बुधवार, 23 दिसंबर 2015

पति-पत्नी एक मुठ्ठी की तरह

पति और पत्नी को सदा इस प्रकार मिलकर रहना चाहिए कि मृत्यु के अतिरिक्त संसार की कोई भी अन्य ताकत उन दोनों को अलग न कर सके। हमारे महान ग्रन्थों के अनुसार गृहस्थ जीवन में यह स्थिति एक आदर्श स्थिति होती है। जिन घरों में उन दोनों में वास्तव में सामंजस्य होता है वहाँ स्वर्ग जैसा आनन्द होता है। ऐसे सुख के लिए तो देवता भी तरसते हैं। वे देवता लोग भी ऐसे घरों में जन्म लेने के लिए तरसते रहते हैं।
        पति और पत्नी को दो जिस्म और एक जान बनकर रहना चाहिए। तभी गृहस्थी की गाड़ी ठीक से पटरी पर चल सकती है। कहने का अर्थ यह है कि यदि उन दोनों में परस्पर विश्वास, सच्चाई, ईमानदारी, समझदारी और पारदर्शिता का व्यवहार होता है तभी घर-परिवार एक मुट्ठी की तरह बंधा हुआ रह पाता है। अन्यथा वह घर तिनकों की तरह उड़कर इधर-उधर बिखर जाता है।
         संस्कृत भाषा के सुप्रसिद्ध महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में भगवान शिव और भगवती पार्वती की वन्दना करते हुए कहा है-
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगत:  पितरौ वन्दे  पार्वतीपरमेश्वरौ॥
अर्थात भगवान शिव और भगवती पार्वती दोनों इस प्रकार मिले हुए हैं जैसे शब्द और अर्थ। शब्द और अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता। वैसे ही न दोनों को भी अलग नहीं कर सकते।
         दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि शब्द बोलते ही हम बिना कहे उसके अर्थ को जान लेते हैं और उसी तरह अर्थ कहते ही हमें शब्द का पता चल जाता है। इस तरह दोनों एकरूप हैं। इसी तरह पति और पत्नी को सदा दूध में शक्कर की तरह ही मिलकर, एक बनकर रहना चाहिए तभी जीवन में आनन्द ही आनन्द होता है। ऐसे दम्पति युगल के उदाहरण देते हुए लोग नहीं थकते और उनकी कसमें तक खाने के लिए तैयार रहते हैं।
         जिन पति-पत्नी के सम्बन्ध में परस्पर विश्वास, सौहार्द और पारदर्शिता नहीं होती वे सारा जीवन लड़ते-झड़गते और लानत-मलानत करते हुए गुजार देते हैं। एक-दूसरे को ताना देना, बात-बात में छींटाकशी करना उनका स्वभाव बन जाता है। ऐसा घर नरक से भी बदतर होता है। यहाँ रहने वाले सभी परिवारी जन पूर्व-पश्चिम की तरह अलग-अलग रहते हैं। कोई किसी की शक्ल देखना पसंद नहीं करता।
          जीवन का अधिकांश समय पति और पत्नी एक साथ गुजारते हैं। प्राय: शादी लड़कों की शादी 25 से 30 वर्ष की आयु में होती है और लड़कियों की शादी20 से 27 हो जाती है। शादी के बाद दोनों पति और पत्नी एकसाथ रहते हैं। आयु के इतने वर्ष साथ-साथ रहने पर भी परस्पर आपस में विश्वास या तारतम्य का न होना वाकई बहुत ही हैरानी का विषय है।
         विवाह से पूर्व दोनों युवा अपने भावी सुखी जीवन के लिए सपने बुनते हैं तो फिर ऐसा अनायास क्या हो जाता है कि वे परस्पर विश्वास की डोर में सदा के लिए नहीं बंध पाते? यह अविश्वास का भूत उन्हें क्यों डराने और सताने लगता है? दोनों एक न होकर सारा जीवन दो बनकर क्यों जीना चाहते हैं?
          युवाओं को अपने देखे हुए सपनों को साकार करने के लिए अपना नव जीवन आरम्भ करने से पूर्व अपने-अपने अहं को ताक पर रख देना चाहिए, उन्हें टकराने नहीं देना चाहिए। उन्हें अपने-अपने पूर्वाग्रह को छोड़कर बंद मुट्ठी की तरह रहना चाहिए। यदि उन्हें कोई कष्ट भी हो तो किसी को भी उनके कष्ट की भनक भी न लगने पाए। यदि कभी कोई समस्या आ भी जाए तो उसे मिल-बैठकर दो समझदार लोगों की तरह सुलझा लेनी चाहिए, कभी तकरार नहीं करनी चाहिए।
        यदि पति-पत्नी एक रथ के दो पहिए की तरह जीवन गुजारना चाहते हैं तो जीवन में आपसी तालमेल बनाए रखना चाहिए। इससे जीवन को जीना सहज और सरल हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

जिसके पास जो है वही देगा

जिसके पास जो कुछ भी होता है, वह वही दूसरों को देता है। इस कड़ी में सबसे पहले हम परमपिता परमात्मा की बात करते हैं। उसने सृष्टि का निर्माण कर जीवों की रचना की। उसके पास सब कुछ है, उसने हमें भी सब कुछ दिया है। अति मूल्यवान यह शरीर दिया जिसके एक-एक अंग के मूल्य को यदि जोड़ें तो वह वैज्ञानिक दृष्टि से करोड़ों रुपए बन जाता है। इस शरीर के अलावा दुनिया में जीने के लिए तरह-तरह के साधन दिए हैं। सुख-सुविधाएँ दी हैं।
         सम्पूर्ण प्रकृति हम जीवों को जीवन देती है। बादल अपने जल से हमें अन्न, जल देकर हमारा पोषण करता है। वायु हमें
जीवन दायिनी शक्ति देती है। सूर्य अपने प्रकाश व ऊष्णता से इस सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है और ऊष्मा देने का महान कार्य है। अग्नि अपने ताप से गरमी देती है और हमारा भोजन पकाती है। जल हमारी दैनन्दिन आवश्यताओं को पूर्ण करता है और बिजली का उपहार देकर हमरे जीवन को सुगम बनाता है। इसी तरह सम्पूर्ण प्रकृति अपने उपहारों से हमें सदा मालामाल करती रहती है।
          अब हम अपने आसपास जरा नजर दौड़ाते हैं। हमारे चारों ओर अपार जन समूह है। इसमें भिन्न प्रकृति के लोग रहते हैं। हमारे दैनिक जीवन में हमारा इनसे वास्ता पड़ता रहता है। सज्जन अपने सद् गुणों की फुहार से सबको आनन्दित करते हैं। उनके पास जाने पर मन को सदा शान्ति मिलती है। बारबार उनसे मिलने की इच्छा होती है। इसका कारण उनका उदार हृदय होना होता है। वे निस्वार्थ भाव से सबके हितचिन्तक होते हैं। अपने सुख-चैन की बलि देकर भी मानवता की सेवा में तत्पर रहते हैं।
         इसके विपरीत दुर्जन अपने अवगुणों की भट्टी में दूसरों को बरबस झोंकते हैं। वे अपने स्वार्थों को सर्वोपरि रखते हैं। इसलिए जाने-अनजाने दूसरों को कष्ट देते रहते हैं।
         उन्हें दूसरों को दुख देकर प्रसन्नता होती है। एसे लोगों से सावधान रहना चाहिए, ये खतरनाक होते हैं।
           समाज विरोधी गतिविधियों में लगे लोग सबको वैसा ही बनाना चाहते हैं ताकि वे दूसरों की आड़ में अपने धन्धे को जायज ठहरा सकें। चोर, डाकू, गिरहकट, स्मगलर, रिश्वतखोर, टैक्सचोर आदि सभी दूसरों को वैसा बनने की ट्रेनिंग देते हैं। ऐसे सभी लोग समाज के शत्रु तथा देश व कानून के बड़े अपराधी होते हैं।
          आतंकवादी लालच देकर दूसरों के माध्यम से अपनी योजनाओं को साकार करते हैं। धर्म के नाम पर भोले-भाले लोगों को बरगलाने का काम करने वाले वे उन्हें प्यार से या जबरदस्ती अपराधी बना डालते हैं।
          तथाकथित धर्मगुरु भी लोगों का ब्रेन वाश करने का काम बखूबी करके उन्हें अपना पिछलग्गू बना देते हैं। अपरिग्रह का उन्हें पाठ पढ़ाते हुए उनका सब कुछ हर लेते हैं और उन्हें किसी भी लायक नहीं छोड़ते। इसी तरह ज्योतिषी और तन्त्र-मन्त्र वाले भी, अपने दुखों से परेशान लोगों को डराकर उन्हें बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उनके धन को हड़पने में षडयन्त्र करते रहते हैं।
         विद्वान के पास जो कोई जाता है, वे उन आगन्तुकों को सदा ही ज्ञान बाँटते हैं। वे हर सम्भव प्रयास करते हैं कि सामने वाला उनसे ज्ञान लाभ करके अपने लोक-परलोक दोनों को सुधार सके।
         इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि कोई भी व्यक्ति दूसरों को वही दे सकता है जो उसके पास होता है। हमें अपने विवेक से विचार करके सही रास्ते का चुनाव करना है। अपने जीवन में शुभ की कामना करते हुए उसके अनुसार ही आचरण करना आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 21 दिसंबर 2015

आत्मज्ञान

हमारी वाणी, हमारी श्रवण इन्द्रिय, हमारी नासिका या घ्राण शक्ति, हमारी आँखें, हमारा, हमारा प्राण आदि हमारे होते हुए भी हमारे नहीं होते। अर्थात कुछ समय पश्चात हमारा साथ छोड़ देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ये हमें साधन के रूप में निश्चत समय के लिए मिलते हैं। यदि इनका उपयोग हम आत्मोन्नति के लिए करते हैं तो ईश्वर तक पहुँचने की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। अन्यथा चौरासी लाख योनियों में भटकते रहते हैं।
         ईश्वर हमारी इन भौतिक इन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका साक्षात्कार अपने हम ज्ञान चक्षुओं से कर सकते हैं। इस आत्म साक्षात्कार करने की कोई आयु नहीं होती। सौतेले भाई को पिता की गोद में देखकर पिता की गोद में बैठने के लिए मचलने वाले बालक ध्रुव को उसकी माँ ने परमपिता परमात्मा की गोद को पाने के लिए प्रेरित किया। नारद जी के मार्गदर्शन में उसने छोटी-सी अवस्था में यह कठिन अथवा असम्भव-सा प्रतीत होने वाला कार्य कर दिखाया। ऐसी मान्यता है कि आकाश में चमकने वाला और सबको मार्ग दिखाने वाला ध्रुव तारा वही बालक ध्रुव है।
        कठोपनिषद में एक कथा आती है कि ऋषि वाजश्रवा ने मुक्ति की कामना से यज्ञ किया और अपना सर्वस्व दान करने के लिए निश्चय किया। जब दान करने का समय आया तो उनके मन में मोह उत्पन्न हो गया। वे ऐसी गौवें दान करने लगे जो वृद्ध हो चुकी थीं और दूध नहीं देती थीं। उनका पुत्र नचिकेता बालक था। पिता को ऐसा करते देखकर उसे दुख हुआ। उसने पिता से कहा कि मैं आपका सबसे प्रिय हूँ, मुझे दान में किसको दोगे। दो-तीन बार उसके पूछने पर पिता ने कहा तुझे यमराज यानि मृत्यु के देवता को देता हूँ।
         यह सुनते ही बालक यमराज के घर गया। वे कहीं गए हुए थे, घर पर नहीं थे, तीन दिन के बाद लौटे।बालक वहीं घर के बाहर बैठकर ही भूखा-प्यासा रहकर उनकी प्रतीक्षा करता रहा। यह जानकर यमराज को बहुत दुख हुआ। उन्होंने उसे तीन वरदान माँगने के लिए कहा।
पहले वर मे नचिकेता ने माँगा कि उसके पिता शान्त संकल्प हों, प्रसन्न मन हों, क्रोध रहित हों और जब मैं यहाँ से लौटकर घर जाऊँ तो मुझसे प्रसन्न होकर बोलें। इतना सब होने के बाद भी वह अपने पिता से नाराज नहीं था।
           दूसरे वरदान में उसने स्वर्ग साधक अग्नि का उपदेश देने के लिए उनसे कहा। उसकी कुशाग्र बुद्धि से प्रसन्न यमराज ने इस अग्नि का नाम  'नचिकेता अग्नि' रख दिया। फिर उसे तीसरा वरदान माँगने के लिए कहा। संसार की असारता को समझने वाले उस बच्चे ने आत्म ज्ञान का उपदेश देने के लिए कहा।
          यमराज ने उसे धन-सम्पत्ति, दीर्घायु, राज्य सुख, स्वर्ग के नानाविध सुख, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति आदि अनेकानेक भौतिक वस्तुओं का लालच दिया पर वह नहीं माना। अन्तत: यमराज ने उसे फिर 'अध्यात्म योग' अर्थात इन्द्रियों को वश में करने का उपदेश दिया। ऐसा कर पाने से इन्द्रियाँ विषय भोगों की ओर आकृष्ट होकर भटकती नहीं हैं, ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाती हैं।
         बालक नचिकेता का यमराज से आत्मज्ञान की जिद करना और बालक ध्रुव का जंगलों में जाकर प्रभु प्राप्ति के लिए कठोर तप करना, इसी सत्यता का द्योतक है कि यह संसार मिथ्या है। सत्य केवल परमात्मा है, जिसे पाने के लिए जन्म-मरण का यह प्रपंच रचा गया है।
          आत्मज्ञान को समझना बच्चों का खेल नहीं। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी राह भटक जाते हैं, इन बच्चों ने इसे मुमकिन कर दिखाया। मनुष्य चाहे अथवा इच्छाशक्ति को दृढ़ कर ले तो वह कुछ भी पा सकता है। आत्मज्ञान द्वारा जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 20 दिसंबर 2015

खुदा और खुदी की दुनिया

दुनिया दो प्रकार की है- एक खुदा की और दूसरी खुदी की।
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में दो तरह की शक्तियाँ काम करती हैं- एक भक्ति वाली और दूसरी माया वाली।
अर्थात यह संसार ईश्वर की सुन्दर रचना है। उसका गुणगान करते हम नहीं थकते। यह भक्ति वाली शक्ति कहलाती है।
         दूसरी ओर मानव अपने इर्द-गिर्द मोह-माया की दीवारें खड़ी कर लेता है। उसके अनुसार उसकी यह सृष्टि बहुत ही मनमोहक है। इसका नुक्सान उसे स्वयं ही उठाना पड़ता है। यह माया वाली शक्ति कही जाती है।
        वैसे तो मनुष्य मोहमाया के जाल में फंसा रहता है। मैं, मेरा घर, मेरा परिवार, मेरे बच्चे, मेरा व्यापार या नौकरी- बस यही उसकी दुनिया है जिसके लिए वह जीता है और खटता है। उसके आगे न तो वह कुछ सोचना चाहता है और न ही कुछ समझना चाहता है। इस संसार के इतने आकर्षण हैं कि मनुष्य उन्हीं में खोया रहता है। उनसे फुर्सत पाए तो उसे अपने बारे में सोचने का मौका मिले।
         जितने समय के लिए उसे इस संसार में जीवन मिलता है, वह बस इसी धुन में रहता है कि अधिक से अधिक धन-सम्पत्ति का संग्रह कर लूँ, अपने व अपनों के लिए सुविधाएँ बटोर ले। इसी चक्कर में अपनी सुधबुध खोकर वह कोल्हू का बैल बन जाता है। जब उसे थोड़ा-सा साँस लेने का समय आता है, उसका इस दुनिया से विदा लेने का समय आ जाता है। तब तक वह चेतता नहीं है।
         माया के मजबूत किले में वह अनचाहे गिरफ्तार हो जाता है। इस किले से मनुष्य की रिहाई नामुमकिन तो नहीं पर कठिन अवश्य है। वह स्वयं जब तक संसार के कारोबार से स्वयं को जोड़े रखता है तब तक वह विषय-वासनाओं की उस दलदल में धंसता चला जाता है। वहाँ से बाहर निकल पाना उसके बूते की बात नहीं रह जाती। फिर तो कोई चमत्कार ही उसे बचा सकता है जैसे वाल्मीकि, अंगुलीमाल आदि डाकुओं की काया पलट हो गई थी।
         ईश्वर की बनाई सृष्टि हर जीव की अपनी सृष्टि है। उसमें सदा ईशवरीय सत्ता का ही राज्य चलता है। मनुष्य यदि यह सोचने लगे कि वह बहुत बड़ा तपस्वी बन गया है या बहुत शक्तिशाली है अथवा हर प्रकार से साधन सम्पन्न है, इसलिए वह ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देने में समर्थ हो गया है। यह उसकी बालसुलभ चेष्टा है। जिसे हम उसकी मूर्खता या नादानी कह सकते हैं। रावण, हिरण्यकश्यप जैसे हजारों-लाखों का एक ही अन्त होता है जो किसी भी तरह अच्छा नहीं कहा जा सकता।
        मनुष्य चाहे कितनी नगरियाँ बसा ले, वह उस मालिक के समान यत्न करने पर भी नहीं बन सकता। अहंकारवश अपनी मूँछों को ताव देता हुआ, विष दन्त निकाले हुए साँप की तरह फुँफकार सकता है। हाँ, ऐसा करने का अथक प्रयास कर सकता है पर ईश्वर जिसका सहाय हो, ऐसे किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। सिर्फ दाँत किटकिटाता और मन मसोसता हुआ रह जाता है।
         सत्ता उसी मालिक की ही चलती है, इन्सान चाहे भी तो उसकी बराबरी में खड़ा होने की उसकी औकात नहीं है। वह अपने बनाए बिछाए भ्रमजाल में प्रसन्न हो सकता है, आनन्द मना सकता है। आखिर में उसे अपने अच्छे या बुरे सभी कर्मों का हिसाब तो उसी परम सत्ता को ही देना पड़ता है। वहाँ यह कहने की उसकी सामर्थ्य है क्या कि मैं तुझे हिसाब नहीं दूँगा?
        मनुष्य कितना भी फनेखाँ बन जाए, स्वयं को स्वयंभू कह ले उसकी बनाई हुई माया नगरी यहीं धरी की धरी रह जाती है।ऐसे कितने आए और कितने गए, सब इतिहास के पन्नों में दफन होकर रह गए। इसलिए विद्वान ज्ञानी जन ईश्वर की दुनिया से टकराने के बजाए, उसे शीश नवाते हैं। अपने इहलोक व परलोक को सुधारने के लिए उसकी सच्चे मन से आराधना करते हैं। उस मालिक की सृष्टि और भक्ति ही सत्य है, शेष मनुष्य की माया और उसकी शक्ति सब बौने हैं, मिथ्या हैं, छलावा हैं। इनके गर्व से यथासम्भव बचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

मनुष्यों का प्रकृति के अनुसार विभाजन


आसपास रहने वाले या काम करने वाले बहुत से लोगों के साथ हमारा संपर्क होता है। सबकी प्रकृति अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के आचरण और व्याहार में हमें विभिन्नता दिखाई देती है। जिस प्रकार मनुष्य रंग-रूप में एक जैसे नहीं दिखाई देते उसी प्रकार उनकी आदतों में भी अन्तर स्पष्ट ही लक्षित होता है।
         सामाज में रहते हुए वे सब के साथ कैसा व्यहार करते हैं? समाज उनकी स्थिति कैसी है?  उसके अनुसार उन्हें हम चार श्रेणियों में इस प्रकार विभाजित कर सकते हैं- 1. उदार   2. दाता   3. कंजूस 
4.  मक्खीचूस।
          सबसे पहले हम उदार लोगों की चर्चा करते हैं। ये महानुभाव सारी पृथ्वी के जीवों को अपने हृदय से लगाकर रखने का जज़्बा रखते हैं। ये परोपकारी लोग सभी के चहेते होते हैं। हर व्यक्ति इनसे अपना संपर्क साधना चाहता है। ये निस्वार्थ भाव से सबके सुख-दुख में साथ निभाते हैं। लोग इनके पास अपनी परेशानियों के साथ आते हैं और प्रसन्न होकर वापिस लौटते हैं। किसी के रहस्यों को सार्वजनिक करके उसे उपहास का पात्र नहीं बनाते। बहुत ही गम्भीर व सज्जन इन लोगों को महापुरुषों की तरह समाज पूजता है।
            दूसरे प्रकार के लोग दाता होते हैं जो दान देने में कभी पीछे नहीं हटते, सदैव तत्पर रहते हैं। सामाजिक एवं धार्मिक सभी प्रकार की संस्थाओं को वे दिल खोलकर दान देते हैं। जहाँ किसी जरूरत मंद को देखते हैं बिना किसी को पता चले उसकी सहायता करते हैं। अपने-पराये का भेदभाव किए बिना ही बादलों की तरह निस्वार्थ भाव से मदद करने में हिचकिचाते नहीं हैं। लोग अपने कष्ट के समय में इनकी उदारता से कृतार्थ होते हैं। समाज में इन लोगों का एक स्थान होता है। अपने सरल स्वभाव के कारण ये लोग हर जगह पर सम्मानित किए जाते हैं।
         तीसरे प्रकार के लोग कंजूस होते हैं। वे हर किसी से मोलभाव करते रहते हैं। अपने घर-परिवार, पत्नी और बच्चों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अतिथि सत्कार करने में भी घबराते नहीं हैं परन्तु पैसे को दाँतों से पकड़ते हैं। सामने इनका लिहाज करते हुए चाहे कोई कुछ न कहे पर पीठ पीछे कंजूस कहकर मजाक अवश्य ही उड़ाते हैं।
        चौथे प्रकार के लोगों को आम भाषा में मक्खीचूस कहते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं जो न खाते हैं और न खाने देते हैं। हर समय पैसे को लेकर झिकझिक करते रहते हैं। इनके लिए कहा जाता है-
        'चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाए।'
ये लोग अपने धन पर साँप की तरह कुंडली मारकर बैठे रहते हैं। लोग पीठ पीछे तो क्या सामने भी इनको चिढ़ाते हैं। पर इन चिकने घड़ों पर कोई असर नहीं होता। ये लोग दाँत निपोर कर रह जाते हैं। इनसे घर-परिवार के जन व भाई-बन्धु आदि सभी परेशान रहते हैं। किए गए अपमान का भी इन लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये जस के तस ही रहते हैं। जीते जी ये किसी की जरूरत को पूरा नहीं करते। परिवार के लोग आवश्यक वस्तुओं के लिए भी तरसते रहते हैं और ये उसे फिजूलखर्ची बताकर अपना पल्लू झाड़ लेते हैं। पर इनकी मृत्यु के बाद इनके घर के लोग उस पैसे को बिना दर्द के उड़ाते हैं।
          हमें स्वयं तय करना है कि हम किस श्रेणी का बनना चाहते हैं। सबकी आँखों का तारा बनकर हम सुख भोगना चाहते हैं या लोगों के व्यंग्य बाणों को सहन करना अपनी नियति बनाना चाहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

अपनों का विश्वास

अपनों का विश्वास मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी होती है। जिस भी सम्बन्ध में विश्वास डगमगाने लगता है वहीं रिश्ता टूटने की कगार पर पहुँच जाता है। सदा यही प्रयास करना चाहिए कि आपसी विश्वास बना रहे, उसमें कभी कमी न आने पाए। यदि कहीं कोई गलतफहमी पनपने लगे तो अपना अहं व पूर्वाग्रह छोड़कर, मिल बैठकर उसे दूर कर लिया जाए।
           वे लोग बहुत ही अभागे होते हैं जो किसी भी कारण से अपना विश्वास दूसरों की नजर में खो देते हैं। दुबारा से विश्वास जमाने में फिर वर्षों लग जाते हैं। तब तक सभी उन्हें अविश्वास भरी नजरों से देखते हैं। ऐसी स्थिति मरणान्तक कष्ट से भी अधिक दुखदायी होती है। इसलिए परस्पर व्यवहार करते समय बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए।
       विश्वास जमाने में बहुत समय लगता है और उसे खो देने में पल भर का भी नहीं लगता। इसलिए सदा ही उन लोगों की परवाह यत्नपूर्वक की जानी चाहिए जिनका विश्वास हम पर तब भी बना रहे, जब हमारा समय बदल जाए। कहने का तात्पर्य है कि जब मनुष्य की विपरीत स्थिति हो तब भी वे हमसे मुँह न मोड़ें बल्कि वे सबसे यही कहें कि फलाँ व्यक्ति कभी गलत हो ही नहीं हो सकता। ऐसा ही विश्वास सदा बना रहना चाहिए।
         जब अच्छा यानि ऐश्वर्य का समय होता है, तब समझदार लोग किसी का भी विश्वास नहीं तोड़ते। उन पर सब भरोसा करते हैं। परन्तु दुर्भाग्य से जब मनुष्य का बुरा समय आता है तब वह न चाहते हुए भी अपनी मजबूरियों के कारण अपना वचन नहीं निभा पाता। इस कारण लोग उसे झूठा, ढोंगी और फरेबी तक कहने से नहीं चूकते। जब उनका अपना खराब समय आता है तब उन्हें सब आटे-दाल का भाव समझ में आ जाता है।
         ऐसे लोगों की परवाह कभी नहीं करनी चाहिए जिनका विश्वास समय के साथ बदल जाए। ये लोग किसी के विश्वास पात्र नहीं हो सकते। इनके जीवन के मायने अलग होते हैं। ये लोग कभी भी बीच मझधार में दूसरे का हाथ छोड़कर किनारा कर सकते हैं। इनसे सावधानी बरतनी आवश्यक होती है। यही वे लोग हैं जो पीठ पीछे बुराइयाँ करके पीठ में छुरा भौंकने का काम चतुराई से करते हैं। ऐसे धोखेबाज मित्र व अविश्वसनीय सम्बन्धी त्याज्य होते हैं। उनसे सहृदयता की उम्मीद करना व्यर्थ होता है।
          दूसरों पर विश्वास कीजिए पर अन्ध विश्वास न करिए। जो भी व्यक्ति ऐसा करता है, उसे सिर्फ दुखों का सामना करना पड़ता है। ऐसे तथाकथित गुरुओं से भी बचने का यथासम्भव प्रयास कीजिए जो दूसरों की बुद्धि को, अपने स्वार्थ हेतु कुण्ठित कर देते हैं। गुरुडम फैलाने वाले इन स्वार्थी गुरुओं  की जाँच-परख करके शीघ्र इनसे किनारा कीजिए। इन धूर्त लोगों के झाँसे में आकर अपने विश्वास को कभी चकनाचूर मत होने दीजिए।
        विश्वास टूटने की आवाज किसी को नहीं सुनाई देती। जिसका विश्वास टूट जाता है, उसको सम्भलने में बहुत समय लग जाता है। इस तरह की घटना के घटित होने के बाद लम्बे समय तक वह किसी पर भी विश्वास नहीं कर पाता। सभी लोग उसे धोखबाज दिखाई देने लगते हैं। उस व्यक्ति का अपना आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगता है। वह हमेशा बौखलाया और बदहवास रहता है।
           विश्वास रूपी पूँजी को संजोकर रखने का प्रयास कीजिए। दुनिया में अच्छे लोगों की संख्या बहुत है। अपने एवं अपनों के विश्वास को मृग मरीचिका न समझकर उस पर खरा उतरने का यत्न करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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