रविवार, 4 जनवरी 2026

निरपराध को सजा देना

निरपराध को सजा देना

निरपराध को सजा देना किसी मनुष्य, न्यायपालिका अथवा राज्य के हित में नहीं होता। उसके मन को जो कष्ट होता है, वह दण्डदाता का मानसिक सुख-चैन सब छीन लेता है। यह अपराधबोध उसे हमेशा ही सन्ताप देता है कि उसने किसी निर्दोष को सजा दी है। यह अपराध यदि उसने किसी लालच के वशीभूत होकर किया हो अथवा किसी के डर के कारण पर उसका अपना मन उसे आयुपर्यन्त कचोटता रहता है।
        शक्तिशाली से तो हर कोई डरता है। उसे छूने की हिम्मत किसी में नहीं होती। पर शक्तिहीन पर हर किसी का वश चलता है। निर्दोष व्यक्ति यदि शक्तिहीन है तो उसे दण्ड देना और भी बड़ा पाप होता है। कबीर दास जी का यह दोहा हमें कमजोरों पर अत्याचार न करने और शक्ति का दुरुपयोग न करने की सीख देता है।
          दुर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय।
     ‌ बिना साँस की धौंकनी लौह भस्म कर देय॥
अर्थात् कमजोर व्यक्ति को कभी सताना या परेशान नहीं करना चाहिए।‌ इसका कारण है कि उसकी हार या बद्दुआ बहुत असरदार होती है। उससे मनुष्य की हानि हो सकती है। यहॉं उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि लुहार के पास जो धौंकनी होती है, वह चमड़े से बनी होती है और निर्जीव होती है। वही जब आग को अपनी हवा देती है तो लौहे जैसी शक्तिशाली धातु को भी भस्म कर देती है। तभी लुहार उस लौहे को मनचाहा आकार दे पाता है।
          इतिहास गवाह है कि निर्दोष व्यक्ति की हाय किसी को नहीं छोड़ती, बड़े-बड़े साम्राज्यों तक को हिलाकर रख देती है तो फिर इन्सान की क्या हस्ती है उसके आगे? शक्तिशाली नन्द वंश का विनाश आचार्य चाणक्य के द्वारा किया गया। महाबलि रावण, दुर्योधन और कंस जैसों अतताइयों के साम्रज्यों का भी देखते-देखते ही अन्त हो गया। आधुनिक काल के इतिहास में भी हमें ऐसी विनाश लीला के अनेक उदाहरण मिल जाएँगे।
        महर्षि वालमीकि ने भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए रामायण में कहा है- 
       यानि          पतन्त्यश्रूणि           राघव।
       तानि पुत्रपशून् हन्ति प्रीत्यर्थमनुशासत:॥
अर्थात् हे राम! निरपराध दण्डित मनुष्य के आँसू पक्षपाती राजा के पुत्र और पशुओं को नष्ट कर देते हैं। यानी महर्षि हमें सचेत करते हुए कह रहे हैं कि राजा जो प्रजा का पालक होता है, यदि वह पक्षपात करते हुए दण्ड देता है तो उसका समूल नाश हो जाता है।
        अपराधी को दण्ड देना न्यायोचित है परन्तु निरपराध को सजा देना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे किसी का भला नहीं हो सकता यह बात हर मनुष्य को सदा आत्मसात कर लेनी चाहिए और इसे स्मरण करते रहना चहिए। कहते हैं कि सौ अपराधी बेशक साक्ष्यों के अभाव में छूट जाऍं परन्तु किसी भी निरपराध को सजा नहीं होनी चाहिए।
          बहुत से मित्रजनों ने प्रत्यक्ष अनुभव किया होगा कि जो लोग हृदय से सरल व सहज होते हैं और दूसरों का हित साधने में जुटे रहते हैं, उन्हे यदि कोई व्यक्ति मानसिक सन्ताप भी देता है तो उसका अहित किसी-न-किसी रूप में हो जाता है। फिर वह सोचता रह जाता है कि उसे किस अपराध का दण्ड मिला है?
            ईश्वर बड़ा ही दयालु है। वह दीनबन्धु है। वह अपने सभी बच्चों की खबर रखता है और उन पर आने वाले सभी कष्टों को हरता है। वह कभी नहीं चाहता कि उसके मासूम बच्चों पर कोई भी अत्याचार करे अथवा उन्हें किसी तरह का कोई कष्ट दे। इसीलिए उन पर कुदृष्टि डालने वालों को वह कभी क्षमा नहीं करता। उन्हें कठोर-से-कठोर दण्ड दे देता है ताकि वे इस चेतावनी को समझ जाएँ और अपने भविष्य के लिए चौकन्ने हो जाएँ।
           इतना सब होने के बाद भी अपने झूठे अहं के कारण यदि मनुष्य न समझना चाहे तो वह परम न्यायकारी प्रभु उन्हें धन-सम्पत्ति और बन्धु-बान्धवों सहित शीघ्र ही नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। उस मालिक के प्रकोप से बचने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए। उसके बनाए हुए जीवों को कष्ट देने के स्थान पर उनके दुख दूर करने का प्रयास करना चाहिए। तभी मनुष्य उस मालिक की दृष्टि में एक अच्छा इन्सान कहला सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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