गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

मेरा मौन

सोचती हूँ काश मेरा मौन भी हो जाए मुखर
भाषा उसकी पढ़े औ पा सके उसकी  खबर

अब तलक न खोज पाई थी मैं अपना सबर
कह दो करते हैं सदा हम आप सबकी कदर

ऐसा कुछ कहा नहीं जो मच गया है ये गदर
जाने कब बन बैठे अब तुम खुद ही यूँ सदर

चाल चलते जा रहे हम इस तरह से बेखबर
कर दिया है जो अपना था वही तुमको नजर

वाचाल ही बनके न खाएँ ठोकरें यूँ दरबदर
न होगा तब भला जब पा सकोगे न ये कदर

खिंच जाएगा तब सब बन कर ही यह रबर
जालिम जमाना है बड़ा जो ले सबकी खबर

तुम चलो तनिक हाथ थामे मेरा मेरे मौनवर
लिख दिया नाम तुम्हारा मेरे हृदय-पटल पर

जाने कब कुछ दरक जाए काँच-सा पल हर
पलटवार कर भाग जाओगे तब किसके दर

बनाया तुझे है साथी यूँ न छोड़ दे मझधार
तू ही निभा दे अब मेरे जीवन के ये किरदार

सहलाता मुझे न करता यह पल-पल खटर
काश मेरा मौन ही सबकी रख पाता खबर

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

दानी कैसा हो

सृष्टि का नियम है कि दाता(दानी) का हाथ हमेशा ऊपर होता है और लेने वाले का हमेशा नीचे। यही प्रकृति के व्यवहार से भी स्पष्ट दिखाई देता है।
        हमारे सामने प्रत्यक्ष है कि बादल हमें हमारी जीवनी शक्ति जल देता है इसलिए वह ऊपर रहता है और पृथ्वी जल लेने वाली है व नीचे होती है।
        अपने आसपास पेड़ों की ओर एक नजर डालें तो स्वयं ही समझ आ जाती है कि वह हमें शीतल छाया, हवा व मधुर फल देते हैं। वे सिर उठाकर ऊपर रहते हैं और हम याचक की भाँति उन्हें नीचे धरा पर खड़े रहकर निहारते हैं।
        जिससे भी हम याचना करते हैं उसके समक्ष हमारी नजरें भी झुकती हैं और हाथ भी आगे फैलाना पड़ता है अर्थात् नीचा होना पड़ता है पर दानी को किसी की सहायता करने का एक सुखद अहसास देता है।
         प्रायः लोग जब बहुत ही मजबूरी या तकलीफ में होते हैं तो उन्हें माँगने की आवश्यकता पड़ती है। उस समय वे पल स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए मरने के समान होता है। कहते भी हैं-
          'माँगन गए सो मर गए मरकर माँगन जाए।'
        वे लोग जो चाटुकारिता प्रिय होते हैं अथवा मेहनत करके कमाना नहीं चाहते उन्हें माँगने से कोई परहेज़ नहीं होता। उसी की बदौलत उनका जीवन यापन होता है। उनको अपने मान-सम्मान की कोई परवाह नहीं होती। उनके जीवन का तो यही मूल मन्त्र होता है-
           'बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया।'
वे लोग किसी भी शर्त पर धन पाने की सोचते हैं बाकी सब उनकी नजर में बेमानी हो जाता है।
        स्वाभिमानी व्यक्ति हाथ का मैल कहे जाने वाले धन को मिट्टी के ढेले के समान समझते हैं। वे केवल मान को ही महत्व देते हैं।
       दानी व्यक्ति को कभी अपनी प्रशंसा में हमेशा प्रशस्तियाँ नहीं गानी चाहिएँ।यदि सारा समय वह यहाँ-वहाँ अपनी उदारता का ढिंढोरा पीटता रहेगा तो उसमें अहंकार आ जाता है जो उसके विनाश का कारण बनता है।
      उसकी की गई सहायता का कोई मूल्य नहीं रह जाता यदि वह उसे पुनः पुनः जताकर सहायता लेने वाले को शर्मिंदा करे। उसे हमेशा 'नेकी कर और दरिया में डाल' उक्ति याद रखनी चाहिए।
        प्रकृति नित्य प्रति हमें भरपूर देती है परन्तु कभी अहसान नहीं जताती। जितने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते उससे भी कहीं अधिक देती है। यदि वह जताती तो संसार पलभर में नष्ट हो जाता इतने वर्षों तक नहीं चलता।
        प्रकृति की ही तरह मनुष्य को देते समय यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि वह देने वाला है। नहीं, दाता होने का अहम छोड़कर उसे सोचना चाहिए कि देने वाला तो ईश्वर है जो अदृश्य रहकर मानव के मन में प्रेरणा देता है तभी वह दानादि जैसा पुण्य कर्म करता है। मनुष्य तो केवल उस मालिक के हाथों की कठपुतली है और यही सत्य है। उसे हमेशा विनम्र रहना चाहिए।
         हम अपनी शुद्ध कमाई से कुछ अंश बचाकर दूसरों की सहायता करें। उन्हें समर्थ बनाने का यत्न करें। हमेशा देते समय दाता होने का भाव मन से निकाल कर नजरें झुकाए रखें और उस ईश्वर का धन्यवाद करें जिसने हमें इस योग्य बनाया है कि हम किसी के काम आ सके।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

माता-पिता का सम्मान

एक मित्र ने आग्रह किया कि  कृपया माता-पिता के आदर हेतु भी आप लोगो को प्रेरित करें।
        उनके इस सुझाव के अनुसार प्रस्तुत हैं मेरे उदगार। माता-पिता हमें इस संसार में लाकर हम पर बहुत उपकार  करते हैं। उनके इस ॠण को मनुष्य चुका नहीं सकता चाहे वह सारी आयु उनकी सेवा करता रहे। माँ पालन-पोषण करती है, स्वयं गीले में रहकर हमारे सुख का ध्यान रखती है। वह हमें अक्षर ज्ञान भी कराती है। इसलिए वह हमारी प्रथम गुरू है, महान है और पूज्या है। पिता हमारा पोषक है इसलिए वह आकाश से भी ऊँचा है और महान है।
          हमारे धर्म ग्रंथ माता-पिता को देवता मानने का आदेश देते हैं। मंदिरों में जाकर पत्थर के देवी-देवताओं की हम पूजा करते हैं परंतु घर में बैठे जीवित देवताओं यानि माता-पिता की अवहेलना करते हैं। उनकी सेवा करने के स्थान पर उन्हें दाने-दाने का मोहताज बना देते हैं। घर में उन्हें रहने का ठिकाना भी नहीं देना चाहते। उनकी जरूरतों को पूरा करने में हम कोताही करते हैं। आजकल विदेशियों की नकल पर कुछ बच्चे माता-पिता को ओल्ड होम में भेज देते हैं जो हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार शोचनीय स्थिति है।
        दोनों पति-पत्नी यदि कमाते हैं तो भी माता-पिता को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं बचते जबकि अपने खर्च में उनकी कोई कमी नहीं होती। उनके अपने सभी कार्य अपने निश्चित ढर्रे पर चलते रहते हैं। यह बहुत निन्दनीय है। व्यापारियों की हालत भी कोई अधिक अच्छी नहीं है । जमा-जमाया कारोबार सम्हालने पर भी उन्हें अपने ही माँ-पापा बुरे लगने लगते हैं।
         बच्चे अपने माता-पिता से सारी उम्मीदें रखते हैं। उनके मरने के पश्चात लाखों रुपये अपनी शान बघारने के लिए खर्च कर देंगे ताकि समाज में उनकी नाक ऊँची रहे।
         बच्चे अपने माता-पिता से सारी उम्मीदें रखते हैं। उनके पास जो धन-संपत्ति या कारोबार आदि है, सब समेटना चाहते हैं। वे हर समय माता-पिता को उनके कर्तव्य याद दिलाना चाहते हैं परंतु अपने सारे दायित्वों से विमुख हो जाते हैं। जिन माता-पिता को जीते-जी पानी भी नसीब नहीं होत उनके मरने के पश्चात  उनके बच्चे लाखों रुपये अपनी शान बघारने के लिए खर्च कर देते हैं ताकि समाज में उनकी नाक ऊँची रहे।
        अपने बच्चों के समक्ष ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने के स्थान पर उन्हें ऐसे आदर्श सिखाएँ कि वे अपने माता-पिता का अनादर करने की हिम्मत न कर सकें। वे समाज के डर से नहीं अपने मन से माता-पिता की सेवा करें और उनके प्रति अपने दायित्वों को पूरा करें।
         मैं निराशावादी बिल्कुल नहीं हूँ। आज भी ऐसी संतानें हैं जो अपने माता-पिता के लिए हर सुख का बलिदान कर उनके लिए जीते हैं और हर समय उनके सुख-साधनों को जुटाते हैं। ऐसे ही बच्चों के कारण हमारी सांस्कृतिक विरासत बची हुई है और भारतीय पारिवारिक ढाँचा बरकरार है।

शनिवार, 31 जनवरी 2015

संत समाज का आईना

संत समाज का आईना व मार्गदर्शक होते हैं। साधु-संतों की जाति नहीं पूछी जाती बल्कि उनका ज्ञान परखा जाता है। इसीलिए कहा है-
'जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।'
       जिसे हम वास्तव में संत कहते हैं वह संसार के बंधनों से मुक्त होता है। ऐसा वह झूठ-फरेब, ईष्या-द्वेष, मोह-माया आदि सांसारिक बंधनों में नहीं बंधता। वह सभी को अपने समान समझता है। वह किसी आडंबर या नाम की इच्छा नहीं रखता।ऐसे संत ही समाज का आभूषण कहलाते हैं। वे अनाम रहकर आत्मोन्नति के लिए समाज से कटकर जंगलों, पर्वतों या गुफाओं साधना करते हुए कैवल्य प्राप्त करते हैं। और यदि समाज में रहते भी हैं तो भौतिक ऐश्वर्यों का त्याग कर समाज की भलाई के कार्य करते हुए संसार से विदा लेते हैं।
       कवि ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में मनस्वी जनों को परिभाषित किया है। वे कहते हैं कि वास्तव में मनस्वी संत फूलों की तरह होते हैं जो या तो शहर में रहते हैं तो सबके सिरों पर विराजमान होते हैं या फिर जंगलों में ही तपस्या करते हुए बिना किसी से प्रशंसा की अपेक्षा किए, किसी की नजर में आए बिना नष्ट हो जाते हैं-
कुसुमस्तबकस्यैव द्वे वृत्ती तु मनस्वीनाम्।
सर्वेषां मूर्ध्नि वा विराजयेत् वने वा विशीर्यात्।
         संत समाज में अपने सत्चरित्र और  गुणों से सर्वत्र अपनी सुगंध फैलाते हैं। सदा संतों को हम उनके सद् गुणों, संयम, आचार-व्यवहार, उनकी कथनी-करनी के एकरूप होना आदि गुणों से पहचान सकते हैं।
       संत को पहचान कर, जाँच-परख कर उस पर विश्वास करना उचित होता है। दूसरे लोगों की चिकनी-चुपडी बातों में न उलझकर अपने विवेक पर भरोसा कीजिए। आपकी तर्क की कसौटी पर जो खरा उतरे उसे संत मान अनुसरण करें अन्यथा सब छोड दें।
       जो संत समाज को सही दिशा नहीं दे सकता अथवा दिग्दशर्क नहीं बनता तो ऐसा वह त्याज्य है व सम्मान प्राप्त करने के योग्य नहीं हो सकता। संत की कोई उपाधि नहीं होती। न ही उसके लिए कोई मापदंड होता है। उसके लिए किसी विद्वत परिषद के गठन की भी आवश्यकता नहीं होती।
      संत यदि केवल पुस्तकीय ज्ञान या कुछ सिद्धियों के बल पर जन सामान्य को प्रभावित करता है परन्तु यदि उसका आचरण अनुकरणीय नहीं है तो वह सर्वथा त्याज्य है।
      पुस्तकीय ज्ञान तो गधे पर लादे बोझ की तरह होता है। यदि उसे पढ़कर उस पर मन, वचन व कर्म से आचरण न किया जाए तो वह भार बन जाता है। तभी कहा है-
        ज्ञानं भार: क्रियां विना।
अर्थात् यदि जीवन क्रियात्मक न हो तो ज्ञान भार बन जाता है।
साधु-संतो की कसौटी उनके सद् गुण और सदाचरण होती है। अपने विवेक रूपी निकष पर कसकर ही संतों को अपने सिर का ताज बनाएँ और अपने जीवन को धन्य करने का यत्न करें।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

बच्चों में झूठ की आदत

घर में माता-पिता तथा विद्यालय में अध्यापकगण बच्चों में झूठ बोलने की समस्या से परेशान हैं। सोचने वाली बात है कि ये नन्हे-मुन्ने इस आदत के अभ्यस्त कैसे हो जाते हैं? उन बेचारे नौनिहालों को तो यह भी नहीं पता होगा कि वे दिन-प्रतिदिन कितनी भयावह बिमारी का शिकार हो रहे हैं? हमें अब यह सोचना हमारा कर्त्तव्य है कि बच्चों में पाई जाने वाली इस असत्यवादिता पर लगाम कैसे लगाई जाए जिसके कारण वे मासूम हर स्थान पर डाँट-फटकार का सामना करने से बच जाएँ।
      यदि गहराई से सोचें तो इस समस्या की जड़ तक पहुँचने में हमें बिलकुल भी कठिनाई नहीं होगी क्योंकि इसका कारण हम सभी हैं। अब आप सब हैरान हो रहे हैं न मेरी सोच पर। वास्तव में हमें अपने गिरेबान में झाँकने की आवश्यकता है। छोटा बच्चा अपने आसपास के माहौल को बड़ी बारीकी से देखता है। उससे बहुत कुछ सीखता है।
       सबसे पहले अपने घर की बात करते हैं। बच्चे की सबसे पहली पाठशाला उसका घर होता है। अपने घर में जैसा देखता है उसे ही ब्रह्म वाक्य मान लेता है। घर में उस झूठ का व्यवहार दिखाई देता है। इस वाक्य पर चौंकिए नहीं। प्राय: घर में हर छोटी-बड़ी बात को हम एक-दूसरे से छिपाने की कोशिश करते हैं। इस प्रयास में बारंबार झूठ बोलते हैं। किसी मित्र, पड़ौसी या संबंधी से हम नहीं मिलना चाहते तो कहला देते हैं घर नहीं हैं। घर में इस प्रकार झूठ का व्यवहार देखकर बच्चा उस व्यवहार को सत्य मानकर उसी राह पर चल पड़ता है। जाने-अनजाने हमें अपना असत्य व्यवहार अच्छा लगता है परंतु मासूम बच्चे जब वैसा असत्य व्यवहार करता है तो हम उस पर आगबबूला हो जाते हैं। उसे भला-बुरा कहते हैं, डाँटते-डपटते हैं और जीभर करके उसको कोसते हैं। वह मासूम बेचारा समझ ही पाता अपनी उस गलती को।
       इसी भाँति अपने आसपास हो रहे ऐसे कार्यकलाप उसके विचारों को और अधिक हवा देते हैं। धीरे-धीरे बच्चा झूठे आचरण का इतना आदि हो जाता है कि वह अपनी सुविधा के लिए विद्यालय में अपनों की बिमारी या मौत की झूठी खबर सुनाने में भी परहेज नहीं करता। नित नए बहाने बनाने में वह अपनी शान समझता है।
       विद्यालय में गृहकार्य करके न जाने, परीक्षा में कम अंक आने पर जब उसे माता-पिता के बुलाने पर टालमटोल करने के बहाने बनाता है। माता-पिता के जाली हस्ताक्षर करके वह विद्यालय में डाँट खाने से बचने की कामयाब-नाकामयाब कोशिश करता है। घर में अपनी असफलताओं की चर्चा न करके उन्हें छिपाता है।
          जब तक घर में उसकी असलियत पता चलती है तब तक बहुत देर हो चुकती है। तब बच्चे का सुधार नामुमकिन तो नहीं कठिन अवश्य हो जाता है। इस बात को अवश्य याद रखिए कि इस संसार में बच्चा जब जन्म लेता है तब वह मासूम होता है। इस दुनिया के छल प्रपंचो से अनजान होता है। उसे छल-कपट के संस्कार हमीं देते हैं।
        उन भोलेभाले बच्चों पर हम अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का अनावश्यक दबाव न डालें जिसके कारण भी हमसे छुपाने के चक्कर में भी वह असत्यवादिता को अपना सखा बना लें और दिन-प्रतिदिन हमसे दूर होते जाएँ।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

मैं हठी हूँ और मेरा बाल मन भी है हठी

मैं हठी हूँ और मेरा बालमन भी है हठी
देखते हैं किस की हठ पुग जाएगी अब।

कहता है वो मुझसे चाँद ही ला दो मुझे
पानी में परछाई से ही बहला दूँगी तुझे।

छूना चाहता बादलों से परे आकाश को
मैं थमाती हूँ इक फीता उसी नादान को।

उड़ना चाहता है पंख फैलाए पक्षी-सा वो
पल में ही नाप आया सारी धरती है वो।

बहुत खुश नाचना चाहे वन मयूर-सा वो
सोचती हूँ गुनगुना दे कोई मधुर धुन वो।

कह दो चाहतें हैं असीम नहीं मानता वो
उन पर नहीं होता वश उसका जानता वो।

किसकी मर्जी है ये सब समझ पाएगा वो
फिर-फिर कर अब एक चाबुक माँगता वो।

इधर-उधर न भटके उसको थाम लेगा वो
अपनी मंजिलों को सदा ही पहचानता वो।

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

युवाओं का अकेलापन

युवावर्ग में आज अकेलेपन की समस्या घर करती जा रही है। इस भौतिक युग में जीवन में आपाधापी इतनी अधिक  बढ़ गई है कि आज युवा अपना मार्ग सुनिश्चित ही नहीं कर पा रहा।
         युवा आज बहुत महत्त्वाकांक्षी है। वह अपना कैरियर बनाना चाहता है वही उसकी प्राथमिकता है जो उचित भी है। इस भौतिक युग में समय के साथ ताल मिलाकर चलना वह बखूबी जानता है। वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके दूर आकाश की ऊँचाइयों को छूना चाहता है। देश-विदेश जहाँ भी उसे मौका मिलता है अपने लक्ष्य को पाने की ओर बढ़ जाता है। इसलिए इस ओर वह इतना अधिक व्यस्त है कि जीवन के अन्य सभी पहलुओं की ओर नहीं देखना चाहता तथा उनके साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा।
      जितना ही वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है उतना ही अकेला होता जा रहा है। दिन भर सिर्फ काम और काम। कभी मीटिंग और कभी टूर। सवेरे घर पर समय से निकलने के बाद घर वापिस लौटने का कोई समय नहीं। बस इसके अतिरिक्त और कोई गतिविधि नहीं और न ही कोई सामाजिक जीवन। शादी-ब्याह, पार्टी, तीज-त्योहार कुछ भी निभाना समय के अभाव के कारण बहुत कठिन हो जाता है। यह भी उनके अकेलापन का बड़ा कारण बन जाता है।
       अपने व्यावसायिक कार्योँ में व्यस्त रहने वाला युवावर्ग स्वयं अपने लिए न समय निकाल पाता है और न ही अपने बारे में सोच पाता है। अपने कैरियर के लिए सजग युवा तरक्की और तरक्की की आशा में अपनी उम्र की बढ़ती आहट को नहीं सुन नहीं पाता।
       अपने जीवन साथी के विषय में सोचने का समय उसके पास नहीं है और यदि विवाह के बंधन में बंध जाता है तो जीवन की भागदौड़ में जीवनसाथी व बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाता। तब व्यर्थ की तकरार में उनका समय व्यतीत होता है जिसके बढ़ जाने पर तालाक तक के हालत पैदा हो जाते हैं।
        तालाक के बाद कुछ युवा पुनर्विवाह कर लेते हैं और कुछ अपने कटु अनुभवों के बाद अकेले रहना पसंद करते हैं।
        बहुत सी स्थितियों में युवा को अपना भविष्य संवारने के लिए घर-परिवार से दूर दूसरे शहर या विदेश में इच्छा से या अनिच्छा से नौकरी करने के लिए अकेले ही जाना पड़ता है। यह वह स्थिति है जब अकेलापन उसका साथी बन जाता है।
        कुछ युवा सही समय पर अपने अहम के कारण दूसरों में कमी निकालते रहते हैं जिससे आयु बीत जाने पर अकेले हो जाता है। कभी-कभी परिस्थितिवश पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए भी अंतत: वह अकेला रह जाता है।
        कुछ युवा आजकल स्वेच्छा से अकेलेपन का वरण करते हैं उनके ऐसा करने के पीछे कोई साख कारण नहीं होता।
       युवा पति या पत्नी में से किसी एक की मृत्यु के बाद दूसरा साथी बच्चों के लिए या अन्य किसी कारण से पुनः विवाह न करके अकेला रहने का निर्णय कर लेते हैं।
        युवा स्वेच्छा से एकाकी रहना चाहता है,  अपना भविष्य बनाना चाहता है, उसके पास यह सब सोचने का समय नहीं है यह सब ठीक है। परन्तु युवावस्था के पश्चात जब वृद्धावस्था की ओर वह बढ़ता है तब उसके पास अपना कहने के लिए कोई नहीं होता। तब तक माता-पिता इस लोक से विदा ले चुके होते हैं और भाई-बहन अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो जाते हैं। इस प्रकार वह दिन-दिन अकेला होता जाता है। तब उस समय अपने जीवन की ओर मुड़ कर देखना ही शेष बचता है।