धन हमारी सभी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत आवश्यक है। इसके बिना जीवन में हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। इसे कमाना कठिन कार्य है। अपने सुख-चैन को तिलाञ्जलि देकर दिन-रात अथक प्रयास करना पड़ता है। कोल्हू के बैल की तरह अहर्निश जुते रहना पड़ता है। उस पर भी यह कोई गारण्टी नहीं कि मनुष्य को मनोवाञ्छित धन राशि मिल सकेगी।
एक मजदूर सरदी-गरमी की परवाह किए बिना मेहनत करता है फिर भी उसके घर का चूल्हा कितने दिन जल पाएगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। यह धन, यह लक्ष्मी किसी की सगी नहीं है। बहुत ही चञ्चल है, आज यहाँ है तो कल कहाँ होगी, पता ही नहीं चल पाता। पलभर मे राजा को रंक बना देती है और रंक को राजा। इसकी महिमा अपरम्पार है।
यह धन मनुष्य को कहता है कि मुझे इस हद तक पसंद करो कि लोग आपको नापसंद करने लगें। यदि इस धन के पीछे भागते रहे तो सभी संगी-साथी पीछे छूट जाते हैं। इसकी अधिकता होने पर मनुष्य में सबसे पहले अहंकार आता है जो सारे विनाश की जड़ है। फिर उसके साथ-साथ दुर्व्यसन भी घेरने लगते हैं। तब सब लोग किनारा करने लगते हैं।
यही धन सारे फसाद की जड़ है, फिर भी न जाने क्यों सब लोग इसके पीछे पागल हैं। यह सारे रिश्तों को खोखला कर देता है। भाई को भाई के खून का प्यासा बना देता है। माना कि जीवन के लिए इसकी बहुत उपयोगिता है परन्तु यह सब कुछ नहीं है। यह इन्सान के लिए न तो खुशियाँ खरीद सकता है न स्वास्थ्य। न ही उसकी इस लोक में मृत्यु से रक्षा कर सकता है।
मरने के बाद इसे ऊपर नहीं ले जा सकते यह इसी लोक में रह जाता है। कहते मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही विदा लेता है। उसका सब साम्राज्य यहीं धरा रह जाता है। मनुष्य के अपने सच्चे साथी उसके अच्छे या बुरे कर्म होते हैं जो जन्म-जन्मान्तरों तक साथ निभाते हैं। यह धन जीते जी मनुष्य को ऊपर ले जा सकता है। यह मनुष्य को अपमानित कराने का कोई अवसर नहीं चूकता। धन के नशे में चूर व्यक्ति को कुकर्मों में फँसाने में जरा भी देर नहीं करता।
इतिहास में बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जिनके पास बेशुमार धन-दौलत थी पर फिर भी जब वे मरे तब उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था। जब तक यह धन अपने पास है तभी तक ही अपना है। जब यह अपने पास नहीं है तब किसी का सगा नहीं है। इस धन की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि जब यह मनुष्य के पास होता तब अपने-पराए सभी उसके अपने बन जाते हैं। स्वार्थ के कारण उस धनी को भगवान कहने लगते हैं और उसके सौ खून भी माफ कर देते हैं। वैसे तो धन भगवान नहीं है पर लोग उसे भगवान से कम नहीं मानते।
धन नमक की तरह होता है, जो भोजन का स्वाद बढ़ाता है परन्तु सब्जी में यदि गलती से अधिक डाल दिया जाए तो मुँह का स्वाद बिगाड़ देता है। उसी प्रकार यदि धन आवश्यकता के अनुसार हो तो जीवन में आनन्द देता है। लेकिन जरूरत से ज्यादा हो जाए तो जिन्दगी का स्वाद बिगाड़ देता है। बच्चे बिगड़ जाते हैं। वे भी अपने माता-पिता की तरह सोचते हैं कि पैसे के बल पर दुनिया खरीद लेंगे। इसी नशे में गलत रास्ते पर चलने लगते हैं। इस विषय में समाचार पत्र, टीवी और सोशल मीडिया गाहे-बगाहे हमें बताते रहते हैं।
धन को जीवन में यदि साधन मानकर चला जाए तो श्रेयस्कर होता है। जहाँ मानव इसे साध्य मानने की भूल करता है, वहीं वह पथभ्रष्ट हो जाता है। खूब धन कमाइए और उसका सदुपयोग सत्कार्यों में लगाकर कीजिए। घर-परिवार की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए दान धर्म का निर्वहण भी करना चाहिए। वैसे यह कर पाना कठिन है, फिर भी प्रयास करें कि उसे अपने सिर पर सवार न होने दें।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 23 मई 2016
दैनन्दिन आवश्यकताओं के लिए धन
रविवार, 22 मई 2016
माँ प्रथम गुरु
माता मनुष्य की प्रथम गुरु कहलाती है। वह बच्चे को सर्वप्रथम अक्षरज्ञान देती है। उसका अपनी सन्तान से रिश्ता अन्य सभी रिश्तों से नौ माह अधिक होता है। इस धरती पर लाने के कारण उसे भगवान का रूप कहा जाता है।
बच्चे का लालन-पालन वह बहुत ही ममता और प्यार से करती है। स्वयं गीले में सो जाती है परन्तु बच्चे को सदा सूखे में सुलाती है। अपना सारा सुख और आराम बच्चे के लिए कुर्बान कर देती है। उसकी ममता के समक्ष दुनिया के सभी सुख फीके पड़ जाते हैं।
उसके चरणों में ही मनीषियों ने स्वर्ग की अवधारणा की है। इसीलिए वे कहते हैं कि मनुष्य आयुपर्यन्त उसकी सेवा करने के उपरान्त भी उसके ऋण से उऋण नहीं हो सकता। जब वह अशक्त हो जाए तब बच्चे की तरह उसकी देखभाल करनी चाहिए। उसके खान-पान और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन की एक घटना है कि एक नवयुवक उनका शिष्य बनने की इच्छा से उनके पास आया और उनके चरणों में गिर गया। अपना शिष्य बनाकर, दीक्षा देने के लिए उनसे प्रार्थना करने लगा।
युवक की बात सुनकर परमहंस जी ने मुस्कुराकर उससे पूछा कि परिवार में उसके अतिरिक्त और कौन-कौन लोग हैं? अथवा क्या वह अकेला ही है?
उनका प्रश्न सुनकर युवक ने उत्तर दिया कि उसके घर में सिर्फ उसकी बूढी माँ है और कोई नहीं है। युवक के उत्तर को सुनकर परमहंस जी को क्रोध आया। परन्तु अपने क्रोध को पीकर उन्होंने उससे साधु बनने का कारण पूछा।
युवक ने कहा कि वह मोह-माया और ऊँच-नीच से युक्त संसार को छोड़कर मुक्ति पाना चाहता है। इस उत्तर को सुनकर परमहंस जी ने उसे समझाते हुए कहा कि अपनी बूढ़ी माँ को असहाय छोड़कर तुम्हें कभी मुक्ति नहीं मिल सकती। सच्ची मुक्ति तुम्हें माँ की सेवा करने से मिलेगी, जाओ उसकी सेवा करो। मानव जीवन का यही सार है।
विद्याध्ययन करने के पश्चात नव जीवन में प्रवेश करने वाले युवा शिष्य को आचार्य शिक्षा यही देते हैं- 'मातृ देवो भव।' अर्थात माँ ईश्वर का रूप होती है, वही सबसे बड़ा देवता है। माता के प्रति अपने सारे दायित्वों का निर्वहण प्रसन्नता पूर्वक करने चाहिए।
माता को जीवन में कष्ट न हो, उसके सुख-साधन का ध्यान रखना ही मनुष्य की सबसे बड़ी साधना है। मन्दिर मे जाकर पत्थर की मूर्तियों के सामने माथा रगड़ने के स्थान पर यदि घर में बैठी जीवित माँ रूपी भगवान की पूजा की जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। सारे रिश्ते-नाते और बन्धु-बान्धव मनुष्य को मझधार में छोड़ सकते हैं परन्तु ममता की छाया से वह कभी वंचित नहीं हो सकता। वहाँ आकर जो स्वर्गिक आनन्द उसे मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिल सकता। इसीलिए सयाने कहते हैं-
'माँवा ठण्डियाँ छावाँ कि छाँवा कौन करे?'
अर्थात् माँ शीतल छाया की भाँति होती है। उसके अलावा और कहीं से इन्सान को ठण्डी छाया नहीं मिल सकती।
इसका सबसे बड़ा कारण है कि पुत्र कुपुत्र बन सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती। आवश्यकता होने पर वह अपने बच्चों की बुराइयों पर भी पर्दा डाल देती है। दुनिया की नजरों में उसे हमेशा ऊँचा उठा हुआ देखना चाहती है। सबसे बढ़कर वह सन्तान को गरम हवा भी नहीं लगने देना चाहती। एक बात मैं यहाँ जोड़ना चाहती हूँ कि इन्सान कितना भी बूढ़ा हो जाए और उसकी माता इस दुनिया से विदा ले चुकी हो, जब भी उसे कष्ट होता है अथवा वह थक-हार जाता है तब 'हाय माँ' ही कहता है। उसके मुँह में किसी अन्य सम्बन्ध का नाम नहीं निकलता।
उसका वश चले तो अपने बच्चों के सारे दुख स्वयं झेल ले। इन्सान को दुनिया से चाहे दुत्कार मिले लेकिन माता के लिए वह सबसे श्रेष्ठ होता है। वह कभी अपनी सन्तान को अपमानित होते हुए नहीं देख सकती। सन्तान को यदि कष्ट होता है तो उसका कलेजा छलनी हो जाता है। माता के अतिरिक्त ऐसा निस्वार्थ प्रेम किसी और रिश्ते में नहीं मिल सकता। उसकी सेवा करने से चारों धामों की यात्रा के पुण्य का फल मिलता है तथा मनुष्य का इहलोक व परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 21 मई 2016
अच्छे का फल अच्छा
मनुष्य यदि किसी का बुरा करता है तो वह उसके साथ रहता है और उसका परिणाम उसे भुगतना पड़ता है। यदि वह अच्छा कार्य करता है तो वह पलटकर उसके ही सामने आता है। यानि कि बुराई का फल कष्टदायी होता है और उसकी अच्छाई का फल उसे खुशियाँ देता है। तभी कहते हैं- 'जैसा बोओगे वैसा पाओगे।' अर्थात् की गई अच्छाई या बुराई का परिणाम मनुष्य के सामने आ ही जाता है।
इसी विषय को स्पष्ट करती एक बोधकथा है कि एक औरत अपने परिवार के लिए प्रतिदिन भोजन पकाती थी। एक रोटी वह किसी भूखे के लिए पकाकर उसे खिड़की के सहारे रख देती थी, जिसे कोई भी ले जा सकता था।
एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और धन्यवाद देने के बजाय अपने रस्ते पर चलता हुआ बड़बड़ाता रहति- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौटकर आएगा।" इस तरह दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा।
वह कुबड़ा प्रतिदिन रोटी लेकर बड़बड़ाता हुआ चला जाता। वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन-ही-मन सोचने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो कहता नहीं और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका।"
एक दिन क्रोधित होकर उसने निर्णय लिया और बोली- "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूँगी।" उस दिन उसने रोटी में जहर मिला दिया, जैसे ही रोटी को खिड़की पर रखा अचानक उसके हाथ काँपने लगे और वह बोली- "हे भगवन, मैं यह क्या करने जा रही थी?" उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे की आँच में जला दिया। फिर उसने एक ताजी रोटी बनाई और खिड़की के सहारे रख दी।
हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेकर बड़बड़ाता हुआ चला गया। वह इससे बिलकुल बेखबर था कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है।
वह महिला खिड़की पर रोटी रखते हुए भगवान से अपने पुत्र की सलामती और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी, जो अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए बाहर गया हुआ था। महीनों से उसकी कोई खबर नहीं मिली थी।
ठीक उसी शाम उसका बेटा घर आया। वह कमजोर हो गया था। उसके कपड़े फट गए थे और वह भूख के कारण बेहाल हो गया था।
माँ को देखते ही उसने कहा- "माँ, यह चमत्कार ही है कि मैं आज यहाँ हूँ। जब घर से एक मील दूर था तो मैं भूख के कारण गिर गया था। मैं मर गया होता यदि वहाँ से गुजर रहे एक कुबड़े की नज़र मुझ पर न पड़ी होती। उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। भूख के मारे मेरे प्राण निकल रहे थे। मैंने उससे खाने के लिए कुछ माँगा। उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कहकर दे दी कि- "मैं हर रोज यही खाता हूँ, आज मुझसे ज्यादा तुम्हें इसकी जरूरत है, यह खा लो और अपनी भूख शान्त करो।"
बेटे की बात सुनते ही माँ का चेहरा पीला पड़ गया। अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लिया।
उसके मस्तिष्क में वही बात घूमने लगी कि यदि उसने सुबह जहर मिली रोटी को आग में जलाकर नष्ट नहीं किया होता तो आज उसका बेटा उस रोटी को खाकर मर जाता? उसे उन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ आ गया- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे तो वह तुम तक लौटकर आएगा।
इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करने के लिए तत्पर रहना चाहिए और अच्छा करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। चाहे उस समय उस कृत कार्य के लिए आपकी सराहना या प्रशंसा हो अथवा न हो। अपने प्रयासों को यत्नपूर्वक बढ़ाते रहना चाहिए। पता नहीं किस मोड़ पर हमारी अच्छाई हमें बहुत कुछ दे जाए और हमारी बुराई हमसे सर्वस्व छीन ले।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 20 मई 2016
ईश्वर की पूजा-अर्चना
ईश्वर की पूजा-अर्चना यानि प्रार्थना करना मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है। इससे मनुष्य का लोक-परलोक दोनों ही सुधरते हैं। उसका आत्मिक बल बढ़ता है और उसे मानसिक शान्ति मिलती है।
प्रभु की प्रार्थना करना और उसका ध्यान करना इंसान के लिए बहुत जरूरी होता हैं। जब मनुष्य सच्चे मन से प्रार्थना करता है तब भगवान उसकी प्रार्थना को सुनकर देर-सवेर उसे पूरा करते हैं। वह मालिक मनुष्य के भाव को चाहता है। उसे किसी भी प्रकार का प्रदर्शन अच्छा नहीं लगता।
जब मनुष्य भगवान का ध्यान करता है तब वह उसकी बात सुनते हैं। ध्यान की अवस्था में मनुष्य ईश्वर के करीब होता है। संसार के सारे कार्य-व्यवहार से दूर रहकर वह मालिक के पास बैठता है। इस प्रकार वह उसके साथ एकात्म होने का प्रयास करता है। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का ही लाभ होता है।
इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को बनाने वाला परमात्मा है और हर जीव के लिए वही सब प्रकार की व्यवस्थाएँ भी करता है। जब तक मनुष्य इस सत्य को स्मरण रखता है तब तक वह सावधान रहता है। वह कुमार्ग पर नहीं चल सकता। अपने जीवन में वह हर कदम फूँक-फूँककर रखता है ताकि उससे कोई अपराध न हो जाए।
जब वह अपने अहं में चूर हो जाता है तब स्वयं को उस परमात्मा से भी महान् समझने लगता है। उस समय वह अहंकारी बनकर वह अपनी औकात भूल जाता है। अपने दुष्कर्मो के कारण उसे भी उस परम न्यायकारी परमेश्वर से सजा तो मिलती है जैसे हम गलती करने पर बच्चों या अपने अधीनस्थों को देते हैं। कहते हैं कि ईश्वर की लाठी बेआवाज होती है और उसका प्रहार बहुत ही कठोर होता है। जब अपने दुष्कृत्यों का फल मानव को भोगना पड़ता है तब वह उसकी सहनशक्ति से परे हो जाता है।
संसार में विद्यमान नानाविध पदार्थ वह मालिक हमें बिनमाँगे झोलियाँ भरकर देता है। अब सबके समक्ष यह समस्या उठती है कि हम उसे क्या अर्पित कर सकते हैं? कहते हैं कि एक बार एक व्यक्ति ने ईश्वर से प्रश्न किया था कि वह उसे किस प्रकार रिझा सकता है और उसे क्या अर्पित कर सकता है?
वास्तव में यह प्रश्न केवल उस व्यक्ति कआ नहीं हम सभी का भी है। इस संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं जो उस प्रभु को समर्पित की जा सके। ईश्वर ने इस प्रश्न को सुनकर उत्तर दिया कि संसार की हर वस्तु उसी ने ही मनुष्य को दी है। मनुष्य के पास अपनी एक ही चीज है, वह है सिर्फ उसका अहंकार। वह उसे मालिक ने नहीं दिया। प्रभु का कहना है कि मनुष्य वही अहंकार यदि उसे अर्पित कर दे तो उसका जीवन सफल हो जाएगा।
इसका तात्पर्य यही है कि मनुष्य को सरल, सहज और सहृदय बनना चाहिए, अहंकारी कदापि नहीं। ईश्वर को घमण्डी लोग बिल्कुल पसन्द नहीं है। वह स्वयं दयालु, प्यार करने वाला और सभी जीवों का हितचिन्तक है। उसे सदाचारी और परोपकारी लोग ही भाते हैं। अहंकारी का सिर कभी-न-कभी नीचा हो ही जाता है।
ओशो का कथन है कि आस्तिक के बजाय नास्तिक के लिए परमात्मा को पाने की ज्यादा सभावना है क्योंकि आस्तिक तो झूठ से ही ईश्वर को पाने की शुरूआत करता है। ईश्वर का उसे पता नहीं है और उसने ईश्वर को मान लिया। यहीं पर तो बेईमानी हो गई। जब मान ही लिया तो अब खोज क्या खाक होगी? जब उसे झूठा ही मान लिया, तो फिर खोज का तो अन्त हो गया।
इसलिए परमात्मा को पाने के लिए, उसको जानने और समझने का सदा प्रयास करना चाहिए। उसकी निष्काम उपासना करनी चाहिए। उसके गुणों का अंशमात्र भी यदि मनुष्य अपना ले तो उसके इहलोक और परलोक दोनों संवर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 19 मई 2016
पति-पत्नी का सम्बन्ध जन्मों का
पति-पत्नी की जोड़ी ईश्वर बनाकर भेजता है, ऐसा सभी मानते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं। इसमें हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही ये संयोग बनता है। इसके लिए किसी की च्वाइस का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः उस रिश्ते की पवित्रता व गरिमा बनाए रखना और उसे बिना किसी शिकवा-शिकायत के निभाना हम सभी मनुष्यों का नैतिक दायित्व है। अन्य सभी रिश्ते इस एक रिश्ते पर कुर्बान किए जा सकते हैं।
भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की परिकल्पना इसी सत्य को ही उजागर करती है। महाकवि कालिदास ने पति-पत्नी को शब्द और अर्थ की तरह परस्पर मिला हुआ कहा है, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार शब्द को अर्थ से और अर्थ को शब्द से अलग करना असम्भव है, उसी प्रकार पति और पत्नी को अलग-अलग ईकाई मानना भी सर्वथा गलत है। इसीलिए उनके दोनों के लिए एक शब्द 'दम्पत्ति' का प्रयोग किया जाता है। उन्हें दो जिस्म और एक जान कहा जाता है।
वाटसअप पर किसी ने यह कहानी पोस्ट की थी, जो हम सभी को इस रिश्ते की वास्तविकता को समझाती है। किसी कॉलेज में Happy married life पर एक workshop हो रही थी, उसमें शादीशुदा जोड़े भाग ले रहे थे। जब प्रोफेसर मंच पर आए तो उन्होंने नोट किया कि सभी पति-पत्नी शादी पर जोक सुनाकर हँस रहे थे। यह देख कर प्रोफेसर ने कहा कि चलो पहले एक खेल खेलते है। उसके बाद अपने विषय पर बातें करेंगे।
सभी लोग खुश हो गए और उन्होंने खेल के विषय में पूछा? तब प्रोफ़ेसर ने एक शादीशुदा लड़की को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लेक बोर्ड पर ऐसे 25-30 लोगों के नाम लिखो जो तुम्हें सबसे अधिक प्रिय हों। लड़की ने पहले अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे फिर अपने सगे सम्बन्धियों, दोस्तों, पड़ोसियों और सहकर्मियों के नाम लिख दिए।
अब प्रोफ़ेसर ने उसे उनमें से कोई भी कम पसंद वाले 5 नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की ने अपने सहकर्मियों के नाम मिटा दिए। प्रोफेसर ने उसे और 5 नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की ने थोडा सोचकर अपने पड़ोसियों के नाम मिटा दिए। अब प्रोफ़ेसर ने और 10 नाम मिटाने को कहा। लड़की ने अपने सगे सम्बन्धी और दोस्तों के नाम मिटा दिए।
अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे जो उसके मम्मी-पापा, पति और बच्चे का नाम था। अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से और 2 नाम मिटा दो। लड़की असमंजस में पड़ गयी। बहुत सोचने के बाद बहुत दुखी होते हुए उसने अपने माता-पिता का नाम मिटा दिया।
सभी लोग स्तब्ध और शान्त बैठे थे क्योकि वे जानते थे कि ये गेम सिर्फ वह लड़की ही नहीं खेल रही थी, उनके दिमाग में भी यही सब चल रहा था। अब सिर्फ 2 ही नाम बचे थे उसके पति और बेटे का। प्रोफ़ेसर ने एक और एक नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की अब बहुत सहमी गयी। बहुत सोचने के बाद रोते हुए उसने अपने बेटे का नाम मिटा दिया।
प्रोफ़ेसर ने उस लड़की से कहा तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ और सभी की तरफ गौर से देखा और पूछा- 'क्या कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों हुआ कि सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया।'
कोई भी इस प्रश्न उत्तर नहीं दे सका। सभी मुँह लटकाकर बैठे हुए थे। प्रोफ़ेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और ऐसा करने का कारण पूछा। जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोसकर इतना बड़ा किया उनका नाम तुमने मिटा दिया और तो और तुमने अपनी कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया, उसका भी नाम तुमने मिटा दिया? लड़की ने जवाब दिया कि अब मम्मी-पापा बूढ़े हो चुके हैं, कुछ साल बाद वे मुझे और इस दुनिया को छोड़कर चले जाएँगे। मेरा बेटा जब बड़ा हो जाएगा तो
जरूरी नहीं कि वह शादी के बाद मेरे साथ ही रहे।
लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है, तब तक मेरा आधा शरीर बनकर मेरा साथ निभाएँगे। इसलिए मेरे लिए सबसे अजीज मेरे पति हैं। प्रोफेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूँज से लड़की को सलामी दी।
प्रोफेसर ने कहा तुमने बिल्कुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो पर अपने आधे अंग अर्थात् अपने पति के बिना नहीं रह सकती। मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर हर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसको सब से ज्यादा अजीज होता है। सभी पति और पत्नियों के लिए ये वास्तव में सत्य है, इसे कभी मत भूलना।
वास्तव में गृहस्थ जीवन की सच्चाई यही है कि सभी रिश्ते-नातों से हम दूर हो सकते हैं पर पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ हाथ थामे हुए जीवन के अन्तिम समय तक साथ निभाते हैं। जीवन साथी में लाख कमियाँ हों परन्तु उन कमियों को अनदेखा करते हुए अपनी जीवन यात्रा पूरी करें। एक बात और कहना चाहती हूँ कि जो पति-पत्नी परस्पर एक-दूसरे को सम्मान नहीं दे सकते उन्हें घर अथवा बाहर कोई नहीं पूछता। स्वार्थी बनकर भी यदि रिश्ता निभाना पड़े तो सौदा महँगा नहीं है। अतः सभी से विनम्र अनुरोध है कि इस सत्य को स्वीकार करते हुए दोनों परस्पर विश्वास और प्रेम को खण्डित न होने दें। फूँक-फूँककर कदम बढ़ाते हुए अपने-अपने जीवन में पारदर्शिता बनाकर रखें। एक-दूसरे के लिए ही जीना और मरना श्रेयस्कर है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 18 मई 2016
ख़ुशी धन-वैभव में नहीं
मनुष्य अपनी खुशी धन-वैभव में ढूँढता है। वह भूल जाता है कि दुनिया के सारे ऐश्वर्य केवल साधन मात्र हैं वे साध्य कदापि नहीं बन सकते। हम अपने लिए दिन -रात एक करके परिश्रमपूर्वक साधन जुटाते जाते हैं, वे हमें क्षणिक सुख का अहसास देते हैं। उन्हें भोगने के पश्चात वे हमारे लिए सामान्य जैसे हो जाते हैं, विशेष नहीं रहते। कभी उन्हें पाने के लिए हम मरे जा रहे थे और अब उनकी परवाह भी नहीं करते।
यह इन्सानी स्वभाव है कि वह हर वस्तु से शीघ्र ही उकता जाता है अर्थात् बोर हो जाता है। प्रसन्नता पाने के लिए या सुखी रहने के लिए केवल धन, दौलत, प्रापर्टी आदि की आवश्यकता नहीं होती, मनुष्य इनके अभाव में भी मस्त रह सकता है। सच्ची खुशी का कारण मन है जो सदा भटकाता रहता है।
इसी बात को एक बोध कथा के माध्यम से समझते हैं। एक शहर में बहुत अमीर व्यक्ति रहता था। अत्यधिक धनी होने पर भी वह सदा दुखी रहता था। एक दिन वह महात्मा के पास गया और उन्हें अपनी समस्या बताई।
उन्होने सेठ की बात ध्यान से सुनी और कहा कि कल इसी समय मेरे पास आना। मैं तुम्हारी सारी समस्या का हल बता दूँगा। सेठ खुशी-खुशी घर गया। जब अगले दिन वह महात्मा के पास आया तो उसने देखा कि वे सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त हैं।
सेठ ने उस खोई वस्तु के बारे में पूछा जिसे वे ढूँढ रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी एक अंगूठी गिर गयी है और वे उसी ढूँढ रहे हैं पर वह अंगूठी मिल ही नहीं रही। यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया। सेठ ने महात्मा से कुछ समय बाद पूछा कि उनकी अंगूठी गिरी कहाँ थी। उन्होंने जवाब दिया कि अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ बहुत अंधेरा है अतः वे यहाँ सड़क पर ढूँढ रहे हैं।
सेठ ने चौंककर पूछा कि जब अंगूठी आश्रम में खोई है तो वहाँ कैसे मिल सकती है। महात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो अपने मन में छुपी रहती है लेकिन उसे धन में खोजने की कोशिश करते हैं। इसीलिए दुखी रहते हैं। यह सुनकर सेठ महात्मा के पैरों में गिर गया।
यही बात हम सभी पर लागू होती है। जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इंसान खुश नहीं रहता क्योंकि हम पैसा कमाने में इतना मगन हो जाते हैं कि बाकी सब कुछ भूल जाते हैं। बच्चा जैसे किसी खिलौने के लिए हठ करता है और जब उसे वह दिला दिया जाता है तब वह दीन- दुनिया भूल जाता है। कुछ ही समय उससे खेलकर उस खिलौने से उसका मन भर जाता है तो उसे फैंक देता है। उसे इस बात का कोई क्मतलब नहीं होता कि वह कितना कीमती खिलौना था। वही हाल हम सभी का भी है।
प्रयास यही करना चाहिए कि अपने बच्चों को धनवान होना सिखाने के स्थान पर खुश रहना सिखाना चाहिए ताकि बड़े होने पर वे रिश्तों की अहमियत समझ सकें और वस्तुओं की उपयोगिता समझ सकें, न कि उनके मूल्य को।
खुशियों के पल खोजने होते हैं। हम बड़ी-बड़ी खुशियों को पाने की फिराक में रहते हैं। यह भूल जाते हैं कि बड़ी खुशियाँ तो जीवन मे गिनी-चुनी आती हैं। इसलिए छोटे-छोटे खुशियों के पल यत्नपूर्वक खोजने चाहिए।
स्वामी विवेकानंद का इस विषय में कथन है कि 'समस्त ब्रह्माण्ड हमारे इस शरीर के अंदर ही विद्यमान है जबकि हम जीवनभर इधर-उधर भटकते रहते हैं। सत्य बोलना, परोपकार करना, अच्छी सोच रखना आदि बहुत बड़े सुख हैं।'
स्वामी विवेकानन्द का कथन सर्वथा उपयुक्त है कि वास्तविक सुख और शान्ति मनुष्य को शुभकार्य करके ही मिलती है। किसी भूखे को भरपेट खाना खिलाने पर जो खुशी मिलती है वह करोड़ों रूपए खर्च करके भी नहीं मिल सकती। इसलिए सच्चा सुख खोजना हो तो शुभकर्म करते हुए मन को शुद्ध और पवित्र बनाना चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने पर परम सुख मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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