इन्सानियत से उठता विश्वास
इन्सानियत से दिन-प्रतिदिन मनुष्य का विश्वास उठता जा रहा है। संसार में प्रायः लोग अपना हित साधने में व्यस्त रहते हैं। इसलिए वे आज संवेदना शून्य होते जा रहे हैं। उनकी यह प्रवृत्ति निस्सन्देह समाज में चिन्ता का विषय बनती जा रही है। माना जाता है कि जिस व्यक्ति में संवेदना नहीं है, वह तो मृतप्राय होता है।
समाज में लगातार घटने वाली अमानवीय और हिंसक घटनाओं को देखते हुए इन्सानियत से जनमानस का विश्वास उठता जा रहा है। अपनों और करीबी लोगों के द्वारा दिए जाने वाले धोखे और व्यक्ति का बढ़ता हुआ अकेलापन भी इसके लिए जिम्मेदार है। टीवी चैनल सारा दिन इन नकारात्मक समाचारों को बार-बार दिखाते रहते हैं। समाचारपत्रों में भी इन समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। सोशल मीडिया भी इस रेस में पीछे नहीं है। इस कारण समाज की एकतरफा और डरावनी तस्वीर प्रस्तुत की जाती है।
ऐसे मनुष्य को लोग पत्थर दिल इन्सान कहते हैं यानी वे समाज में क्रूर कहे जाते हैं क्योंकि उनके सीने में दिल नाम की चीज नहीं होती। वे पत्थर की तरह कठोर माने जाते हैं। उनके हृदय में दया, ममता, करुणा और सहृदयता आदि गुण बिल्कुल नहीं होते।
कुछ समय से संसार के कितने ही देश युद्ध की विभीषिका से झुलस रहे हैं। न जाने कितने ही निर्दोष लोग काल कवलित हो रहे हैं। चारों ओर त्राहि-त्राहि हो रही है। पता नहीं कब इस सबका अन्त होगा, कहा नहीं जा सकता।
आज के समय में चारों तरफ फैली हिंसा, स्वार्थ और अपराध की घटनाओं को देखकर कई बार इन्सानियत पर से विश्वास उठने लगता है। इस श्रेणी में आतंकवादी, चोर, डाकू, समाज विरोधी गतिविधियाँ करने वाले नृशंस लोग आते हैं। इसलिए कोई भी इनके सामने नहीं आना चाहता। लोग उनसे भयभीत रहते हैं और उनके साथ सम्बन्ध बनाने में रुचि नहीं रखते।
सत्य यही है कि कुछ बुरे लोगों या घटनाओं से पूरी इन्सानियत खत्म नहीं होती। आज भी संकट के समय लोग बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद के लिए आगे आते हैं। दुनिया में नेकी, प्यार और करुणा आज भी जीवित है, जो इस समाज को थामे हुए है। इन्हीं लोगों के कारण संसार बचा हुआ है। बुरे लोग संख्या में कम होते हैं परन्तु उनका शोर अधिक होता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि इन्सानियत समाप्त हो गई है।
आज लोग ईश्वर की भक्ति भी अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। जो दाता सदा सबके लिए अपने भण्डार खोले बैठा रहता है, उससे अपना काम करवाने के लिए, उसे रिश्वत देने का असफल प्रयास करते हैं। मनुष्य को जब कुछ चाहिए होता है अथवा कष्ट-परेशानी में होता है तो वह मालिक से प्रार्थना करता है परन्तु फिर बाद में उसे भूल जाता है।
कहा जाता है कि पत्थर की मूर्तियों को लोग इसीलिए पूजने लगे हैं क्योंकि आज विश्वास करने लायक इन्सान बहुत कम मिलते है। यह सत्य है कि पत्थर से यदि प्रहार किया जाए तो वह सामने आने वाले सबको समान रूप से चोट पहुँचाता है अर्थात् घायल कर देता है।
पत्थर की यही तारीफ है कि कुछ भी उपाय कर लो वह पिघलता नहीं है। उसकी अन्य विशेषता यह भी है कि वह स्वयं कभी नहीं बदलता। उसे आकार विशेष देने के लिए मूर्तिकार को अथक प्रयास करना पड़ता है।
पत्थर को जिस प्रकार सधे हुए हाथ तराशते हैं तो वे उसमें मानो प्राण डाल देते हैं। उसे मनचाहा आकार देने में कलाकार समर्थ होते हैं। उसी प्रकार सज्जनों की संगति और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करने से मनुष्य को भी मनचाहा आकार दिया जा सकता है।
सुप्रसिद्ध रामचरित के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि (रत्नाकर डाकू ) और बौद्धधर्म के सन्यासी (अंगुलिमाल डाकू) इसके प्रत्यक्ष उदाहरण कहे जा सकते हैं। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास की खोज करने पर मिल जाएँगे।
मनुष्य में जब तक मानवोचित गुणों का समावेश नहीं होता तब तक उसका कद ऊँचा नहीं होता। इन्सानियत से ही इन्सान का कद बढ़ता है केवल चौखटों की ऊँचाई बढ़ा लेने से कुछ नहीं होता। मनुष्य की महानता का बखान तभी होता है जब वह मानवता की भलाई के लिए कार्य करता है। अन्यथा उसे भूल जाने में इस जमाने को बिल्कुल भी समय नहीं लगता।
इस संसार में इन्सान सब कुछ बन सकता है, दुनिया के सारे कार्य-व्यवहार कर सकता है किन्तु एक सच्चा इन्सान बनना वास्तव में उसके लिए सबसे कठिन कार्य होता है। इस ओर उसे प्रयास करना चाहिए।
मनुष्य अपने इस जीवन में यदि सफलता की बुलन्दियों को छू लेता है तो उसे सबके साथ विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। तभी वह लम्बे समय तक उस स्थान पर बना रह सकता है। उसे सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि समाज में इस पद को पाने के लिए उसे कितना संघर्ष करना पड़ता है।
परन्तु इसके विपरीत यदि वह उस मुकाम पर पहुँचने के बाद इन्सानियत को भूलकर अहंकारी अथवा स्वार्थी हो जाता है तो शीघ्र ही सबकी आँखों की किरकिरी बन जाता है। तब उसे पटकनी देने के लिए बहुत लोग तैयार हो जाते हैं। यथा सम्भव प्रयास यही करना चाहिए कि इन्सान कभी अपनी इन्सानियत को न छोड़े।
चन्द्र प्रभा सूद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें