धन और खुशियॉं सम्हाल कर रखें
मनुष्य को अपनी खुशियों और धन को सदा सम्हालकर रखना चाहिए। मनुष्य को ऐसा लगता है कि खुशियों के पल उसके जीवन में बहुत कम समय के लिए आते हैं। यद्यपि ऐसा नहीं होता। खुशियों के आने पर वह खो जाता है और वे पल हाथ में पकड़े रेत की तरह फिसल जाती है।इन्हें सहेज कर रखना चाहिए, किसी भी मूल्य पर अपने हाथ से इन्हें गँवाना नहीं चाहिए। मनुष्य को अपने व्यवहार और अपनी सोच पर नियन्त्रण रखना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति उसकी सत्ता को न मानकर उसे चुनौती देता है तो तब भी उसे अपना आपा नहीं खोना चाहिए। मनुष्य को सदा प्रसन्न रहना चाहिए और अपनी जिन्दगी से निराश नहीं होना चाहिए। जीवन में सफल व्यक्ति कहलाने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। परन्तु पैसे को सदा अपनी जेब में रखना चाहिए। उसे अपने मन-मस्तिष्क पर सवार नहीं होने देना चाहिए। यदि ऐसा हो जाता है तो फिर धन के मद में चूर मनुष्य पतन के गर्त में गिरने लगता है।
यदि मनुष्य इस धन का उपयोग घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने और दान आदि कार्यों में व्यय करता है तो उसका सदुपयोग होता है। उस समय घर आए आगन्तुक का सम्मान करने से उसे पीछे नहीं हटना चाहिए। हमारे शास्त्र अतिथि को देव मानते हुए कहते हैं -
अतिथि देवो भव।
निम्न दोहे में कबीरदास जी कहते हैं -
साईं इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाए।
मैं भी भूखा न रहूॅं और साधु भूखा न जाए।।
अर्थात् कबीर जी इस दोहे के माध्यम से भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर! मुझे केवल उतना ही धन या अन्न दें जिसमें मेरे पूरे परिवार का पेट भर सके। मुझे बहुत अधिक धन नहीं चाहिए, बस इतना दे दीजिए कि मेरा परिवार भी भूखा न रहे और मेरे द्वार पर आने वाला कोई मेहमान या साधु भी भूखा न लौटे।
इसके विपरीत यदि यह धन मनुष्य केसिर पर चढ़कर बोलने लगे तो इन्सान का दिमाग खराब होने लगता है। वह अपने बराबर किसी दूसरे को नहीं समझता। उसके बच्चे भी उसकी देखादेखी घमण्डी बनने लगते हैं जो किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। वह हर किसी को देख लेने की धमकी देने लगता है। हर स्थान पर आग लगाने की धमकी देने लगता है। यहाँ तक कि स्वयं को भी खुदा समझने लगता है। ईश्वर की सत्ता को भी चुनौती देने से परहेज नहीं करता।
यहाँ एक बात बताना चाहती हूँ कि मनुष्य अपनी कमाई से गरीब नही होता बल्कि अपनी जरूरतों को बढ़ा लेने से गरीब होता है। जब जक मनुष्य अपनी कामनाओं को असीम बनाता जाता है तब तक वह चैन से नहीं बैठ सकता। यही उसकी परेशानी का कारण बन जाता है। इसलिए वह मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है।
इसी भाव को हम दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि यदि इन्सान अपनी कमाई से अधिक पैर फैलता है तो दुःख-तकलीफों का सामना करता है। यानी वह न चाहते हुए भी कर्जों के बोझ तले दबकर रह सकता है। तब उसकी परेशानियों का चक्र घूमने लगता है और उसका जीवन नरक बन जाता है।
इस सत्य को कभी नहीं भूलना चाहिए कि जब तक इन्सान के पास पैसा है तभी तक यह दुनिया पूछती है और सम्मान देती है। अन्यथा मिट्टी के मोल भी नहीं पूछती। इसलिए धन-दौलत पर अभिमान करना व्यर्थ है। उसे केवल साधन मानना उचित है, उसे साध्य मान लेने से जीवन में भटकाव होने लगता है। फिर उसके जीवन में स्थिरता नहीं रह पाती।
जीवन की दूसरी सच्चाई यह है कि माया महाठगिनी और बहुत चंचल है। इस पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। इसके खेल बड़े निराले हैं। यह पलक झपकते ही देखते-ही-देखते राजा को रंक बनाकर रुला देती है और रंक को राजा बनाकर उसे मालामाल कर देती है।
जब लोग हमारी परेशानी होने पर बुराई करते हैं तो निराश नहीं होना चाहिए। पीठ पीछे बुराई करने वालों की कमी नहीं होती। यह मानना चाहिए कि वे कायर हैं, उनमें सामने से आकर कुछ बोलने की सामर्थ्य नहीं है। अतः उन दोगले लोगों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
दुनिया की परवाह तभी तक करनी चाहिए तब तक वे आपके और आपके सपनों के बीच दीवार बनकर न आएँ। जब तक मनुष्य में सामर्थ्य है, उसे सफलता प्राप्ति के सपनों को साकार कर लेना चाहिए।
हर समस्या का समाधान हम दृढ़ प्रतिज्ञ बनकर या डटकर कर तभी कर सकते हैं यदि उसमें हमारी भी सक्रिय भागीदारी होगी। उससे मुँह मोड़कर या पीठ दिखाकर भाग जाने से किसी भी समस्या का निदान कर पाना वास्तव में बहुत असम्भव होता है।
दुनिया के सब अनुराग-विराग की परवाह छोड़कर प्रसन्न रहने का अभ्यास कीजिए। अपनी इच्छाओं को समेटते हुए अपनी मेहनत की कमाई में सन्तुष्ट रहने का यत्न कीजिए। यकीन मानिए ईश्वर की कृपा से सब शुभ होगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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