बुधवार, 7 जनवरी 2026

दीपक तले अन्धेरा

दीपक तले अन्धेरा

'दीपक तले अन्धेरा' हमारे सयानों ने सोच-समझकर ही यह वाक्य कहा है। दीपक जब जलता है तो चारों ओर उसका प्रकाश फैलाता है परन्तु जिस स्थान पर वह रखा जाता है यानी उसके ठीक अपने ही नीचे प्रकाश नहीं पहुँच पाता। उस स्थान पर अन्धेरा ही रहता है।
             हम इस मुहावरे के अर्थ में कह सकते हैं कि जहाँ प्रकाश या ज्ञान होना चाहिए, वहीं पर अज्ञानता या बुराई का होना। इसे खासकर ऐसे व्यक्ति के संदर्भ में कहा जा सकता है जो दूसरों को उपदेश देता है किन्तु खुद अच्छे आचरण का पालन नहीं करता या अपनी बुराइयों को अनदेखा करता है। यह उस विडम्बना को दर्शाता है कि दीपक स्वयं जलकर दूसरों को रोशनी देता है परन्तु खुद उस रोशनी से वंचित रहता है। 
            इस मुहावरे के पीछे के छुपे मर्म को समझना बहुत आवश्यक है। यह वाक्य हमें सोचने के लिए विवश कर देता है कि ऐसा कहने के पीछे हमारे विद्वानों की क्या सोच रही होगी? उनके समक्ष ऐसा क्या घटित हुआ होगा जिसके कारण उन्होंने अपनी ऐसी राय बनाई होगी?
              इस विषय पर बहुत विचार करने के बाद मैंने यही निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य अपने कुटुम्बी जनों के लिए जैसे जीवन की परिकल्पना करता है अथवा जैसा समाज को बनाना चाहता है, शायद अपनों को उस साँचे के अनुरूप ढाल पाने में उसे सफलता हाथ नहीं लग पाती। 
             बहुत बार ऐसा भी देखा गया है कि समाज सुधार करने वालों के अपने बच्चे राह भटककर गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। इसका कारण है कि वे अधिक समय तक घर से बाहर के झमेलों को सुलझाने में लगे रहते हैं। उन्हें निपटाने में इतना व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने घर और बच्चों का उन्हें होश ही नहीं रहता। अपने घर-परिवार और बच्चों को वे उतना समय नहीं दे पाते जितना उनके लिए आवश्यक होता है। घर में थोड़ा-सा समय रहकर अपने स्वयं के बच्चों को संस्कारित करने का ख्याल ही उनके मन से शायद निकल जाता है। अथवा वे ऐसा ही मानकर चलते हैं कि उनके घर के सदस्य तो कोई गलत कार्य कर नहीं सकता।
            एक शिक्षक जो अपने छात्रों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है पर खुद रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, उसके लिए कहा जा सकता है कि 'दीपक तले अन्धेरा है।' एक व्यक्ति जो दूसरों को अच्छा करने की सलाह देता है परन्तु स्वयं गलत काम करता है, वह इस मुहावरे का सटीक उदाहरण है। यानी हम कह सकते हैं कि दूसरों को ज्ञान देना बहुत सरल है और स्वयं अज्ञानी रहना या उस ज्ञान की अनुपालना न करना भी हो सकता है।
             यह सत्य है कि माता-पिता यदि बच्चों को अपने पास बिठाकर संस्कारित नहीं कर पाएँगे तो उनका भटकना तो स्वाभाविक ही है। परन्तु यदि उन पर सस्कारों का अंकुश ही नहीं रहेगा तो वे अपनी मनमानी निश्शंक या निडर होकर करते रहेंगे। मनमानी करते हुए वे कहाँ तक पहुँच जाएँगे इस विषय में कोई कुछ भी नहीं कहने में समर्थ नहीं हो सकता।
            इतिहास के पन्ने खंगालने पर हमें इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जहाँ महान साम्रज्यों को उनके ही अपने उत्तराधिकारियों द्वारा बरबाद कर दिया गया। आज भी समाचार पत्रों अथवा टीवी चैनलों में सुर्खियाँ बटोरते हुए ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहाँ बड़े-बड़े पदों पर विराजमान और न्यायालय में न्याय करने वालों के बच्चे कार चोरी जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं या अन्य कुकर्म करते हुए पकड़े जाते हैं। इसी प्रकार शिक्षाविदों  के बच्चे भी किसी कारण से पढ़ने से वंचित रह जाते हैं।
            एवं विध अहिंसा का पाठ पढ़ाने वालों के बच्चे हिंसक प्रवृत्ति के हो जाते हैं। समाजसेवियों के घरों के बच्चे भी नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले बन जाते हैं। दूसरों को धर्म का उपदेश देने वालों के यहाँ भी अधर्मी जन्म ले लेते हैं। देशभक्तों की सन्तानें भी देशद्रोही हो सकती हैं। ईमानदार लोगों के उत्तराधिकारी समय के साथ बहते हुए भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोर और दूसरों का गला काटने वाले बन जाते हैं।
          समाज को प्रकाशित करने में जुटे लोग यदि अपने घर-परिवार में इच्छित सुधार कर लें तभी 'दीपक तले अन्धेरे' वाली यह उक्ति उनके लिए अनुपयोगी सिद्ध हो सकती है अन्यथा दीपक तले अन्धेरा तो वास्तव में होता ही है इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

नौकरों के हाथों में दुलारे

नौकरों के हाथों में दुलारे

अकेले घर में नौकरों के हाथों में अपने दुलारे जिगर के टुकड़े को सौंपने से पहले उनके विषय में इतनी जानकारी अवश्य एकत्रित कर लीजिए कि वे इस दायित्व के योग्य हैं भी या नहीं। आप पूर्णरूपेण यदि सन्तुष्ट हो जाएँ तभी आप अपने नौनिहालों की देखरेख का जिम्मा उन लोगों को सौंपे।
          जिन परिवारों में दादा-दादी साथ में रहते हैं वहाँ ऐसी समस्याओं से झूझना नहीं पड़ता बशर्ते कि बच्चे बहुत ही स्वार्थी न हों और बजुर्गों से दुर्व्यवहार करने वाले न हों। बड़ों के रहते बच्चों की किसी भी प्रकार की समस्या और चिन्ता नहीं रहती। वे भावनात्मक रूप से सुरक्षित रहते हैं।
          आजकल एकल परिवारों के चलते बच्चों को 'कहाँ छोड़ें' वाली समस्या विकट होती जा रही है। इसका कारण है कि माता-पिता दोनों ही नौकरी अथवा व्यवसाय करते हैं। वे दोनों सवेरे से शाम तक जब घर से दूर रहते हैं तब सारा दिन छोटे बच्चों को सम्हालने, उनकी देखभाल करने वाला कोई तो घर पर होना चाहिए।
             यद्यपि कुछ कम्पनियाँ छोटे बच्चों की जिम्मेदारी लेते हुए उनके लिए अपने यहाँ क्रच का प्रबन्ध करती हैं ताकि माता-पिता निश्चिन्त होकर अपना कार्य पर ध्यान लगा सकें। इस प्रकार कम्पनी का काम भी सुचारू रूप से चलता रहता है और माता-पिता भी बच्चों की चिन्ता से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु सभी लोग ऐसे भाग्यशाली नहीं होते कि उन्हें इस प्रकार की सुविधाएँ मिल सकें। इसलिए घरेलू नौकरों पर निर्भर रहना उनकी मजबूरी बन जाती है। वे लोग बच्चों के लिए चिन्तित रहते हैं।
            आए दिन समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टीवी आदि सोशल मीडिया पर बच्चों के साथ घरेलू नौकरों के दुर्व्यवार की घटनाएँ प्रकाश में आती ही रहती हैं। जिनकी सुरक्षा का दायित्व नौकरों को सौंपा जाता है, कभी-कभी वही फिरौती के लिए बच्चों  को अगवा तक कर लेते हैं।
           बच्चों को ठीक से न खिलाना, उन्हें मारना-पीटना, डराना-धमकाना तो आम घटनाएँ हैं। ऐसे नौकरों के पास बच्चे बारबार न रहने की जिद करते हैं पर माता-पिता को डर के कारण उनके कारनामे खुलकर नहीं बता पाते।
             कुछ नौकर बच्चों को नशीली दवाइयाँ खिलाकर सुला देते हैं। इसलिए बच्चे सुस्त रहते हैं। माता-पिता समझ नहीं पाते कि अच्छा खाने-पीने के बाद भी उनकी ऐसी स्थिति क्यों होती जा रही है। कई बार अपने साथियों के साथ ऐय्याशी करते हुए नौकर या नौकरानियाँ पकड़े भी गए हैं।
          इससे भी बढ़कर एक घटना सुनने में आई थी कि बच्चे के माता-पिता के आफिस जाने के बाद नौकरानी उस छोटे बच्चे को लेकर भीख माँगने चली जाती थी। एक दिन उसकी माँ जल्दी घर आ रही थी। उसने लाल बत्ती पर अपने बच्चे के साथ नौकरानी को भीख मॉंगते देखा तो वह सन्न रह गई। उस दिन उसे नौकरानी की करतूत का पता चला और फिर उसकी पुलिस में रिपोर्ट कराई गई। 
             भौतिकावादी इस युग में न तो लोगों को ईश्वर का डर है और न ही उनका जमीर उन्हें कचोटता है। बस उनके आराम और स्वार्थो  की पूर्ति होती रहनी चाहिए। आज समाज में घटते जीवन मूल्यों के चलते नौकरों के चारित्रिक हनन को हम नहीं नकार सकते।
           आजकल घर में नौकर रखते समय पहले पुलिस वेरिफिकेशन करवाना कानूनी रूप से भी बहुत आवश्यक हो गया है। हालाँकि यह तो कोई गारण्टी नहीं कि ऐसा करने पर कुछ अनहोनी नहीं होगी। परन्तु घर और बच्चों की सुरक्षा के लिए यह करवा लेना चाहिए। पुलिस के पास उनका फोटो तथा उनके घर-परिवार की जानकारी हो जाने से वे भी गलत काम करने से घबराते हैं।
              माता-पिता को चाहिए कि आधुनिक तकनीक का सहारा लें। दिन में थोड़े-थोड़े समय पश्चात घर पर फोन करके बच्चों की जानकारी लेते रहें। हो सके तो घर पर सीसीटीवी कैमरे लगवाएँ। फिर कार्यालय में बैठे हुए ही अपने घर और बच्चों पर कड़ी नजर रखें। सबकी सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि जब तक बहुत मजबूरी न हो अपने माता-पिता व घर को छोड़कर एक ही शहर में रहते हुए अन्यत्र जाने की न सोचें। यदि अपने मन को मारकर बच्चों की खातिर थोड़ा समझौता करना पड़े तो हिचकिचाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 5 जनवरी 2026

किशोरावास्था में नशे की लत

किशोरावस्था में नशे की लत 

किशोरावस्था में नशे की लत यदि किसी को लग जाए तो युवावस्था तक पहुँते-पहुँते वह किशोर बहुत-से रोगों का शिकार बन जाता है। एक किशोर जब जानते-समझते हुए भी इनका सेवन करने में आनन्द लेने लगता है तब वह शायद अपने जीवन में आने वाली मुसीबतों को 'देख लेंगे' कहते हुए एक दुस्साहिक कार्य को अंजाम दे रहा होता है। उसे तब यह समझ नहीं आता अथवा वह समझना ही नहीं चाहता कि आगे भविष्य में यह मजा उसके कष्ट का कारण बनने वाला है। उसका धन, उसके समय और सबसे बढ़कर उसका स्वास्थ्य इस कुटैव की भेंट चढ़ने वाला है।
          किशोरावस्था की जो सबसे बड़ी समस्या है वह यह है कि बच्चे इस समय युवावस्था और बाल्यावस्था के बीच की आयु से  गुजर रहे होते हैं। वे स्वयं को बड़ा कहलवाना चाहते हैं परन्तु यह भी सत्य है कि उनका मानसिक स्तर बड़ों की तरह नहीं होता। अपने जीवन की इस अवस्था में वे पूर्ण रूपेण स्वतन्त्रता चाहते हैं परन्तु वे उसे सम्हाल नहीं पाते। वे शायद स्वतन्त्रता के मायने ही नहीं जानते होते हैं। बाहर घूमना, मौज-मस्ती करना, अपने पसन्द के कपड़े पहनने को ही शायद वे अपनी आजादी समझने लगते हैं।
           इसी टकराहट में मस्ती-मस्ती में वे गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। वे दोस्तों के कहने पर सिगरेट, शराब और नशीली दवाइयों के चक्कर में पड़ जाते हैं। यदि वे इन पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहते तो दोस्त उन्हें एक बार चखने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें इसका आनन्द उठाने के लिए उकसाते हैं। एक बार चखने के बाद जब उन्हें लगता है कि अब वे सातवें आसमान में उड़ रहे हैं। तब उस तथाकथित आनन्द का वे बारबार मजा लेना चाहते हैं। उस आनन्द के लिए जब घर से पैसे नहीं मिल पाते तो वे चोरी करने लगते हैं।
           धीरे-धीरे ये किशोर इन सबके ऐसे आदी हो जाते हैं कि इनके बिना तो उनका जीवन कष्टदायक हो जाता है। उस समय उनका शरीर लुँजपुँज होने लगता है। बेचैनी बढ़ने लगती है और वे काँपने लगते हैं। जब तक उन्हें नशे की इच्छित डोज न मिले वे अपने स्वाभाविक रूप में नहीं आ पाते। उन्हें नियमित रूप से इसकी आवश्यकता रहती है। यह स्थिति वास्तव में बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होती है।
          आजकल पब संस्कृति का चलन भी बढ़ता जा रहा है। उसमें जाना इन लोगों का सहज ही शगल बन जाता है। इसी प्रकार रेव पार्टियों में भी इनका दोस्तों के साथ आना-जाना होने लग जाता है। इन सबकी चर्चा समाचार पत्रों व टीवी पर दिखाई जाती रहती है। सोशल मीडिया पर भी इसके बारे में सुना जा सकता है।
            इन किशोरों का कुसंगति में पड़ जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इनकी देख-रेख करने वाला प्राय: घर में कोई नहीं होता। घर में यदि नौकर हो तो वह बच्चों से कुछ कह नहीं सकता। घर के मालिक सोचते हैं कि नौकर की क्या औकात जो बच्चे को कुछ काम है सके? इसलिए वे यह सब देखकर अनदेखा कर देते हैं।
          माता-पिता दोनों ही अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। भौतिक जगत की अपनी सारी समस्याओं को सुलझाने में वे इतना अधिक खो जाते हैं कि भूल जाते हैं कि घर पर उनके वे बच्चे उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं जिन्हें उनकी जरूरत है। जिनके लिए वे दिन और रात कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहकर कार्य कर रहे हैं। उनका यही मानना होता है कि वे बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए सारी मेहनत कर रहे हैं।
           बच्चे सवेरे से शाम तक खाली रहते हैं। न कोई उन्हें टोकने वाला होता है और न कोई पूछने वाला कि वे अब तक कहाँ थे? कुछ बच्चे इस सबसे उकता जाते हैं और अपने माता-पिता को परेशान करने के लिए भी इस गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं जहाँ से वापसी की सम्भावनाएँ बहुत कम होती हैं। इस तरह उनका जीवन नर्क बन जाता है। उस समय माता-पिता जाग जाते हैं।
            जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है तब माता-पिता के जागने का लाभ नहीं होता। उस समय डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए वे अपना धन और समय दोनों को ही बर्बाद करते हैं। उस समय उन किशोरों को कोसने अथवा अपने भाग्य को दोष देने का कोई फायदा नहीं होता। समय रहते यदि किशोरों की सुध ले ली जाती तो ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।
             कई सामाजिक व सरकारी संस्थाएँ इन लोगों के पुनर्वास के लिए प्रयत्नशील हैं। परन्तु उनके प्रयासों का सुखद परिणाम तभी सामने आ सकता है जब ये किशोर स्वयं अपनी इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाकर अपने आप को सुधारना चाहें।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 4 जनवरी 2026

निरपराध को सजा देना

निरपराध को सजा देना

निरपराध को सजा देना किसी मनुष्य, न्यायपालिका अथवा राज्य के हित में नहीं होता। उसके मन को जो कष्ट होता है, वह दण्डदाता का मानसिक सुख-चैन सब छीन लेता है। यह अपराधबोध उसे हमेशा ही सन्ताप देता है कि उसने किसी निर्दोष को सजा दी है। यह अपराध यदि उसने किसी लालच के वशीभूत होकर किया हो अथवा किसी के डर के कारण पर उसका अपना मन उसे आयुपर्यन्त कचोटता रहता है।
        शक्तिशाली से तो हर कोई डरता है। उसे छूने की हिम्मत किसी में नहीं होती। पर शक्तिहीन पर हर किसी का वश चलता है। निर्दोष व्यक्ति यदि शक्तिहीन है तो उसे दण्ड देना और भी बड़ा पाप होता है। कबीर दास जी का यह दोहा हमें कमजोरों पर अत्याचार न करने और शक्ति का दुरुपयोग न करने की सीख देता है।
          दुर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय।
     ‌ बिना साँस की धौंकनी लौह भस्म कर देय॥
अर्थात् कमजोर व्यक्ति को कभी सताना या परेशान नहीं करना चाहिए।‌ इसका कारण है कि उसकी हार या बद्दुआ बहुत असरदार होती है। उससे मनुष्य की हानि हो सकती है। यहॉं उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि लुहार के पास जो धौंकनी होती है, वह चमड़े से बनी होती है और निर्जीव होती है। वही जब आग को अपनी हवा देती है तो लौहे जैसी शक्तिशाली धातु को भी भस्म कर देती है। तभी लुहार उस लौहे को मनचाहा आकार दे पाता है।
          इतिहास गवाह है कि निर्दोष व्यक्ति की हाय किसी को नहीं छोड़ती, बड़े-बड़े साम्राज्यों तक को हिलाकर रख देती है तो फिर इन्सान की क्या हस्ती है उसके आगे? शक्तिशाली नन्द वंश का विनाश आचार्य चाणक्य के द्वारा किया गया। महाबलि रावण, दुर्योधन और कंस जैसों अतताइयों के साम्रज्यों का भी देखते-देखते ही अन्त हो गया। आधुनिक काल के इतिहास में भी हमें ऐसी विनाश लीला के अनेक उदाहरण मिल जाएँगे।
        महर्षि वालमीकि ने भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए रामायण में कहा है- 
       यानि          पतन्त्यश्रूणि           राघव।
       तानि पुत्रपशून् हन्ति प्रीत्यर्थमनुशासत:॥
अर्थात् हे राम! निरपराध दण्डित मनुष्य के आँसू पक्षपाती राजा के पुत्र और पशुओं को नष्ट कर देते हैं। यानी महर्षि हमें सचेत करते हुए कह रहे हैं कि राजा जो प्रजा का पालक होता है, यदि वह पक्षपात करते हुए दण्ड देता है तो उसका समूल नाश हो जाता है।
        अपराधी को दण्ड देना न्यायोचित है परन्तु निरपराध को सजा देना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे किसी का भला नहीं हो सकता यह बात हर मनुष्य को सदा आत्मसात कर लेनी चाहिए और इसे स्मरण करते रहना चहिए। कहते हैं कि सौ अपराधी बेशक साक्ष्यों के अभाव में छूट जाऍं परन्तु किसी भी निरपराध को सजा नहीं होनी चाहिए।
          बहुत से मित्रजनों ने प्रत्यक्ष अनुभव किया होगा कि जो लोग हृदय से सरल व सहज होते हैं और दूसरों का हित साधने में जुटे रहते हैं, उन्हे यदि कोई व्यक्ति मानसिक सन्ताप भी देता है तो उसका अहित किसी-न-किसी रूप में हो जाता है। फिर वह सोचता रह जाता है कि उसे किस अपराध का दण्ड मिला है?
            ईश्वर बड़ा ही दयालु है। वह दीनबन्धु है। वह अपने सभी बच्चों की खबर रखता है और उन पर आने वाले सभी कष्टों को हरता है। वह कभी नहीं चाहता कि उसके मासूम बच्चों पर कोई भी अत्याचार करे अथवा उन्हें किसी तरह का कोई कष्ट दे। इसीलिए उन पर कुदृष्टि डालने वालों को वह कभी क्षमा नहीं करता। उन्हें कठोर-से-कठोर दण्ड दे देता है ताकि वे इस चेतावनी को समझ जाएँ और अपने भविष्य के लिए चौकन्ने हो जाएँ।
           इतना सब होने के बाद भी अपने झूठे अहं के कारण यदि मनुष्य न समझना चाहे तो वह परम न्यायकारी प्रभु उन्हें धन-सम्पत्ति और बन्धु-बान्धवों सहित शीघ्र ही नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। उस मालिक के प्रकोप से बचने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए। उसके बनाए हुए जीवों को कष्ट देने के स्थान पर उनके दुख दूर करने का प्रयास करना चाहिए। तभी मनुष्य उस मालिक की दृष्टि में एक अच्छा इन्सान कहला सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 3 जनवरी 2026

सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करना

सुख -शान्ति से जीवन व्यतीत करना

मनुष्य सुख और शान्ति से अपने जीवन को व्यतीत करना चाहता है। प्राय: मनुष्य किसी प्रकार के झमेले में न पड़कर उससे दूर रहना चाहते हैं। अपने घर-परिवार के दायित्वों को यदि वह पूर्णरूपेण निभा ले तो उसका जीवन सफल कहलाता है। वह एक कामयाब इन्सान बन जाता है।
          महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि वेदव्यास जी ने कहा है-
     कुभार्यां च कुपुत्रं च कुराजानं कुसीहृदम्।
     कुसंबंधं   कुदेशं   च  दूरत:   परित्यजेत्॥
अर्थात् कुपत्नी, कुपुत्र, कुराजा, कुमित्र, कुसम्बन्धी और कुदेश को शीघ्र त्याग देना चाहिए।
              घर में पत्नी का कार्य सबके साथ ही सामंजस्य बनाकर रहना होता है। यदि वह ऐसा नहीं करती और सदा अपनी मनमानी करती है, घर में रहकर भी यदि वह अपने घर की नहीं हो सकती तब उस घर पर हर समय कलह-क्लेश रहता है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। हमारे सयाने कहते हैं कि जिस घर में ऐसी स्थिति होती है, वहाँ उस घर के मटकों का पानी भी समाप्त हो जाता है। घर की बात जब सड़क पर आ जाती है तो उस घर को सब बड़ी ही बेचारगी वाली नजरों से देखते हैं। इसीलिए ऐसी पत्नी का परित्याग करना चाहिए।
            पुत्र जब कुपुत्र बन जाए तब घर-परिवार बर्बादी के कगार पर आ जाता है। समाज में वे उपहास का पात्र बनते हैं। ऐसा पुत्र माता-पिता के सन्ताप का कारण बनता है। अपनी कुसंगति के कारण धन-सम्पत्ति की बर्बादी करता है। छोटे-बड़े का सम्मान करना वह भूल जाता है। उसके घर में रहते हुए सदा ही झगड़े होते रहते हैं। उस समय ऐसे कुपुत्र से किनारा कर लेना श्रेयस्कर होता है।
             राजा यदि कुराजा हो तो उस देश को तत्काल छोड़ देना चाहिए। उस राज्य में न्याय व्यवस्था चरमराने लगती हैं और शीघ्र ही अराजकता अपने पैर जमाने लगती है। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी जैसी समस्याएँ सिर उठाने लगती हैं। ऐसे देश पर कोई भी अन्य राष्ट्र आसानी अपना अधिकार कर सकता है। वहाँ के निवासियों की जान और माल सुरक्षित नहीं रहता। उनका जीवन नरक के समान कष्टदायी हो जाता है। ऐसे देश को छोड़कर अन्यत्र जाने वाला सुखी हो जाता है। 
            कुमित्र अपने मित्र का भी हितचिन्तक नहीं होता और न ही उसे कभी सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। वह बुराइयों के दलदल में उसे घसीट कर ले जाता है। जहाँ से उसका लौटना बहुत ही कठिन हो जाता है। सबसे मजे की बात यह है कि वह अपने साथी को मझधार में छोड़कर किनारा कर लेता है। ऐसे अहित करने वाले मित्र से मनुष्य को शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा पाने का यत्न करना चाहिए।
            कुसम्बन्धी कभी मनुष्य को अच्छी सलाह नहीं देते। वे सदा ही उसके जीवन, धन-सम्पत्ति, मान-सम्मान आदि को नष्ट करने के प्रयास में लगे रहते हैं। वे कभी नहीं चाहते कि उनका कोई सम्बन्धी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़े या समाज में कभी उसकी वाहवाही हो। वे मीठी छुरी की तरह होते हैं जो मुँह के सामने सच्चे हितचिन्तक की तरह बर्ताव करते हैं परन्तु पीठ पीछे उसकी जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य बखूबी करते हैं। ऐसे कुसम्बन्धियों से दूरी बनाकर रहना ही मनुष्य के हित में होता है। अतः उनसे दूर रहकर अपने विषय में विचार करना चाहिए।
            कुदेश में रहना बहुत ही कष्टप्रद होता है। कुराजा के रहते देश की स्थिति बहुत ही डाँवाडोल हो जाती है। सज्जनों के लिए उस स्थान पर रहना बहुत दूभर होने लगता है। वहाँ पर रहने वाले सभी लोग मनमाना आचरण करते हैं। इसलिए ऐसी परिस्थिति में संवेदनशील व्यक्ति के लिए वह देश छोड़कर अन्यत्र चले जाना हितकर होता है। ताकि वह अपना जीवन सुख-शान्ति से व्यतीत करने‌ में समर्थ हो सके।
           दुराचारिणी पत्नी, कुपुत्र, कुमार्गगामी मित्र, कुराजा, कुदेश और अपनी जड़ें काटने वाले उन सम्बन्धियों का नित्य त्याग करना चाहिए। सज्जनों को अपने देश का मोह छोड़कर कुदेश से चले जाना चाहिए। यदि मनुष्य अपना जीवन सुचारू रूप से चलाना चाहता है तो उसे सतर्कता पूर्वक महर्षि वेदव्यास द्वारा बताए गए इन नियमों का पालन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

किशोर वय की समस्याऍं

किशोर वय की समस्याएँ

किशोर वय की भी बड़ों की तरह अपनी ही बहुत सारी समस्याएँ होती हैं। किशोर वय में उनकी मुख्य समस्याऍं होती हैं - शारीरिक बदलाव, मानसिक और भावनात्मक उतार-चढ़ाव, पहचान का संकट, सामाजिक दबाव, पढ़ाई और भविष्य की चिन्ता, रिश्तों में तनाव (खासकर माता-पिता से) और सोशल मीडिया के प्रभाव से जुड़ी होती हैं। इससे चिन्ता, अवसाद, खराब खानपान और नशीले पदार्थों के दुरुपयोग जैसी चुनौतियॉं पैदा हो सकती हैं। इसका कारण है कि उनका दिमाग और शरीर तेजी से विकसित हो रहा होता है।
            किशोरों पर सही व्यवसाय चुनने का दबाव रहता है औरअनिश्चितता बनी रहती है। आजकल प्रतिस्पर्धा के चलते उन पर अच्छे अंक लाने का प्रेशर होता है। इस कारण वे दिन-रात पढ़ाई में जुटे रहते हैं। इससे उनकी सोशल लाइफ प्रभावित होने लगती है।
             इस आयु में बच्चे जीवन के ऐसे मोड़ पर होते हैं कि न तो वे बड़े कहलाते हैं और न ही बच्चे। इन बच्चों की सही कही बातों पर बड़े लोग ध्यान नहीं देते। यह बात इनके कोमल मन को बहुत पीड़ा देती है। इन किशोरों की सबसे बड़ी समस्या है कि ये सोचते हैं हम बड़े हो गए हैं और बड़ों की तरह ही उन्हें अपने फैसले लेने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। वे अपनी मनमर्जी से सारे कार्य करना चाहते हैं। वे चाहते है कोई भी उन्हें रोकटोक न करे। किसी की भी दखलअंदाजी से वे चिढ़ जाते हैं। 
          इस किशोरावस्था में वे छोटों के साथ खेलना या मौज-मस्ती नहीं करना चाहते। उन्हे लगता है कि वे छोटे हैं उनके बराबर के नहीं हैं। इसलिए वे उनसे दूरी बनाकर रहते हैं। बड़े लोग जो है वे उन्हें बच्चा मानते हुए अनदेखा करते हैं। इस कारण वे बिल्कुल अकेले हो जाते हैं। अपने इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वे हमउम्र साथियों की तलाश करते हैं। उनके साथ वे अपना समय व्यतीत करते हैं, मौज-मस्ती करते हैं, हंसी-मजाक करते हैं और घूमते-फिरते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसे दोस्तों को खोजकर उन्होंने कोई खजाना पा लिया है।
            घर में रहते हुए वे स्वय को अकेला महसूस करते हैं। इसलिए अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए उनको टीवी देखकर, गेम्स खेलकर, मोबाइल में वाट्स अप पर दोस्तों से गप्पें लगाकर अथवा फेसबुक पर मनपसन्द पोस्ट या वीडियो देखकर अपना समय बिताना अच्छा लगता है। अपनी पसन्द के गाने सुनकर भी वे मन बहलाने का यत्न करते हैं।
             इस आयु में बच्चे चाहते हैं कि उनके माता-पिता उनके लिए समय निकालें, उनके पास बैठें, उनसे सलाह-मशविरा करें,  जरूरत पड़ने पर उनको डाँट-डपट करें। वे अपने स्कूल की और अपने दोस्तों की समस्याओं को उनके साथ शेयर करना चाहते हैं। 
              उनके माता-पिता दोनों ही दिन-रात अपने-अपने कार्यालय अथवा व्यवसाय में व्यस्त रहते हैं। सवेरे से शाम तक जुटे हुए उन्हें आराम के पल भी नहीं मिलते। जिन किशोरों की सुविधा सम्पन्न माताएँ घर पर रहती हैं वे भी अपने मित्रों के साथ क्लबों, किटी पार्टियों या शापिंग आदि में व्यस्त रहती हैं। उनके पास अपने बच्चों के लिए समय का अभाव रहता है।
        अपने समयाभाव के मुआवजे के रूप में वे बच्चों को उनकी पसन्दीदा मंहगी वस्तुएँ खरीदकर ला देते हैं। यदि वे सौ रूपए माँगते हैं तो उन्हें पाँच सौ या हजार के नोट थमा देते हैं। विद्यालय से कहीं बाहर घूमने जाना हो या दोस्तों के ही साथ मटरगश्ती करनी हो तो उन्हें आवश्यकता से अधिक धन थमाकर उनका दिल जीतने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं। 
           किशोरों को इन सब भौतिक वस्तुओं की उतनी अधिक आवश्यकता नहीं होती जितनी माता-पिता के समय की होती है। वे भी दूसरे बच्चों की तरह उनसे लाड़-प्यार करना चाहते हैं। उनसे रूठने-मनाने का ढोंग कर मनुहार करने पर मानना चाहते हैं। पर वे माता-पिता हैं जिन्हें ये उनका सब करना बचकानी हरकतें लगता हैं। ऐसे में ये किशोर बागी होने लगते हैं। अपने माता-पिता का ध्यान आकर्षित करने के लिए उल्टे-सीधे काम करने शुरू देते हैं। कुछ गलत संगति में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं। 
          किशोरावस्था की समस्याओं से निपटने के लिए माता-पिता और किशोर के बीच संवाद होता रहना चाहिए। दोनों को एक-दूसरे पर विश्वास बनाना चाहिए। यदि कभी आवश्यकता पड़ जाए तो काउंसलर या डॉक्टर से मदद लेनी चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि संतुलित आहार लिया जाए। व्यायाम किया जाए। सबसे आवश्यक पर्याप्त नींद को बढ़ावा देना चाहिए। इनके अतिरिक्त सोशल मीडिया का सही उपयोग करने के लिए समय-सीमा तय करनी चाहिए और सतर्क रहना चाहिए।
            किशोरावस्था में बच्चे इतने बड़े या इतने जिम्मेदार नहीं होते कि उनकी ओर से निश्चिन्त हुआ जा सके। उन्हें इस अवस्था में भी मात-पिता के प्यार-दुलार की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी बचपन में होती थी। इसलिए उनकी ओर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। यही वह समय है जब उन्हें संस्कारित करके सुयोग्य बनाया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

आत्मरक्षा की आवश्यकता

आत्मरक्षा की आवश्यकता 

आत्मरक्षा के लिए हर किसी को निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपनी रक्षा करने के लिए मनुष्य को सक्षम बनने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता, उसकी रक्षा कभी कोई दूसरा नहीं कर सकता। इसलिए शास्त्र कहते हैं- 
            आत्मानं सततं रक्षेत्।
अर्थात् मनुष्य को अपनी रक्षा के लिए निरन्तर यत्न करना चाहिए।
           यदि किसी मनुष्य में शारीरिक बल की कमी भी हो तो उसे अपना आत्मिक बल यानी अपना आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए। जिस मनुष्य के पास आत्मिक बल होता है, वह कभी किसी परिस्थिति में घबराता नहीं है और किसी भी व्यक्ति का सामना करने का साहस रख सकता है।
            यहॉं हम चींटी का उदाहरण देते हैं। चींटी एक बहुत ही छोटा जीव है और वह किसी का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती। यदि उसे छेड़ा जाए तो वह भी कुलबुलाते हुए अपना विरोध प्रकट कर देती है। इसी प्रकार मनुष्य को भी आवश्यकता पड़ने पर अपने शक्तिशाली शत्रु का प्रतिरोध अवश्य करना चाहिए। 
          एक दृष्टान्त कभी पढ़ा था कि एक साँप की शिकायत किसी मुनि से लोगों ने की। उन लोगों ने मुनि से कहा, "मुनिवर! एक सर्प इधर आया हुआ है। वह निरपराध लोगों को डस्टकर उन्हें मृत्युलोक पहुॅंचा रहा है।"
              यह दुखद समाचार सुनकर मुनि ने उस सॉंप से कहा, "तुम व्यर्थ ही  निरपराध लोगों को डसकर उन्हें मार देते हो। यह अच्छी बात नहीं है। तुम्हें भी अहिंसा का मार्ग अपना लेना चाहिए और अपना परलोक सुधारना चाहिए।"
            उसे महात्मा जी की बात पसन्द आ गई और उसने सोचा क्यों न मैं लोगों को क्षमादान देकर परलोक सुधार लूँ।
            कुछ दिन बीतने पर वह उन महात्मा जी के पास आया और अपनी व्यथा सुनाने लगा। उसने कहा, "जब से मैंने लोगों को काटना छोड़ दिया है तब से कोई भी मुझसे नहीं डरता। लोग मुझे परेशान करते हैं और मुझ पर पत्थर भी बरसा देते हैं। बच्चे भी मेरी पूँछ मरोड़ देते हैं।" 
             उसकी बात सुनकर महात्मा जी ने उस साँप को समझाते हुए कहा, "तुझे लोगों को काटने के लिए मना किया था। मैंने यह थोड़ा कहा था कि तुम फुफकारना भी छोड़ दो। दूसरों को डराने के लिए अपना फन फैलाते हुए फुफकार अवश्य करनी चाहिए।" 
          'पंचतन्त्रम्' नामक ग्रन्थ में विष्णु शर्मा जी ने इसी विषय पर प्रकाश डाला है -
         निर्विषेणापि सर्पेण कर्त्तव्या महती फटा।
      विषो भवति वा मा भूत् फटटोपो भयङ्कर:॥
अर्थात् सॉंप जहरीला न भी हो परन्तु यदि वह फुफकारता रहता है और फन उठाता रहता है तो लोग इतने से ही डर कर भाग जाते हैं। यदि वह इतना भी नहीं करेगा तो लोग उसकी रीढ़ को अपने जूतों से कुचल कर तोड़ देंगे। यानी विषरहित साँप को भी फुफकारना चाहिए। उसके पास विष हो चाहे न हो पर उसका फन फैलाना ही सबके हृदयों में भय पैदा कर देता है।
            अग्नि बहुत ही शक्तिशाली होती है। वह बड़े-बड़े जंगलो और भवनों तक को नष्ट कर देती है। जो भी जीव उसकी चपेट में आ जाता है, वह जलकर भस्म हो जाता है। परन्तु वही राख जब ठण्डी पड़ जाती है तो उस पर चींटियाँ भी चलने लगती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अद्वितीय रूप से शक्तिशाली अग्नि के भस्म न कर सकने पर उसका कोई महत्व नहीं रह जाता। चींटी जैसे जीव उसे रौंदनै लगते हैं।
            इसी प्रकार भयंकर विषधर किसी भी जीव को नहीं बख्शता। परन्तु जब वह काल के गाल में समा जाता है अथवा निर्जीव हो जाता है, उस समय चींटियाँ उसे खा जाती हैं।
              कहने का तात्पर्य यही है कि निर्बल व्यक्ति को इस ससार में कोई भी जीने नहीं देता। कहते हैं बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। इसी प्रकार का व्यवहार एक बलवान निर्बल के साथ करता है। उसे हर तरह से प्रताड़ित करता है। उसका वश चले तो किसी शक्तिहीन को वह जीने ही न दे। वही इस दुनिया का मालिक बनकर रहने लगे। पर अफसोस यह करना उसके बस में नहीं है। ईश्वर ने अपनी सृष्टि में सभी प्रकार के जीव उत्पन्न किए हैं और वह उनकी रक्षा भी करता है।
          मनुष्य को ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी नहीं डरना चाहिए। यह स्मरण रखना चाहिए कि वह उसका परम रक्षक है। इसलिए केवल उसकी शरण में जाना चाहिए। महात्मा गांधी की तरह शारीरिक बल न होते हुए भी आत्मिक बल होना चाहिए जिससे शक्तिशाली साम्राज्यों की नींव भी हिल जाती है। फिर इन्सान तो कुछ भी नहीं है। वह चाहे कितना खूँखार और बलशाली हो आत्मविश्वासी के समक्ष टिक नहीं सकता।
चन्द्र प्रभा सूद