त्रिया हठ
त्रिया हठ के विषय में बहुत कुछ कहा और सुना गया है। अपने घर में अथवा अपने आसपास कहीं भी यह शब्द अवश्य ही आपको सुनने को मिला होगा। इस त्रिया हठ पर मैं अपने विचार रख रही हूॅं। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप सब सुधी जनों को यह आलेख रुचिकर प्रतीत होगा।
त्रिया हठ अथवा किसी स्त्री हठ। इसका अर्थ है किसी स्त्री द्वारा अपनी किसी विशेष इच्छा या जिद को पूरा करने के लिए अड़ जाना। चाहे वह इच्छा उचित हो या अनुचित हो। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ महिला अपनी बात मनवाने पर अड़ जाती है। इसके लिए कई बार भावुकता, रूठना या विशेष अभिनय के द्वारा उसका काम निकलवाना शामिल माना जाता है। यानी स्त्री यदि अपने हठ पर आ जाए तो परिवार की चूलें तक हिल जाती हैं। इससे उसकी चतुराई, उसका रहस्यमय स्वभाव अथवा उसके कपटपूर्ण व्यवहार ज्ञाऐ होता है।
महान कवि और नीतिज्ञ भर्तृहरि ने स्त्री के चरित्र के विषय में 'नीतिशतकम्' में बताया है -
नृपस्य चित्तं, कृपणस्य वित्तम्।
मनोरथाः दुर्जनमानवानाम्।।
त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम्।
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।
अर्थात् राजा का चित्त, कंजूस का धन, दुर्जनों का मनोरथ, पुरुष का भाग्य और स्त्रियों का चरित्र देवता तक नहीं जान पाते तो मनुष्यों की तो बात ही क्या है?
इस श्लोक से हम स्त्रियों के चरित्र के विषय में कहा गया है कि देवता भी उनके चरित्र के बारे में नहीं जान सकते तो हम मनुष्य उन्हें समझने में असफल हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उनका चरित्र बहुत जटिल होता है। उसे समझना मनुष्यों के बस की बात नहीं है।
यह जीवन की अनिश्चितता को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि नारी की सोच, व्यवहार और पुरुष का भाग्य, ये कर्म इतने जटिल और रहस्यमय होते हैं कि उन्हें समझना मानवीय क्षमता से परे है। यहॉं तक कि ईश्वर भी इन्हें पूरी तरह से नहीं समझ सकते। यह श्लोक यह सन्देश देता है कि हमें किसी के चरित्र या भाग्य के बारे में बिना सोचे-समझे, कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए। लोक मान्यता में त्रियाचरित्र यानी स्त्री के चरित्र को समझ पाना कठिन माना गया है।
अब हम इस विषय पर कुछ उदाहरण लेते हैं। मॉं सती भगवान शिव की पत्नी और राजा दक्ष की पुत्री थीं। महाराज दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उसमें शिव और सती को उन्होंने आमन्त्रित नहीं किया। भगवान शिव के समझाने पर भी वे नहीं मानीं और पिता के यज्ञ में पहुॅंचा गईं।वहॉं पिता के यज्ञ में शिवजी का अपमान न सह पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया।
रामायण काल की कैकेई का हठ सर्वविदित है। वहॉं आपने पुत्र भरत को राजगद्दी पर बैठाने के लिए कैकेई ने भगवान के लिए चौदह वर्षों का वनवास मॉंगा था। फलस्वरूप भगवान, भगवती सीता और लक्ष्मण वन में चले गए। उनके वियोग में महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई। वनवास में उनके कठोर जीवन और कठिनाइयों के विषय में हमने पढ़ा है।
रामायण का ही दूसरा उदाहरण लेते हैं जहॉं भगवती सीता ने स्वर्णिम हिरण की पाने का हठ किया। लक्ष्मण को भगवान राम की सहायता करने के लिए विवश किया। फिर लक्ष्मण द्वारा खींची गई रेखा का उल्लघंन किया। तत्पश्चात उनका रावण द्वारा अपहरण हुआ, उनकी खोज में भगवान राम और लक्ष्मण का भटकना, राम-रावण युद्ध हुआ। मॉं सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। अन्ततः उन्हें गर्भावस्था में जंगल में जाना पड़ा।
अब महाभारत काल के उदाहरण लेते हैं। गान्धरी के पति महाराज धृतराष्ट्र अन्धे थे। गान्धारी ने स्वयं की ऑंखों पर पट्टी बाॉंध ली यानी की खुद भी अन्धी हो गई। यह नहीं किया कि पति की ऑंखें बने। दुर्याधन का पापाचार सहन करती रही परन्तु युद्ध के समय उसे ‘विजयी भव’ नहीं कहा। अपने ही पुत्र को विजेता होने का आशीर्वाद नहीं दिया। जब श्रीकृष्ण सामने आये तो सौ मृत पुत्रों की मॉं ने भगवान श्रीकृष्ण को श्राप दिया। शाप देने के उपरान्त पश्चाता लगी कि मैने यह क्या कर दिया।
महाभारत का ही दूसरा उदाहरण देखते हैं। महारानी कुन्ती कर्ण के जन्म का रहस्य छिपाकर रखा। उसे अपने सामने प्रतिदिन प्रताडित होते हुए देखती रही। जब पाण्डवों पर युद्ध में कर्ण के हाथें सम्भावित मृत्यु का संकट आया तो उसी परितयक्त पुत्र के पास याचना के लिए चली गई। पाण्डवों के लिए अभय दान माॉंग लिया।
ये इतिहास के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे हम सभी परिचित हैं। अपने आसपास भी हम ऐसी स्त्रियों को देख सकते हैं जिनके हठ के कारण परिवार बर्बाद हो गए। घर-परिवार की भलाई के लिए भी स्त्रियों ने अवश्य ही हठ किया होगा पर वे उदाहरण शायद नगण्य होंगे। इसीलिए वे चर्चा में नहीं आ सके होंगे। यह भी हो सकता है कि कोई इस विषय पर ध्यान ही नहीं देना चाहता।
चन्द्र प्रभा सूद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें