गुरुवार, 3 सितंबर 2020

ईश्वर को क्या भेंट दें

  ईश्वर को क्या भेंट दें

ईश्वर की पूजा करके, उसे भेंट में क्या दिया जाए? यह सबसे बड़ी समस्या है, जिस पर विचार करना आवश्यक है। इसका कारण है कि जो भी धन-दौलत और वैभव हमारे पास विद्यमान है, वह सब तो ईश्वर का ही दिया हुआ। वह मालिक हम सभी मनुष्यों को झोलियाँ भर-भरकर देता है। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उसमें से कितना समेट सकते हैं। यानी जो हमारे भाग्य का होता है, केवल वही हमें मिल पाता है।
          ईश्वर को हम धन दें, तो वह उसी का दिया हुआ है। यदि उसे सोने-चाँदी की भेंट देना चाहें, तो वे भी उसने ही दी हैं। यदि उसे मिठाई खिलाना चाहें, तो वह भी उसके दिए धन से खरीदी गई है। और यदि उसे मेवा या ड्राईफ्रूट देना चाहें तो वह भी उसी का दिया हुआ है। हमारे घर में जो भी विद्यमान अन्न, वस्त्र, अन्य ऐश्वर्य के सभी भौतिक साधन हैं, वे भी उस मालिक ने हमें दिए हैं।
           अब तो वास्तव में चिन्तन करना पड़ेगा कि मालिक को किस वस्तु की भेंट दी जाए, ताकि वह प्रसन्न हो सके। हमारे पास जो भी है, उसमें से कोई वस्तु ऐसी नहीं जो मालिक ने नहीं दी। इसका अर्थ यह हुआ कि हम उसे जो भी पत्र-पुष्प भेंट करते हैं, वह उनसे प्रसन्न नहीं होता। यह तो वही बात हुई-
    त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पयते।
अर्थात् हे ईश्वर! तुम्हारी वस्तु तुम्हें ही सौंप रहे हैं।
          जिसने कोई वस्तु दी है, उसे ही वापिस सौंपने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। अब भौतिक जीवन का उदाहरण लेते हैं। किसी बन्धु-बान्धव से किसी अवसर पर मिले उपहार को यदि समय बीतते गलती से भी उसे लौटा दिया जाए, तो वह नाराज हो जाता है। जब मौका मिले तब उलाहना दे देता है। इसलिए हम ध्यान रखते हैं कि जिससे उपहार मिला है, उसे ही वापिस न दे दिया जाए।
           यह सचमुच गम्भीर विषय है। ईश्वर ने हम मनुष्यों को सब कुछ दिया है। वह चाहता है कि हम विनम्र, दयालु, सहृदय, परोपकारी बनें। कभी मिली हुई अपनी इस सुख-समृद्धि पर गर्व न करें। ईश्वर मनुष्य की सच्ची भावना को चाहता है। मनुष्य के मन का निःस्वार्थ भाव उसे बहुत प्रिय है। इस भाव से ओतप्रोत होकर मनुष्य ईश्वर को जो भी देता है, वही वास्तविक भक्ति होती है।
            एक यह अहंकार ही है जो ईश्वर ने इस मनुष्य को नहीं दिया है। पता नहीं इसे मनुष्य ने कैसे प्रश्रय दे दिया? मनुष्य हर वस्तु पर अकड़ता है। अपने धन-वैभव पर गर्व कर है। अपनी विद्या अथवा योग्यता पर इतराता फिरता है। अपने रूप-सौन्दर्य पर घमण्ड करता है। अपने पद के मद में रहता है। अपने योग्य बच्चों पर मान करता है। यानी हर भौतिक वस्तु को प्राप्त करके स्वयं को महान समझने की भूल करता है। यहीं पर वह ठगा जाता है।
          ईश्वर चाहता है कि इस अहं को हम उसे भेंट कर दें। संसार की यही एक वस्तु है, जो उसे भेंट की जा सकती है। कठिनाई यह है कि हम सब मदान्ध रहते हैं। अपने अभिमान का परित्याग नहीं कर सकते।  यह अहंकार मनुष्य को ले डूबता है। रावण, हिरण्यकश्यप जैसे अहंकारी जो स्वयं को भगवान मानते थे, उनका अहंकार  उन्हें नहीं बचा पाया। वे भी इस संसार से विदा हो गए।
           इस चर्चा का सार यही है कि ईश्वर को भेंट देने के लिए मनुष्य के पास ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो उस मालिक की दी हुई नहीं है। वह परमात्मा मनुष्य की भावना को चाहता है। मनुष्य अपने श्रद्धा भाव से प्रभु को जो भी समर्पित करता है, वही उसे प्रिय होता है। मनुष्य का अहं उसका सबसे बड़ा शत्रु है। बस यही उसकी अपनी कमाई है। यदि मनुष्य अपने इस अहंकार को ईश्वर के सुपुर्द कर दे, तब उसका बेड़ा पार हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 2 सितंबर 2020

परम तत्त्व एक

 परम तत्त्व एक

ईश्वर परम तत्त्व है, उसे जानना व समझना इस मनुष्य जीवन का सार है। प्रमुख बात यह है कि वह ईश्वर एक ही है। इसके विषय में विश्व के सभी धर्मों ने अपने-अपने ग्रन्थों में लिखा है। अलग-अलग धर्म उस प्रभु को अलग-अलग नाम से पुकारते हैं। जिस प्रकार एक भौतिक मनुष्य पिता, बेटा, गुरु, बाबा, पति, मित्र, चाचा, मामा, फूफा आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। उसी प्रकार उस ईश्वर के अनेक नाम है, जिनसे लोग उसे बुलाते हैं।
         विश्व के आदिग्रन्थ ऋग्वेद में इस विषय में कहा गया है-
         एको हि सद् विप्र बहुधा वदन्ति।
अर्थात् सत्य यानी ईश्वर एक है, उसे विद्वान अनेक नामों से पुकारते हैं। यह उक्ति एकेश्वरवाद की स्थापना करती है। कितने धर्म, कितने ईश्वर के नाम, सब एक ही हैं। सब धर्मों की शिक्षा एक है और सबका ईश्वर भी एक ही है, नाम कोई भी हो सकता है। सुख में, दुख में सभी लोग उस ईश्वर को ही पुकारते हैं, किसी अन्य को नहीं।
          'महाभारत' में महर्षि वेद व्यास ने इस विषय में बताया है-
  एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु।
 तथैव धर्मवैचित्र्यं तत्त्वमेकं परं स्मॄतम्।।
अर्थात् जिस प्रकार अनेक रंगों की गाएँ एक रंग का यानी सफेद दूध देती हैं, उसी प्रकार विभिन्न धर्मों में एक ही परम तत्त्व (ईश्वर) का उपदेश दिया गया है।
          इस श्लोक का तात्पर्य यही है कि विभिन्न रंगों की गौवों का दूध केवल सफेद रंग का होता है यानी एक ही रंग का होता है। गाय के रंग के जैसे दूध का रंग नहीं होता। उसी प्रकार वह परम तत्त्व ईश्वर भी एक ही है। चाहे उसे किसी भी धर्म में ढूंढ लो या किसी भी नाम से पुकार लो। इस सत्य कहीं कोई परिवर्तन आने वाला नहीं है कि वह प्रभु एक ही है, दूसरा कोई और नहीं हो सकता।
          ईश्वर की चाहे मूर्ति बनाकर पूजा कर लो यानी उसकी भक्ति सगुण रूप में कर लो या फिर बिना किसी आकर के उसे निर्गुण निराकार मान लो। इन दोनों ही अवस्थाओं में उसे किसी भी नाम से जप लो। इसमें कहीं कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला। इसका कारण है कि अन्ततः वह एकरूप और एकगुण वाला हो जाता है यानी हर प्रकार की पूजा पद्धति में सबको एक ही रूप में दिखाई देता है।
          दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जब ईश्वर की भक्ति चरम पर होती है, तो वह निर्गुण और सगुण भक्ति करने वाले सभी भक्तों को प्रकाश के रूप में दिखाई देता है। उस समय उसका कोई रूप नहीं रह जाता। वह बस निराकार या प्रकाश रूप में ही अपने भक्तों को दर्शन देता है। कोई भी साधक उसके इस दिव्य रूप का वर्णन अपनी इस जिह्वा से करने में समर्थ नहीं हो सकता। 
         ईश्वर के इस अद्भुत स्वरूप को कोई भी व्यक्ति इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकता। उसे केवल अन्तर्चक्षुओं से देख सकते हैं। परमात्मा के स्वरूप की व्याख्या 'नेति नेति' कहकर शास्त्रों में की गई है। यानी ईश्वर यह भी नहीं है और यह भी नहीं है। साधक की जिह्वा ईश्वर के देखे गए उस स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकती। वह किसी को बताने में समर्थ नहीं होता कि वह ईश्वर कैसा दिखाई देता है। 
         साधक या भक्त की स्थिति ठीक गूँगे व्यक्ति की तरह होती है। जैसे गूँगा मनुष्य गुड़ खाता है और उसकी मिठास में खो जाता है। परन्तु वह व्यक्ति उस गुड़ का स्वाद अपनी जिह्वा से किसी को भी नहीं बता सकता। उसी प्रकार ईश्वर के उस दिव्य रूप को देखने वाले की स्थिति हो जाती है। उसकी वाणी मानो मूक हो जाती है। यह चमत्कार परमेश्वर के उस प्रकाश के प्रत्यक्ष दर्शन के कारण होता है, उसके फलस्वरूप साधक की यह दशा हो जाती है।
           इस चर्चा के सार रूप में इतना ही कह सकते हैं कि जिस प्रकार नदियाँ चारों ओर से आकर समुद्र में एकाकार हो जाती हैं। उनकी पहचान खो जाती है। उसी ही प्रकार ये विभिन्न धर्म मानो अलग-अलग रास्तों से आकर उस एक परमेश्वर में मिल जाते हैं। उनमें भेद कर पाना सम्भव नहीं हो पाता। यही परम तत्त्व है, यही सार तत्त्व है। इसे समझने के उपरान्त सभी भेद समाप्त हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

कौन-सा गुरु दण्डनीय

 कौन-सा गुरु दण्डनीय

गुरु बनाने से पहले उसकी सघन परीक्षा कर लेनी चाहिए। मनुष्य जब बाजार में एक मिट्टी का मटका भी खरीदने जाता है, तो अच्छी तरह ठोक बजाकर देख लेता है। जब पूरी तसल्ली कर लेता है, तभी उस मटके को खरीदता है।  फिर गुरु तो मनुष्य के जीवन भर का साथी होता है। यदि मनुष्य को ज्ञानी, तत्त्वदर्शी, धीर-गम्भीर, संयमी, व्रतधारी, शान्त प्रकृति का गुरु मिल जाए, तो उसका सौभाग्य होता है। 
           अज्ञानी, लोलुप, क्रोधी गुरु के मिल जाने पर मनुष्य के जीवन का कोई भला नहीं होने वाला। गुरु की चिकनी चुपड़ी बातों के झाँसे में नहीं आना चाहिए। ऐसे गुरु कभी मनुष्य के पथप्रदर्शक नहीं बनते। उनकी संगति में रहकर अच्छा-भला इन्सान भी स्वयं भ्रष्ट हो जाता है। निकृष्ट कार्य करने वाले व्यक्ति को यदि गुरु मान लिया जाए, तो मनुष्य का पतन निश्चित होता है। ऐसा गुरु एक अच्छे इन्सान को कुमार्गगामी बना देता है।
          'वाल्मिकीरामायणम्' में महर्षि वाल्मीकि ने कहा है-
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत:।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम्।।
अर्थात् यदि आत्माभिमान से उत्फुल्ल कोई गुरु किए जाने योग्य और न किए जाने योग्य कार्य में भेद कर पाने मे अक्षम है और अनुचित मार्ग का अनुगामी हो जाता है तो उसको दण्डित करना न्यायपूर्ण होता है।
          यह श्लोक बता रहा है कि यदि कोई गुरु कहा जाने वाला व्यक्ति करणीय और अकरणीय का अन्तर करने में असमर्थ होता है, तो वह दण्डनीय है। वह गुरु ही क्या जो उचित और अनुचित का भेद न कर सके? आज के तथाकथित गुरु इसी श्रेणी में आते हैं। इसीलिए वे न्याय-व्यवस्था के दोषी बनकर वर्षों से कारावास की सजा भुगत रहै हैं। जब वे अपराध करते थे, उस समय उन्हें अपने गुरुत्व का बिल्कुल ध्यान नहीं रहता था।
             ऐसे गुरु जिनके पवित्र कहे जाने वाले आश्रमों में अत्याचार, अनाचार, हत्या आदि जैसे दुष्कर्म होते हैं, उस स्थान पर जाना किसी भी मनुष्य के लिए शास्त्र सम्मत नहीं होता। ऐसे स्थानों से जितनी दूरी बनाकर रखी जाए उतना ही अच्छा है। न ये लोग गुरु कहलाने के योग्य होते हैं और न ही इनके आश्रम पवित्र स्थान होते हैं। ये तो कोरे व्यवसायी एवं ठग होते हैं। जो गुरु स्वयं दुर्व्यसनों में आकण्ठ डूबे हुए होते हैं, वे अपने शिष्यों को क्या धर्म का मार्ग दिखा सकते हैं? इन गुरुओं से किनारा करने के लिए मनीषी कहते हैं। 
         वास्तव में गुरु वह होता है, जो अपने शिष्य के अन्तस् में विद्यमान अँधकार को दूर करके उसे प्रकाशित करता है। उसकी आध्यात्मिक भूख को शान्त करने का यथासम्भव करता है। उसके हर प्रश्न का उत्तर बहुत धैर्यपूर्वक व सहजता से देता है। उसकी कथनी और करनी एक होती है। तभी उसकी कही गई बात का मूल्य होता और उसकी बताई गई हर बात का सामने वाले पर प्रभाव पड़ता है। 
           परन्तु जिन तथाकथित गुरुओं की कथनी और करनी में अन्तर होता है, उनकी कही किसी भी बात का प्रभाव सामने वाले पर नहीं पड़ता। ये लोग स्वयं भ्रष्ट होते हैं, इसलिए ये सदा अवसर की तलाश में रहते हैं। इनके दिए गए भाषण का भी कोई असर नहीं होता। इन लोगों की संगति में रहने वाले मनुष्यों के विचार भी दूषित होने लगते हैं। वे आध्यात्मिक उन्नति तो नहीं कर सकते, पर उनका भौतिक पतन अवश्य होने लगता है।
           इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि जो गुरु शिष्य की कसौटी पर खरा न उतरे, उसका परित्याग कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति गुरु के नाम पर कलंक हो, उस तथाकथित पाखण्डी गुरु के चंगुल से शीघ्र ही बच निकलने का प्रयास करना चाहिए। समाज के इन शत्रुओं को देश, धर्म और समाज का दोषी मानते हुए उन्हें न्याय-व्यवस्था के हवाले कर देना चाहिए। वही इनके अपराध के अनुसार सजा देकर उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 31 अगस्त 2020

पिता-पुत्र का सम्बन्ध

  पिता-पुत्र का सम्बन्ध

पिता और पुत्र का रिश्ता इस संसार में बहुत गहन होता है। पिता अपने संस्कारों की थाती अपने पुत्र को सौंपता है। पुत्र उन्हें आत्मसात कर लेता है। पुत्र की हर इच्छा को पूरा करना पिता का दायित्व होता है। वह अपने मुँह का निवाला निकालकर पुत्र को देने में नहीं हिचकिचाता। हर पिता अपने पुत्र के लिए हीरो होता है, जो चुटकी बजाते ही उसकी सारी समस्याओं को हल कर देता है।
             यदि माता दैहिक साँसारिक यात्रा के आविर्भाव पर प्राण को चेतना प्रदान करती है, तो उस जड़ स्वरूप को पोषित करने वाला पिता होता है। पिता की अँगुली पकड़कर पुत्र स्वयं को सबसे भाग्यशाली इन्सान समझता है। वह अपने पिता के कन्धों पर चढ़कर स्वयं का कद बड़ा कर लेता है। उसके सारे सपनों को पूरा करने वाला, उसका पिता ही होता है।
           हर पिता अपने बेटे को गाली देता है, डाँटता है और मारता भी है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह उससे प्यार नहीं करता। बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए यह सब करना आवश्यक हो जाता है। बेटे ने कुछ माँग रखी तो आवश्यक नहीं कि उसे पूरा कर दिया जाए। बच्चे को न सुनने की आदत भी होनी चाहिए। बच्चे को यह पता होना चाहिए कि पिता वही वस्तु खरीदकर देंगे, जिसकी उसे आवश्यकता होगी। अनावश्यक वस्तु उसे नहीं मिलेगी।
            आचार्य चाणक्य अपनी पुस्तक 'चाणक्यनीति:' में कहते हैं-
लालयेत्पञ्च वर्षाणि दस वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्।।
अर्थात् पाँच वर्ष तक पुत्र को लाड-प्यार करना चाहिए। दस वर्ष तक ताडना-वर्जना करनी चाहिए और जब पुत्र सोलह वर्ष की अवस्था में पहुँच जाए, तब उसके साथ मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए।
          चाणक्य के अनुसार पाँच वर्ष की बाल्यावस्था तक बेटे के साथ लाड़ लड़ाने चाहिए। उसके बाद दस वर्ष की अवस्था तक उसे अनुशासित करने के लिए, उसके साथ कठोरता का व्यवहार करना चाहिए। परन्तु जब पुत्र सोलह वर्ष का युवक हो जाए, यानी पिता का जूता पुत्र के पैरों में पूरा आने लगे, तब उसके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए। उसके पश्चात उसे अपना मित्र ही मानना चाहिए। तब उससे विचार-विमर्श करना चाहिए।
           हर पिता चाहता है कि उसका पुत्र उससे अधिक योग्य बने। उससे अधिक तरक्की करे। वह पुत्र के बड़े होकर योग्य बनने का स्वप्न देखता है। जब उसका पुत्र पढ़-लिखकर, अच्छी नौकरी प्राप्त कर लेता है, तो वह स्वयं को संसार का सबसे भाग्यशाली इन्सान समझता है। यदि वह व्यवसाय करता है, तो पुत्र को व्यापार में रुचि लेते देख और उसे बढ़ाते देखकर वह हर्षित होता है।
           पिता जब आयुप्राप्त होने लगता है, तब वह चाहता है कि उसका पुत्र अब सारी जिम्मेदारियाँ सम्हाले। उसके पास अपनी जो भी धन-सम्पत्ति होती है, उसे धीरे-धीरे अपने पुत्र को सौंपकर वह निश्चिन्त हो जाता है। पिता सदा अपने पुत्र को सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते देखना चाहता है। वह चाहता है कि उसके जीते जी उसका पुत्र और और उन्नति करता जाए। इसके लिए वह स्वयं भी प्रयास करता है।
          ऐसे पिता के ऋण से मनुष्य कभी उऋण नहीं हो सकता, जो उसे इस धरती पर लेकर आया है। उसी पिता से ही पुत्र का अस्तित्व होता है। इसीलिए पिता को देवता कहा जाता है। पुत्र का दायित्व बनता है कि ऐसे देवता की पूजा करे। यानी उसके मुँह से निकलने से पहले उसकी जरूरतों को समझकर पूरा करे, जैसे पिता उसके बचपन में किया करता था। इसमें बदले की भावना जैसी कोई बात नहीं है, अपितु यह बेटे का फर्ज है।
             जो बेटा अपना कर्त्तव्य मानकर अपने पिता की सेवा प्रसन्नता से करता है, उसकी सराहना सभी लोग करते हैं। ऐसे बेटे को लोग श्रवण पुत्र कहते हैं। उसका यश चहुँ दिशि प्रसारित होता है। उसका इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं। जैसे बेटे को अपने पिता पर कभी मान होता था, वैसे ही अब पिता उस पर मान कर सके, ऐसा ही एक पुत्र का व्यवहार होना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 30 अगस्त 2020

पिता-पुत्री का प्यार

 पिता-पुत्री का प्यार

पुत्री या बेटी अपने पिता की बहुत लाडली होती है। पापा और बेटी का रिश्ता दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता होता है। हर पापा के लिए बेटी उसकी जिन्दगी होती है। हर बेटी के लिए उसका पापा उसके लिए दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और मान होता है। जब तक उसके पापा जीवित रहते हैं, तब तक सब कुछ उसका अपना होता है। बेटी अपने पाप के दम पर ही अपनी हर जिद को पूरा करती है।
             छोटी बेटी जब तुतलाकर बोलती है, तो घर के सभी सदस्यों के साथ उसका पिता भी बहुत हर्षित होता है। जब वह अपने छोटे-छोटे हाथों से पिता के काम करती है, तब वह बेटी पर बलिहारी जाता है। उस समय उसे गर्व होता है, अपनी नन्ही-सी बेटी पर। बेटी जब फुर्सत के पलों में अपने पापा के साथ खेलती है, रूठती है, मानती है, तो तब मानो पिता को स्वर्गिक आनन्द मिल जाता है।
            बेटी को घर का कोई सदस्य यदि कुछ कहता है, तो वह अपने पिता पर गर्व करते हुए एकदम कह उठती है, शाम को पापा को ऑफिस से वापिस घर आने दो फिर बताती हूँ। बेटी अपने घर में माँ की ममता के आँचल की छाया में रहती है, पर उसकी शक्ति पापा के बलबूते पर ही होती है। वह अपने पापा की बस लाडली रानी बिटिया होती है और पाप भी हर समय उसकी ढाल बनकर खड़े रहते हैं।
          बेटी को पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाने का स्वप्न हर पिता देखता है। इस दायित्व को पिता बहुत प्रसन्नता से वहन करता है। वह अपनी बेटी की हर इच्छा को पूर्ण करने का भरसक प्रयास करता है। वह स्वयं अभावों में जी लेता है, पर अपनी बेटी के सपनों को पूरा करने में जी-जान लगा देता है। अपनी बेटी की हर छोटी-बड़ी सफलता को देखकर पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। 
           पिता अपनी बेटी की आँखों में कभी आँसू नहीं देख सकता। उसके उदास होने पर पिता परेशान हो जाता है। अपनी बेटी के आँखों में आँसू देखकर पिता स्वयं अन्दर से बिखर जाता है। उसके चहकने पर पिता खिल उठता है। पिता और पुत्री का प्यार ही कुछ इस प्रकार का होता है कि किसी को भी ईर्ष्या होने लग जाए। बेटी सारी आयु अपने माता और पिता की चिन्ता से मुक्त नहीं हो पाती। चाहे वह पास रहती हो अथवा दूर, उनके बारे में ही सोचगी रहती है।
            वह पिता स्वयं को इस दुनिया का सबसे अधिक भाग्यशाली इन्सान समझता है, जिसकी बेटी बड़ी होकर अपने पिता की आशानुरूप अच्छी नौकरी प्राप्त कर लेती है और अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है। उसे ऑफिस जाते देख पिता अपने खुशी के आँसुओं को अपनी आँखों से बाहर नहीं आने देता। बेटी भी इस खुशी को भली भाँति समझती है। बेटी जब अपनी पहली तनख्वाह पिता के हाथ में रखती है, तो उसकी खुशी का पारावार नहीं रहता।
           हमारी भारतीय संस्कृति में बेटी का कन्यादान करना यानी विवाह करना बहुत सौभाग्य माना जाता है। पिता यथाशक्ति अपनी बेटी का विवाह करता है। वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। बेटी की विदाई का पल सबसे कठिन समय होता है। वह बेटी के बचपन से विदाई तक के सभी पलों को याद करके रोता है और बेटी की पीठ थापथपाकर हिम्मत देता है कि बेटा चार दिन बाद तुम्हें लेने आ जाऊँगा। 
          जब तक पिता जीवित रहता है बेटी बड़े हक से मायके में आती है। अपने पापा के दम पर घर में आकर जिद भी कर लेती है। पिता की मृत्यु के पश्चात बेटी हिम्मत हार जाती है। उसका मान-मनौव्वल करने वाला पिता उस घर में नहीं रहता। पिता के रहते जो अधिकार वह मायके घर पर समझती है, वह भाई के होते हुए नहीं रह जाता। चाहे भाई कितना भी अच्छा हो, पर उसे हक से वह कुछ नहीं कह पाती।
           बेटी जिस घर में होती है, वह घर सदा महकता रहता है। उसकी पायल की रुनझुन से वहाँ जीवन्तता रहती है। उसके होने से घर में एक प्रकार का अनुशासन रहता है। पिता-पुत्री का यह रिश्ता किसी अनजानी गहरी डोर से बँधा हुआ होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आयुपर्यन्त पिता अपनी बेटी के विषय में और बेटी अपने पिता के विषय में चिन्तित रहते हैं। दोनों के प्राण एक-दूसरे में बसते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 29 अगस्त 2020

असहायों की सेवा

असहायों की सेवा

किसी दिन-दुखी का सहायक बनना बहुत ही पुण्य का कार्य होता है। स्वार्थवश तो लोग एक-दूर से जुड़ते हैं, परन्तु बिना किसी स्वार्थ के रोगियों, असहायों और अनाथों की सहायता करना, वास्तव में एक महान कार्य कहलाता है। यदि समाज के इस वञ्चित वर्ग को ठुकरा दिया जाएगा, तो फिर कौन इनकी सुध लेगा? कौन इनका सहारा बनेगा? ये प्रश्न मन को मथने के लिए पर्याप्त हैं।
            निम्न श्लोक में महर्षि वेद व्यास महाभारत में कहते हैं-   
एकत: क्रतव: सर्वे सहस्त्रवरदक्षिणा।
अन्यतो रोगभीतानां प्रााणिनां प्रााणरक्षणम्।
अर्थात् यानी एक ओर विधिपूर्वक सब को अच्‍छी दक्षिणा दे करके किया गया यज्ञ कर्म और दूसरी तरफ दुखी और रोग से पीडि़त मनुष्‍य की सेवा करना, ये दोनों कर्म उतने ही पुण्‍यप्रद हैं। 
           महाभारत के इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि यज्ञ करना और दुखियारों की सेवा करना, दोनों की पवित्रता एक बराबर है। ये हमारे शास्‍त्रों ने हमें सिखाया है। किसी रोगी की सेवा करना, जरूरतमन्द की सहायता करना अथवा किसी के प्राण संकट में हों, उसकी मदद करना इत्यादि कार्य करने वाले को उतना ही पुण्य मिलता है, यज्ञ करने से मिलता है। ऐसे कार्य पुण्यकार्य कहलाते हैं।
          इतना सब समझाने पर भी लोग असहायों की सहायता करने से कतराते हैं। प्रायः लोग सोचते हैं कि यह उनका दायित्व नहीं है। पर वे भूल जाते हैं कि बूँद-बूँद से घट भर जाता है। थोड़ा-थोड़ा सहयोग सभी लोग करें तो बहुत कुछ हो सकता है। कई लोगों की जिन्दगी सँवर सकती है। वे योग्य बनकर समाज की मुख्य धारा में सम्मिलित हो सकते हैं। ऐसे वे समाज के योगदान को कभी नहीं भूलेंगे।
          दीनबन्धु एण्ड्रूज सच्चे अर्थों में गरीब, दुखी और बेसहारा तथा दुर्दशाग्रस्त लोगों के सच्चे मित्र थे। इसीलिए लोग उन्हें दीनबन्धु कहकर पुकारते थे। वे महात्मा गांधी के सहायक भी थे। असहाय भारतीयों के लिए त्याग करने वाले इस विदेशी महान आत्मा को भारत श्रद्धा से नमन करता है । उनके असहाय भारतीयों के लिए किये गए कार्य सचमुच ही महान थे। इनके अतिरिक्त मदर टेरेसा का नाम भी लोग बहुत श्रद्धा से लेते हैं। उन्होंने अनेक अनाथों, दुखियों और असहायों की निस्स्वार्थ सेवा की।
          कई सामाजिक संस्थाएँ इन लोगों की सहायता करती हैं। कुछ गिने चुने लोग भी इस शुभ कार्य हेतु प्रयासरत हैं। परन्तु उनकी गिनती अभी कम है। इन लोगों के लिए अभी बहुत कुछ करना शेष है। इनके उत्थान के लिए सरकारी योजनाएँ तो कई हैं। पर केवल सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं रह जा सकता। सरकार के पास बहुत कार्य करने के लिए होते हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं को आगे आकर इनके लिए कुछ करना होगा।
           मनुष्य का दुर्भाग्य होता है कि उसे दिन-हीन अवस्था में रहना पड़ता है। उसके पूर्वजन्म कृत कर्म उसकी इस हालत के लिए जिम्मेदार होते हैं। उनका प्रारब्ध उनका साथ नहीं देता। उन्होंने जैसा किया है, उसका फल ये भोग रहे हैं कहकर हम अपने दायित्व से बच नहीं सकते। उन्होंने तो जो किया, वे उसे भोग रहे हैं परन्तु यदि उनकी इस अवस्था में उनके लिए कुछ भी कर सको, तो हर मनुष्य को योगदान करना चाहिए।
          ईश्वर का एक नाम दीनबन्धु भी है। वह दीनों की हर सम्भव सहायता करता है। उसके बनाए इन जीवों पर जो दया दिखाता है, ईश्वर उनसे प्रसन्न रहता है। वह चाहता है उसके बनाए किसी भी मनुष्य से लोग घृणा न करें बल्कि सहृदयता से पेश आएँ। जैसे वह सबको समान दृष्टि से देखता है, वैसा ही सब अनुसरण करें। इसीलिए वेद व्यास जी ने कहा है कि भरपूर दक्षिणा देकर पूर्ण हुए यज्ञ का जो फल होता है, वही असहायों की सेवा का पुण्य होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

नारी का सम्मान

 नारी का सम्मान

स्त्रियाँ समाज का एक विशिष्ट अंग हैं। वे घर-परिवार की धुरी हैं। उनका सम्मान हर स्थिति में होना चाहिए। किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह उनका तिरस्कार करे अथवा उन्हें अपशब्द कहे। स्त्री और पुरुष गृहस्थी रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। उनमें से एक भी यदि बिगड़ जाए, तो गाड़ी ठीक तरह से नहीं चल सकती। इसलिए उन दोनों का समान रूप से चलायमान होना बहुत ही आवश्यक होता है।
           दुर्भाग्यवश मध्यकाल में नारी को पीछे छोड़कर पुरुषवर्ग ने अपना आधिपत्य जमा लिया। वह वर्ग अपने अहं के कारण स्त्री को दोयम दर्जे का समझने लगा। उस समय समाज पुरुष प्रधान समाज बन गया। स्त्री पर मनमाने अत्याचार होने लगे और उसे रूढ़ियों में जकड़ दिया गया। तब यह स्थिति बहुत ही कष्टकारी बन गई थी। समय बीतते कई समाज सुधारकों ने स्त्री के जीवन स्तर को ऊपर उठाने का प्रयास भी किया। अपने इस कार्य में वे काफी हद तक सफल हुए।
          यहाँ 'मनुस्मृति:' के दो श्लोकों को उदधृत करना चाहती हूँ। इन दोनों श्लोकों में भगवान मनु ने स्त्रियों के सम्मान के विषय कहा है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवत:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।
अर्थात् जिस घर में नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ इनका आदर नही होता, वहाँ पर सभी प्रयोजन निष्फल हो जाते हैं।
                     तथा
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्  न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।
अर्थात् जिस कुल में स्त्रियाँ शोक-संतप्त रहती हैं, उस कुल का शीघ्र ही विनाश हो जाता है या उसकी अवनति होने लगती है । जहाँ स्त्रियां प्रसन्नचित्त रहती हैं, वह कुल प्रगति करता है।
            यह बात हमारी भारतीय संस्कृति में आदिकाल में ही मनु महाराज ने कही थी कि जिस कुल में स्त्रियाँ पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। जिस घर वा कुल में स्त्रियाँ शोकातुर होकर दुःख प्राप्त करती हैं, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है, वहाँ सारे कार्य असफल हो जाते हैं। जिस घर या कुल में स्त्रियाँ आनन्द, उत्साह और प्रसन्नता में भरी हुई रहती हैं, वह कुल सर्वदा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है।
          स्त्रियों का घर में प्रसन्नचित रहना बहुत आवश्यक है। ये खुश रहती हैं, तो घर में प्रसन्नता का वातावरण रहता है। वहाँ मानो स्वर्ग जैसा माहौल रहता है। वह घर सदा चहकता रहता है। वहाँ रहने वाले सदस्यों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। वे अपने कार्यों को ठीक से कर पाते हैं। घर में आने वाले मेहमान भी प्रफुल्लित होकर वहाँ से जाते हैं। घर में यदि कोई अभाव भी हो, तो वह नगण्य हो जाता है।
         जिस घर में स्त्रियाँ उदास या मुरझाई हुई रहती हैं, उस घर में मुर्दनी छाई रहती है। वह घर नरक के समान बन जाता है। उस घर में अजीब-सा वातावरण रहता है। ऐसा घर काटने को दौड़ता है। वहाँ किसी भी सदस्य को ऊर्जा नहीं मिलती, बल्कि वहाँ सदैव नकारात्मक ऊर्जा का वास रहता है। उस घर में आने वाले भी प्रसन्न होकर वहाँ से नहीं जाते। सब कुछ होते हुए भी मानो, कुछ नहीं होता।
            आज स्त्रियों को घर और बाहर दोनों मोर्चों को सम्हालना होता है। वे खिली रहती हैं, तो वे दोनों मोर्चों पर सफल हो जाती है। अन्यथा हर स्थान पर निराश और परेशान रहती हैं। उनके व्यवहार का घर और बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। उनकी खुशी उनके घर को महकाती है और उनकी उदासी उनके घर को बर्बाद कर देती है। इन दोनों का अन्तर घर में प्रवेश करने वालों को सहज ही हो जाता है।
           आज दुनिया के लोगों को स्त्रियों का महत्त्व समझ आ रहा है। स्त्री और पुरुष की समानता के लिए नियम और कानून बनाए जाने लगे हैं। इसके अनुसार स्त्री और पुरुष दोनों ही एकसमान हैं। उनमें भेदभाव करना अथवा असमानता का व्यवहार करना कानूनन अपराध है। यहाँ स्त्रियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया है। इस कानून का पालन न करने वालों के लिए यहाँ पर सजा का प्रावधान भी रखा गया है।
           अपने आप में यह विधान स्त्रियों के लिए बहुत अच्छा है। मेरे विचार से इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़नी चाहिए। घर, परिवार, समाज के सभी लोगों को मिलकर इस ओर ध्यान देना चाहिए। स्त्रियों पर अत्याचार न हों, उन्हें समाज में यथोचित मान-सम्मान मिलना चाहिए, जिसकी वे अधिकारिणी हैं। स्वस्थ समाज में नारी को उसकी गरिमा बनाए रखनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद