे मोबाईल पर व्यस्त रहते हैं। यह स्थिति तो अपवाद काल की है, सदा रहने वाली नहीं है। यही आयु पढ़ने की होती है और यही आयु खेलने या मौज-मस्ती करने की भी होती है।
           माता-पिता का यह परम दायित्व बनता है कि वे अपने बच्चों को टीवी और मोबाईल का एडिक्ट न बनने दें। टीवी और मोबाईल का समय निश्चित करें, जिससे बच्चे अनुशासित रहें। उन्हें पढ़ाई करने के लिए प्रोत्सहित करें। जीवन की ऊँच-नीच उन्हें इस प्रकार समझाएँ, जिससे उनके बच्चे समझदार बन जाएँ। एक जिम्मेदार नागरिक बनने का अपना दायित्व वे पूर्ण कर सकें।
चन्द्र प्रभा सूद