मनुष्य को उसके भाग्य के अनुसार समय पर ही मिलता है। न उससे रत्तीभर कम और न ही उससे अधिक। उसके भाग्य में जो होता हैं वह बिना कहे ही पता नहीं कैसे भी करके उसके पास आ जाता है। परन्तु जो उसके भाग्य में नही होता, वह उसके पास आकर भी हाथ से निकल जाता है। वह बस मूक दर्शक की तरह देखता और बिलबिलाता रह जाता है।
बचपन में एक कथा सुनी थी कि किसी राजा की एक बेटी ने उससे कहा था कि पिता उसे नमक की तरह अच्छा लगता है तो वह नाराज हो गया था। पिता ने उस नाराजगी के कारण उसे दण्ड देने का निश्चय किया। राजा ने उसकी शादी एक राह चलते किसी भिखारी जैसे दिखने वाले किसी इन्सान से करवा दी।
माँ तो आखिर माँ होती है, उसे बेटी के दुर्भाग्य पर बहुत रोना आया। उसने राजा से छिपाकर कुछ धन उसे दे दिया। ताकि उसे शादी के एकदम बाद उसे किसी तरह से परेशान न होना पड़े।
वह राजकुमारी अपने पति के साथ नया जीवन आरम्भ करने के लिए निकल पड़ी। कोई ठिकाना नहीं था, कोई आसरा नहीं था। एक-दो दिन बाद ही माँ द्वारा दिया गया धन भी चोरी हो गया। अब उन दोनों के पास अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।
राजकुमारी बहुत हिम्मत वाली थी। उसने हांर नहीं मानी और अपने पति के साथ मिलकर बहुत श्रम किया। अन्ततः उन्होंने अपना मनचाहा प्राप्त कर लिया। यानि एक सुन्दर-सा महल बना लिया और अपने राजसी ठाठ-बाट जुटा लिए। फिर एक दिन बिना अपना परिचय दिए, पति को भेजकर अपने पिता को भोजन के लिए आमन्त्रण भिजवा दिया।
पिता बेटी का वह ऐश्वर्य देखकर प्रभावित हुए बिना न रह सका। अब भोजन करने की बारी थी। सामने न आते हुए बेटी ने बहुत सारे व्यञ्जन खाने के लिए भेजे। उनमें एक भी नमकीन खाद्य नहीं था। राजा इतने सारे मीठे व्यञ्जन खाकर उकता गया और पूछ बैठा कि नमकीन कुछ भी नहीं है क्या?
तब वह बेटी बाहर आई और पिता से बोली कि मैं आपकी वही बेटी हूँ जिसने आपको कहा था कि आप मुझे नमक की तरह अच्छे लगते हो तो आपने मुझे घर से बाहर निकल दिया था। केवल मीठा कोई नहीं खा सकता पर नमकीन कितना भी हो खाया जा सकता है। जब तक मीठे के साथ नमकीन न हो तो उसे खाना कठिन हो जाता है।
उसकी बात सुनकर पिता को अपनी उस गलती का अहसास हुआ और पश्चाताप भी। उसने बेटी से अपने उस कुकृत्य के लिए क्षमा माँगी और उसे अपने गले से लगा लिया।
कहने का तात्पर्य यही है कि जब राजकुमारी के भाग्य में नहीं था तो राजा की बेटी होते हुए भी सभी सुखों-ऐश्वर्यों से उसे वंचित होना पड़ा। इससे भी बढ़कर माँ के द्वारा की गई सहायता भी उसके काम न आ सकी। जब भाग्य देने पर आया तो उसने उस राजकुमारी को सब कुछ दे दिया और मालामाल कर दिया।
इसे हम भाग्य का फेर भी कह सकते हैं जिसने राजकुमारी को बैठे-बिठाए भिखारिन जैसी स्थिति में पहुँचा दिया। और फिर समय बीतते राजमहल के सारे ठाठ दे दिए। जैसे भगवान श्रीराम का अगली प्रातः राज्यतिलक होना था पर होनी ने उन्हें दरबदर कर चौदह वर्ष के लिए वनवास दे दिया।
इसी प्रकार रजा हरिश्चन्द्र को पत्नी और पुत्र सहित राज्य से बेदखल कर दिया। उन्हें चाण्डाल के यहाँ नौकरी करनी पड़ी। और भी अपनी पत्नी व पुत्र को दास की तरह बेचना पड़ा। हालाँकि उनके इस कार्य का समर्थन मैं नहीं कर रही। पर होनी को कैन ताल सकता है?
राजा हरिश्चन्द्र के जीवन की घटना लिखने का उद्देश्य मात्र इतना ही है कि भाग्य कैसे-कैसे खेल इन्सान को खेलने के लिए विवश करता है। मनुष्य बस कठपुतली बना उसकी डोर पर नाचता रहता है। उसके पास इसके अतिरिक्त और कोई चारा भी तो नहीं है। वह चाहकर भी इसका प्रतिवाद नहीं कर सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 6 अगस्त 2016
होनी जो न कराए
शुक्रवार, 5 अगस्त 2016
क्रोध और हर्ष का अतिरेक
मनुष्य जब क्रोध में हो तब उस समय उसे कोई अहं फैसला नहीं लेना चाहिए। कहते हैं कि क्रोध अन्धा होता है, वह मनुष्य के विवेक का हरण का लेता है। तब वह कुछ भी सोचने-समझने के काबिल नहीं रहता। वह अपने-पराए का भेद करने में असमर्थ हो जाता है।
उस क्रोध की अधिकता के समय लिया गया कोई भी निर्णय उसके विरुद्ध जा सकता है। दुर्भाग्यपूर्ण लिए गए अपने उस निर्णय के कारण फिर उसे जीवन भर प्रायश्चित करना पड़ सकता है।
इसी प्रकार जब मनुष्य किसी विशेष उपलब्धि अथवा किसी कारण से प्रसन्न हो तब उसे किसी से कोई वादा नहीं करना चाहिए। अधिक ख़ुशी में इन्सान के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। तब ऐसा लगता है कि मानो उसे पंख मिल गए हैं और वह उड़ता फिरता है। उस समय भावना में बहकर किया गया वही वादा ही उसके जी का जंजाल बन जाता है।
रामायणकाल में महाराजा दशरथ की अन्तकाल में हुई दुर्दशा को आज तक स्मरण किया जाता है। इस बात को सदा याद रखना चाहिए कि सोच-समझकर वादा करने वाले को कभी किसी के सामने नीचा नहीं देखना पड़ता। न ही उन्हें किसी के समक्ष नजरें नहीं झुकाकर शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।
यदि कोई व्यक्ति किसी भी कारण से क्रोध दिलाना चाहे तो उसके झाँसे में नहीं आना चाहिए। यदि वह अपने उद्देश्य यानि गुस्सा दिलाने मे सफल रहता हैं तो निश्चित मानिए कि वह व्यक्ति विशेष उसके हाथ की कठपुतली बनता जा रहा है। वह जब चाहे उसे नाच नचा सकता है। फिर वह नैतिक-अनैतिक कोई भी अपना मनचाहा कार्य उससे करवा सकता है।
क्रोध और प्रसन्नता मानव मन की दो अवस्थाएँ हैं। क्रोध में मनुष्य को अपना आपा नहीं खोना चाहिए, होश में रहना चाहिए। क्रोध के कारण दुर्वासा ऋषि को आजतक सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। इसी क्रोध के कारण ही मनुष्य के मन में प्रतिशोध लेने की दुर्भावना बलवती होने लगती है।
इस भावातिरेक में वह अपना विरोध करने वाले किसी का भी कत्ल तक कर बैठता है और फिर कानून का मुजरिम बनकर सारी जिन्दगी सलाखों के पीछे बिता देता है। उसके घर-परिवार के लोग और उसके भाई-बन्धु उससे शीघ्र किनारा कर लेते हैं। जिनके लिए वह अपना सारा जीवन दाँव पर लगा देता है, वही उस कृत्य के लिए उसकी भर्त्सना करते हुए नहीं थकते।
प्रसन्नता भी मनुष्य के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है। बहुत से लोग होते हैं जिन्हें ख़ुशी भी रास नहीं आती। इन ख़ुशी के पलों में उनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वे पतंग की तरह ऊँचे उड़ने लगते हैं और सोचते हैं कि उनकी डोर को कोई काटने का साहस नहीं कर सकता।
दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वे गुब्बारे की तरह फूलकर कुप्पा हो जाते हैं। किन्तु वे भूल जाते हैं कि कोई अपना ही उसमें पिन चुभोकर उन्हें धराशाही कर देगा और वे केवल देखते ही रह जाएँगे, कुछ कर नहीं पाएँगे।
इस प्रसन्नता के आवेग में भी गलत फैसले ले लिए जाते हैं जो निकट भविष्य में जी का जंजाल बन जाते हैं। उस समय मनुष्य भूल जाता है कि उसकी यह ख़ुशी ही उसके दुःख का कारण बन जाती है और वह मूक दर्शक बना बस हाथ मलता रह जाता है, कोई उपाय करने के लिए उसकी बुद्धि नाकाम हो जाती है।
मनुष्य के जीवन में क्रोध का आवेग हो अथवा प्रसन्नता का अतिरेक हो दोनों ही स्थितियों में उसे स्वयं पर नियन्त्रण रखना चाहिए। क्रोध यमराज का दूसरा रूप होता है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। अति प्रसन्नता भी विनाश का कारण बनती है। इसलिए दोनों की अति से यत्नपूर्वक बचना चाहिए, इसी में समझदारी और सबका कल्याण है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 4 अगस्त 2016
परिवार संयुक्त अथवा एकल
कुछ दशक पूर्व हमारे भारत देश में जब संयुक्त परिवार की प्रथा प्रचलन में थी तब घर-परिवार के सब लोग मिल-जुलकर रहते थे। सबके सुख-दुःख साझा होते थे और आपसी सौहार्द और भाईचारे के चलते वे सरलता से कट जाया करते थे। इसी प्रकार शादी-ब्याह आदि सभी शुभकार्य और त्यौहार भी भरपूर मस्ती से, आनन्द से मनाए जाते थे।
आज के समय की तरह बेशक बहुत अधिक लोग तब पढ़े-लिखे नहीं थे, उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, फिर भी परिवार एक सूत्र में बंधा हुआ होता था। आज की पीढ़ी उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपने योग्य होने के अहं का शिकार हो रही है। वे मात्र अपने स्वार्थ पूर्ण करना चाहती है। उसे उससे आगे कुछ सूझता ही नहीं है।
शायद युवावर्ग के इस स्वार्थी रवैये के कारण ही संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। उनके स्थान पर विदेशों की नकल करते हुए एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इन एकल परिवारों की ऊपरी चमक-दमक मन को अवश्य ही ललचाती है। यह भी लगता है की हम स्वतन्त्र हैं और जैसा चाहें अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकते हैं। किसी का कोई बन्धन नहीं है, न ही कोई रोकटोक है।
यह आजादी लगती तो बहुत अच्छी है परन्तु उससे होने वाली परेशानियाँ कहीं अधिक होती हैं। संयुक्त परिवारों के होते हुए किसी माता-पिता को अपने बच्चों के खाने-पीने, आराम करने, खेलने आदि की चिन्ता नहीं रहती थी।
माता-पिता अपना सारा ध्यान अपने कार्य पर लगा सकते हैं। जहाँ बड़े भाई-बहन होते हैं वहाँ बच्चों की गृहकार्य और पढ़ाई की चिन्ता भी समाप्त हो जाती है। लड़ते-झगड़ते बच्चे कब बड़े हो जाते हैं पता भी नहीं चलता। इन परिवारों के बच्चों को परस्पर मिलकर रहना, दूसरों को सहन करना, मिल-बाँटकर खाना, दूसरों के साथ सामञ्जस्य स्थापित करना आदि गुण बड़ों की देखादेखी अपने आप आ जाते हैं।
जबकि एकल परिवार के बच्चे अत्यधिक लड़-प्यार और ध्यान दिए जाने के कारण असहिष्णु, जिद्दी और नकचड़े हो जाते हैं। प्रायः उन बच्चों को किसी से भी मिलना पसन्द नहीं आता। यदि दो दिन के लिए भी मेहमान घर आ जाएँ तो वे परेशान हो जाते हैं। इसलिए वे किसी पार्टी या रिश्तेदारी में जाना नहीं चाहते। उन्हें सिर्फ अपने से मतलब होता है किसी दूसरे से नहीं।
संयुक्त परिवार में रहते हुए घर में ताला लगाकर जाने की आवश्यकता नहीं होती। कहीं जाना हो तो बच्चों को घर पर छोड़ देने पर भी उनकी चिंता से मुक्त रहा जा सकता है। ऐसे परिवार हर दृष्टि से सुरक्षित होते हैं। कहते हैं- ‘एकता में बल होता है।’
जिस तरह बच्चों की परवरिश संयुक्त परिवार में सरलता हो जाती है उसी प्रकार घर में बीमार व्यक्ति की तीमारदारी, बड़े- बुजुर्गों की देखभाल, आने वाले अतिथियों का स्वागत सत्कार, घर में किसी सदस्य के साथ कोई अनहोनी घटना का घट जाना आदि के समय सभी परिवारी जनों के सहयोग से इनका निभाव सरलता से हो जाता है। किसी एक को सारा समय खटना नहीं पड़ता।
एकल परिवार में रहते हुए यह सारी समस्याएँ सुलझाने में बहुत कठिनाई होती है। सबसे बड़ी बच्चों की चिन्ता सताती रहती है। जितनी अधिक बाजुएँ होंगीं, कार्य उसी अनुपात में होगा। वैसे आज का युवा अपना भला-बुरा अच्छी तरह समझता है। इसलिए वे संयुक्त परिवार की ओर लौट रहा है।
हाँ, जो युवा रोजी-रोटी के चक्कर में घर से दूर रहते हैं, उनकी बात अलग है। वहाँ दूरी से अधिक उनकी अपनी मज़बूरी होती है जिसके लिए सदा उसे कोसते नहीं रहना उचित नहीं होता।
जहाँ तक सम्भव हो अपने निजी स्वार्थो और झूठे अहं को आड़े न आने देकर परिवार का सुरक्षा कवच अपनाएँ। इस प्रक्रिया में यदि अपने मन को मारकर बच्चों की सुरक्षा और उनके भविष्य के लिए समझौता भी करना पड़े तो यह सौदा मँहगा नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 3 अगस्त 2016
माता-पिता की ममता और क्षमता
इस असार संसार में असम्भव काम दो ही हैं - पहला है अपनी माता की ममता का मूल्य आँकना और दूसरा है पिता की क्षमता का अनुमान लगा सकना।
आज की युवा पीढ़ी यह समझती है कि वह बड़ी हो रही हैं तो उसे समझदार कहलाने का लाइसेंस मिल गया है। परन्तु यह सोच तो किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराई जा सकती। बच्चे भूल जाते हैं कि जीवन के जिस पायदान पर वे खड़े हैं उनके माता-पिता उसे पार करके वहाँ से कहीं आगे निकल आए हैं।
उन्हें शायद अपनी इस बेतुकी सोच पर अधिक गर्व होता है कि वे बहुत योग्य हैं और दुनिया के बाकी सभी लोग उनके सामने हुक्का भरते हैं यानि मूर्ख हैं। यह कथन सर्वथा सत्य है कि पैदा होते ही वे बच्चे अपने बूते पर पूरी तरह से योग्य नहीं बन गए थे। उन्हें योग्यता के सोपानों पर सफलता से चढ़ने की ट्रेनिंग इन्हीं माता-पिता ने दी थी जिनका सम्मान करने में उनकी हेठी होती है।
बच्चों को सदा यह बात याद रखनी चाहिए कि माता-पिता ने इस संसार में उन्हें जन्म देकर, उन्हें पढ़ा-लिखकर इस योग्य बनाया है कि वे आज सिर उठाकर समाज में जी रहे हैं। जो बच्चे माता-पिता को मान नहीं दे सकते उन्हेँ न समाज क्षमा करता है और न ही ईश्वर। उनकी सारी पूजा-अर्चना भी ईश्वर की दृष्टि में व्यर्थ हो जाती है यदि वे अपने माता-पिता का दिल दुखाते हैं या उनकी अवहेलना करते हैं।
दुनिया में सिर्फ माता-पिता ही ऐसे हितचिन्तक होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ अपने बच्चों से प्यार करते हैं। माता-पिता बच्चों के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं। वे उनके लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। स्वयं भूखे रहकर भी बच्चों को भूखे नहीं सोने देते। उनके सुख-दुःख को अपना मानते हुए सब स्वयं झेल जाते हैं, उन्हें गर्म हवा तक नहीं लगने देना चाहते।
उनके लिए सब प्रकार साधन जुटाकर वे प्रसन्न होते हैं। इसलिए उनके प्यार और उनकी ममता की परीक्षा लेने के लिए उन बेचारों का अनावश्यक लाभ नहीं उठाना चाहिए और न ही उसका मोल नहीं लगाना चाहिए।
अपनी सफलता का रौब अपने माता-पिता को कभी नहीं दिखाना चाहिए क्योंकि उन्होनें अपनी जिंदगी को हारकर ही अपनी सन्तान को जिताया होता है। इसीलिए कहा जाता है की जीतने वाले से जिताने वाले का महत्त्व अधिक होता है।
जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ो उसी को ही धक्का मरकर गिरा देने वाली प्रवृत्ति से बच्चों को बचना चाहिए। उन्हें अपने लिए बस यही सोचना चाहिए कि जीवन के किसी मोड़ पर यदि उनके साथ ऐसा हो गया तो वे क्या करेंगे?
समय रहते बच्चों को चेत जाना चाहिए कि माता-पिता से बड़कर कोई और उनका शुभ चाहने वाला नहीं हो सकता। दुनिया तो स्वार्थ की बुनियाद पर चलती है। मित्रों, सम्बन्धियों, भाई, बन्धुओं से जितना व्यवहार करोगे उतना करवा लोगे। यदि उसमें कभी कुछ कोर-कसर रह गयी अथवा किसी अवसर पर उनका मनचाहा उन्हें न दे सके तो उन सम्बन्धों में दरार आने लगती हैं।
इसके विपरीत माता-पिता की बादशाही होती है। उनके साथ व्यवहार रखो चाहे न रखो, उनकी तरफ से सम्बन्ध कभी समाप्त नहीं होते। उनका मन भी यदि बच्चे दुखाते हैं तो भी उनके मन से कभी बददुआ नहीं निकलती। वे सदा ही अपने बच्चों को आशीर्वाद देते हैं। इसीलिए शास्त्र उन्हें भगवान मानते हैं और उनकी पूजा करने का परामर्श देते हैं।
वे बच्चे बड़े अभागे होते हैं जिनके माता-पिता उनके होते हुए दरबदर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। दो जून खाने, बीमारी में इलाज के लिए और बच्चों से अपनेपन के अहसास के लिए तरसते हैं। बच्चों के पास चाहे लाखों-करोड़ों हों पर यदि माता-पिता के लिए कुछ नहीं तो सब व्यर्थ है। ऐसे निर्लज्ज और दुष्ट बच्चे ईश्वर किसी को न दे।
यह बात हमेशा गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि उन्हें ज़िन्दगी का ककहरा पढ़ाने वाले माता-पिता अपने प्यार में सन्तान से चाहे हर जाएँ किन्तु उन्हें मूर्ख अथवा जाहिल समझने की भूल वे कभी न करें। वे चाहें तो उन्हें नाकों चने चबवा सकते हैं। यदि बच्चों को समाज और घर-परिवार का डर नहीं है तो बैंक उनके बुढ़ापे का सहारा बनने और उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ देने के लिए बाहें फैलाए बैठे हैं। कानून उनकी सुरक्षा करने के लिए हर प्रकार से सन्नद्ध है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 2 अगस्त 2016
खुशियाँ और धन सम्हालें
मनुष्य को अपनी खुशियों और धन को सदा सम्हालकर रखना चाहिए। खुशियों के पल बहुत काम समय के लिए जीवन में आते हैं। इन्हें सहेजकर रखना चाहिए, किसी भी मूल्य पर अपने हाथ से इन्हें गँवाना नहीं चाहिए। मनुष्य को अपने व्यवहार और अपनी सोच पर नियन्त्रण रखना चाहिए। यदि कोई उसकी सत्ता को न मानकर उसे चुनौती देता है तो तब भी उसे अपना आपा नहीं खोना चाहिए।
मनुष्य को सदा प्रसन्न रहना चाहिए और अपनी जिन्दगी से निराश नहीं होना चाहिए। जीवन में सफल व्यक्ति कहलाने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। परन्तु पैसे को सदा अपनी जेब में रखना चाहिए। उसे अपने मन-मस्तिष्क पर सवार नहीं होने देना चाहिए।
यदि मनुष्य इस धन का उपयोग घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने और दान आदि कार्यों में व्यय करता है तो उसका सदुपयोग होता है। इसके विपरीत यदि यह धन सिर पर चढ़कर बोलने लगे तो इन्सान का दिमाग खराब होने लगता है। वह अपने बराबर किसी दूसरे को नहीं समझता।
उसके बच्चे भी उसकी देखादेखी घमण्डी बनने लगते हैं जो किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। वह हर किसी को देख लेने की धमकी देने लगता है। यहाँ तक कि स्वयं को भी खुदा समझने लगता है। ईश्वर की सत्ता को भी चुनौती देने से परहेज नहीं करता।
यहाँ एक बात बताना चाहती हूँ कि मनुष्य अपनी कमाई से गरीब नही होता बल्कि अपनी जरूरत के अनुसार गरीब होता है। जब जब मनुष्य अपनी कामनाओं को असीम बनाता जाता है तब तक वह चैन से नहीं बैठ सकता। यही उसकी परेशानी का कारण बन जाता है।
इसी भाव को हम दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि यदि इन्सान अपनी कमाई से अधिक पैर फैलता है तो सदा ही उसे दुःख-तकलीफों का सामना करता है।
यानि वह कर्जों के बोझ तले दबा रह सकता है। तब उसकी परेशानियों का चक्र घूमने लगता है और उसका जीवन नरक बन जाता है।
इस सत्य को कभी नहीं भूलना चाहिए कि जब तक इन्सान के पास पैसा है तभी तक यह दुनिया पूछती है और सम्मान देती है। अन्यथा मिट्टी के मोल भी नहीं पूछती। इसलिए धन-दौलत पर अभिमान करना व्यर्थ है। केवल उसे साधन मानना उचित है, उसे साध्य मन लेने से भटकाव होने लगता है। फिर जीवन में स्थिरता नहीं आ सकती।
जीवन की दूसरी सच्चाई यह है कि माया महाठगिनी और बहुत चंचल है। इस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। यह पलक झपकते ही, देखते-ही-देखते राजा को रंक बनाकर रुला देती है और रंक को राजा बनाकर उसे मालामाल कर देती है।
जब लोग हमारी परेशानी होने पर बुराई करते हैं तो निराश नहीं होना चाहिए। पीठ पीछे बुराई करने वालों की कमी नहीं होती। यह मानना चाहिए की वे कायर हैं, उनमें सामने से आकर कुछ बोलने की सामर्थ्य नहीं है। अतः यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि उन दोगले लोगों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
दुनिया की परवाह तभी तक करनी चाहिए तब तक वे आपके और आपके सपनों के बीच में न आएँ। जब तक मनुष्य में सामर्थ्य है उसे सफलता प्राप्ति के सपनों को साकार कर लेना चाहिए।
हर समस्या का समाधान हम दृढ़ प्रतिज्ञ बनकर या डटकर कर तभी कर सकते हैं यदि उसमें हमारी भी सक्रिय भागीदारी हो। उससे मुँह मोड़कर या पीठ दिखाकर भाग जाने से किसी भी समस्या का निदान का पाना असम्भव होता है।
दुनिया के सब अनुराग-विराग की परवाह छोड़कर प्रसन्न रहने का अभ्यास कीजिए। अपनी इच्छाओं को समेटते हुए अपनी मेहनत की कमाई में सन्तुष्ट रहने का यत्न कीजिए। यकीन मानिए ईश्वर की कृपा से सब शुभ होगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 1 अगस्त 2016
टूटता तारा
हमारे मन में यह अवधारणा घर कर गई है कि जब टूटता हुआ तारा दिखाई दे तो उस समय कोई विश माँग लो अथवा कामना करो तो वह पूरी हो जाती है। कहते हैं कि यह टूटता हुआ तारा है जो सब लोगों की मनोकामना पूर्ण करता है। इसका कारण शायद यही है कि उसे टूटने और अपने भाई-बन्धुओं से बिछुड़ने का दर्द शायद ज्ञात होता है। तभी तो वह सब लोगों को उनके हिस्से की सारी खुशियाँ देना चाहता है।
कभी हम किसी उद्देश्य को लेकर चलते हैं और कभी निरुद्देश्य भटकते रहते हैं। जिंदगी कि कड़वी सच्चाई हमें तब ज्ञात होती है जब पेड़ों से टूटकर गिरे हुए फूलों ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि दूसरों को खुशबु देने वाले प्रायः कुचल दिए जाते हैं।
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि जो निःस्वार्थ महापुरुष दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहते हैं उन्हें स्वामी दयानन्द की तरह विषपान करना पड़ता है और ईसा की तरह सूली पर चढ़ जाना पड़ता है।
फिर भी ये महानुभाव अपने साथ अत्याचार करने वालों को कोई सजा दिए बिना क्षमा करके अपनी सहृदयता और महानता का परिचय देते हैं।
यदि कोई नजरअंदाज करता है तो निश्चिन्त रहिए, उसका बुरा मत मानिए। इस संसार में जो भी मूल्यवान लोग होते हैं, उन सब हीरों की कद्र करने की बात यह जनसाधारण नहीं समझ सकता। इसी प्रकार मंहगी वस्तुएँ जो लोगों की पहुँच से बाहर होती हैं, उसे दूर की कौड़ी कहकर वे उन्हें नजरंअदाज कर देते हैं।
जब अपनी गलती का पता लग जाए उसी समय क्षमा याचना कर लेनी चाहिए। साथ ही अपने दुष्कमों अथवा दुर्व्यसनों का अविलम्ब त्याग कर देना चाहिए। उसमेँ की गई देर कष्टदायक होती है। इसके पीछे सार यही है कि हम यात्रा करते हुए जितनी अधिक दूर चले जाते हैं, वापिस लौटने में हमें उतना ही अधिक समय लगता है।
इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं है कि इस संसार में दूसरों पर हँसने के स्थान पर मनुष्य को स्वयं हँसते रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा कर पाता है तो दुनिया उसके पीछे चलने लगती है। अन्यथा दुखों और परेशानियों के समय हर समय आँसू बहाते रहने वालों के आँसू सूख जाते हैं। फिर उन आँसुओं को मनुष्य की आँखो में भी जगह नहीं मिल पाती। यानि चाहकर भी उसकी आँखों में आँसू नहीं आते।
जो भी अपने साथ अच्छा या बुरा हो रहा है, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर संतोष कर लेना चाहिए। उसके न्याय पर कभी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि उसका न्याय बड़ा ही विचित्र है। वह स्वयं ही दुनिया में संतुलन बनाकर रखता है।
सयाने कहते हैं कि जब दाँत थे तो थे चबाने के लिए दाने खरीदने की सामर्थ्य नहीं थी और अब जब खाने के लिए दाँत नहीं हैं तो मनुष्य के पास दाने खरीदने की हैसियत हो गई है।
इसी कड़ी में यह उदाहरण भी ले सकते हैं कि जो व्यक्ति हाड़तोड़ परिश्रम करता है और सौ-सौ किलो अनाज के बोरे उठा लेता हैं, उसके पास उसे खरीदने के लिए धन नहीं है। इसके विपरीत जो नाजों से, शानो-शौकत में पला-बड़ा है, वह सौ किलो अनाज खरीद सकता है पर उसे उठा नहीं सकता।
इसलिए कोई कार्य करने से पहले दस बार उसके परिणाम के विषय में सोचना चाहिए। मनुष्य जैसी करनी करेगा, उसका भुगतान उसे करना ही पड़ेगा।
इसीलिए मनीषी सद् परामर्श देते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन काल में ऐसे कर्म करने चाहिए कि मृत्यु के बाद इन्सान हँसते हुए इस दुनिया से विदा ले और बाकी लोग उसकी अच्छाइयों और सद् गुणों को याद करके रोते रहें।
चन्द्र प्रभा सूद
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