किशोर वय की समस्याएँ
किशोर वय की भी बड़ों की तरह अपनी ही बहुत सारी समस्याएँ होती हैं। किशोर वय में उनकी मुख्य समस्याऍं होती हैं - शारीरिक बदलाव, मानसिक और भावनात्मक उतार-चढ़ाव, पहचान का संकट, सामाजिक दबाव, पढ़ाई और भविष्य की चिन्ता, रिश्तों में तनाव (खासकर माता-पिता से) और सोशल मीडिया के प्रभाव से जुड़ी होती हैं। इससे चिन्ता, अवसाद, खराब खानपान और नशीले पदार्थों के दुरुपयोग जैसी चुनौतियॉं पैदा हो सकती हैं। इसका कारण है कि उनका दिमाग और शरीर तेजी से विकसित हो रहा होता है।
किशोरों पर सही व्यवसाय चुनने का दबाव रहता है औरअनिश्चितता बनी रहती है। आजकल प्रतिस्पर्धा के चलते उन पर अच्छे अंक लाने का प्रेशर होता है। इस कारण वे दिन-रात पढ़ाई में जुटे रहते हैं। इससे उनकी सोशल लाइफ प्रभावित होने लगती है।
इस आयु में बच्चे जीवन के ऐसे मोड़ पर होते हैं कि न तो वे बड़े कहलाते हैं और न ही बच्चे। इन बच्चों की सही कही बातों पर बड़े लोग ध्यान नहीं देते। यह बात इनके कोमल मन को बहुत पीड़ा देती है। इन किशोरों की सबसे बड़ी समस्या है कि ये सोचते हैं हम बड़े हो गए हैं और बड़ों की तरह ही उन्हें अपने फैसले लेने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। वे अपनी मनमर्जी से सारे कार्य करना चाहते हैं। वे चाहते है कोई भी उन्हें रोकटोक न करे। किसी की भी दखलअंदाजी से वे चिढ़ जाते हैं।
इस किशोरावस्था में वे छोटों के साथ खेलना या मौज-मस्ती नहीं करना चाहते। उन्हे लगता है कि वे छोटे हैं उनके बराबर के नहीं हैं। इसलिए वे उनसे दूरी बनाकर रहते हैं। बड़े लोग जो है वे उन्हें बच्चा मानते हुए अनदेखा करते हैं। इस कारण वे बिल्कुल अकेले हो जाते हैं। अपने इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वे हमउम्र साथियों की तलाश करते हैं। उनके साथ वे अपना समय व्यतीत करते हैं, मौज-मस्ती करते हैं, हंसी-मजाक करते हैं और घूमते-फिरते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसे दोस्तों को खोजकर उन्होंने कोई खजाना पा लिया है।
घर में रहते हुए वे स्वय को अकेला महसूस करते हैं। इसलिए अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए उनको टीवी देखकर, गेम्स खेलकर, मोबाइल में वाट्स अप पर दोस्तों से गप्पें लगाकर अथवा फेसबुक पर मनपसन्द पोस्ट या वीडियो देखकर अपना समय बिताना अच्छा लगता है। अपनी पसन्द के गाने सुनकर भी वे मन बहलाने का यत्न करते हैं।
इस आयु में बच्चे चाहते हैं कि उनके माता-पिता उनके लिए समय निकालें, उनके पास बैठें, उनसे सलाह-मशविरा करें, जरूरत पड़ने पर उनको डाँट-डपट करें। वे अपने स्कूल की और अपने दोस्तों की समस्याओं को उनके साथ शेयर करना चाहते हैं।
उनके माता-पिता दोनों ही दिन-रात अपने-अपने कार्यालय अथवा व्यवसाय में व्यस्त रहते हैं। सवेरे से शाम तक जुटे हुए उन्हें आराम के पल भी नहीं मिलते। जिन किशोरों की सुविधा सम्पन्न माताएँ घर पर रहती हैं वे भी अपने मित्रों के साथ क्लबों, किटी पार्टियों या शापिंग आदि में व्यस्त रहती हैं। उनके पास अपने बच्चों के लिए समय का अभाव रहता है।
अपने समयाभाव के मुआवजे के रूप में वे बच्चों को उनकी पसन्दीदा मंहगी वस्तुएँ खरीदकर ला देते हैं। यदि वे सौ रूपए माँगते हैं तो उन्हें पाँच सौ या हजार के नोट थमा देते हैं। विद्यालय से कहीं बाहर घूमने जाना हो या दोस्तों के ही साथ मटरगश्ती करनी हो तो उन्हें आवश्यकता से अधिक धन थमाकर उनका दिल जीतने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं।
किशोरों को इन सब भौतिक वस्तुओं की उतनी अधिक आवश्यकता नहीं होती जितनी माता-पिता के समय की होती है। वे भी दूसरे बच्चों की तरह उनसे लाड़-प्यार करना चाहते हैं। उनसे रूठने-मनाने का ढोंग कर मनुहार करने पर मानना चाहते हैं। पर वे माता-पिता हैं जिन्हें ये उनका सब करना बचकानी हरकतें लगता हैं। ऐसे में ये किशोर बागी होने लगते हैं। अपने माता-पिता का ध्यान आकर्षित करने के लिए उल्टे-सीधे काम करने शुरू देते हैं। कुछ गलत संगति में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं।
किशोरावस्था की समस्याओं से निपटने के लिए माता-पिता और किशोर के बीच संवाद होता रहना चाहिए। दोनों को एक-दूसरे पर विश्वास बनाना चाहिए। यदि कभी आवश्यकता पड़ जाए तो काउंसलर या डॉक्टर से मदद लेनी चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि संतुलित आहार लिया जाए। व्यायाम किया जाए। सबसे आवश्यक पर्याप्त नींद को बढ़ावा देना चाहिए। इनके अतिरिक्त सोशल मीडिया का सही उपयोग करने के लिए समय-सीमा तय करनी चाहिए और सतर्क रहना चाहिए।
किशोरावस्था में बच्चे इतने बड़े या इतने जिम्मेदार नहीं होते कि उनकी ओर से निश्चिन्त हुआ जा सके। उन्हें इस अवस्था में भी मात-पिता के प्यार-दुलार की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी बचपन में होती थी। इसलिए उनकी ओर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। यही वह समय है जब उन्हें संस्कारित करके सुयोग्य बनाया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें