मंगलवार, 24 सितंबर 2019

ईश्वर का न्याय

मनुष्य की अज्ञ बुद्धि ईश्वर की सत्ता और उसके न्याय पद्धति को नहीं समझ सकती। भौतिक संसार में न्याय करने के लिए बहुत सी अदालतें हैं। फिर भी कई कारणों से कभी-कभी चूक हो जाती है। ईश्वर के न्यायालय में कभी, किसी तरह की कोई भी चूक होने की सम्भावना नहीं हो सकती। जिस प्रकार वह पूर्ण है, उसी प्रकार उसकी समस्त रचनाएँ भी पूर्ण है। उसके सभी कार्य कसौटी पर कसे जाने की तरह शत प्रतिशत सत्य होते हैं।
           एक कथा के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं, जिसमें किसी लेखक का नाम नहीं लिखा था। किञ्चित शोधन और परिवर्तन के साथ प्रस्तुत है।
           एक बार दो आदमी एक मन्दिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे। वहाँ अन्धेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे। थोड़ी देर में वहाँ एक आदमी आया और वह भी उन दोनों के साथ बैठकर बातें करने लगा। कुछ देर बाद वह आदमी बोला कि उसे बहुत भूख लग रही है, वैसे भूख तो उन दोनों को भी लगने लगी थी।
         पहला आदमी बोला, "मेरे पास तीन रोटियाँ हैं।"
          दूसरा बोला, "मेरे पास पाँच रोटियाँ हैं, हम तीनों मिल बाँटकर खा लेते हैं।"
          उसके बाद प्रश्न यह उठा कि आठ (3+5) रोटियाँ तीन आदमियों में कैसे बाँटी जाएँगी?
         पहले आदमी ने राय दी, "ऐसा करते हैं कि हर रोटी के तीन-तीन टुकडे करते हैं, अर्थात् आठ रोटियों के चौबीस टुकडे (8X3=24) हो जाएँगे। तब हम तीनों ही आठ-आठ टुकड़े बराबर बराबर बाँटकर खा लेंगे।"
         तीनों को उसकी सलाह अच्छी लगी और उन्होंने आठ रोटियाँ के चौबीस टुकडे कर दिए। प्रत्येक ने आठ-आठ रोटी के टुकड़े खाकर अपनी भूख शान्त की। फिर बारिश के कारण मन्दिर के प्राँगण में सो गए। सुबह उठने पर उस तीसरे व्यक्ति ने उपकार के लिए उन दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से रोटी के आठ टुकडो़ के खिलाने के बदले उपहार स्वरूप आठ सोने की गिन्नियाँ दीं और फिर वह अपने घर की ओर चला गया।
            उसके जाने के बाद पहले आदमी ने दूसरे आदमी से कहा, "चार-चार गिन्नियाँ हम दोनों बाँट लेते हैं।"
           दूसरा बोला, "नहीं, मेरी पाँच रोटियाँ थी और तुम्हारी सिर्फ तीन रोटियाँ थी। अतः मैं पाँच गिन्नियाँ लूँगा, तुम्हें तीन गिन्नियाँ मिलेंगी।"
          इस बात पर दोनों में बहस और झगड़ा होने लगा। इसके बाद वे दोनों ही न्याय के लिए उस मन्दिर के पुजारी के पास गए और उसे समस्या बताई तथा न्यायपूर्ण समाधान के लिए प्रार्थना की।
          पुजारी बेचारा असमंजस में पड़ गया, "उसने कहा तुम लोग ये आठ गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो। मैं कल सबेरे तुम लोगों को उत्तर दे पाऊँगा।"
        पुजारी को दिल में वैसे दूसरे आदमी की तीन और पाँच गिन्नियों वाली बात ठीक लगी रही थी। फिर भी वह गहराई से सोचते हुए वह गहरी नींद में सो गया। कुछ देर बाद उसके सपने में साक्षात भगवान प्रगट हुए। पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए उनसे प्रार्थना की। उसने बताया, "मेरे ख्याल से तीन और पाँच गिन्नियों का बंटवारा उचित लगता है।"
       भगवान मुस्कुरा कर बोले, "नहीं, पहले आदमी को एक गिन्नी मिलनी चाहिए और दूसरे आदमी को सात गिन्नियाँ मिलनी चाहिए।"
          भगवान की बात सुनकर पुजारी अचम्भित हो गया और उसने अचरज से पूछा, "प्रभो, ऐसा कैसे?"
          भगवन फिर एकबार मुस्कुराए और बोले, "इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी तीन रोटी के नौ टुकड़े किए परन्तु उन नौ में से उसने सिर्फ एक टुकड़ा बाँटा और आठ टुकड़े स्वयं खाए अर्थात उसका त्याग सिर्फ रोटी के एक टुकड़े का था इसलिए वह सिर्फ एक गिन्नी का हकदार है। दूसरे आदमी ने अपनी पाँच रोटियों के पन्द्रह टुकड़े किए। उसमें से आठ टुकडे उसने स्वयं खाए और सात टुकड़े उसने बाँट दिए। इसलिए न्यायानुसार वह सात गिन्नियों का हकदार है। यही मेरा गणित है और यही मेरा न्याय है।"
ईश्वर की न्याय का सटीक विश्लेषण सुनकर पुजारी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया।
          इस कहानी का सार यही है कि हमारा समझने का दृष्टिकोण ईश्वर के दृष्टिकोण से एकदम भिन्न होता है। हम ईश्वरीय न्याय को जानने समझने में अज्ञानी हैं। हम सभी लोग अपने त्याग का गुणगान करते है। ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग के अनुसार यथोचित तरीके से निर्णय करते हैं। इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि हम कितने साधन सम्पन्न है। महत्वपूर्ण यह है कि हमारे सेवा कार्य में त्याग का कितना अंश है।
           इसलिए ईश्वरीय न्याय पर कभी सन्देह नहीं करना चाहिए। वह समदर्शी है, सबको एकसमान देखता है। अतः उसके न्याय करने की प्रक्रिया हम मनुष्यों से बिल्कुल अलग है। वह मनुष्य के भाव, उसके कमाई के साधन आदि पर विचार करके ही न्याय करता है और तदनुरूप ही उसका फल देता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 23 सितंबर 2019

बेटी को ससुराल का डर

बेटी को ससुराल का डर

बेटी जब होश सम्हालती है, तभी से उसे घर-परिवार के लोग बात-बात पर ससुराल का डर दिखाने लगते हैं और ताने देते हैं। वे उसे कहते हैं कि ससुराल में देर से सोकर उठोगी तो सास ताना मारेगी। मायके में यदि काम नहीं किया तो कोई बात नही, माँ बरदाश्त कर लेगी पर सास नहीं करेगी। ज्यादा जबान माँ के घर ही चल सकती है, ससुराल में जबान लड़ाने पर सास घर से बाहर निकल देगी।
            बेटी के उठने-बैठने की शालीनता, सोने-जागने के समय, वस्त्र पहनने के विषय में, मित्रों के साथ घूमने जाने पर, जोर से हँसने आदि न जाने कितनी ही बातों को लेकर हर बेटी को माता, पिता, भाई और घर के बड़े-बुजुर्ग सब ससुराल का भय दिखाकर भयभीत करते रहते है। यह एक विडम्बना है कि बेटी बचपन से ही सदा खौफ के साये में जीने के लिए विवश हो जाती है।
           बालपन से ही उसके मन में एक प्रकर का अनजाना भय समा जाता है। ससुराल को लेकर उसके मन में तक ग्रन्थि सी बन जाती है। उसे समझ नहीं आता कि ससुराल क्या इतना डरावना स्थान होता है। सास, ससुर, देवर, ज्येष्ठ और ननद सब भूत-प्रेतों की तरह भयभीत करते रहते हैं। वहाँ कभी सुकून नहीं मिल पाता। ससुराल में सभी लोग शायद लाठी लेकर बैठे रहते हैं कि बहू जरा-सी गलती करे तो सही और उसकी खैर नहीं।
           एक युवा लड़की अपनी आँखों में भविष्य के सपने सजाकर अपने ससुराल में प्रवेश करती है। यदि इस तरह उसके मन के किसी कोने में संदेह का बीज हर समय पनपता रहेगा, तो उसे ससुराल वालों के सद व्यवहार पर भी शक होगा। उसे उनके साथ सामञ्जस्य बिठाने में बहुत कठिनाई होगी। उसे उनके प्यार-दुलार, ममत्व को समझने में बहुत समय लगेगा।
           ससुराल में खाना बनाना अथवा घर की साज-सज्जा आदि कोई भी काम करेगी तो डरती रहेगी कि पता नहीं घर के लोगों की इस पर प्रतिक्रिया क्या होगी? इस तरह काम के आते होने पर भी उस बेचारी से कहीं-न-कहीं भूल-चूक हो जाने की सम्भावना बनी रहती है। इसका अर्थ यह हुआ कि वह काम भी करे और बुरी भी बने। सब की नजरों में वह एक नालायक और फूहड़ बहू बनकर रह जाती है।
           इस तरह माँ-पापा की उस सयानी बेटी का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि न चाहते हुए भी उससे हर काम में गलती हो जाती है। इस स्थिति में उसे हर समय ससुराल से ताने सुनने को मिलते हैं। बहुत से लोग ऐसे भी है, जो उसके माता-पिता को भी दोष देने लगते हैं। इन सबको सुनकर वह अपने मन-ही-मन रोती है। ससुराल में उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं होता।
          में हर बेटी के माता-पिता से यही अनुरोध करना चाहती हूँ कि वे अपनी बेटी को बचपन से ही ससुराल का हौव्वा न दिखाएँ। बेटी को स्वस्थ माहौल में पलने और बढ़ने दें। उसे उच्च शिक्षा दिलाएँ, उसका मनोबल बढ़ाएँ। यदि उससे जाने या अनजाने कोई गलती हो भी जाए, तो उसे डाँट-डपट करने या दोष देने के स्थान पर सदा प्यार से समझ दें, ताकि वह भविष्य के लिए चौकन्नी हो सके।
           अपनी नाजों से पाली हुई बेटी के सुखद और स्वर्णिम भविष्य के लिए उसका मार्गदर्शन कीजिए। जब बेटी अपने ससुराल जाए तो वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो। वह बहुत प्रसन्न मन से अपने ससुराल की दहलीज पर अपना कदम रखे। वहाँ के सभी रिश्तों से डरने के स्थान पर उन्हें खुले मन से स्वीकार करे। इससे उसके किसी कार्य में गलती होने की सम्भावना भी कम होती है।
           ससुराल पक्ष को भी चाहिए कि बहू को अपनी बेटी की तरह मानें। उससे कोई गलती या भूल-चूक हो भी जाए, तो उसका तिरस्कार करने के स्थान पर उसे प्यार से समझाएँ। अपनी अरमानों से लाई गई बहू को आज मान-सम्मान और प्यार दोगे, तभी बदले में उससे इस सबकी अपेक्षा कर सकोगे।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 22 सितंबर 2019

रिश्तों की सीमा

असार संसार के सभी भौतिक रिश्ते-नाते मनुष्य के जीवनपर्यन्त रहते हैं। मृत्यु आते ही सभी सम्बन्ध इसी धरा पर छूट जाते हैं। आँख बन्द होते ही ये रिश्ते पराए से हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्र-पड़ौसी, सभी स्नेही जन मनुष्य के जीते-जी उसके साथी होते हैं। उसके मरणोपरान्त अपना प्रिय केवल यादों में ही रह जाता है। उसके साथ सारे सम्बन्ध टूट जाते हैं, मानो वह कोई पराया हो।
          मनुष्य का अपना कहा जाने वाला यह शरीर भी उससे प्राणों के निकल जाने के उपरान्त उसका साथ छोड़ देता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस शरीर पर सारा जीवन मान किया, उसे सजाकर और संवारकर रखा, वह भी एक निश्चित समय के पश्चात साथ छोड़ देता है। अपने कहे जाने वाले प्रियजन भी उसे कुछ घण्टे तक सहन नहीं कर पाते। वे यथाशीघ्र ही उसे अग्नि को समर्पित करने के लिए उतावले हो जाते हैं।
             इन विचारों को एक कथा के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। इसे बहुत पहले कहीं पढ़ा था। आप लोगों ने भी यह कथा पढ़ी या सुनी होगी। कथा कुछ इस प्रकार है।
          कभी किसी स्थान पर एक पहुँचे हुए महात्मा जी आए। उनकी प्रसिद्व को सुनकर एक दुखियारी महिला उनके पास आई और बोली, "महात्मा जी, मेरे जीने का एकमात्र सहारा मेरा बेटा असमय मृत्यु को प्राप्त हो गया है।'"
           महात्मा जी उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, " मृत्यु तो जीवन का सत्य है, इससे कोई भी बच नहीं सकता।"
          वह स्त्री रोते हुए महात्मा जी से बोली, "आप समर्थ हैं, आप मुझे मेरे बेटे से एक बार मिलवा दीजिए।"
           महात्मा जी ने कहा, "यह असम्भव है। एक बार जिसकी मृत्यु हो जाती है, वह पुनः लौटकर नहीं आता।'
          उस महिला ने हाथ ठान ली कि वह अपने पुत्र से एक बार मिले बिना वहाँ से नहीं जाएगी। उसकी जिद को देखते हुए महात्मा जी ने उससे कहा कि वह दूर से अपने बेटे को एक बार देख सकती है, पर उसे छुएगी नहीं। उस स्त्री ने महात्मा जी की बात मान ली।
          अब महात्मा जी के चमत्कार के कारण उस स्त्री को उसके बेटे जैसे बहुत से बच्चे दिखाई दिए। वह हैरान हो गई कि इस भीड़ में से वह अपने बेटे को कैसे ढूंढे। खैर, अन्ततः उसे उनमें अपना बेटा जाता हुआ दिखाई दिया। उसका मन प्रसन्न हो गया कि अब वह अपने बेटे से बस एक बार तो मिल सकेगी।
           यह क्या? उसने अपने बेटे को बड़े प्यार से पुकारा। वह अनसुना करके चलता रहा। उसने दूसरी बार, तीसरी बार बेटे को पुकारा पर परिणाम वही रहा, ढाक के तीन पात। अब चौथी बार जब अधीर होकर उस माता ने अपने बेटे को पुकारा, तब उसने पीछे मुड़कर उसकी ओर देखा। उस बालक ने उससे पूछा, "तुम कौन हो? मुझे क्यों इस तरह पुकार रही हो?"
          महिला ने प्रसन्न होते हुए उस बच्चे से कहा,"बेटा, तुम मेरे पुत्र हो और मै तेरी माँ हूँ।"
          यह सुनकर उस बालक ने कहा, "कौन बेटा और कौन माँ? आप मेरे किस जन्म की माँ हैं?"
          वह स्त्री बेटे के मुँह से यह सुनकर रोने लगी। उस बालक ने फिर कहा,"न जाने मेरे कितने जन्म हो चुके हैं और आपके भी अनगिन जन्म हो चुके हैं। जन्म और मृत्यु का यह खेल अनवरत चलता रहता है। मेंने पता नहीं कितनी बार बेटे, भाई, पति आदि के रूप में जन्म लिया। पता नहीं कितनी ही स्त्रियाँ मेरी माता बनीं और कितनों का में पुत्र बना।"
           इस रहस्य को समझकर उस स्त्री को जन्म, मृत्यु और सभी रिश्तों का ज्ञान हो गया। इसके लिए उसने महात्मा जी को धन्यवाद किया।
            कहने का तात्पर्य यही है कि सभी रिश्ते अस्थायी है, जो केवल जन्म और मृत्यु तक कि अवधि तक के लिए मिलते हैं। ये सभी पूर्वजन्मों के कर्मानुसार लेनदेन के सम्बन्धों का भुगतान करने के लिए होते हैं। अपना-अपना हिसाब चुकता करने के बाद ये सभी दूसरे लोक चले जाते हैं। इस सत्य को मनुष्य जितनी जल्दी समझ ले, उतना ही अच्छा है, नहीं तो रोने-झींकने से भी कोई हल नहीं मिल सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 21 सितंबर 2019

दान का संस्कार

हमारे शास्त्र दान देना सौभाग्यकारक मानते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह इस समाज से बहुत कुछ लेता है। सामाजिक और धर्मिक कार्यों के लिए सदा ही धन की आवश्यकता होती है। वह धन आता है दान से। हमारे मनीषी हमें समझाते हैं कि अपने घर के खर्चों को करते हुए प्रति मास अपनी सुविधानुसार मनुष्य को दान के लिए कुछ राशि निकालनी चाहिए। अपने परिश्रम और ईमानदारी से कमाए गए धन को किसी सुपात्र को देना चाहिए।
          इस विषय में एके बोधकथा पढ़ी थी। उसे आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ।
         एक सन्त ने एक सद् गृहस्थ के द्वार पर दस्तक दी और आवाज लगाई, "भिक्षां देहि।"
        एक छोटी बच्ची बाहर आई और वह बोली, ‘‘बाबा, हम लोग बहुत ही गरीब हैं, हमारे पास भिक्षा में देने के लिए कुछ भी नहीं है।"
          सन्त बोले, ‘‘बेटी, मना मत करना, अपने आँगन की एक मुट्ठी धूल ही मुझे भिक्षा में दे दो।"
        लड़की ने एक मुट्ठी धूल उठाई और उन सन्त के भिक्षा पात्र में डाल दी।
           शिष्य ने उनसे पूछा, ‘‘गुरु जी, धूल भी कोई भिक्षा होती है? आपने उसे धूल देने के लिए क्यों कहा?
        सन्त बोले, ‘‘बेटा, अगर आज वह मुझे न कह देती, तो फिर कभी किसी को भिक्षा नहीं दे पाती। आज उसने धूल दी है तो क्या हुआ, देने का संस्कार तो उसके मन में पड़ गया। आज धूल देने से उसमें देने की भावना तो जागी है, फिर कल जब वह बेटी सामर्थ्यवान हो जाएगी तब अन्न और फल का भी दान करेगी।
         इस छोटी-सी कथा का निहितार्थ बहुत महान है। इस बात को सदा स्मरण रखना चाहिए कि दान हमेशा अपने परिवार के छोटे बच्चों के हाथों से दिलवाना चाहिए, जिससे बिना कहे ही उनके मन में दूसरों को कुछ देने की भावना बचपन से ही घर कर जाए। इसी प्रकार बच्चों को माता-पिता सहज ही में संस्कारवान बना सकते हैं। दूसरी ओर बच्चे खेल-खेल में ही ये सब महत्त्वपूर्ण बातें सीख जाते हैं।
          दान अपनी जेब के अनुसार अथवा अपनी चादर को देखते हुए ही देना चाहिए। किसी की होड़ करते हुए स्वयं को कर्ज में डूबा देना समझदारी नहीं सकता कहलाती। दान मनुष्य किसी भी वस्तु का दे सकता है। धन का दान तो प्रचलित है। अन्न और फल का भी दान दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वस्त्र का दान दिया जा है। वस्त्र नए हों तो बहुत अच्छा, पर यदि पुराने वस्त्र भी किसी को  दिए जाएँ तो वे फ़टे-पुराने न होकर अच्छी कंडीशन के होने चाहिए, ताकि लेने वाला उन्हें कुछ दिन पहने तो सही।
           एक बात में यहाँ और जोड़ना चाहती हूँ कि दान अपनी मेहनत और ईमानदारी की कमाई का ही फलदायी होता है। चोरी, डकैती, रिश्वतखोरी, स्मगलिंग, भ्रष्टाचार, दूसरों का गला काटकर कमाए गए धन से दिया गया दान कभी फलदायी नहीं होता। यानी दाता को उस दान का पुण्य कदापि नहीं मिलता। ईश्वर समाज विरोधी इन लोगों से कभी प्रसन्न नहीं हो सकता।
           विद्या का दान सब दानों में उत्तम माना जाता है। जितनी अपनी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार गरीब बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया जा सकता है। जिस गरीब प्रतिभाशाली बच्चे को ऐसी सुविधा मिल जाएगी, उसका जीवन सफल हो जाएगा। साथ ही उसे शिक्षित करवाने वाले का जीवन भी धन्य हो जाता है।
         मन में यह दुख कभी नहीं करना चाहिए कि हम इस योग्य नहीं है कि दान दे सकें। कोई बात नहीं किसी को अच्छा मार्ग दिखाना भी उपकार का कार्य होता है, उसे तो कर सकते हैं। सबके साथ प्रेम और सहृदयता का व्यहार भी इसी दान की श्रेणी में आता है। शारिरिक श्रम का भी दान किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य के पास जो भी है, उसे समाज के हित में लगाना दान कहलाता है। यानी तन, मन और धन से जो भी श्रद्धापूर्वक दिया जाए, वह दान की श्रेणी में ही आता है। हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने जीवन में इस दानकर्म से वञ्चित न रहने पाए। दान देने से मनुष्य में विनम्रता का भाव आना चाहिए। इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधरते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 19 सितंबर 2019

कौवा बनकट खाने नहीं आऊँगा

श्राद्ध एक ऐसी रूढ़ि है, जिसके अनुसार मनुष्य के पितर कौवे के रूप में पितृपक्ष में आकर अपना भाग या अन्न ग्रहण करते हैं। आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इस प्रथा का घोर विरोध किया था। उनका कथन था कि इन व्यर्थ के अन्ध विश्वासों से समाज में विकार आते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वैदिक काल में इस दुष्प्रथा का कहीं भी कोई वर्णन नहीं है। तथाकथित परवर्ती विद्वानों ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए इस कुप्रथा का विधान किया।
         भाई दिनेश बरेजा की लिखी यह कहानी मेरे मन के भावों के बिल्कुल करीब है। इसलिए इस कथा को कुछ भाषागत संशोधनों के बाद आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। आशा है आप इससे सहमत होंगे।
          "अरे! भाई बुढापे का कोई ईलाज नहीं होता, अस्सी पार चुके हैं. अब बस सेवा कीजिये." डाक्टर पिता जी को देखते हुए बोला।
         शंकर ने पूछा, "डाक्टर साहब! कोई तो तरीका होगा, साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है।"
       "शंकर बाबू, मैं अपनी तरफ से दुआ ही कर सकता हूँ। बस आप इन्हें खुश रखिए। इससे बेहतर और कोई दवा नहीं है।इन्हें लिक्विड पिलाते रहिये, जो इन्हें पसंद है खिलाइए।" डाक्टर अपना बैग सम्हालते हुए मुस्कुराया और बाहर निकल गया।
          शंकर पिता को लेकर बहुत चिन्तित था। उसे लगता ही नहीं था कि पिता के बिना भी कोई जीवन हो सकता है। माँ के जाने के बाद अब एकमात्र आशीर्वाद उन्ही का ही बचा था। उसे अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे। कैसे पिता हर रोज कुछ-न-कुछ लेकर घर में घुसते थे। बाहर हलकी-हलकी बारिश हो रही थी, ऐसा लगता था जैसे आसमान भी रो रहा हो। शंकर ने खुद को किसी तरह समेटा और पत्नी से बोला, "सुशीला! आज सबके लिए मूँग की दाल के पकौड़े और हरी चटनी बनाओ। मैं बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ।"
        पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी। वह अपने काम में जुट गई। कुछ ही देर में रसोई से पकौड़ों की खुशबू आने लगी। शंकर भी जलेबियाँ ले आया था। जलेबी रसोई में रखकर वह पिता के पास बैठ गया। उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए बोला, "बाबा! आज आपकी पसन्द की चीज लाया हूँ. थोड़ी जलेबी खाएँगे।" 
        पिता ने आँखे झपकाईं और फिर वे हल्का-सा मुस्कुरा दिए। अपनी अस्फुट आवाज में बोले, "आज पकौड़े बन रहे हैं क्या?"
        "हाँ बाबा, आपकी पसन्द की हर चीज अब मेरी भी पसन्द है। अरे, सुषमा जरा पकौड़े और जलेबी भी लाओ" शंकर ने आवाज लगाईं।
          "लीजिए बाबू जी एक और पकौड़ा" हाथ में देते हुए उसने कहा।
         "बस अब पूरा हो गया, पेट भर गया। जरा-सी जलेबी दे" पिता बोले। शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया, पिता उसे बहुत प्यार से देखते रहे।
           "शंकर, सदा खुश रहो बेटा. मेरा दाना-पानी अब पूरा हुआ।"
         शंकर ने कहा, "बाबा, आपको तो सेंचुरी लगानी है, आप मेरे तेंदुलकर हो।" आँखों में आँसू बहने लगे।
        वे मुस्कुराए और बोले, "तेरी माँ मेरा पेवेलियन में इंतज़ार कर रही है, अगला मैच खेलना है। तेरा पोता बनकर आऊँगा, तब खूब खाऊँगा बेटा।"
          पिता उसे देखते रहे। शंकर ने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी, मगर पिता उसे लगातार देखे जा रहे थे। आँख भी नहीं झपक रही थी। शंकर समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई ।
          तभी उसे ख्याल आया, पिता जी हमेशा कहा करते थे, "मैं श्राद्ध खाने नहीं आऊँगा कौआ बनकर, जो खिलाना है अभी खिला दे।"
         मंदिरों में जाते हैं, वहाँ पत्थरों की पूजा करते है, पूजा-पाठ करवाते है और वे सारी चीजे करते है, जिससे हमें लगता है कि हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। लेकिन क्या आप जानते है कि ईश्वर मनुष्य के पास हमेशा माता-पिता के रूप में विद्यमान रहता है। बस आवश्यकता है तो उन्हें पहचानने की।
        अपनी खुशियों का गला घोटकर हमारी सारी ख्वाहिश पूरी करने वाले हमारे माता-पिता ही होते हैं। उन्होंने ही हमें इस समाज में जीने का अधिकार दिलाया है। जब वे हमारे लिए इतना कुछ कर सकते है, तो क्या हम अपने माता-पिता के जीते जी उनकी सेवा-सुश्रुषा नही कर सकते।
           मेरा केवल मात्र यही मानना है कि माता-पिता के जीवनकाल में उन्हें सारे सुख देना ही वास्तविक श्राद्ध है। माता-पिता का सम्मान करके उन्हें जीते जी खुशियाँ देना प्रत्येक सन्तान का कर्त्तव्य होता है। जो माता-पिता की हर इच्छा को प्रसन्नतापूर्वक पूर्ण करता है, उसका जन्म धन्य हो जाता है। मातृ-पितृभक्त श्रवण कुमार की तरह वह युगों-युगों तक इस धरती पर स्मरण किया जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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