मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

जीने के लिए सहारा खोजना व्यर्थ

जीने के लिए सहारा खोजना व्यर्थ

अपना जीवन जीने के लिए आखिर किसी दूसरे के सहारे की कल्पना करना व्यर्थ है। किसी अन्य को बैसाखी बनाकर कब तक चला जा सकता है? दूसरों का मुँह ताकने वाले व्यक्ति को एक दिन धोखा खाकर, लड़खड़ाकर गिर जाना पड़ता है। उस समय उसके लिए सम्हलना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए किसी सहारे को खोजने के स्थान पर मनुष्य को स्वयं पर विश्वास करना चाहिए।
         मनुष्य का वास्तविक सहारा उसका उसके अन्तस् में विद्यमान होता है। जब वह बैसाखियों के भरोसे चलना आरम्भ करते है तो उसके अपने पैर अपनी ताकत खो देते हैं। आत्मनिर्भरता ही जीवन का असली आधार है। इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए।
         दूसरों से सहारे की उम्मीद करने से सदा मानसिक निर्भरता बन जाती है। अन्तत:  निराशा ही मनुष्य के हाथ लगती है। समय और परिस्थितियॉं कभी एक जैसी नहीं रहतीं, हमेशा बदलती हैं। इसलिए बाहरी सहारे कभी भी स्थायी नहीं हो सकते। दूसरों पर निर्भर होने पर मनुष्य अपनी क्षमताओं को पहचानना भूल जाता है। जीवन के सबसे कठिन दौर में अपना हौंसला और धैर्य ही व्यक्ति का  सबसे बड़ा साथी बनते हैं।
          बचपन की बात अलग कही जा सकती है। उस समय बच्चा सदा माता-पिता की अँगुली थामकर चलता है। वह उनके बिना एक कदम भी नहीं चल पाता। उनकी नजरों से ही बच्चा इस दुनिया को देखने और समझने की कोशिश करता है। उस समय यदि वह उनका हाथ छोड़ दें तो वह लड़खड़ाकर गिर सकता है।
          बड़ा होने पर जब वह योग्य बनकर इस संसार सागर में तैरने के लायक हो जाता है तब उसे मजबूत और स्वावलम्बी बन जाना चाहिए। उस समय मनुष्य को किसी के भी कन्धे को बैसाखी बनाने की कोई आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। उसे स्वावलम्बी बनकर, अपने ऊपर पूरी तरह से विश्वास रखना चाहिए।
        यह सत्य है कि एक लता बहुत नाजुक और कमजोर होती है। उसे किसी सहारे की आवश्यकता होती है, तभी वह फलती फूलती है। इसीलिए उसे अपनी सुरक्षा के लिए किसी मजबूत वृक्ष का सहारा लेना पड़ता है।
          मनुष्य को यह बात हमेशा ही याद रखनी चाहिए कि जो बेल बड़े वृक्ष का सहारा लेकर बहुत इतराती फिरती है और समझती है कि उसमेँ आकाश छूने की सामर्थ्य आ गई है तो वह गलत सोचती है। वृक्ष के कटते ही वह धड़ाम से जमीन पर औंधे मुँह गिर जाती है। फिर उसे मुँह की खानी पड़ जाती है। तब उसे सहारा देने के लिए कोई नहीं आता। उसकी सहायता कोई नहीं करता। 
            परावलम्बी मनुष्य स्वयं को बहुत कमजोर समझता है। वह कभी भी अपने जीवन में सिर उठाकर नहीं चल पाता। उसे हमेशा यही लगता है कि वह अपने जीवन में अकेले या बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकता। इसलिए वह ऐसे व्यक्ति की तलाश करता रहता है जो उसका सहारा बन सके और हाथ पकड़कर, थामकर उसे आगे ले जाए। ऐसे मनुष्य को यदा कदा अपमान का कड़वा घूँट पीना ही पड़ता है। 
          जिसे वह अपना सब कुछ मान लेता है, जिसका मुँह ताकता है, जिसके निर्देश के बिना वह एक कदम भी नहीं चलता, वही समय आने पर उसे उसकी औकात बता देता है। उस समय वह स्वयं को बहुत ही असहाय और बौना महसूस करता है। अपनी कल्पना के विपरीत मिले आघात को सहन करना उसके लिए कठिन हो जाता है। 
            ऐसी दुखद स्थितियों से बचने के लिए मनुष्य में आत्मविश्वास का होना बहुत आवश्यक होता है। मनुष्य को यथासम्भव अपने विवेक पर भरोसा करना चाहिए उसे यत्नपूर्वक अपना मानसिक और आत्मिक बल बढ़ाना चाहिए। तभी वह इन दुखदायी स्थितियों से बच सकने में सफल हो सकता है।
          जब तक मनुष्य अपने में साहस नहीं जुटा पाता और दूसरों की ओर देखना नहीं छोड़ता तब तक उसका हृदय चकनाचूर होता ही रहता है। उसका स्वाभिमान आहत होता रहता है। हर कोई उसे दो बात सुनाकर चल देता है। वह बेचारा बना हुआ असहाय-सा देखता रह जाता है।
          किसी का सहारा लेने वाले व्यक्ति को सहारा देने वाला धीरे-धीरे अपना गुलाम ही समझने लगता है। वह चाहता है कि उसका सहारा लेने वाला उसे खुदा समझे। उसकी हर सही-गलत बात पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगाए। उसके हर कथन को ब्रह्मवाक्य माने। उसकी इच्छा से सोए, जागे और अपने सारे कार्य करे। यानी बिना मोल के अपनी गुलामी उसके नाम लिख दे।
          यदि वह उसकी इच्छा के अनुसार न चलना चाहे तो उससे सम्बन्ध विच्छेद करने की धमकी देता है। ऐसे में वह बेचारा घबराकर उसका साथ पाने के लिए उपाय करने लगता है।
          उचित यही है कि मनुष्य को अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए। अपने अन्तस् की शक्ति को पहचानना चाहिए। किसी का सहारा लेने से बचना चाहिए ताकि उसे जीवन में कभी असफलता का मुँह न देखना पड़े। 
चन्द्र प्रभा सूद

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