सुन्दरता आन्तरिक होनी चाहिए बाह्य नहीं। भौतिक अथवा शारीरिक सौन्दर्य क्षणिक होता है। मनुष्य का रंग-रूप, उसका शारीरिक सौष्ठव, उसकी कद-काठी, उसके नैन-नक्श आदि बाह्य सौन्दर्य को दर्शाने वाले होते हैं।
हम अपने भारत देश को एक छोटे विश्व के रूप में देख सकते हैं। यहाँ गोरे-से-गोरे और काले-से-काले, मोटे-पतले, लम्बे-नाटे आदि सभी प्रकार के लोग मिल जाएँगे। अब प्रश्न यह उठता है कि जब इतनी विविधता है तो सुन्दरता का पैमाना क्या होगा?
सभी लोगों का सुन्दरता को जाँचने का नजरिया अलग-अलग हो सकता है। जिन देशों में लोग काले होते हैं, वे उसी के अनुरूप सुन्दरता को देखते हैं। जिन देशों में लोग गोरे होते हैं उनका पैमाना तथावत् बन जाता है। इसी प्रकार लम्बे या नाटे होने की भी कसौटी हो सकती है।
ये सब लिखने का तात्पर्य यही है कि शारीरिक सौन्दर्य को मापने का सबका अपना-अपना निकष होता है। फिर भी यदि हम यह कहें कि आकर्षक व्यक्तित्व सभी को अपनी ओर आकृष्ट करता है। ईश्वर ने हर प्रजाति में मादा को सुन्दर बनाया है। इसका अपवाद केवल मोर पक्षी है जो अपनी मादा मोरनी से कही अधिक सुन्दर होता है।
इस संसार में बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने रूप-सौन्दर्य पर गर्व करते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह भौतिक सौन्दर्य सदा साथ नहीं निभाता। शरीर के रोगी हो जाने पर अथवा चेचक आदि बिमारी के आ जाने पर चेहरा पूर्ववत् सुन्दर नहीं रह सकता। एक आयु के बाद जब इन्सान वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है तब झुरियाँ आ जाने के कारण भी सुन्दरता कहीं खो सी जाती है।
इसलिए अस्थायी सुन्दरता पर घमण्ड करना मनुष्य को कदापि शोभा नहीं देता। अपने बाहरी रूप-सौन्दर्य का गर्व न करके मनुष्य को अपने आन्तरिक गुणों को बढ़ाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। अपने गुणों को अथवा योग्यता का मनुष्य जितना अधिक विस्तार करता है उतना ही वह सबका प्रिय बनता है। मनुष्य के पास भरपूर सौन्दर्य हो परन्तु वह मूर्ख हो तो कोई उससे मित्रता करना पसन्द नहीं करेगा। इसी प्रकार मनुष्य के मुँह खोलते ही उसका फूहड़पन सामने आ जाए तब भी वह किसी का प्रिय कभी नहीं बन सकता।
बाहरी सौन्दर्य का आकर्षण तभी तक रहता है जब तक मनुष्य के अवगुण प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते। यदि उसमें योग्यता है और शारीरिक सुन्दरता नहीं है तब भी लोग उसके दीवाने बन जाएँगे। बालक अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था पर बालपन से ही वह प्रकाण्ड पण्डित था, उसकी कुरूपता को अनदेखा करके लोग उसकी विद्वत्ता का लोहा मानते थे।
मेरे कथन का यही अर्थ है कि भौतिक सुन्दरता भले ही सबको आकर्षित करती है परन्तु उसी सौन्दर्य को मान्यता तभी मिल पाती है जब उसमें गुणों का सम्मिश्रण हो अन्यथा उस सुन्दरता का कोई मोल नहीं रह जाता। उस व्यक्ति को कोई घास नहीं डालता। उसके व्यवहार और बोलने के लहजे के कारण उससे दूरी बनाना लोग अधिक पसन्द करते हैं।
मनुष्य के आन्तरिक गुण यानि दया, सहानुभूति, परोपकार, सहृदयता और ज्ञान आदि गुण उसे सबका सिरमौर बनाते हैं। ये गुण ही मनुष्य का वास्तविक सौन्दर्य कहलाते हैं जो भौतिक सौन्दर्य को कहीं पीछे छोड़ देते हैँ। बाह्य भौतिक सौन्दर्य के साथ यदि आन्तरिक सौन्दर्य भी हो तो वह सोने पर सुहागे का कार्य करता है। ऐसे व्यक्ति को लोकप्रिय होने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।
अन्त में इतना ही कहना है कि अपने अंतस् में मानवोचित गुणों और सदाचरण का इतना विस्तार करना चाहिए कि हर व्यक्ति मित्रता करने के लिए अथवा साथ जुड़ने के लिए लालायित हो जाए। तभी आन्तरिक सौन्दर्य बाहरी सौन्दर्य पर भारी पड़ सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 24 अप्रैल 2016
आंतरिक सौन्दर्य
शनिवार, 23 अप्रैल 2016
बजुर्गों के अनुभव का लाभ लें
बजुर्ग परिवार की रीढ़ होते हैं। सभी को उनके जीवनकाल के अनुभवजन्य ज्ञान का प्रत्यक्ष लाभ उठाना चाहिए। घर के बुजुर्ग छायादार वृक्ष की तरह अपने अनुभवों के मधुर फल से उपकृत करते हैं। अपनी उपस्थिति की घनी छाया से परिवार की हर पीढ़ी को कृतार्थ करते हैं। अपने पूर्वजों से मिले संस्कारों की धाती आने पीढ़ियों को सौंपते समय वे गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
बुजुर्गों की आवश्यकता मनुष्य को हर कदम पर पड़ती है। इस विषय में एक दृष्टान्त याद आ रहा है। किसी समय शादी के अवसर पर दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों के समक्ष शर्त रखी कि बारात में वे किसी भी बुजुर्ग को नहीं लेकर आएँगे, केवल युवा ही आएँगे। अब लड़के वाले परेशान हो गए कि बुजुर्गों के बिना बारात कैसे सजेगी? तब एक अनुभवी बुजुर्ग ने उन्हें परामर्श दिया कि बारात में दिखाने के लिए सभी युवा ही जाएँ। एक बक्से में एक बुजुर्ग को बिठाकर साथ ले जाया जाए। इससे लड़की वालों की बात भी रह जाएगी और एक बुजुर्ग भी साथ मिल जाएगा।
इस बात पर राजी होकर बारात दुल्हन के द्वार पर पहुँची। अब वहाँ शादी की रस्में होने लगीं। कुछेक रस्मों के विषय में युवा कुछ नहीं जानते थे। उस समय एक युवक ने अपने ठहरने के स्थान पर जाकर उस बुजुर्ग से सब समझ लिया। वापिस आकर जब उसने उन रस्मों को उचित रीति से निभा लिया तो दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों से उन रस्मों को निभाने के विषय में पूछा।
उस समय उन्होंने ने बताया कि वे एक बुजुर्ग को सबकी नजरों से बचाकर बक्से में छुपाकर लाए हैं। तब सब स्पष्ट हो गया। इसका अर्थ यही है कि युवा कितने भी योग्य क्यों न हो जाएँ परन्तु बुजुर्गों से अधिक निपुण नहीं हो सकते। अत: बुजुर्गों के अनुभव और ज्ञान का लौहा युवावर्ग को मानना चाहिए।
बजुर्ग परिवार में नमक की तरह होते हैं। यदि मीठे की तरह उन्हें कहेंगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि मीठे से मनुष्य शीघ्र ऊब जाता है। मीठे खाद्यान्न कितने ही स्वादिष्ट क्यों न हों उनसे मन जल्दी भर जाता है। नमक से वह कभी नहीं ऊबता। नमक से भोजन का स्वाद बढ़ता है, वैसे ही बजुर्गों से परिवार के संस्कार बढ़ते हैं।भोजन में नमक का होना जितना आवश्यक होता है उतना ही घर में बजुर्गों का होना अनिवार्य होता है।
माता-पिता मनुष्य के लिए भगवान का रूप होते हैं। जीवन पर्यन्त उनकी सेवा करके भी उनके ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। ईश्वर को हम इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते पर वे उसके प्रतिनिधि के रूप में हमारे पास रहते हैं। जिस घर में माँ-बाप हंसते हैं अर्थात सन्तुष्ट और खुशहाल रहते हैँ, प्रभु स्वयं ही उस घर में बसते हैं। वहाँ सुख-शान्ति की कभी कमी नहीं रहती।
इसके विपरीत जिस घर में उनका अपमान होता है या वे कष्ट पाते हैँ, वहाँ पर कष्ट-क्लेश अपना स्थायी निवास बना लेते हैं। मन्दिरों में जाकर पत्थर के भगवान के आगे माथा रगड़ने के स्थान पर घर में बैठे जीवित भगवान का पूजन-अर्चन सदा ही कल्याणकारी होता है, यह सार्वभौमिक सत्य है।
बुजुर्ग अपने घर-परिवार के हों अथवा कोई अन्य हों, अपने पूर्वाग्रह और अहं का त्याग करके उनके अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। जो बुजुर्गों की अवहेलना करते हैं उन्हें ऐसा न करने का परामर्श देना चाहिए। ईश्वर से उनकी सद् बुद्धि की कामना करनी चाहिए। जब किसी के भी द्वारा दिए गए श्राप फलदायी हो सकते हैं तो बुजुर्गों के द्वारा दिए गए आशीर्वाद भी मनुष्य के लिए निस्सन्देह फलीभूत होते है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016
दोषारोपण करना सरल
दूसरों पर दोषारोपण करना सबसे सरल कार्य है। मनुष्य सोचता है कि दूसरे को फंसाकर वह बच जाएगा परन्तु ऐसा होता नहीं है। स्वयं का बचाव करने के लिए कभी भी दूसरों पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। सच्चाई कभी-न-कभी तो प्रकट हो ही जाती है। उस समय मनुष्य की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती है। तब बगलें झाँकने के अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं शेष बचता।
समय बड़ा बलवान होता है उसके पास सत्य को प्रकट करने के लिए अपने ही तरीके हैं। कभी-कभी मनुष्य का अपना जमीर ही उसे बार-बार कचोटने लगता है। तब वह अपराधबोध से कभी-कभी इतना अधिक ग्रसित हो जाता है और फिर मानसिक दबाव झेल नहीं पाता और स्वयं ही उस सत्य को सबके समक्ष प्रकट कर देता है, जिसे वह एक अर्से से छिपाता चला आ रहा था।
कहते हैं झूठ को सात पर्दों में भी छिपाकर रख लो वह सामने आ ही जाता है। जैसे सुगन्ध चारों ओर बिना प्रयास के फैलती है। इसी प्रकार दुर्गन्ध भी हर तरफ फैल जाती है। और भी कहते हैं कि झूठ के पाँव नहीं होते, दूसरों के कन्धों पर चढ़कर वह बहुत समय तक सवारी नहीं कर सकता। उसे वास्तविकता के धरातल पर आना ही होता है।
बचपन से ही दोषारोपण की यह बीमारी आरम्भ हो जाती है। शैतानी करने पर अपने दूसरे भाई-बहन अथवा मित्र-पडौसी के बच्चे पर अपना दोष मढ़ने का कार्य बच्चे बखूबी करते हैं। पढ़ाई ठीक से न करने पर जब परीक्षा में कम अंक आते हैं तब अपनी खाल बचाने के लिए अध्यापक पर पक्षपात का दोष लगाना सबसे सरल कार्य होता है कि अध्यापक ने जबरदस्ती अंक काटे हैं, उसे मेरे साथ पता नहीं क्या दुश्मनी है?
ज्यों ज्यों इन्सान बड़ा होता जाता है त्यों त्यों दोषारोपण के इस अनुचित कार्य में वह अधिक दक्षता प्राप्त करता जाता है। समय और स्थितियों के अनुसार वह अपने बचाव के लिए बकरे ढूँढता ही रहता है। कार्यालय में गड़बड़ी करने पर कभी अपने बास को दोष देता है तो कभी अपने ही साथियों को कटघरे में खड़ा कर देता है। जब और कोई न मिले तो उस समय बस सरकार को ही कोसकर अपनी भड़ास निकाल लो।
घर में ही देखिए, पति अपनी पत्नी पर किसी भी प्रकार की गलती का दोष मढ़कर, उसे भलाबुरा कहकर अपने अहं को तुष्ट कर लेता है। इसी तरह पत्नी भी अपने पति को गाहेबगाहे दोषी ठहराकर सबकी सहानुभूति बटोरने का प्रयास करती रहती है।
जन साधारण हर समस्या को बढ़ावा देने और उसका निदान न करने के लिए अपने चुने हुए नेताओं को दोष देते हैं, सारा समय उनकी आलोचना करते हैं। सभी राजनैतिक दल अपने विरोधियों पर प्रतिदिन परेशानियाँ बढ़ाने का दोषारोपण करते हैं।
सड़क पर चलते हुए कोई भी अपनी गलती न मानकर सामने वाले को दोष देते हुए गाली-गलौच करते हैं और मारपीट करने के लिए उतावले हो जाते हैं।
यदि सभी मनुष्य अपने अंतस् में या अपने गिरेबान में झाँक ले तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। तब उन्हें अपने ऊपर शर्म आने लगेगी कि वे किस हद तक गिर सकते हैं। यह दोहा इसके लिए सटीक है-
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई।
जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा न कोई।।
यह दोहा भी यही सच्चाई प्रकट कर रहा है कि दूसरों के दोष ढूँढते हुए हम छिद्रान्वेषी बन जाने का अपराध करते हैं। यदि हम स्वयं को खोजने लगें तब पता चलेगा कि हमारे भीतर दोषों की कोई कमी नहीं है।
अतः दोषारोपण करना छ़ोड़कर यदि अपने दोषों का सुधार कर लें तो यह मानव जीवन धन्य हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016
जिन्दगी जीना एक कला
जिन्दगी जीना एक कला है। वैसे तो अपना-अपना जीवन तो सभी चराचर जीव जीते हैं। कुछ लोग जिन्दगी में ऐसे कार्य कर जाते हैं कि वे युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। उनके विपरीत ऐसे भी लोग हैं जो एड़िया घिसते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं। कीड़े-मकौड़ों की जीना कोई जीना नहीं कहलाता।
जीवन उसी का सफल है जिसके जाने के बाद लोग उसे श्रद्धा और प्रेम से याद करें। जिन्दगी उसकी सफल है जिसकी मौत पर जमाना अफसोस करे। वरना इस असार संसार में हर किसी का जन्म मरने के लिए ही होता है।
जिन्दगी जीना कभी भी किसी के लिए आसान नहीं होती इसे आसान बनाने के लिए अथक प्रयास करना पड़ता है। सौ पापड़ बेलने पड़ते हैं। दूसरों की गलतियों को नजरअंदाज करना होता है और कुछ लोगों को न चाहते हुए बर्दाशत करना पड़ता है। जीवन में जीतोड़ मेहनत करनी आवश्यक होती है। इसके साथ ही सही वक्त पर सही फैसले लेने होते हैं।
जीवन में हर किसी को खुश कर पाना टेढ़ी खीर होती है। जिन्दगी बीत जाती है सबको खुश रखने के प्रयास करने में। जो लोग खुश हुए वे अपने नहीं थे। जो लोग अपने थे वे लाख कोशिशों के बाद भी खुश नहीं हो सके। आजकल रिश्ते रोटी की तरह गोल हो गए हैं, उनका ओरछोर ही समझ में नहीं आता। जरा-सी भी आँच बढ़ाने पर जैसे रोटी जल जाती है उसी प्रकार यदि रिश्ते न सम्हाले जाएँ तो तुरन्त बिखर जाते हैं।
जीवन फूलों की सेज नहीं हैं, कदम-कदम पर काँटे बिछे रहते हैं। जीवन के हर मोड़ पर बहुत-सी मुश्किलें रास्ता रोककर खड़ी रहती हैं। मनुष्य को इसके लिए कभी शिकायत नहीं करनी चाह। भगवान ऐसा कुशल डायरेक्टर है जो सबसे कठिन रोल बेस्ट एक्टर को ही देता है। यानि कि हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार रोल देकर इस दुनिया में भेजता है।
यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा जीवन एक नाटक है। यदि हम दिए गए कथानक को ठीक से समझ लेंगे तो सदैव खुश रह सकते हैं अन्यथा नहीं। कोई भी व्यक्ति यहाँ किसी का अहसान नहीं लेना चाहता। उसे यही लगता है कि सारी जिन्दगी नजरें झुकाकर चलने से अच्छा है कि किसी का अहसान ही न लिया जाए। अपनी या दूसरों की नजरों से गिरकर कोई भी नहीं जीना चाहता।
जिन्दगी हर मोड़ पर परीक्षा लेती है। यहाँ मुझे किसी फिल्मी गाने की यह पंक्ति याद आ रही है-
जिन्दगी है खेल, कोई पास कोई फेल
खिलाड़ी है कोई अनाड़ी है कोई।
जीवन में हार-जीत की चिन्ता किए बिना खेल भावना से उसे लेते हुए निरन्तर गतिशील रहना चाहिए।
उसका यही फलसफा है कि कोई चाहे या न चाहे मनुष्य को सबका साथ निभाना ही पड़ता है। इसका कारण है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है और वह पलभर भी अकेले रह नहीं सकता। उसे हर समय किसी-न-किसी सहारे की आवश्यकता पड़ती रहती है।
जिन्दगी में क्या खोया क्या पाया, इसका हिसाब कभी रखा नहीं जा सकता। जो कुछ भी हम जीवन में खोते हैं, उसमें अपनी नादानी होती है और जो पाते हैँ वह प्रभु की कृपा ही होती है। इन्सान और ईश्वर के बीच बहुत ही खूबसूरत रिश्ता है। मनुष्य हर समय कुछ-न-कुछ माँगता रहता है और वह हम पर बिना अहसान किए बिनमाँगे ही हमारी झोलियाँ भरता रहता है। वह हमें मालामाल करता रहता है।
जिन्दगी वही अच्छी होती है जिसके हर पृष्ठ पर प्रेम की प्रेरणा होती है। कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य हर जीव से प्रेम करे। अपने सद्ज्ञान तथा विवेक से मार्गदर्शन लेते हुए इस जीवन को सफल बनाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 19 अप्रैल 2016
मनुष्य मरणधर्मा
मानव के इस शरीर का स्वभाव मरणशील है। यह संसार ही मरणधर्मा कहलाता है। जो भी जड़-चेतन जीव यहाँ जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। इसीलिए इस संसार को असार भी कहते हैं।
हितोपदेश में कवि ने कहा है कि-
काय: सन्निहितापाय: सम्पद: पदमापदाम्।
समागमा: सापगमा: सर्वमुत्पदि भङ्गुरम्॥
अर्थात् शरीर का स्वभाव विनाश है। सम्पत्तियों और आपत्तियों का स्थान हैं। संयोग-वियोग वाले हैं और सम्पूर्ण उत्पन्न पदार्थ क्षणभंगुर हैं।
इस श्लोक में कवि का कथन है कि शरीर का स्वभाव विनाश है। मनुष्य परिश्रम करके सम्पत्तियाँ जुटाता है। फिर उन एकत्रित किए गए ऐश्वर्यो का भोग करता है। उसके जीवन में क्रमानुसार विपत्तियाँ आती हैं जो उसे दुखों के भंवर में छोड़ देती हैं। उनसे त्रस्त मनुष्य को कहीं ठौर नही मिलता। उस कष्टकारी समय को बिताने में उसे नानी याद आ जाती है। उस समय उसके अपने भी उससे किनारा कर लेते हैं। तब वह इस संसार सागर में निपट अकेला रह जाता है
अपने बन्धु-बान्धवों से उसका संयोग होता है और कुछ समय पश्चात उनसे वियोग हो जाता है। उसका कोई-न-कोई प्रियजन इस असार संसार में पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी आयु भोगकर सदा के लिए यहाँ से विदा ले लेता है। इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड में उत्पन्न सभी जीव क्षणभंगुर कहलाते हैं।
इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आचार्य चाणक्य के इस कथन पर विचार करते हैं -
नासातो निर्गमस्यापि श्वासस्य च महामुने।
प्रवेशे प्रत्ययो नास्ति प्रातरागमनं कुत:॥
अर्थात् हे महामुने! नाक से निकला श्वास पुन: प्रवेश कर पाएगा या नहीं, इसका भी भरोसा नहीं है। तब प्रात:काल के आने की बात ही क्या?
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि हम जो श्वास दिन के चौबीसों घण्टे लेते हैं, उसका कुछ भी भरोसा नहीं है। अभी जो श्वास लिया है उसके बाद का श्वास हमें लेने के लिए मिलेगा अथवा नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं। यह सब भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है। इस विषय में उस ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता।
यह संसार जीव की कर्मभूमि है। यहाँ मनुष्य के रूप में जन्म लेकर वह अपने कर्मों को बीजरूप में बोता है और जन्म-जन्मान्तर तक उसके कड़वे-मीठे फल खाता रहता है। चौरासी लाख कही जाने वाली योनियों में केवल मनुष्य योनि ही कर्मयोनि कहलाती है, शेष अन्य योनियाँ भोगयोनि कहलाती हैं। वहाँ जीव मात्र अपने कर्मों का फल भोगता है, कर्म कर नहीं सकता।
मनीषियों का मानना है कि जीव संसार में रहते हुए यदि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के बनाए नियमों के अनुसार कर्म करता है तो वे श्रेष्ठ कर्म करता है। इसके विपरीत किए गए कर्म निम्न कहलाते हैं। शुभकर्मों का फल उसे इस जन्म में और आगामी जन्म में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य देते हैं। उसके दुष्कर्म उसे इहलोक और परलोक में महान् कष्ट और परेशानियाँ देते हैँ।
मनुष्य चाहे तो अपना लोक और परलोक दोनों सुधार कर उस मालिक का प्रिय बन सकता है अन्यथा वह जन्म-जन्मान्तरों तक अपने कर्मो का भुगतान कष्टों के रूप में करता रहेगा। यह संसार उसकी बपौती नहीं है यहाँ से उसकी विदाई पक्की है।
इस क्षणभंगुर नश्वर शरीर से जो सत्कर्मों की वृद्धि करनी है कर लीजिए फिर यह समय हाथ नहीं आएगा। अन्तकाल में पश्चाताप भी कुछ सुधार नहीं कर सकेगा। अत: अपने साथ मित्रता निभाइए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 18 अप्रैल 2016
दीर्घसूत्रता त्यागें
दीर्घसूत्रता यानि आज का कार्य कल पर टालने की हमारी प्रवृत्ति के कारण ही हम कदम-कदम पर असफलता का मुँह देखते हैं। जिस कल की हम प्रतीक्षा करते रहते हैं, वह कल तो कभी आता ही नहीं है। किसी कार्य को करने की योजना जब एक बार बना ली तो फिर इस आलस्य का कारण समझ में नहीं आता।
हमें चेतावनी देते हुए कवि ने इस दोहे में कहा है कि-
कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी बहुरि करेगा कब॥
अर्थात् जिस कार्य को कल करना चाहते हो उसे आज ही कर लेना चाहिए। जिस कार्य को आज करना चाहते हो उसे अभी कर लेना चाहिए। पलभर में प्रलय आ जाती है यानि प्राकृतिक आपदा के आ जाने पर जब विनाश हो जाएगा तब फिर वह सोचा हुआ कार्य कब कर सकोगे?
'लोकानन्दम्' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव के विषय में कहा है-
श्व: कार्यमेतदिदमद्य परं मुहुर्ताद्।
एतत् क्षणादिति जनेन विचिन्त्यमाने॥
तिर्यग्निरीक्षणपिशङ्गितकालदण्ड:।
शङ्के हसत्यसहन: कुपित: कृतान्त:॥
अर्थात् यह कल करूँगा, इसे आज ही थोड़ी देर बार करूँगा और इसे तो क्षणभर में कर लूँगा। लोगों को इस तरह विचार करते हुए देखकर मैं सोचता हूँ कि असहनशील क्रुद्ध यमराज हाथ में काल का दण्ड लिए हुए और कटाक्ष निरीक्षण करते हुए उन पर हंसते हैं।
कवि के कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के जीवन का समय उसके पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार ईश्वर की ओर से मिलता है। हमारी नादानी या टालमटोल करने के स्वभाव के कारण आजकल-आजकल करता रहता है और पल-पल करके उसका जीवन कम होता जा रहा है। मृत्यु का देवता मनुष्य की इस मूर्खता पर हंसता है।
हम सभी मनुष्य अपने आलस्य के कारण कार्य अभी करते हैं क्या जल्दी है? प्रात:काल कर लेंगे, सायंकाल करेंगे अथवा कल कर लेंगे, बस यही करते हुए अपना अमूल्य समय नष्ट करते नहीं थकते। समय बीत जाने के बाद सिर धुनने का लाभ नहीं होता। कहते हैं-
'का वर्षा या कृषि सुखाने।'
अर्थात् जब फसल खराब हो गई तब वर्षा हो भी जाए तब उसका कोई लाभ नहीं अथवा बेकार हो जाती है। समय रहते यदि वर्षा हो जाती तो किसान का नुकसान न होता।
बच्चा स्कूल में पढ़ता है तब वह वहाँ पढ़ाए गए पाठ को यदि प्रतिदिन दोहरा ले तो परीक्षा के समय उसे अतिरिक्त पढ़ाई करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। पर वह तो मस्ती करता रहता है। सोचता है अभी खेल लूँ या अभी टी. वी. देख लूँ या दोस्तों के साथ चैटिंग कर लूँ या थोड़ा घूम लूँ, फिर पढूँगा। ऐसा करते रहने पर पढ़ाई पिछड़ जाती है और परीक्षा के समय जब पुस्तक खोलता है तो उसे कुछ समझ नहीं आता।
इसी प्रकार हम उत्साह से योजनाएँ बनाते रहते हैँ और आज क्रियान्वित करेंगे या कल कर लेंगे ऐसा सोचते रहते है और फिर रेस में पिछड़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। फिर जब हानि उठाते हैं तब फिर दूसरों को कोसते हैं।
दीर्घसूत्री सदा ही अपनी इस आदत के कारण परेशान रहता है। बस पकड़नी हो या रेल या जहाज हर स्थान पर भागते हुए पहुँचता है और कभी-कभी उसकी बस, रेल या जहाज छूट भी जाते हैं। अपने कार्यस्थल पर देर से पहुँचकर बास की डाँट खाता है। शादी-ब्याह व पार्टियों में देर से पहुँचकर लोगों के कटाक्ष सहन करता है।
अपनी दीर्घसूत्रता का त्याग करके यदि हम लोग समय पर बीज बो सकें तो कोई कारण नहीं कि हमें असफलता का मुँह देखना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद
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