जीव इस संसार में जन्म लेता है और अपने कर्मानुसार ईश्वर प्रदत्त आयु भोगकर इस दुनिया से विदा लेता है। वह जीवन और मृत्यु के बीच में झूलता रहता है।एक शरीर से मुक्त होने के बाद उसका जन्म कब हो कोई नहीं जानता। हमारे ग्रन्थों का मानना है कि जो पुण्यात्मा होते हैं उनका पुनर्जन्म एक शरीर को छोड़ते ही हो जाता है। कुछ लोगों के कर्म ऐसे होते हैं जो वायुमंडल में वर्षो तक भ्रमण करते रहते हैं उन्हें नया शरीर नहीं मिलता। उन्हें हम भूत-प्रेत के नाम से पुकारते हैं। शेष अन्यों को अपने कर्मानुसार निश्चित अवधि के पश्चात पुनर्जन्म मिलता है। वह निश्चित अवधि क्या है व किस समय नया जन्म मिलेगा इस विषय में हमारी यह मानुषी बुद्धि नहीं जान पाती। किस स्थान पर हम जन्म लेंगे यह सब भी भविष्य के गर्भ में सुरक्षित है।
एवंविध मृत्यु कब और किस पल आ जाए यह भी एक रहस्य है। ईश्वर के अतिरिक्त इस भेद का ज्ञान ही किसी को नहीं हो पाता। हम मनुष्यों के लिए तो इसे जान पाना असंभव-सा है। बड़े-बड़े ज्ञानी व ॠषि-मुनि इस रहस्य को खोजने में सारा जीवन बिता देते हैं फिर भी इस सार को समझने में असमर्थ रहते हैं।
सारांशत: हम कह सकते हैं कि हमारी बुद्धि अथवा हमारी सोच से परे है इस पुनर्जन्म का रहस्य समझ पाना। इसे भले ही हम न जान सकें पर इतना निश्चित मान सकते हैं कि हम सभी इस धरती पर कुछ निश्चित समय के लिए आते हैं।
ईश्वर ने हमें अपने कर्मों के अनुसार जो भी समय हमें दिया है उसका सदुपयोग करना चाहिए। अन्यथा हमारा जीवन इस पृथ्वी पर बोझ बन जाएगा। मृत्यु के समय हमें पश्चाताप करने का समय भी नहीं मिल पाएगा। अंतसमय में जीवन व्यर्थ गंवाने का क्षोभ मन में लेकर इस संसार से विदा होकर नवजीवन की ओर जाना होगा।
हम चौरासी लाख योनियों के चक्र में पड़कर इस संसार में ही आवागमन करते रह जाएँगे।ऐसे तो मुक्ति का कोई भी रास्ता नहीं निकल सकेगा।
घर, परिवार, धर्म, देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह हमें नित्य ही निष्ठापूर्वक मन, वचन और कर्म से करना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए।
इस असार संसार में कौन पहले विदा लेगा और कौन बाद में, यह एक अनसुलझी पहेली है। अपने किसी प्रियजन से वियोग कभी भी हो सकता है यह हमें हमेशा याद रखना चाहिए। जीवन में न जाने कौन-सी रात आखिरी होगी इसलिए सबसे मिल-जुलकर रहना चाहिए। अपने झूठे अहम के नशे में इस संसार के भौतिक रिश्ते-नातों की गरिमा और मर्यादा खंडित न होने पाए इसका ध्यान रखना आवश्यक है। हमें यह विश्लेषण समय-समय पर करते रहना चाहिए।
ईश्वर को हमें अपने जीवनकाल में हर कदम पर पल-पल स्मरण करना चाहिए जिससे अंतकाल में जब उसके पास जाने का समय आए तो उस प्रभु से नजरें चुराने की कदापि आवश्यकता महसूस न हो। इस संसार से विदा लेते समय हमारे मन में परमपिता से मिलने की प्रसन्नता का अनुभव हो। यह मलाल न रहे कि काश समय रहते हम चेत जाते तो हम बहुत कुछ कर सकते थे।
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015
जीवन-मृत्यु में झूलता मनुष्य
सोमवार, 23 फ़रवरी 2015
पूजापाठ व्यक्तिगत
धर्म-कर्म, पूजा-पाठ आदि प्रत्येक मनुष्य का व्यक्तिगत मामला है। किसी दूसरे को इसमें दखलअंदाजी करने का कोई अधिकार नहीं है। कौन किस धर्म या सम्प्रदाय को मानता है या किस विशेष देवी-देवता की आराधना करता है इसे व्यक्ति विशेष को ही विचार करने दें तो अधिक उपयुक्त होगा।
कोई सकार ईश्वर की उपासना करता है और कोई निराकार की। कोई कर्मकाण्ड करता है, ईश्वर को नवधा भक्ति से रिझाने का यत्न करता है तो कोई केवल योग के माध्यम से उस तक पहुँचना चाहता है और कोई मात्र जप-तप का मार्ग अपनाता है। कहने का अर्थ है तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र किसी भी मार्ग को अपनाकर प्रभु तक पहुँचने के लिए मानव यत्नशील है। किसी भी मार्ग को अनुचित कहना शोभनीय नहीं है। यह जरूरी नहीं कि हम दूसरे व्यक्ति की सोच से सहमत हों।
विश्व में अनेकों धर्म हैं और उनकी अनुपालना करने वाले भी असंख्य लोग हैं। इसमें झगड़े वाली कोई बात है ही नहीं। ये सभी धर्म मानव के उत्थान की चर्चा करते हैं। उसे यही समझाते हैं कि ईश्वर को पाना ही उसका अंतिम लक्ष्य है।
वह ईश्वर एक है उसका हम अनेकानेक नामों से स्मरण करते हैं। वेद कहता है-
एको हि सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
अर्थात् ईश्वर एक है उसे विद्वान अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं।
इस विषय में हम एक भौतिक उदाहरण लेते हैं। व्यक्ति एक है पर उसे बेटा, मित्र, पिता, भाई, मामा, चाचा, ताऊ, दादा, पति, फूफा, मौसा आदि उसके अनेक संबोधन हैं। इन सबके अतिरिक्त उसके कार्यक्षेत्र के अनुसार भी कई अन्य नामों से अभिहित किया जाता है। जब एक सांसारिक व्यक्ति को हम इतने नाम दे सकते हैं तो जिसने ऐसे अरबों-खरबों जीवों को उत्पन्न किया हैं उसके असंख्य नाम होना तो स्वाभाविक ही है।
सभी धर्म उस प्रभु तक पहुँचने का मार्ग मात्र हैं। इसलिए सभी धर्म समान हैं तथा उनकी श्रेष्ठता से इंकार नहीं किया जा सकता।
मान लीजिए हमने अपने देश भारत की राजधानी दिल्ली जाना है। बताइए कैसे जाएँ? रेल से, बस से, हवाई जहाज से, अपनी कार से या अन्य कोई और ट्रक-टेम्पो आदि वाहन हो सकता है। इनमें से किसी भी साधन से देश या विश्व के किसी भी कोने से दिल्ली आया जा सकता है।
अनगिनत मार्ग हैं इस भौतिक प्रदेश में पहुँचने के लिए। वैसे ही ये सभी धर्म हैं जो अपने-अपने तरीके से उस परमसत्ता तक जाने का मार्ग दर्शाते हैं।
सभी धर्म मानवता, सौहार्द, दया, करुणा, प्राणीमात्र से प्यार करना, अहिंसा आदि मानवोचित गुणों को पालन करने का पाठ पढ़ाते हैं। लड़ाई-झगड़े या नफरत करने की आज्ञा हमें कोई भी धर्म नहीं देता।
कुछ मुट्ठी भर इंसानी दिमाग धर्म के नाम पर नफरत फैलाते हैं जो किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।
किसी भी धर्म को नीचा दिखाकर उन धर्मावलम्बियों का अपमान करना कदापि उचित नहीं। लोगों को लालच देकर या जोर- जबरदस्ती धर्मांतरण करना किसी भी तरह उचित नहीं।
अब यह हमारी मेधा पर निर्भर करता है कि हम उस मार्ग पर चल कर अपना जीवन सफल बना पाते हैं या नहीं।
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015
गृहस्थाश्रम का महत्व
भारतीय पारिवारिक व सामाजिक परिवेश में गृहस्थ आश्रम का महत्व शेष तीनों आश्रमों- ब्रह्मचर्य आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम से अधिक है। इसका कारण सीधा-सा यह है कि गृहस्थ आश्रम अन्य तीनों आश्रमों का पालन करता है।
ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा ग्रहण की जाती है। विद्यार्थी अभी आजीविका कमाने के योग्य नहीं होता। इसलिए वह अपना भरण-पोषण नहीं कर सकता और अपने माता-पिता पर आश्रित रहता है।
वानप्रस्थ आश्रम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सामाजिक कार्यों में जुटने का समय होता है। सारी आयु संघर्ष करने के उपरांत घर-परिवार की कमान अपने योग्य बच्चों को सौंपकर ईश्वर की ओर उन्मुख होने का प्रयास करना आवश्यक होता है। अत: रिटायर्ड लाइफ व नाती-नातिनों के साथ जीवन का आनन्द उठाना एक अलग ही अनुभव होता है।
सन्यास आश्रम में घर-परिवार का त्याग करके समाज को दिशा देने का कार्य किया जाता है। सन्यासी स्वाध्याय करके मनन करते हैं व ईश्वर की उपासना में जुटे रहते हैं। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ये समाज के पूज्य गृहस्थियों पर ही आश्रित रहते हैं।
गृहस्थी का मूल आधार पति-पत्नी होते हैं। इन दोनों के संबंधों में जितनी अधिक मधुरता होगी घर-परिवार में उतना ही सौहार्द होगा।प्रश्न यह है कि पति-पत्नी के संबंध कैसे हों? महाकवि कालिदास ने शिव व पार्वती को आदर्श पति-पत्नी मानते हुए उनकी स्तुति की है-
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।
अर्थात् जिस प्रकार शब्द और अर्थ आपस में मिले होते हैं, उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता वैसे ही माँ भगवती और भगवान शिव की एक-दूसरे के बिना कल्पना करना संभव नहीं है। ऐसे शिव और पार्वती को मैं प्रणाम करता हूँ।
हमारे भारत में आदर्श पति-पत्नी के उदाहरण स्वरूप शिव-पार्वती, राम-सीता आदि का उल्लेख किया जाता है। आदर्श मानते हुए हम उनकी पूजा करते हैं।
गृहस्थी की गाड़ी चलाने वाले पति-पत्नी का आपसी व्यवहार संतुलित, दुराव-छिपाव रहित, निष्ठापूर्ण, सामंजस्य पूर्ण और परस्पर मित्रवत् होना आदर्श स्थिति है। दोनों को अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर एक-दूसरे का सच्चा हमसफर बनना चाहिए। यदि गुरू नानक देव जी के शब्दों में कहें तो उचित होगा- 'एक ने कही दूसरे ने मानी। नानक कहें दोनों ज्ञानी।'
इस तरह के परिवारों में सुख,शांति व समृद्धि का वास होता है। बच्चे आज्ञाकारी व यशस्वी होते हैं। हम सभी प्रबुद्ध जन मन से विचार करेंगे तो ऐसा समझ में आएगा कि आधुनिक परिवेश में आज सद्गृहस्थियों की बहुत आवश्यकता है। सामाजिक ढांचा चरमराने न पाए इसका हमें ही ध्यान रखना है।
शनिवार, 7 फ़रवरी 2015
पर निन्दा
मानवीय कमजोरी है कि वह अपने गुणों का बढ़ा-चढ़ा कर बखान करता है और अपने दोषों को नजरअंदाज करता है। इसके विपरीत दूसरे के गुण उसे नगण्य प्रतीत होते हैं और उनके दोषों को पहाड़ की तरह बढ़ा-चढ़ा कर बताने में उसे आत्मिक सुख का अनुभव होता है।
हम दूसरों की कमियों को उजागर करने में कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहते। उन्हें नमक-मिर्च लगाकर चटकारे लेकर सुनाते हैं। हम हमेशा इस बतरस का आनन्द उठाते हैं। जब अपनी बारी आती है तो उसे सहन नहीं कर पाते। तब दूसरों को भला-बुरा कहकर या गाली-गलौच करके अपनी भड़ास निकालते हैं।
वैसे देखा जाए तो इंसान गलतियों का पुतला है। जाने-अनजाने पता नहीं वह कितनी गलतियाँ करता है और जिनका प्रायश्चित्त भी उसे करना पड़ता है। कभी-कभी उसे उनका मूल्य भी चुकाना पड़ता है। यदि निम्न दोहे को याद रखा जाए तो मनुष्य दूसरों के छिद्रान्वेषण करने के बजाय अपनी कमियाँ देखेगा-
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोए।
जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोए॥
स्वयं को खोजने पर ही ज्ञात होता है कि हम स्वयं भी बहुत-सी गलतियाँ करते हैं और बार-बार उन्हें दोहराते भी हैं। यदि इंसान गलती न करे तो वह भगवान बन जाएगा। भगवान हर दोष एवं हर विकार से परे है। परन्तु मनुष्य चाहकर भी दोषों-विकारों से मुक्त नहीं हो पाता और कभी लालचवश और कभी स्वार्थवश रास्ते से भटककर दोषी बन जाता है।
समस्या केवल यह है कि दूसरों की निन्दा करना हमें अपना शगल लगता है। इस बात को हम भूल जाते हैं कि दूसरे की ओर जब हम एक अंगुली उठाते हैं तो बाकी चार अंगुलियाँ हमारी ओर उठी रहती हैं। जिसका सीधा-सा तात्पर्य है कि वे हमें चेतावनी दे रही हैं कि हम संभल जाएँ क्योंकि हम दूसरों के बनिस्बत चार गुणा अधिक गलतियाँ कर रहे हैं।
फिर भी हम समझ नहीं पाते और पुनः पुनः गलतियों को दोहराते हैं।
निम्न दोहे में हमें समझाया है कि निन्दा करने वाले से घबराना नहीं चाहिए उसे अपने बहुत पास रखना चाहिए-
निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाए।
पानी औ साबुन बिना निर्मल करे सुभाए॥
निन्दक दूसरों को उनकी कमियाँ बताकर उन्हें सुधरने का मौका देता है। वैसे तो सफाई का कार्य साबुन और पानी से करते हैं पर निन्दक हमारा शुभचिंतक होता है जो उनके बिना ही हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है।
दूसरों के दोषों को बताते-बताते वह स्वयं को भूल जाता है और एक के बाद एक गलती करता रहता है। दूसरे तो अपनी गलती को सुधारने का यत्न करते हैं पर वह अपनी ही धुन में रहता हुआ पतन की ओर बढ़ता है।
अपने दोषों पर गहरी नजर रखकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना समझदारी है। दूसरों की निन्दा-चुगली में अपना समय बरबाद न करके सकारात्मक कार्यों में लगाना चाहिए जिससे हम सर्वांगीण विकास कर सकते हैं।
दूसरों की निन्दा-चुगली करने वालों से ईश्वर कदापि प्रसन्न नहीं होता। अत: आत्मोत्थान करने वालों को इस बुराई से यथासंभव बचना चाहिए।
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015
मेरा मौन
सोचती हूँ काश मेरा मौन भी हो जाए मुखर
भाषा उसकी पढ़े औ पा सके उसकी खबर
अब तलक न खोज पाई थी मैं अपना सबर
कह दो करते हैं सदा हम आप सबकी कदर
ऐसा कुछ कहा नहीं जो मच गया है ये गदर
जाने कब बन बैठे अब तुम खुद ही यूँ सदर
चाल चलते जा रहे हम इस तरह से बेखबर
कर दिया है जो अपना था वही तुमको नजर
वाचाल ही बनके न खाएँ ठोकरें यूँ दरबदर
न होगा तब भला जब पा सकोगे न ये कदर
खिंच जाएगा तब सब बन कर ही यह रबर
जालिम जमाना है बड़ा जो ले सबकी खबर
तुम चलो तनिक हाथ थामे मेरा मेरे मौनवर
लिख दिया नाम तुम्हारा मेरे हृदय-पटल पर
जाने कब कुछ दरक जाए काँच-सा पल हर
पलटवार कर भाग जाओगे तब किसके दर
बनाया तुझे है साथी यूँ न छोड़ दे मझधार
तू ही निभा दे अब मेरे जीवन के ये किरदार
सहलाता मुझे न करता यह पल-पल खटर
काश मेरा मौन ही सबकी रख पाता खबर
बुधवार, 4 फ़रवरी 2015
दानी कैसा हो
सृष्टि का नियम है कि दाता(दानी) का हाथ हमेशा ऊपर होता है और लेने वाले का हमेशा नीचे। यही प्रकृति के व्यवहार से भी स्पष्ट दिखाई देता है।
हमारे सामने प्रत्यक्ष है कि बादल हमें हमारी जीवनी शक्ति जल देता है इसलिए वह ऊपर रहता है और पृथ्वी जल लेने वाली है व नीचे होती है।
अपने आसपास पेड़ों की ओर एक नजर डालें तो स्वयं ही समझ आ जाती है कि वह हमें शीतल छाया, हवा व मधुर फल देते हैं। वे सिर उठाकर ऊपर रहते हैं और हम याचक की भाँति उन्हें नीचे धरा पर खड़े रहकर निहारते हैं।
जिससे भी हम याचना करते हैं उसके समक्ष हमारी नजरें भी झुकती हैं और हाथ भी आगे फैलाना पड़ता है अर्थात् नीचा होना पड़ता है पर दानी को किसी की सहायता करने का एक सुखद अहसास देता है।
प्रायः लोग जब बहुत ही मजबूरी या तकलीफ में होते हैं तो उन्हें माँगने की आवश्यकता पड़ती है। उस समय वे पल स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए मरने के समान होता है। कहते भी हैं-
'माँगन गए सो मर गए मरकर माँगन जाए।'
वे लोग जो चाटुकारिता प्रिय होते हैं अथवा मेहनत करके कमाना नहीं चाहते उन्हें माँगने से कोई परहेज़ नहीं होता। उसी की बदौलत उनका जीवन यापन होता है। उनको अपने मान-सम्मान की कोई परवाह नहीं होती। उनके जीवन का तो यही मूल मन्त्र होता है-
'बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया।'
वे लोग किसी भी शर्त पर धन पाने की सोचते हैं बाकी सब उनकी नजर में बेमानी हो जाता है।
स्वाभिमानी व्यक्ति हाथ का मैल कहे जाने वाले धन को मिट्टी के ढेले के समान समझते हैं। वे केवल मान को ही महत्व देते हैं।
दानी व्यक्ति को कभी अपनी प्रशंसा में हमेशा प्रशस्तियाँ नहीं गानी चाहिएँ।यदि सारा समय वह यहाँ-वहाँ अपनी उदारता का ढिंढोरा पीटता रहेगा तो उसमें अहंकार आ जाता है जो उसके विनाश का कारण बनता है।
उसकी की गई सहायता का कोई मूल्य नहीं रह जाता यदि वह उसे पुनः पुनः जताकर सहायता लेने वाले को शर्मिंदा करे। उसे हमेशा 'नेकी कर और दरिया में डाल' उक्ति याद रखनी चाहिए।
प्रकृति नित्य प्रति हमें भरपूर देती है परन्तु कभी अहसान नहीं जताती। जितने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते उससे भी कहीं अधिक देती है। यदि वह जताती तो संसार पलभर में नष्ट हो जाता इतने वर्षों तक नहीं चलता।
प्रकृति की ही तरह मनुष्य को देते समय यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि वह देने वाला है। नहीं, दाता होने का अहम छोड़कर उसे सोचना चाहिए कि देने वाला तो ईश्वर है जो अदृश्य रहकर मानव के मन में प्रेरणा देता है तभी वह दानादि जैसा पुण्य कर्म करता है। मनुष्य तो केवल उस मालिक के हाथों की कठपुतली है और यही सत्य है। उसे हमेशा विनम्र रहना चाहिए।
हम अपनी शुद्ध कमाई से कुछ अंश बचाकर दूसरों की सहायता करें। उन्हें समर्थ बनाने का यत्न करें। हमेशा देते समय दाता होने का भाव मन से निकाल कर नजरें झुकाए रखें और उस ईश्वर का धन्यवाद करें जिसने हमें इस योग्य बनाया है कि हम किसी के काम आ सके।
सोमवार, 2 फ़रवरी 2015
माता-पिता का सम्मान
एक मित्र ने आग्रह किया कि कृपया माता-पिता के आदर हेतु भी आप लोगो को प्रेरित करें।
उनके इस सुझाव के अनुसार प्रस्तुत हैं मेरे उदगार। माता-पिता हमें इस संसार में लाकर हम पर बहुत उपकार करते हैं। उनके इस ॠण को मनुष्य चुका नहीं सकता चाहे वह सारी आयु उनकी सेवा करता रहे। माँ पालन-पोषण करती है, स्वयं गीले में रहकर हमारे सुख का ध्यान रखती है। वह हमें अक्षर ज्ञान भी कराती है। इसलिए वह हमारी प्रथम गुरू है, महान है और पूज्या है। पिता हमारा पोषक है इसलिए वह आकाश से भी ऊँचा है और महान है।
हमारे धर्म ग्रंथ माता-पिता को देवता मानने का आदेश देते हैं। मंदिरों में जाकर पत्थर के देवी-देवताओं की हम पूजा करते हैं परंतु घर में बैठे जीवित देवताओं यानि माता-पिता की अवहेलना करते हैं। उनकी सेवा करने के स्थान पर उन्हें दाने-दाने का मोहताज बना देते हैं। घर में उन्हें रहने का ठिकाना भी नहीं देना चाहते। उनकी जरूरतों को पूरा करने में हम कोताही करते हैं। आजकल विदेशियों की नकल पर कुछ बच्चे माता-पिता को ओल्ड होम में भेज देते हैं जो हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार शोचनीय स्थिति है।
दोनों पति-पत्नी यदि कमाते हैं तो भी माता-पिता को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं बचते जबकि अपने खर्च में उनकी कोई कमी नहीं होती। उनके अपने सभी कार्य अपने निश्चित ढर्रे पर चलते रहते हैं। यह बहुत निन्दनीय है। व्यापारियों की हालत भी कोई अधिक अच्छी नहीं है । जमा-जमाया कारोबार सम्हालने पर भी उन्हें अपने ही माँ-पापा बुरे लगने लगते हैं।
बच्चे अपने माता-पिता से सारी उम्मीदें रखते हैं। उनके मरने के पश्चात लाखों रुपये अपनी शान बघारने के लिए खर्च कर देंगे ताकि समाज में उनकी नाक ऊँची रहे।
बच्चे अपने माता-पिता से सारी उम्मीदें रखते हैं। उनके पास जो धन-संपत्ति या कारोबार आदि है, सब समेटना चाहते हैं। वे हर समय माता-पिता को उनके कर्तव्य याद दिलाना चाहते हैं परंतु अपने सारे दायित्वों से विमुख हो जाते हैं। जिन माता-पिता को जीते-जी पानी भी नसीब नहीं होत उनके मरने के पश्चात उनके बच्चे लाखों रुपये अपनी शान बघारने के लिए खर्च कर देते हैं ताकि समाज में उनकी नाक ऊँची रहे।
अपने बच्चों के समक्ष ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने के स्थान पर उन्हें ऐसे आदर्श सिखाएँ कि वे अपने माता-पिता का अनादर करने की हिम्मत न कर सकें। वे समाज के डर से नहीं अपने मन से माता-पिता की सेवा करें और उनके प्रति अपने दायित्वों को पूरा करें।
मैं निराशावादी बिल्कुल नहीं हूँ। आज भी ऐसी संतानें हैं जो अपने माता-पिता के लिए हर सुख का बलिदान कर उनके लिए जीते हैं और हर समय उनके सुख-साधनों को जुटाते हैं। ऐसे ही बच्चों के कारण हमारी सांस्कृतिक विरासत बची हुई है और भारतीय पारिवारिक ढाँचा बरकरार है।