मंगलवार, 12 मई 2026

नीति वचन

नीति वचन 

नीति-कथाओं का संग्रह 'हितोपदेश' नामक ग्रन्थ में नारायण पण्डित ने मनुष्यों के लिए नीतिपूर्ण बातें लिखी हैं। निम्नलिखित श्लोक में उन्होंने प्रिय व्यक्ति, सत्कर्म, अच्छी पत्नी, बुद्धिमान व्यक्ति, लक्ष्मी, मित्र और पुरुष इन सबके विषय में बहुत सुन्दर विवेचना की है-
      स स्निग्धोSकुशलान्निवारयति 
                    यस्तत्कर्म यन्निर्मलम्।
       सा स्त्री यानुविधायिनी स 
                ‌मतिमान्य: सद्भिरम्यर्च्यते॥
       सा धीर्या न मदं करोति स 
                 सुखी यस्तृष्णया मुच्यते।
        तन्मित्रं  यदकृत्रिमं  स  पुरुषो 
                   य:  खिद्यते  नैन्द्रियै:॥      
अर्थात् प्रिय व्यक्ति वही होता है जो अमंगल का निवारण करता है, सत्कर्म वही है जो निर्मल है, पत्नी वही है जो अनुगामिनी है, बुद्धिमान वही है जो सज्जनों के द्वारा पूजित होता है, लक्ष्मी वह है जो मद उत्पन्न न करे, सुख वही है जो तृष्णा से विमोचित करे, मित्र वही है जो अकृत्रिम (बिना दिखावे का) है और पुरुष वही है जो इन्द्रियों के वश में नहीं है।
            प्रिय व्यक्ति दूसरों का हित करने वाला होता है। वह अपने प्रियजनों की हर अमंगल से रक्षा करता है। वह नहीं चाहता कि उसके प्रियजन किसी भी कारण से दुख पाएँ या उनको जीवन में कभी गर्म हवा की तपिश सताए। वह सदैव उनके जीवन में खुशियाँ लाने का यथासम्भव प्रयास करता है। व्यक्ति प्रिय तभी बनता है जब वह निस्वार्थ भाव से अपने बन्धु-बान्धवों के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिन-रात कार्य करता है। उनके मंगल की कामना करता हुआ उनके सुख-दुख में हर समय साथ निभाता है।
             सत्कर्म वही कहलाते‌ हैं जो निर्मल हैं यानी अन्त:करण को शुद्ध और पवित्र करने वाले हों। रैदास जी ने कहा था -
          मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मनुष्य का मन शुद्ध, पवित्र और निष्कपट है तो घर पर या अपने कार्यस्थल पर ही ईश्वर की प्राप्ति और पुण्य मिल सकता है, तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं। इसका भाव है कि आन्तरिक पवित्रता ही सबसे बड़ी भक्ति है, बाहरी आडम्बर नहीं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सत्कर्म करने वाला अपने इहलोक और परलोक दोनों को सुधारता है। उसके मन में कभी कुमार्ग की ओर प्रवृत्त होने के विषय में सोच ही नहीं सकता।
           पत्नी वही है जो अनुगामिनी है अर्थात् अपने जीवन साथी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चले। उसके सुख-दुख के समय उसकी परछाई बनकर रहे। अपने व्यवहार से कभी ऐसा प्रदर्शन न करे कि वह अपने पति के घर में सामंजस्य नहीं बिठा सकती। वही पत्नी भाती है जो गृहस्थी को कुशलता से चलाए। घर चलाने की उसकी कुशलता उसे ‌विशेष बनाती है। अपने परिवारी‌ जनों के साथ उसे सदा‌ यथायोग्य व्यवहार करना‌ चाहिए।
            बुद्धिमान वह मनुष्य कहा जाता है जो सदा सज्जनों के द्वारा पूजित होता है। अपने विवेक के कारण सदा सत्संगति में रहता है। हर प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करने की क्षमता रखता है। ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ, उसे विनम्रता बनाए रखनी चाहिए। दूसरों के दृष्टिकोण को समझना भी बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं। उसे सभी लोगों के साथ सहृदयतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखना चाहिए।
             लक्ष्मी के विषय में हम सभी जानते हैं कि वह एक स्थान पर टिककर नहीं रह सकती। आज यहाँ है तो पलक झपकते ही वहाँ यानी अन्यत्र पहुँच जाती है। राजा को रंक बनाने और रंक को राजा बनाने की भरपूर क्षमता रखती है। गलत तरीके से धन कमाने पर अपने साथ व्यसनों को भी लेकर आती है। मनुष्य को आसमन से जमीन पर पटकना इसे बखूबी आता है। इसलिए मनुष्य को अपने धन और वैभव पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी वही है जो मद उत्पन्न न करे।
          सुख वही कहलाता है जिससे तृष्णा दूर रहे। यदि एक के बाद एक तृष्णा मनुष्य को घेरे रखेंगी तो वह कोल्हू के बैल की तरह अपना सुख-चैन गॅंवाकर दिन-रात परिश्रम करता रहेगा। फिर भी कोई-न-कोई तृष्णा उसे भटकाती ही रहेगी। सुख की चाह रखनी हो तो तृष्णाओं का त्याग करना पड़ता है। यदि जीवन में सुख की कामना हो तो मनुष्य को सन्तोष रखना चाहिए। जो उसके पास है, उसी में सुख की तलाश करनी चाहिए।
             मित्र उसे कहते है जो आडम्बर रहित, सरल व निश्छल होता है। वह सदा अपने मित्र का हितचिन्तक होता है। उसके लिए हमेशा शुभ करने वाला और सोचने वाला होता है। सुख-दुख के समय अपने मित्र के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर वह खड़ा रहता है। वह पीठ पीछे भी अपने मित्र की बुराई नहीं करता। मित्र के विषय में मनीषी‌ कहते हैं कि वह श्मशान तक‌ साथ निभाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मित्रों की मित्रता जीवन भर चलती है। मृत्यु के अतिरिक्त उन्हें कोई अलग‌‌ नहीं कर सकता।
            मनीषियों का कथन है कि वास्तव में मनुष्य वही कहलाता है जिसे अपने ऊपर संयम है। वह कदापि इन्द्रियों के वश में नहीं होता। वह जानता है कि इन्द्रियों के वश में हो जाने का अर्थ है अपने लक्ष्य से भटक जाना। इनके अधीन होने वाले व्यक्ति को कभी शान्ति नहीं मिल सकती। मनुष्य एक अद्वितीय सामाजिक, बुद्धिमान और तर्कशील प्राणी है जो अपनी उच्च संज्ञानात्मक क्षमताओं के कारण अन्य जीवों से भिन्न है। वे आत्म-जागरूकता, नैतिक मूल्यों, जटिल उपकरणों के निर्माण और संस्कृति के विकास में सक्षम हैं। 
          ‌‌    हितोपदेश के इस श्लोक में बताए गए नीतिपूर्वक वचनों के अनुसार व्यवहार करने वाले ही वास्तव में जीवन को सफलतापूर्वक जीते हैं। इन बातों का ध्यान रखने से मनुष्य सदा ऊँचाइयों को छूता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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