किशोरावस्था में नशे की लत
किशोरावस्था में नशे की लत यदि किसी को लग जाए तो युवावस्था तक पहुँते-पहुँते वह किशोर बहुत-से रोगों का शिकार बन जाता है। एक किशोर जब जानते-समझते हुए भी इनका सेवन करने में आनन्द लेने लगता है तब वह शायद अपने जीवन में आने वाली मुसीबतों को 'देख लेंगे' कहते हुए एक दुस्साहिक कार्य को अंजाम दे रहा होता है। उसे तब यह समझ नहीं आता अथवा वह समझना ही नहीं चाहता कि आगे भविष्य में यह मजा उसके कष्ट का कारण बनने वाला है। उसका धन, उसके समय और सबसे बढ़कर उसका स्वास्थ्य इस कुटैव की भेंट चढ़ने वाला है।
किशोरावस्था की जो सबसे बड़ी समस्या है वह यह है कि बच्चे इस समय युवावस्था और बाल्यावस्था के बीच की आयु से गुजर रहे होते हैं। वे स्वयं को बड़ा कहलवाना चाहते हैं परन्तु यह भी सत्य है कि उनका मानसिक स्तर बड़ों की तरह नहीं होता। अपने जीवन की इस अवस्था में वे पूर्ण रूपेण स्वतन्त्रता चाहते हैं परन्तु वे उसे सम्हाल नहीं पाते। वे शायद स्वतन्त्रता के मायने ही नहीं जानते होते हैं। बाहर घूमना, मौज-मस्ती करना, अपने पसन्द के कपड़े पहनने को ही शायद वे अपनी आजादी समझने लगते हैं।
इसी टकराहट में मस्ती-मस्ती में वे गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। वे दोस्तों के कहने पर सिगरेट, शराब और नशीली दवाइयों के चक्कर में पड़ जाते हैं। यदि वे इन पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहते तो दोस्त उन्हें एक बार चखने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें इसका आनन्द उठाने के लिए उकसाते हैं। एक बार चखने के बाद जब उन्हें लगता है कि अब वे सातवें आसमान में उड़ रहे हैं। तब उस तथाकथित आनन्द का वे बारबार मजा लेना चाहते हैं। उस आनन्द के लिए जब घर से पैसे नहीं मिल पाते तो वे चोरी करने लगते हैं।
धीरे-धीरे ये किशोर इन सबके ऐसे आदी हो जाते हैं कि इनके बिना तो उनका जीवन कष्टदायक हो जाता है। उस समय उनका शरीर लुँजपुँज होने लगता है। बेचैनी बढ़ने लगती है और वे काँपने लगते हैं। जब तक उन्हें नशे की इच्छित डोज न मिले वे अपने स्वाभाविक रूप में नहीं आ पाते। उन्हें नियमित रूप से इसकी आवश्यकता रहती है। यह स्थिति वास्तव में बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होती है।
आजकल पब संस्कृति का चलन भी बढ़ता जा रहा है। उसमें जाना इन लोगों का सहज ही शगल बन जाता है। इसी प्रकार रेव पार्टियों में भी इनका दोस्तों के साथ आना-जाना होने लग जाता है। इन सबकी चर्चा समाचार पत्रों व टीवी पर दिखाई जाती रहती है। सोशल मीडिया पर भी इसके बारे में सुना जा सकता है।
इन किशोरों का कुसंगति में पड़ जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इनकी देख-रेख करने वाला प्राय: घर में कोई नहीं होता। घर में यदि नौकर हो तो वह बच्चों से कुछ कह नहीं सकता। घर के मालिक सोचते हैं कि नौकर की क्या औकात जो बच्चे को कुछ काम है सके? इसलिए वे यह सब देखकर अनदेखा कर देते हैं।
माता-पिता दोनों ही अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। भौतिक जगत की अपनी सारी समस्याओं को सुलझाने में वे इतना अधिक खो जाते हैं कि भूल जाते हैं कि घर पर उनके वे बच्चे उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं जिन्हें उनकी जरूरत है। जिनके लिए वे दिन और रात कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहकर कार्य कर रहे हैं। उनका यही मानना होता है कि वे बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए सारी मेहनत कर रहे हैं।
बच्चे सवेरे से शाम तक खाली रहते हैं। न कोई उन्हें टोकने वाला होता है और न कोई पूछने वाला कि वे अब तक कहाँ थे? कुछ बच्चे इस सबसे उकता जाते हैं और अपने माता-पिता को परेशान करने के लिए भी इस गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं जहाँ से वापसी की सम्भावनाएँ बहुत कम होती हैं। इस तरह उनका जीवन नर्क बन जाता है। उस समय माता-पिता जाग जाते हैं।
जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है तब माता-पिता के जागने का लाभ नहीं होता। उस समय डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए वे अपना धन और समय दोनों को ही बर्बाद करते हैं। उस समय उन किशोरों को कोसने अथवा अपने भाग्य को दोष देने का कोई फायदा नहीं होता। समय रहते यदि किशोरों की सुध ले ली जाती तो ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।
कई सामाजिक व सरकारी संस्थाएँ इन लोगों के पुनर्वास के लिए प्रयत्नशील हैं। परन्तु उनके प्रयासों का सुखद परिणाम तभी सामने आ सकता है जब ये किशोर स्वयं अपनी इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाकर अपने आप को सुधारना चाहें।
चन्द्र प्रभा सूद
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