हर स्थिति का सामना करना
जीवन में मनुष्य को हर प्रकार की स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्थिति चाहे बुरी-से-बुरी हो या अच्छी-से-अच्छी हो, उसे अपना सन्तुलन बनाए रखना चाहिए। उसे उम्मीद का दामन कभी नहीं छोडना चाहिए। आशा की एक किरण के सहारे निस्सन्देह मनुष्य अपने जीवन में कुछ भी कर गुजरता है।
मुझे अकबर और बीरबल का एक किस्सा याद आ रहा है। सर्दी के दिन थे। एक बार अकबर ने कहा, "जो व्यक्ति तालाब में सारी रात खड़ा रहेगा उसे मैं ईनाम दूँगा।"
शहर मे मुनादी करवा दी गई और शर्त बता दी गई। ईनाम की बात सुनकर कई लोगों ने प्रयास किया पर असफल रहे।
एक साहसी युवक ने ईनाम जीतने का निर्णय किया और राजा के पास गया। उसने राजा से कहा, "महाराज, मैं अपनी किस्मत आजमाना चाहता हूॅं।"
युवक की बात सुनकर राजा ने उसे अनुमति दे दी। रात को जब तालाब में खड़ा था तो दूर उसे जलता हुआ दीया दिखाई दिया। यही जलता हुआ दीपक उसकी प्रेरणा का स्त्रोत बन गया और उसने राजा की लगाई हुई शर्त जीत ली।
कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? इस साहसी नवयुवक की तरह सदैव आशा का दीपक अपने मन में जलाए रखना चाहिए। तभी मनुष्य अपने जीवन में सफल हो सकता है।
हर मनुष्य सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ महान बनना चाहता है किन्तु स्वयं परिश्रम नहीं करना चाहता। इस प्रकार निकम्मे बनने से कुछ भी हाथ में नहीं आता। केवल असफलता ही उसे मुँह चिढ़ाती है। मनीषी कहते हैं-
अपने हाथ जगन्नाथ।
और
जितना गुड़ डालो उतना मीठा होता है।'
और भी
मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।
यानी सीधा-स्पष्ट-सा गणित है कि मनुष्य जितनी मेहनत कर लेगा, वह उतनी ही कामयाबी हासिल कर लेगा। अन्यथा ठन-ठन गोपाल रहेगा यानी उसे कुछ भी प्राप्ति नहीं होगी।।
इन्सान की हार्दिक इच्छा होती है कि कोई उसके लिए कुछ कर दे और वह बैठा-बैठा उसके मजे लूटता रहे। वह स्वयं हाथ पर हाथ रखे बैठा रहे और दूसरे उसकी जी हजूरी करते रहें। ऐसा आखिर कब तक चलता रहेगा?
दूसरों से कुछ पाने की आशा रखने पहले मनुष्य को अपने मन में यह विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि जिनसे पाना चाहता है उसने उन सबकी भलाई के लिए कभी कुछ किया है क्या?
पहले अपनी ओर से समाज या दूसरों के लिए कुछ त्यागना पड़ता है, तभी उसे कुछ पाने के लिए सोचना होता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो कामचोर, नालायक, स्वार्थी आदि उपाधियाँ पाता है जो उसे अपमानित करती रहती हैं।
हम यदि कुछ लेने जाते हैं तो पहले उसका मूल्य चुकाते हैं तभी मनचाही वस्तु खरीद सकते हैं। उस समय मनुष्य को -
इस हाथ दे उस हाथ ले
वाला नियम अपनाना पड़ता है। अन्यथा शोकेस में सजी वस्तुओं को देखकर मन को बहलाना पड़ता है। फिर जीवन में इस सिद्धान्त को हम सब कैसे भूल जाते हैं?
जीवन में विद्यमान कुछ अच्छी बातें होती हैं जिनका मूल्य हमारी नजर में होता है। ये अच्छी बातें किसी के लिए ज्ञान हो सकती हैं, किसी के लिए प्रेम हो सकती हैं या फिर किसी और के लिए पैसा हो सकती हैं। इन्हें कुछ भी कह सकते हैं पर उन्हें प्राप्त करने के लिए पहले मनुष्य को अपनी ओर से डटकर पुरुषार्थ करना होता है। निस्सन्देह उसके पश्चात ही मनुष्य को अपने स्वयं के योगदान के बदले उससे अधिक प्राप्त हो सकता है। अन्यथा वह दूसरों का मुॅंह ताकता रह जाता है।
वे मूर्ख जिन्हें अपने बाहुबल पर विश्वास नहीं होता वही दूसरों से आशा रखते हैं और उसके न पूर्ण होने पर निराश होते हैं। उसी हताशा में वे अन्य लोगों को गाली-गलौच करते हैं और उन्हें कोसते हुए अपने मन की भड़ास निकालते हैं। इससे किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, बस इन्सान अपने कर्मों से अपना कद छोटा कर लेता है।
अपनी उड़ान, अपनी आकाँक्षाएँ, अपनी सीमाएँ मनुष्य को स्वयं ही निर्धारित करनी चाहिए। उसी के अनुरूप कर्म करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। सब अच्छा-अच्छा तो किसी मनुष्य के जीवन में नहीं हो सकता। कठिनाइयों का सामना भी उसे जीवन में करना पड़ता है। हम अवश्य सफल होंगे, यह कहकर आशा का दामन कसकर पकड़े रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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