सोमवार, 28 अप्रैल 2025

अपने व्यवहार से शत्रु और मित्र

अपने व्यवहार से शत्रु और मित्र

इस संसार में जब मनुष्य का जन्म होता है तब उसे अपने रिश्ते ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिलते हैं। ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता है, वह अपने मित्र बनाने लगता है। आयु के साथ-साथ उसे मित्र बनाने की समझ आने लगती है और वह अपने मित्रों का चुनाव करने लगता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि रिश्तों को चुनने की स्वतन्त्रता उसे नहीं मिलती। वह केवल अपने मित्रों का चुनाव कर सकता है। उन लोगों के साथ उसका जैसा व्यवहार होता है, उसी के अनुरूप वे रिश्ते प्रगाढ़ होते रहते हैं यानी बनते या बिगड़ते हैं। 
          आज के समय में मनुष्य यद्यपि अपनी लाभ-हानि को देखते हुए सम्बन्ध बनाने का प्रयास करता है। जिन बन्धु-बान्धवों से उसे अपना स्वार्थ सिद्ध होता दिखाई देता है, उनसे वह अपनी समीपता बढ़ाने लगता है। दूसरी ओर जहॉं उसे उनसे कुछ पाने की आशा नहीं होती, उनसे वह किनारा करने लगता है। आधुनिक समाज में व्यक्ति के स्वार्थ रिश्तों पर भारी पढ़ने लगे हैं। बड़े दुख की बात है कि उसी के अनुसार वह उनको परखना चाहता है।
            वैसे देखा जाए तो इस संसार में जब ईश्वर मनुष्य को बच्चे के रूप में भेजता है तो वह एक कोरी स्लेट की तरह होता है। वह बहुत ही सरल हृदय होता है। उस मासूम बच्चे को लोग भगवान का रूप कहते हैं क्योंकि वह दुनिया के छल-कपट, प्रपंच से दूर होता है। जैसे जैसे वह बड़ा होता है उसे इस दुनिया की हवा लगने लगती है तो वह हर प्रकार के छल-फरेब सीखने लगता है। उसका भोलापन जाने कहॉं तिरोहित हो जाता है। उसे दुनियादारी की समझ अच्छे से आने लगती है।
           इस दुनिया में रहकर मनुष्य कुछ लोगों को अपना मित्र बना लेता है। इसके विपरीत अपने छल छद्म से वह कुछ लोगों को अपना शत्रु बना लेता है। यह सब उसके अपने व्यवहार का ही परिणाम होता है। इसी विचार को 'चाणक्यनीति:' में आचार्य चाणक्य ने हमें समझाया है- 
        न क कस्यचित् शत्रु: न क कस्यचित् मित्रम्।
          व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा।।
अर्थात् कोई किसी का मित्र नहीं होता  है और न ही कोई किसी का शत्रु होता है। हम अपने व्यवहार से ही शत्रु और मित्र बनाते हैं।
           मित्र बनाना और मित्रता करना बहुत सरल है परन्तु उसे निभाना बहुत कठिन होता है। जब तक हम निःस्वार्थ भाव से मित्रता निभाते हैं तो हमारे सम्बन्ध लम्बे समय तक बने रहते हैं। हमारे स्वार्थ जब टकराने लगते हैं तब वह मित्रता नहीं रह जाती बल्कि व्यापार बन जाती है। यदि हमारे श्मशान जाने तक हमारा साथ निभाती है तो वास्तव में वही मित्रता कहलाती है। सही मायने में हम तभी सच्चे मित्र होते हैं। मित्रता की परिभाषा और सच्ची पहचान ही यही है।
         शत्रु बनाना सबसे आसान कार्य होता है। हम अपनी स्वयं की गलतियों से लोगों को अपना शत्रु बना बैठते हैं। हमारा अहं, हमारा अविवेक, हमारा जनून ही हमारे सिर पर चढ़कर नाचने लगते हैं, उस समय हमें लगता है कि हमें दुनिया में किसी की भी आवश्यकता नहीं है। हमारे यही विचार हमारे दुश्मन बन जाते हैं और बन्धु-बान्धवों को हमारा शत्रु बनाने का काम बखूबी निभाते हैं। इस प्रकार का व्यवहार करके जाने-अनजाने हम अपने शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करते जाते हैं।
          राजनीति में तो शत्रु व मित्र की पहचान करना बहुत कठिन है। पता ही नहीं चलता कि कौन मित्र हैं और कौन शत्रु। इसका एक ही कारण है सत्तालोलुपता। सत्ता को पाने के लिए किसी भी बाप बनाया जा सकता है और किसी से भी विलग हुआ जा सकता है। ऐसी स्थिति बनने अथवा होने पर इस प्रकार से दुश्मनी का प्रदर्शन किया जाता है मानो वहाँ कुत्ते और बिल्ली का वैर है। यानी वे कभी मित्र रहे ही नहीं थे। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति के क्षेत्र में कौन शत्रु है और कौन मित्र कहना कठिन-सा होता है। वहॉं शत्रु और मित्र की परिभाषा कब बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। इस तरह वहॉं पर बनने वाले सम्बन्ध कभी स्थाई नहीं होते।
           इस चर्चा का सार यही है कि हर मनुष्य को सोच-समझ कर शत्रु व मित्रों का चुनाव करना चाहिए। इससे धोखा खाने से बचा जा सकता है। अपना जीवन सुख और शान्ति से व्यतीत किया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 26 अप्रैल 2025

अशरीरी मन का महत्व

अशरीरी मन का महत्व 

हमारे शरीर में जो मन विद्यमान है, वह अशरीरी है। मन को अशरीरी इसलिए कहते हैं क्योंकि इसका कोई आकार नहीं होता, कोई रूप नहीं होता है। अतः कोई इसे देख नहीं सकता है। फिर भी हम इसके महत्त्व को नकार नहीं सकते। हिरण की नाभि में छुपी कस्तूरी के समान यह सबके शरीर में रहता है। अशरीरी होते हुए भी यह हमारे जीवन में विशेष रोल अदा करता है। यह हमारे मानव जीवन को अपनी इच्छानुसार चलाता है। इसके अपने कुछ नियम भी हैं, जिनको समझना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। 
          हमारा मन हर उस वस्तु को पाना चाहता है, जो हमारे पास नहीं होती है। जब तक उसे प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह उसके लिए व्याकुल रहता है। उसकी व्यग्रता से प्रतीक्षा करता है। उसके यथासम्भव मेहनत करता है। परन्तु जब उस वस्तु को प्राप्त कर लेता है, तब उसके प्रति विरक्त होने लगता है यानी उसे मन भूलने लगता है। तब वह वस्तु उसे मामूली-सी लगने लगती है। जो वस्तु उसे सरलता से, बिना परेशानी के प्राप्त जाती है, वह उसकी कद्र नहीं करता। 
           यहॉं हम एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। एक छोटा बच्चा नया खिलौना लेने के लिए जिद करता है, रोता है, चीखता-चिल्लाता है, परन्तु जब उसके माता-पिता उसे वह ले देते हैं, तब वह खुश होता है। उससे कुछ दिन खेलता है, फिर उसे भूल जाता है कि वैसा कोई खिलौना कभी उसके पास था। फिर भी यदि कोई दूसरा बच्चा उस खिलौने से खेलने लगे, तो उससे झपटकर छीन लेता है। उस समय उस खिलौने के लिए उसमें अपनेपन का भाव आ जाता है, जो कुछ समय पूर्व तक कहीं दिखाई नहीं देता था।
           बच्चे का उदाहरण देने का तात्पर्य यह है कि मानव मन सदा ही बच्चा बना रहना चाहता है। वह बच्चे की भाँति सरल, दयालु, छल-कपट से रहित रह सकता है, पर सदा के लिए नहीं। इसे समय आने पर गिरगिट की तरह रंग बदलने में भी महारत हासिल है। यह सरलता से अपने सभी रंग दिखा देता है। इसलिए इससे बचकर चलने की बहुत ही आवश्यकता होती है। यद्यपि यह बहुत कठिन कार्य है, परन्तु यदि ध्यान दिया जाए, तो ऐसे लोगों को पहचानना कठिन नहीं है। 
           यही स्थिति मनुष्य के मन की भी होती है। मनचाही वस्तु को पाकर वह उसे बेशक भूल जाता है, पर दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब हमारा अपना हमसे दूर होता है, उसके लिए वह बेचैन होता है, रोता है। जो हमारे पास होता है, उसकी वह उपेक्षा करता है। यह मन सदा भविष्य के बारे में सोचता है, वर्तमान की वह चिन्ता नहीं करता। भूतकाल उसे बहुत प्रिय होता है, तभी उन गलियों में भ्रमण करता रहता है।
         जहाँ मनुष्य पहुँच जाता है, मन वहाँ से हटकर कहीं दूर चला जाता है। यह मन आगे-आगे दौड़ता है और हम उसके पीछे भागते रहते हैं। वह कभी कहीं जाता है और कभी कहीं। जहाँ हम जाना चाहते हैं, वह धत्ता दिखाकर अन्यत्र चला जाता है। हम उसे पकड़ने का यत्न करते हैं, तो वह मुँह चिढ़ाकर भागने लगता है। हम घर में होते हैं, तो वह देश-विदेश की सैर करने चला जाता है। जब हम बाहर होते हैं, तब इसे घर की याद सताने लग जाती है। फिर यह बिसूरने लगता है।
            मन मानो धरती को छूता हुआ क्षितिज है। वह कहीं है नहीं, बस अपने होने का अहसास करवाता रहता है। यदि हम आगे बढ़ते हैं, तो वह हमसे भी कहीं आगे बढ़ जाता है। मन का यह खेल बड़ा विचित्र है। इसे समझना वास्तव में असम्भव है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि यह मन हमारे पास रहकर भी हमारी पहुॅंच से बहुत दूर है। मानो वह कोई दूर की कौड़ी है। कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि जैसे इस मन से हमारा तो कुछ भी लेना-देना नहीं है। कभी-कभी यह बड़ा पराया-सा लगने लगता है।
          मन सदा ऊँचे-ऊँचे स्वप्न देखता रहता है। इसका सारा खेल अभाव के साथ सम्बन्ध बनाने का होता है। यदि मनुष्य के पास एक लाख रुपए हों तो मन उन्हें अनदेखा करके दस लाख रुपयों की जमा-घटा करने लगाता रहता है, जो हमारे पास नहीं हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मन वहाँ भागता है, जहाँ हमारी पहुँच नहीं होती। मन कभी प्रसन्न होने वाला नहीं है। वह बस और और के चक्कर में रहता है। इस मन का सूत्र पकड़ने में हम असमर्थ रह जाते हैं।
          इस मन की माया को आज तक कोई नहीं समझ सका। ऋषि-मुनि भी इसे वश में करने या जीतने के प्रयास में हार जाते हैं। यह हर व्यक्ति को नाच नचाता रहता है। न चाहते हुए भी हम मनुष्य इस दुसाध्य मन की कठपुतली बनकर इसके कहने के अनुसार चलते रहते हैं। अनेक बार ठोकर खाकर भी हम सम्हलते नहीं हैं। बार-बार इसके झॉंसे में आकर परेशान होते हैं। हमें समझ नहीं आता कि मन के कहे अनुसार अथवा उसके पीछे भागने का कोई भी लाभ होता है क्या?
         अपने मन को ध्यान के द्वारा एकाग्र किया जा सकता है। विचारणीय यह है कि इस ध्यान को लगाने के लिए भी तो मन को साधना अनिवार्य हो जाता है। जब ईश्वर का भजन करने बैठो, तब इस दुष्ट मन को सारे जहान की बातें याद आने लगती हैं। यानी उस समय वह यहाँ वहाँ भटकने लगता है। जिन विषयों को हम कभी का ठण्डे बस्ते में डाल चुके होते हैं, वह उन्हें भी खोद-खोदकर बाहर निकाल लाता है। फिर भी इस मन को साधने से ही हमारा कल्याण सम्भव हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

समय के अनुसार बदलना

समय के अनुसार बदलना 

यह सत्य है कि समय हमारे कहने से अथवा हमारे अनुसार नहीं बदलता। प्रकृति का यह नियम है कि मनुष्य को ही समय के साथ कदमताल करते हुए बदलना पड़ता है। ऐसा नहीं हो सकता कि हम कहें तो इसी पल समय हमें आगे भविष्य की ओर ले जाए। यानी भविष्य में हमारे साथ जो भी अच्छा या बुरा घटित होने वाला है, वह हमें सब दिखा दे। और हम चौकन्ने हो जाऍं। अथवा हम कहें तो वह हमें भूतकाल में ले‌ जाए। जहॉं पहुॅंचकर हम अपनी गलतियों या अच्छाइयों को देख सकें। फिर उन पर विचार कर सकें।
          यह मानकर चलिए कि जो आज हमारे पास है, वह कल नहीं रहेगा। बीते हुए कल में जो हमारे पास था, उसे हम आज के समय में कदापि नहीं ला सकते। इसलिए मनुष्य के लिए उचित यही है कि वह अपने समय का सदुपयोग करना सीख ले। उसे व्यर्थ ही गॅंवाने की भूल न करे। अपने जीवन के हर एक पल को बेहतर तरीके से जीना चाहिए। अन्यथा समय बीतने पर पश्चाताप करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचता। अपने परिवारी जनों और अपने बन्धु-बान्धवों को भी समय का उपयोग करने‌ के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए।
           दूसरे लोगों की देखा-देखी मनुष्य को स्वयं को अनावश्यक परेशान नहीं करना चाहिए। क्योंकि मनुष्य जो भी प्राप्त करता है या उपलब्धि पाता है, वह उसके अपने अथक परिश्रम का ही परिणाम होता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ईमानदारी से प्रयास करने के उपरान्त भी सफलता उसके हाथ नहीं लगती। जो भी यत्नपूर्वक न प्राप्त हो, उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। उस पर सन्तोष करना ही मनुष्य के लिए एकमात्र विकल्प बचता है। फिर उसे पुनः दुगने उत्साह से जुटकर अपनी जीत को हाथ बढ़ाकर पा लेना चाहिए।
          यदि मनुष्य इस सत्य को आत्मसात कर लेता है कि इस दुनिया में जो सन्तुष्ट है, वही अपने जीवन में सुखी रह सकता है। यानी जब मनुष्य को सन्तोष रूपी धन मिल जाता है, उस समय वह संसार का सबसे सुखी व्यक्ति बन जाता है। मनुष्य जितना अपने बन्धु-बान्धवों या पड़ोसियों की नकल करने का यत्न करता है, उतना जीवन में दुखों और परेशानियों को न्योता देता है। जितना भी मनुष्य को प्राप्त हो रहा है, उसमें ही उसे जीवन का आनन्द लेना चाहिए। यह सूत्र उसे अनावश्यक तनाव से बचाता है। 
           संसार में हर मनुष्य सोने का चम्मच मुॅंह में लेकर पैदा नहीं होता। करोड़पति या अरबपति भी हर कोई नहीं बन सकता। यह सब मनुष्य के पूर्व कृत कर्मों के कारण ही मिलता है। इसलिए उनकी होड़ करना हर व्यक्ति के बस की बात नहीं होती है। इसलिए कोल्हू का बैल बन जाने पर भी उसके जीवन में बहुत अधिक सुधार नहीं हो पाता। अपने से कमजोर स्थिति वालों की ओर देखकर चलने से ही मनुष्य का भला होता है। वह सोचने के लिए विवश हो जाता है कि वह बहुत लोगों से अच्छा जीवन व्यतीत कर रहा है। 
           मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार जितना भी कम या अधिक कमा पाता है, उसमें ही उसे गुजार बसर करनी आनी चाहिए। इस प्रकार वह बहुत सी मुसीबतें से बच सकता है। उसे अपनी चादर से बाहर पैर नहीं फैलाने चाहिए। दूसरों की होड़ में अपने जीवन को दॉंव पर नहीं लगाना चाहिए। उसे अपने जीवन में  आने वाली धूप-छांव के लिए भी कुछ न कुछ बचत करनी चाहिए। ताकि आवश्यकता पढ़ने पर उसे किसी का मुॅंह न ताकना पड़े और न ही कर्ज लेने की नौबत आए। इससे उसका बजट गड़बड़ा जाता है। 
           मनुष्य का जीवन एक कोरे कागज की भॉंति होता है। इस पर जो भी अच्छा या बुरा लिखना‌ है,  मनुष्य को बहुत ही सोच-समझकर लिखना होता है। एक बार ही मनुष्य जो चाहे उस कागज पर अपनी इच्छा से लिख सकता है। फिर उसे बच्चों की तरह रबर की सहायता से मिटाने की अनुमति नहीं मिलती। उसके द्वारा लिखा हुआ ही उसका भविष्य बन जाता है। समय धीरे-धीरे आगे सरकता जाता है। भागकर अथवा हाथ उठाकर या हाथ आगे बढ़ाकर किसी भी प्रकार से नहीं पकड़ा जा सकता।
          घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए जीवन में भागमभाग बनी रहती है। मनुष्य को केवल पैसा कमाने की मशीन बनकर नहीं रह जाना है। यथासम्भव अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करना चाहिए। सबसे आवश्यक  है कि दिन में एक बार खुलकर हंसना चाहिए। साथ ही अपने परिवार के साथ हर वर्ष एक या दो बार भ्रमण के लिए जाना चाहिए। मित्रों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करना चाहिए। इस प्रकार करने से मन प्रसन्न रहता है। मनुष्य कुछ समय के लिए अपनी समस्याओं से राहत का अनुभव करता है।
            समय प्रवहमान है। उसको तो किसी भी हालत में रोका नहीं जा सकता। जो भी शुभाशुभ कर्म हमने पूर्व में किए हैं, उनको हम बदल नहीं सकते। समय रहते हम अपने कर्मों की शुचिता पर ध्यान दें सकते हैं। हमें आने वाले समय के लिए सावधान हो जाना चाहिए। भूतकाल की अपनी भूलों को सुधारने का अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। उन्हें पुनः न दोहराने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए। जन कल्याण के कार्यों को भी यदा-कदा कर लेना चाहिए। इससे समाज के प्रति हमारे दायित्वों का निर्वहन होता है। 
          अपने समय का सदुपयोग करने के लिए सब ओर से ध्यान हटाकर अपने जीवन को व्यवस्थित करने का प्रयास करना चाहिए। अपने विचारों में परिपक्वता लाने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए अच्छा सोचना चाहिए। अपने स्वास्थ्य को घर के बने पौष्टिक भोजन से पुष्ट करना चाहिए। यथासम्भव अच्छे मित्रों की संगति में रहना चाहिए। योगाभ्यास करना चाहिए। रात को सोते समय पर्याप्त नींद आए, इसके लिए अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। ईश्वर की उपासना करके मन को शान्त करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

वृद्धावस्था का आधार गीता का सार

वृद्धावस्था का आधार गीता का सार

जीवन के संध्याकाल में मनुष्य को इस संसार में जल में कमल की तरह रहना चाहिए। जिस प्रकार जल में रहते हुए भी कमल को जल छू भी नहीं पाता। उसी प्रकार सकारात्मक विचार रखते हुए मनुष्य को भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार मोह-माया से स्वयं को दूर करके ईश्वर की उपासना में मन लगाना चाहिए। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जैसे महाराज जनक राजकाज करते हुए भी दुनिया की मोह-माया से विरक्त थे, तभी उन्हें विदेहराज कहते हैं। उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने सभी दायित्वों को पूर्ण करना चाहिए पर उनमें फॅंसकर नहीं रह जाना चाहिए।
             हर कार्य को परमात्मा को समर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य में कर्त्तापन का भाव नहीं आता। तब अहंकार उसके पास फटकता तक नहीं है। निस्सन्देह वृद्धावस्था का आधार गीता का सार ही है। 'श्रीमद्भगवद् गीता' धर्मज्ञान के साथ साथ मनुष्य को जीवन जीने की कला भी समझाती है। गीता के उपदेशों का अनुसरण करके वृद्धावस्था में मनुष्य न केवल स्वयं का बल्कि समाज का भी भला कर सकता है। 
            महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन शत्रु सेना में अपने बंधु-बांधवों को देखकर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दुख का त्याग करके अपने कर्तव्य के पथ पर अग्रसर होने का उपदेश दिया था।  कहने का अर्थ है कि मनुष्य को केवल कर्म करते रहना चाहिए, शेष सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसे परिणाम की प्राप्ति होती है। इसलिए अपने शेष बचे हुए जीवन में सकारात्मक रहकर अच्छे कर्म करने का यत्न करना चाहिए।
           वृद्धावस्था में मन पर नियन्त्रण रखना बहुत आवश्यक होता है। मन बहुत चंचल होता है और वह सदा यहाँ वहाँ भटकता रहता है। इस अशांत मन को अभ्यास और वैराग्य के नियमित अभ्यास से वश में किया जा सकता है। जब मनुष्य इस मन को साध लेता है तो मन उसके अनुसार चलने लगता है। यानी मनुष्य मन का स्वामी बन जाता है, उसका सेवक नहीं बनता। इससे यह मन अनावश्यक ही उसे अपने इशारों पर नहीं नचा पाता। मन के कहने में न आकर मनुष्य स्वयं ही अपने लिए नियमों को बनाता है।
          वृद्धावस्था में प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य तनाव से मुक्त रहे। यह तनाव मनुष्य के विनाश का कारण बन जाता है। इससे डिप्रेशन में जाने की सम्भावना बनी रहती है। व्यर्थ की चिन्ता और असुरक्षा की भावना से व्यथित नहीं होना चाहिए। वृद्धों में साधारणत: यह भावना दिखाई देती है। इस आयु में अनावश्यक ही पूर्वाग्रह नहीं पालने चाहिए। ऐसा करने से आखिर वह किस पर विश्वास कर सकेगा। इस प्रकार तो जीना ही कठिन हो जाएगा। इसलिए तनाव से मुक्त रहने के लिए धर्म और कर्म का मार्ग अपनाना चाहिए।
            वृद्धावस्था में भी मनुष्य को आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। जहॉं तक सम्भव हो अपने कार्य स्वयं ही करने का उसे अभ्यास बनाना चाहिए।अपना कार्य ईमानदारी से करना चाहिए। इस आयु में आकर भी मनुष्य यदि जोड़-तोड़ में लगा रहता है तो वह अपना सम्मान खो देता है। सारी आयु मनुष्य भागमभाग में व्यस्त रहता है। अब उस आपाधापी वाली जिन्दगी से दूर रहकर उसे अपने जीवन को संयत कर लेना चाहिए। शान्त मन से बैठकर स्वाध्याय करना चाहिए और ईश्वर की आराधना में अपना समय व्यतीत करना चाहिए।
            वृद्धावस्था में क्रोध पर नियन्त्रण रखना बहुत आवश्यक होता है। क्रोध सभी बुराइयों का मूल है। गीता में लिखा है कि क्रोध भ्रम पैदा करता है और भ्रम से बुद्धि विचलित होती है। घर या बाहर यदि मनुष्य अनावश्यक क्रोध करता रहेगा तो वह अपना सम्मान खो देगा। कोई भी उसकी बात को सुनने के लिए तैयार नहीं होगा। वह घर में अलग थलग होकर अकेलेपन का शिकार हो जाएगा। इसका सबसे बड़ा कारण है कि क्रोधी मनुष्य को कोई भी पसन्द नहीं करता। सभी उससे कन्नी काटकर निकलने का प्रयास करते हैं।
           यह शरीर नश्वर है, इसे एक दिन अवश्य ही इस संसार को त्यागकर जाना होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के शरीर परिवर्तन को मनुष्य के वस्त्र परिवर्तन के समान बताया है। उनके अनुसार मृत्यु समयानुसार आनी है। इसलिए इसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए। हमारा शरीर एक रथ के समान है जो आत्मा रूपी सवार का साधन मात्र है। इसका सही तरीके से रख-रखाव करना बहुत आवश्यक है। इसे उचित आहार-विहार से पुष्ट करना चाहिए। जिह्वा के स्वादों को इस अवस्था में त्याग देना उचित होता है।
          इस संसार में सभी जीव यात्री हैं। हमें निश्चत समय व निश्चत स्टेशन पर उतर जाना होता है। अत: वृद्ध होने पर भी प्रसन्नतापूर्वक जीना चाहिए। अपने मन में निराशा या हताशा का भाव कदापि नहीं रखना चाहिए। पुनर्जन्म होने पर शरीर फिर से प्राप्त होना ही होता है। समयानुसार किसी न किसी रूप में जीव को इस नश्वर संसार में आना‌ होता है। उस समय फिर से सभी रिश्ते-नाते पुनः नए रूप में ही मिलते हैं। इसलिए साथ छोड़कर जाने वालों के लिए शोक या दुख नहीं करना चाहिए। 
           इस आयु तक आते-आते मनुष्य के पास अनुभव रूपी ज्ञान का खजाना एकत्रित हो जाता है। अपनी सुखद वृद्धावस्था के लिए मनुष्य धन का संचय भी करता है। अपने अर्जित धन को यथायोग्य निर्धन व जरूरतमन्द के लिए यदा-कदा दान देना चाहिए। इस तरह धन की सार्थकता का अनुभव होता रहेगा। अपने ज्ञान के कोश का सदुपयोग करके मनुष्य को आत्म सन्तोष होता है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसका ज्ञान व्यर्थ नहीं गया। उससे किसी का तो मार्गदर्शन हुआ। समाज को दिशा देने का कार्य समाज के बुजुर्गों को करना चाहिए।
           वृद्धावस्था में आत्मचिन्तन करना बहुत आवश्यक होता है। मनुुष्य को प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। इससे व्यक्ति के अंतस में छुपे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सकता है। सभी जीवों में परमात्मा का अंश जीवात्मा विद्यमान है। इसलिए उन्हें अपने समान समझते हुए सभी प्राणियों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। अपने बच्चों से आशा व अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। जितना हो सके उनकी सहायता करनी चाहिए। हर परिस्थति में ईश्वर का धन्यवाद करते हुए प्रसन्न रहना चाहिए। 
           'श्रीमद्भगवद्गीता' को सभी उपनिषदों का सार कहा जाता है। इसमें बताए गए जीवन मूल्यों से जीवन के हर पड़ाव की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति मनुष्य को मिलती है। उसका आत्मिक बल बढ़ता है। इसलिए मनुष्य को गीता में बताए गए सूत्रों को हृदय की गहराई से अपना कर्तव्य मानकर अपनाना चाहिए। इसके लिए किन्तु या परन्तु नहीं करना चाहिए। वृद्धावस्था में इन बताए गए सूत्रों को अपनाने से निस्संदेह व्यक्ति उन्नति के पथ की ओर निरन्तर अग्रसर होता है। उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

आयु से परिपक्वता का लेना-देना नहीं

आयु से परिपक्वता का लेना-देना नहीं

एक आयु के पश्चात मनुष्य को परिपक्व हो जाना चाहिए। उसे बचकानी हरकतें करने से बचना चाहिए। यदि मनुष्य ऐसा नहीं करता है तो वह अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में हंसी का पात्र बनता है। कोई भी उसे सीरियसली नहीं लेता बल्कि मसखरा या जोकर समझकर उसको अनदेखा करते हैं। कुछ समय मन बहलाने के लिए तो ठीक है पर अधिक समय तक उसे सहन करना कठिन हो जाता है। तब उसे उन सब पर क्रोध आता है। वह सोचता है कि सभी लोग मूर्ख हैं जो उसका सम्मान नहीं करते।
          मनुष्य को आयु के बढ़ने के साथ-साथ स्वयं की ओर ध्यान देना आरम्भ करना चाहिए। उसे अनावश्यक तनाव लेने से बचना चाहिए। हर परिस्थिति में शान्त रहने का प्रयास करना चाहिए। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह जो भी कर रहा है, वह अपनी स्वयं की शान्ति के लिए है। तभी वह स्वयं के लिए जीना प्रारम्भ करता है। सबसे आवश्यक बात यह है कि उसे दूसरों से अपनी तुलना करनी बन्द कर देनी चाहिए। इसका कारण यही है कि हर व्यक्ति की कार्य करने की सामर्थ्य और स्थितियॉं भिन्न होती हैं।
          मनुष्य को अपनी जरूरतों और इच्छाओं के बीच का अन्तर समझ लेना चाहिए। अपनी चाहतों को, अपनी प्रसन्नता को भौतिक सांसारिक वस्तुओं के साथ जोड़ना उचित नहीं होता। इन वस्तुओं के पीछे भागना मृगतृष्णा के समान है। एक वस्तु की कामना करना और उसे यत्नपूर्वक प्राप्त कर लेने के बाद दूसरी ही इच्छा मुॅंहबाये खड़ी हो जाती है। तो कब तक इस छलावे में जिया जा सकता है। कभी तो अपनी अनावश्यक कामनाओं से किनारा करना ही पड़ेगा। तभी तो घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास सम्भव हो सकता है।
           हर व्यक्ति अपने हिसाब से ठीक होता है। यही सोचना चाहिए कि हर व्यक्ति की अपनी-अपनी सोच है। किसी को उसके आधार पर सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए अपने रिश्तों से  अधिक उम्मीद करना त्याग देना चाहिए। उसके स्थान पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। यही सोच बनानी चाहिए कि कोई हमारे लिए कुछ कर दे ठीक है और यदि न करें तो भी हम पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। इस प्रकार की मानसिकता जब मनुष्य बना लेता है तब वह मस्त रहना सीख जता है।
          किसी को भी दुनिया में यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है कि आप कितने अधिक बुद्धिमान हैं। अतः दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना छोड़ देना चाहिए। समाज को स्वयं ही यह समझने दीजिए कि आप बहुत योग्य हैं। जब लोग आपसे व्यवहार करेंगे तो वे स्वयं ही आपकी बुद्धिमत्ता का लोहा मानने लगेंगे। इसलिए सब समय पर छोड़ दीजिए। यह मानकर चलिए कि हीरा खुद होकर कभी किसी को अपना मूल्य नहीं बताता बल्कि जौहरी स्वयं ही उसे देख-परखकर उसका मूल्यांकन कर लेता है।
            इन सबसे भी बढ़कर मनुष्य को अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। दूसरों को बदलने का प्रयास करना छोड़ देना चाहिए। इसके स्थान पर स्वयं की ओर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। आत्मोद्धार के लिए प्रयास करना श्रेयस्कर होता है। यही सोचना चाहिए कि जब मनीषी समाज में लोगों को नहीं बदल पाते तो फिर हम कैसे यह कार्य कर सकते हैं? समझदारी इसी में है कि जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाए। 'छोड़ो जाने दो' वाली उक्ति को समझकर सीख लेना चाहिए। तब मन को कष्ट नहीं होता।
           लोग क्या कहते हैं, क्या करते हैं? इसकी चिन्ता में अपना समय व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। जिन्होंने नहीं समझना उनके लिए अपना समय और शक्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जानते-बूझते भी अज्ञ यानी मूर्ख बन जाते हैं। उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। इसका कारण है कि सोए हुए व्यक्ति को तो जगाया जा सकता है पर जो ऑंख बन्द करके सोने का अभिनय कर रहा हो, उसे किसी भी तरह नहीं जगाया जा सकता। उसे उसी अवस्था में छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए। 
           समझदार होने या परिपक्व होने की आयु में व्यक्ति को अनावश्यक ही रूठना, मानना या नखरे नहीं दिखाने चाहिए। उसे इन भावों से ऊपर उठ जाना चाहिए। उसकी आयु को देखते हुए शायद मुॅंह पर उसे कोई कुछ न कहे पर वह अपना सम्मान दूसरों की नजरों में खो देता है। घर-परिवार के सदस्य अथवा बन्धु-बान्धव उसके ऐसे व्यवहार के कारण उसे अनदेखा करने लगते हैं। तब उसे उन सब पर क्रोध आने लगता है और वह अनर्गल प्रलाप करने लगता है। यह स्थिति किसी भी प्रकार से अच्छी नहीं कही जा सकती।
           आयु से परिपक्वता का कोई लेना-देना नहीं है। यदि मनुष्य अपना मान-सम्मान बनाए रखना चाहता है तो उसे स्वयं पर नियन्त्रण रखना चाहिए। छोटे-बड़े को यथोचित आदर और मान देना चाहिए। उसे अपने मन की संकीर्णता का त्याग करके विशाल हृदय बनना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह समय का सदुपयोग कर सकता है। अपनी रुचि का कार्य कर सकता है। स्वाध्याय करने में समय व्यतीत कर सकता है। ईश्वर की उपासना में  मन लगा सकता है। जनहित के कार्य करके समाज को दिशा दे सकता है। 
            जीवनकाल में मनुष्य यदि इन छोटी-छोटी बातों पर गहनता से विचार करने लगे तो वास्तव में वह परिपक्व लोगों की श्रेणी में गिना जाता है। उसे हर स्थान पर महत्त्व दिया जाता है। उससे विचार-विमर्श किया जाता है। इस प्रकार उसका इहलोक और परलोक संवर जाता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

मर्यादाओं का पोषक मध्यम वर्ग

मर्यादाओं का पोषक मध्यमवर्ग 

समाज और देश में जो नैतिकता बची हुई है उसका श्रेय मध्यमवर्गीय परिवारों को ही जाता है। नैतिकता और मर्यादा से परे ऐसे बहुत से सारे कार्य होते हैं जिनका प्रभाव सिर्फ मध्यमवर्गीय परिवारों पर होता है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि समाज और परिवार का भय सिर्फ उन्हीं को ही होता है और आत्मग्लानि का भाव भी उन्हें ही अधिक होता है।  
           बेटी ससुराल वालों के अत्याचारों से परेशान होकर मायके में शरण लेती है। अपने पति के दुर्व्यवहार के कारण या उसके विवाहेत्तर सम्बन्धों के चलते अपने माता-पिता के पास आ जाती है। कभी  पति या पत्नी में किसी समस्या के कारण सन्तान न होने पर पत्नी को दोषी मानकर उसे मायके जाने के लिए विवश कर दिया जाता है। इनमें से कोई भी कारण हो सकता है जब किसी लड़की को अपने पति या ससुराल को छोड़ना पड़ जाता है। इन सब कारणों के अतिरिक्त किन्हीं अपरिहार्य कारणों से तलाक लेना पड़ जाता है। इन सब परिस्थितियों में लड़की का जीना समाज दुश्वार कर देता है। उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता है, समाज का डर दिखाया जाता है। हालात कैसे भी रहते हों, उस पर ही हर हाल में सामंजस्य स्थापित करने के लिए दबाव बनाया जाता है।
           यदि हम उच्चवर्णीय परिवारों की ओर देखें तो पता चलता है कि वे इन सभी बन्धनों से मुक्त हैं। वहॉं शायद इन सब नियमों  के मायने ही अलग हैं। पति-पत्नी दोनों ही अपने आचार-व्यवहार के प्रति उदासीन प्रतीत होते हैं। इनके अतिरिक्त टीवी और फिल्म जगत के नायक-नायिकाओं की ओर मध्यमवर्ग टकटकी लगाए देखता रहता है। उनके जैसे जीवन मूल्यों को अपनाना चाह कर भी समाज के डर से मन मसोस कर रह जाता है। फिर अपने कदम समेट लेता है।
          उच्चवर्ग के अतिरिक्त नव धनाढ्य वर्ग भी सभी वर्जनाओं को तोड़कर लम्बी उड़ान भरना चाहता है। वह कहीं दूर आगे निकल जाना चाहता है। उसके लिए किसी सामाजिक नियम अथवा मर्यादा की अवहेलना करना मामूली-सी बात बन जाती है। ऐसा करते हुए उसे किसी प्रकार का अपराधबोध भी नहीं होता। वह इन सबसे परे अपनी ही मौज-मस्ती में व्यस्त रहता है। उसकी बला से यह दुनिया भाड़ में जाए।
          निम्नवर्ग अपनी दैनन्दिन समस्याओं से ही सदा जूझता रहता है। वह अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए जोड़-तोड़ में लगा रहता है। उसे दो समय का खाना भी प्रतिदिन मिल जाए तो वही उसके लिए बहुत होता है। ऐसी स्थिति में संस्कार या मर्यादा जैसे शब्द उसे भारी भरकम प्रतीत होते हैं। इनके विषय में यदि वह सोचने लगे तो उलझकर ही रह जाएगा।
           तुलसीदास जी ने रामायण में एक स्थान पर बहुत ही सत्य कहा है - 
           समरथ को नहीं दोष गोसाईं
इसका यही अर्थ हुआ कि समर्थ या शक्ति सम्पन्न व्यक्ति को कोई दोष नहीं दिया जाता। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सारे सामाजिक नीति नियम और परम्पराओं को मानने की आशा केवल निर्बल व्यक्ति से ही की जाती है। शक्तिशाली व्यक्ति किसी परम्परा अथवा नियम को मानने या न मानने के लिए बाध्य नहीं होता। उस पर किसी का कोई जोर नहीं चलता। यदि वह किसी पर अन्याय करता है या समाज विरोधी कार्य करता है तब भी समाज उसका विरोध न करके उसकी हॉं में हॉं मिलाता है।
           विवाहेतर सम्बन्ध चाहे स्त्री के हों या पुरुष के, हमारे समाज में हेय समझे जाते हैं। ऐसे सम्बन्धों वाले स्त्री और पुरुष का व्यवहार कुछ ज्यादा ही मधुर होता है। वे अपने आश्रितों का अधिक ध्यान रखते हैं ताकि उनका विश्वास बना रहे। उन पर कोई अविश्वास न कर सके। 
           यहॉं भी मध्यमवर्ग ऐसे सम्बन्धों को कदापि सहन नहीं कर सकता। जबकि आर्थिक युग में उच्चवर्ग में ये सम्बन्ध आम होने लगे हैं। वे लोग इसकी परवाह भी नहीं करते और न ही कोई किसी पर अंगुली उठाता है। सभी अपने में मस्त रहते हैं। अपनी समस्याओं में उलझा निम्नवर्ग अपनी दो जून की रोटी कमाने की जद्दोजहद में लगा रहता है। उसे इन सबसे कोई लेना-देना नहीं होता।
            भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, हेराफेरी, दूसरे का गला काटना आदि समाज विरोधी कार्य मध्यमवर्ग के लिए बहुत निम्न स्तर के कार्य होते हैं। इन कार्यों में लिप्त पाए जाने पर यदि न्याय व्यवस्था के दोषी बनकर जेल की हवा खानी पड़ जाए तो उनके लिए  मृत्यु तुल्य होता है। उन्हें लगता है कि वे किसी को मुॅंह दिखाने लायक नहीं रहे।
           इसके विपरीत उच्चवर्ग और निम्नवर्ग के लोगों के जमीर पर इन सबका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे धड़ल्ले से समाज विरोधी इन गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं। उच्चवर्ग के लोग ये सब करने में अपनी शान समझते हैं। उनके लिए यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। निम्नवर्ग अपनी मजबूरियों के कारण ऐसे कार्य करता है। उसे लगता है दो रोटी ही तो खानी हैं चाहे कहीं भी रहकर मिल जाऍं।
           अपवाद सर्वत्र हो सकते हैं। हर वर्ग के व्यक्तियों की अपनी अलग सोच हो सकती है। मेरे इस विश्लेषण का तात्पर्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुॅंचाना नहीं है। समाज के विभिन्न लोगों के विचारों को पढ़ने और उनसे मिलने के उपरान्त ही ऐसा लिखा है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 21 अप्रैल 2025

सुखमय वृद्धावस्था के लिए

सुखमय वृद्धावस्था के लिए

अपनी वृद्धावस्था के लिए अथवा अपने आने वाले जीवन के लिए समय रहते ही योजना बना ली जाए, यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सुखमय वृद्धावस्था के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। प्रयास यही रहना चाहिए कि अपने सभी सामाजिक दायित्वों और जिम्मेदारियों को अपनी रिटायरमेंट तक पूरा कर लिया जाए। इससे वृद्धावस्था में अनावश्यक तनाव नहीं रहता।
           मनुष्य अपने जीवनकाल में अथक परिश्रम करके अपने लिए एक आशियाना बनाता है। वह यही सोचता है कि अपने परिवार के साथ वहॉं सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करेगा। अपने नाती-पोतों के साथ खेलते हुए वह अपना बचपन जीएगा। खून-पसीने से बनाए गए उस घर को जीते-जी बच्चों को नहीं सौंपना चाहिए। यथासम्भव अपने स्वयं के स्थायी आवास पर ही रहना चाहिए ताकि स्वतन्त्रतापूर्वक अपने जीवन का आनन्द लिया जा सके।
           अपना बुढ़ापा सुरक्षित करने के लिए हर सम्भव प्रयास करना आवश्यक है। अपने जीवित रहते परिश्रम से कमाकर जोड़े हुए बैंक बैलेंस, भौतिक सम्पत्ति और व्यापार आदि को अपने पास ही रखना चाहिए। अतिमोह में पड़कर किसी के भी नाम पर करने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए। हो सकता है कि बच्चे सुनहरे सपने दिखाऍं कि वे वृद्धावस्था में आपकी सेवा करेंगे, आपका हर प्रकार से ध्यान रखेंगे। इसलिए अपनी धन-सम्पत्ति उनके नाम पर कर दें। 
           बच्चों के इस प्रकार के बहकावे में नहीं आना चाहिए, उनके मगरमच्छ वाले ऑंसुओं को अनदेखा करना चाहिए। यहॉं एक बात कहना चाहती हूॅं कि बच्चों को यदि सचमुच आपके सहारे या सहयोग की आवश्यकता है तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता अवश्य करनी चाहिए।  उन्हें निराश नहीं करना चाहिए।
          समय बदलने के साथ बच्चों की प्राथमिकता भी बदल सकती हैं। अतः अपने बच्चों के इस वादे पर बिल्कुल निर्भर नहीं रहना चाहिए। हो सकता है कि भविष्य में वे चाहकर भी आपके लिए कुछ न कर पाऍं। साथ ही यह भी सम्भावना हो सकती है कि वे अपने ही देश में अन्यत्र किसी प्रदेश में या विदेश में अपनी नौकरी अथवा व्यवसाय के कारण बस जाऍं। तब आपको यहॉं अकेले ही जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है।
             अपने बाद जीवनसाथी को किसी का मोहताज बनाकर नहीं छोड़ना है बल्कि समय रहते वसीयत बनवा लेनी चाहिए कि उनके पश्चात सारी धन-सम्पत्ति का वारिस उनकी पत्नी होगी। उसके बाद वह सब बच्चों में बराबर बॉंट दी जाएगी। इससे भी बढ़कर यह आवश्यक है कि अपने जीवनसाथी को आपकी धन-सम्पत्ति के विषय में पूरी जानकारी होनी चाहिए। उसे अपने लेन-देन, बैंक अकाउंट, इन्श्योरेन्स, इन्वेस्टमेंट आदि के बारे में बताइए। जिससे समय आने पर उसे किसी का मुॅंह न ताकना पड़े। उस समय वह दृढ़ता और साहस के साथ विपरीत परिस्थितियों का सामना कर सके।
             जहॉं तक हो सके अपने बच्चों के जीवन में अनावश्यक दखलअंदाजी न करें। सलाह भी उनके मॉंगने पर ही दें तो अच्छा रहेगा। यदि बच्चे आपके परामर्श को अनसुना कर देते हैं तो उसे अपनी ईगो का विषय बनाकर अनावश्यक तूल नहीं देनी चाहिए। उन्हें अपने तरीके से जीवन जीने दीजिए और आप अपने तरीके से जीवन व्यतीत कीजिए। ऐसा करने से घर में सदा ही सुख-शान्ति बनी रहती है। अन्यथा घर युद्ध का मैदान बन जाता है और अनावश्यक वाद-विवाद होने लगता है। यह सोचना चाहिए कि आपने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जी लिया है तो बच्चों को भी अपना जीवन जीने की आजादी मिलनी चाहिए।
           अपनी वृद्धावस्था का आधार बनाकर किसी से सेवा करवाने अथवा सम्मान पाने का कभी प्रयास नहीं करना चाहिए। बहुत समय तक बेचारा बनकर सहानुभूति नहीं बटोरी जा सकती। अपने जीवन को उल्हासपूर्वक जीने का प्रयत्न करना चाहिए। स्वयं प्रसन्न रहकर दूसरों को भी प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। उन लोगों को अपने मित्र समूह में शामिल करना चाहिए जो आपके जीवन को प्रसन्न देखना चाहते हों, यानी सच्चे हितैषी हों। 
          सबसे अहं है अपने स्वास्थ्य का स्वयं ध्यान रखना। समय-समय पर चिकित्सीय परीक्षण करवाते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त घर का बना सादा और पौष्टिक भोजन खाना चाहिए। स्वास्थ्य रहने के नियमों का पालन करना चाहिए यानी वाक, योगासन, हल्का-फुल्का व्यायाम करना चाहिए। यथासम्भव अपने कार्य स्वयं ही करने की आदत बनानी चाहिए। छोटे-मोटे कष्टों-परेशानियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उम्र के साथ-साथ छोटी-मोटी शारीरीक परेशानियॉं चलती ही रहती हैं।
            किसी के साथ भी अपनी तुलना करके स्वयं को दुखी नहीं करना चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी-अपनी सामर्थ्य होती है। किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। कोई कुछ सहायता कर दें तो ठीक है और यदि न करें तो किसी के समक्ष रोना नहीं रोना चाहिए। दूसरों की बातें अवश्य सुननी चाहिऍं पर निर्णय अपने विचारों के आधार पर ही लेना चाहिए। जहॉं तक हो सके किसी भी तरह के टकराव को टालकर तनाव रहित जीवन को जीने का प्रयास करना चाहिए।
           अपने साथ कुछ ऐसे मित्रों को जोड़ना चाहिए जिनके साथ आप सहज अनुभव कर सकें। उनके साथ कभी-कभी पार्टी कीजिए, लंच या डिनर पर जाइए और पिकनिक का कार्यक्रम बनाइए। प्रतिवर्ष किसी तीर्थस्थल अथवा हिल स्टेशन पर यात्रा के लिए जाइए। इससे आपको जीने का आनन्द आएगा। आप स्वयं को उत्साहित, ऊर्जावान और तरोताजा महसूस करेंगे। यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिए कि जब तक आप स्वयं अपने लिए जीना शुरू नहीं करते हैं निश्चित मानिए तब तक आप जीवित नहीं हैं।      
             इस असार संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। इसलिए जीवन में कुछ भी सदा के लिए नहीं रह सकता। यानी कि सुख, दुख, चिन्ता, परेशानी भी नहीं। किसी से भी अनावश्यक याचना नहीं करनी चाहिए और न ही किसी का मुॅंह ताकना चाहिए। अपना समय व्यतीत करने के लिए धर्म ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए, बागवानी भी की जा सकती है। ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। प्रार्थना केवल ईश्वर से करनी चाहिए कि वह जीवन में आपको सदा स्वस्थ रखे और धैर्य व साहस दे।                                                                 

रविवार, 20 अप्रैल 2025

जीवन का सार

 जीवन का सार

मनुष्य इस संसार में सीमित समय के लिए आता है।उसे यह समझ लेना चाहिए कि जितने साल तक वह अपना जीवन जी चुका है, उसका उसके बाद का शेष जीवन अब कुछ ही वर्षों का बच गया है। इसलिए प्रसन्न रहने के लिए उसे जीवन में कई परिवर्तन लाने चाहिए। उसे स्वयं के लिए समय निकालना चाहिए। जिन कार्यों को वह अभी तक अपनी व्यस्तता के कारण पूर्ण नहीं कर सका, उन पर उसे ध्यान देना चाहिए। तभी उसका जीवन सुखमय हो सकता है।
          सबसे पहले मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि यह संसार मरणधर्मा है। यहॉं कोई भी सदा के लिए नहीं रहने वाला। आज उसका कोई प्रियजन दुनिया से विदा ले रहा है, तो कल उसका भी नम्बर आने वाला है। किसी के चले जाने से संसार का कोई काम नहीं रुकता। सृष्टि पहले की ही भॉंति चलती रहती है। दो-चार दिन रोने-धोने के पश्चात घर-परिवार के लोग, पड़ोसी, बन्धुजन सभी अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाऍंगे। वे मौज-मस्ती, खाने पहनने में मस्त रहेंगे।  
         यथासम्भव स्वयं के लिए समय निकालता चाहिए। अपनी भागदौड़ वाली जिन्दगी में अपने और अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल सके। उस समय कार्यक्षेत्र की व्यस्तता की मजबूरी रही थी, परन्तु अब समय मिला है, तो उसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए। बच्चों के और अपने जीवनसाथी के साथ क्वालिटी टाइम बिताने का प्रयास करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार शापिंग करिए, यात्रा पर जाइए और बन्धु-बान्धवों के पिकनिक पर जाइए। इसके अतिरिक्त कभी-कभी फाइव स्टार होटल में रहने के स्थान पर प्रकृति की गोद में रहने जाइए। रिसोर्ट में रहने का अनुभव लीजिए। इससे जीवन में और भी आनन्द आएगा।
          यह बात स्मरण रखने योग्य है कि हमारे सामने कोई व्यक्ति चाहे पैसे, पावर और पोजीशन वाला क्यों न हो, किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। कोई किसी को कुछ नहीं देने वाला। सबको अपनी कमाई पर ही सन्तोष करना होता है। जहॉं अपना स्वार्थ सिद्ध होता हो, लोग उसी से ही अपना सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास करते हैं। जब स्वार्थ की पूर्ति हो जाती है, तब वे पहचानने से ही इन्कार कर देते हैं। फिर ऐसे इन लोगों को क्योंकर भाव देकर महान बनाना।
          लोगों के अच्छे कार्यों और विचारों की खुले दिल से प्रशंसा करनी चाहिए। ऐसा करने से मन को वास्तविक आनन्द मिलता है।‌ ऐसे लोगों से सदा दूरी बनाकर रखनी चाहिए, जो अपनी बुरी आदतों और जड़ मान्यताओं को दूसरे लोगों पर थोपने का यत्न करते हैं। ऐसे लोगों को सुधारने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कोई जीवन की दौड़ में एक कदम पीछे करे, तो उससे दस कदम पीछे हट जाना चाहिए। एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य को स्वयं से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, अन्य किसी से नहीं। अपनी प्रसन्नता को इसलिए बलि नहीं चढ़ाना चाहिए कि लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे। यानी चार लोगों को खुश रखने के लिए स्वयं का मन नहीं मारना चाहिए।
          किसी गलत व्यक्ति के सामने अपने आप को सही साबित करने के स्थान पर मौन रहना उचित होता है। इससे अपनी मानसिक शान्ति बनी रहती है। मनुष्य को खुद से प्यार करना चाहिए। अपने दुख और कठिनाइयों को उजागर नहीं करना चाहिए। लोग सामने सहानुभूति दिखाते हैं, पर पीठ पीछे मजाक उड़ाते हैं। जो अपना होता है वह स्वयं ही बिना कहे दूसरे की परेशानी समझ जाता है, उसे कहना नहीं पड़ता। बाकी लोगों के समक्ष अपने मन की बात कहने से बचना चाहिए।
          हम बड़े-बड़े शोरूम में जाते हैं या मॉल में जाते हैं, वहॉं बिना मोलभाव किए जरूरत का ब्रॉंडेड सामान खरीद कर ले आते हैं। परन्तु हम रेहड़ी पटरी वालों से मोलभाव करते हैं। हम जानते हैं कि उन मंहगे स्थानों पर ठगे जा रहा हैं, फिर भी परवाह नहीं करते। जो बेचारे कम कीमत पर हमें सामान बेचते हैं, उन्हें हम बुरा-भला कहते हैं। इस ठगने-ठगाने के विषय में मुझे कबीरदास जी का एक दोहा स्मरण हो रहा है -
     कबीरा आप ठगाइये और न ठगिये कोय।
    आप ठगै सुख ऊपजे और ठगे दुख होय।। 
कबीरदास जी ने बहुत अच्छी बात कही है कि स्वयं बेशक ठगे जाइए, परन्तु किसी को ठगना अच्छी बात नहीं है। जब हम ठगे जाते हैं, तो सुख की उत्पत्ति होती है यानी मन में सन्तोष होता है कि हमने किसी का अहित नहीं किया। किन्तु जब हम दूसरे को ठगते हैं तो दुख होता है। हमारा मन हमें कचोटता है।
          जीवन काल में अपने और अपने घर-परिवार पर हम हजारों-लाखों रुपये खर्च कर देते हैं। यदि हो सके तो किसी जरूरतमन्द व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए। उसकी समय पर आवश्यकता पूरी होगी, तो उसके मन से निकली दुआ हमारे लिए बहुत उपयोगी होती है। वैसे भी हमारे मनीषी दान का बहुत महत्व बताते हैं। वे हमें सुपात्र को दान देने के लिए सदा प्रेरित करते रहते हैं। 
            जीवन बहुत ही अमूल्य है। हर पल को मस्ती के साथ बिताइए। सुख या दुख केवल अपने ही हैं, जितनी जल्दी मनुष्य यह सार समझ ले, उसे दुनिया के थपेडों से डर नहीं लगता। यह निश्चित है कि समय कैसा भी हो बीत जाता है। आत्मिक सुख के लिए मानवता की सेवा, जीवों पर दया और प्रकृति की सेवा करनी चाहिए। अपने ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए और सबसे बढ़कर ईश्वर की उपासना में भी समय व्यतीत करना चाहिए। अनन्त का मार्ग इन्हीं उपायों से मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

घर में बुजुर्ग सामंजस्य बनाए

बुजुर्ग घर में सामंजस्य बनाऍं

घर-परिवार में सभी सदस्यों को सामंजस्य बनाकर रखना चाहिए। घर में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी रहते हैं। इसलिए केवल घर के बच्चों और युवाओं का ही नहीं अपितु बुजुर्गों का भी दायित्व बनता है कि वे समय और परिस्थितियों को देखते हुए अपने व्यवहार में परिवर्तन लाऍं। इससे घर में सुख और शान्ति का साम्राज्य बना रहता है। बड़ों को चाहिए कि वे बच्चों को अपना आशीर्वाद दें। छतनार वृक्ष बनकर बच्चों को शीतल छाया प्रदान करें। इसी से बुजुर्गों का मान बढ़ता है।
          इसके विपरीत यदि घर के बुजुर्ग अपनी हठधर्मिता का त्याग नहीं करना चाहते, तब घर में परेशानियॉं बढ़ने लगती हैं। घर का वातावरण बोझिल होने लगता है। उस समय बुजुर्ग बच्चों को बोझ लगने लगते हैं। वे कुछ भी करके उनसे छुटकारा पाने के उपाय सोचने लगते हैं। यह स्थिति किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराई जा सकती। उन्हें यह सोचना चाहिए कि उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जी लिया है। अब बच्चों को भी उनके हिस्से की स्वतन्त्रता देनी चाहिए।
          कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि बच्चे माता-पिता की आवश्यकताओं को समझकर उन्हें पूर्ण करने का प्रयास करें। वे निश्चित करें कि उन्हें समय पर नाश्ता-खाना इत्यादि मिलता रहे। जब वे बीमार हों, तो उन्हें समय पर डॉक्टर को दिखाकर दवाई उपलब्ध करवा दें। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखें। वृद्धावस्था के कारण उनके माता-पिता शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। अतः उनके साथ ऐसा व्यवहार न करें, जिससे वे स्वयं को असहाय समझें। उनके मान-सम्मान पर ऑंच नहीं आनी चाहिए।
           दूसरी ओर आयुप्राप्त होते माता-पिता बच्चों की समस्याओं को समझें और यथासम्भव उनकी सहायता करें। यदि उनके बेटा-बहू दोनों नौकरी करते हों, तो घर बैठे वे बच्चों की देखभाल कर सकते हैं। इसके लिए बच्चों पर अहसान जताना बिल्कुल अच्छी बात नहीं है। यदि घर रहते हुए वे बच्चों का गृहकार्य करवा दें तो बच्चों को भी आराम हो जाता है। घर के छोटे-छोटे कार्यों में  सहयोग करके उनका समय बचा सकते हैं। बुजुर्ग बच्चों पर अनावश्यक दबाव न बनाऍं बल्कि अपने अनुभवों से घर में एक सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण करें।
           बुजुर्ग यदि अपने पूर्वाग्रह का त्याग करके बच्चों की समस्याओं को समझने लगें तो वे घर में अपने स्वाभिमान को बचा सकते हैं। बच्चे भी अपने ऐसे माता-पिता का सम्मान करते हैं। घर में अनावश्यक ही चिल्लाना अथवा बिना कारण बात-बेबात लड़ाई-झगड़ा करना उन्हें शोभा नहीं देता। अपने बच्चों की हर आने-जाने वाले के समक्ष बुराई करने से बचना चाहिए। जब उन्हें बच्चों के साथ ही रहना है तो उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वे बच्चों का अपमान किसी के सामने न करें। इससे उनका अपना सम्मान भी कम होता है। यदि कोई छोटी-मोटी बात घर में हो जाती है, तो अनदेखा करना चाहिए।
           इसके अतिरिक्त अपने दुराग्रही स्व‌भाव के कारण उन्हें नित्य प्रति समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उनके अड़ियल रवैए के कारण धीरे-धीरे बच्चे उनसे मुॅंह मोड़ने लगते हैं। उनकी परवाह करना कम कर‌ देते हैं। एक समय ऐसा आता है जब बच्चे उनके व्यवहार के कारण परेशान होकर उनसे दूरी बनाने लगते हैं। उस समय वे घर में अकेले पड़ जाते हैं। इस तरह घर में उनके मध्य एक अबोलापन परसने लगता है। उसका असर बुजुर्गों पर अधिक होता है। यह किसी भी तरह से अच्छी बात नहीं कही जा सकती।
           यदि बच्चे माता-पिता के व्यवहार के कारण उनसे विमुख होने लगते हैं, तब बुजुर्ग सारा दोष उन्हें देने लगते हैं। उस समय उन्हें याद करवाने का प्रयत्न करते हैं कि उनके पालन-पोषण में उन्होंने कितने कष्ट उठाए। उन्हें योग्य बनाने के लिए अपने किए गए बलिदानों की दुहाई देते हैं। वे अपने बच्चों के जीवन में आने वाली कठिनाइयों को समझना ही नहीं चाहते। वे बच्चों के जीवन की व्यस्तता में उन्हें मानसिक तनाव देने का कार्य बखूबी करते हैं। इस प्रकार जब बच्चे उनसे बहुत दुखी हो जाते हैं तब वे अपने माता-पिता की अवहेलना करने लगते हैं। बुजुर्गों को ऐसी परिस्थितियॉं घर में उत्पन्न करने से बचने की आवश्यकता होती है।
          बुजुर्ग माता-पिता को थोड़ा समझदारी का परिचय देना चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को सदा दोष नहीं देना चाहिए। यदि वे कोई सलाह-मशवरा बच्चों को दें और बच्चे उसे न मानें अथवा अनसुना कर दें, तो उन्हें इस बात का घर कोई इश्यू नहीं बनाना चाहिए। एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी के अन्तर के कारण यह स्वाभाविक होता है। हर पीढ़ी को माता-पिता समझाते हैं पर बच्चे उस पर अक्षरशः पालन नहीं करते। उन्होंने ने भी अपने समय में माता-पिता की शत-प्रतिशत बातों को नहीं माना होगा। फिर आज वे अपने बच्चों से ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
         समय और परिस्थितियों की मॉंग यही है कि बुजुर्ग अपने बच्चों पर विश्वास करें और बच्चे उनकी उम्मीदों पर खरे उतरें। घर-परिवार में यह एक आदर्श स्थिति होती है कि बुजुर्ग हंसते-मुस्कुराते रहें और बच्चे उनके अनुभवों का लाभ उठाऍं। यह तभी सम्भव हो सकता है जब बुजुर्ग अपनी हठधर्मिता का त्याग करें। बच्चों पर अनावश्यक अंकुश लगाने का प्रयास न करें। घर में परस्पर मिलजुलकर प्यार और अपनेपन से रहें। 
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

बेटा नहीं बहू घर की धुरी

बेटा नहीं बहू घर की धुरी

सुनने में शायद यह अजीब लगे पर वास्तविकता यही है कि घर की धुरी बहू ही होती है, बेटा नहीं। घर में आने वाली सभी खुशियों की चाबी बहू के हाथों में ही होती है। अब तक यही कहा जाता रहा है कि पुरुष का काम मात्र धन कमाना है और औरत का काम घर-गृहस्थी सम्हालना, आने वाले मेहमानों की देखभाल करना होता है। इसलिए पुरुष को घरेलू काम-काज करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। सदियों से यह बात उसे घुट्टी में पिलाई जाती है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त पुरुष इसे पत्थर की लकीर समझने लगते हैं।
          आज के समय में इन विचारों में कुछ परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों को सकारात्मक कहा जा सकता है। आज स्त्रियाॅं भी घर को सम्हालने के साथ-साथ कमाने लगी हैं। दोनों ही क्षेत्रों में वे अपना लोहा मनवाने लगी हैं। वे पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं। जब वे घर और ऑफिस दोनों क्षेत्रों में निपुणता के साथ कार्य कर सकती हैं तो पुरुष क्यों नहीं कर सकताॽ इक्कीसवीं सदी का यह ज्वलन्त प्रश्न है। वाकई यह विचारणीय विषय है।
           इतनी जागरूकता होने के बावजूद भी बहुत से पुरुष अभी तक घर-परिवार और ऑफिस दोनों जिम्मेदारियों को निभाने में असफल हो रहे हैं अथवा वे निभाना नहीं चाहते। इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि वे इनसे दूर भाग रहे हैं। वे अपनी पत्नी का सहयोग करने से पल्ला झाड़ रहे हैं।आज भी पति, सास-ससुर, बच्चे और घर के अन्य सदस्य स्त्री पर ही आश्रित रहते हैं। उसे ही उन सबकी देखभाल के साथ-साथ रिश्तेदारों और मेहमानों के साथ ही बरतना पड़ता है।
            ससुराल में आज भी उसे बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता। उसे दूसरे घर से आया हुआ कहकर घर के अहं फैसलों से उसे दूर रखा जाता है। उसे कभी दहेज के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है, तो कभी कामचोर या स्वार्थी कहकर‌ तानें दिए जाते हैं। उसकी स्थिति मात्र काम करने वाली से अधिक नहीं समझी जाती। उसे कमाने की मशीन समझ लिया जाता है। उसे सुविधा देने के नाम पर सबके मुॅंह बिगड़ जाते हैं। उसके कार्यों की प्रायः घरों में आज भी सराहना नहीं की जाती।
              माता-पिता के द्वारा सबके समक्ष कहा यही जाता है कि बेटा हमारी बहुत सेवा करता है। जबकि यह सत्य नहीं है। बेटा तो बस ऑफिस से आकर मात्र यह पूछकर कि समय से खाना खा लिया और उनका हालचाल पूछकर अपने दायित्व को पूरा हुआ मान लेता है। उधर माता-पिता इसे ही अपनी देखभाल मानकर खुश हो जाते हैं। जबकि उनके लिए खाना-नाश्ता बनाना, उनके कपड़ों की धुलाई, घर की साज-सज्जा आदि सभी कार्य घर की बहू ही करती है।
            वे लोग अपनी बहू की न तो प्रशंसा करते हैं और न ही उसे कभी कोई क्रेडिट देते हैं। उसके कार्यों में उसकी सहायता करना, वे अपनी शान के विरुद्ध समझते हैं। यद्यपि उनकी यह सोच‌ सरासर गलत है। वैसे देखा जाए तो उनके बेटे को तो यह भी ज्ञात नहीं होता कि उसके माता-पिता कौन-सी दवाई लेते हैंॽ किस समय दवा खाते हैंॽ वे किस तरह का खाना खाते हैंॽ उनकी दैनन्दिन आवश्यकताऍं क्या हैंॽ अब प्रश्न यह उठता है कि इस सबका ध्यान कौन रखता है ॽ
            इन सबकी जानकारी उनकी बहू को ही रहती है, चाहे वह नौकरी करती हो अथवा घर पर ही रहकर घरेलू कार्य करती हो। घर में यदि नौकर विद्यमान भी है तो उसे समय-समय पर उन बुजुर्गों के खान-पान सम्बन्धी निर्देश देती रहती है। उन्हें फोन करके समय पर भोजन करने और दवाई लेने के लिए कहती रहती है। उनके बीमार पड़ने पर अपने कार्यालय से छुट्टी लेकर उनकी सेवा करती है। उन्हें डॉक्टर के पास ले जाती है। प्रायः पुरुष तो अपने काम का बहाना बनाकर इन झंझटों से छुटकारा पा लेते हैं।
            हमारे भारतीय परिवारों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि बेटे की शादी करते ही माताऍं घर-गृहस्थी से संन्यास ले लेती हैं चाहे उनकी आयु कम ही क्यों न हों और वह पूर्णतया स्वस्थ क्यों न हों। वे अपना समय व्यर्थ की बैठकबाजी में, टी वी देखने में व्यतीत करने लगती हैं परन्तु अपनी बहू का सहयोग करना नहीं चाहतीं। घरेलू बहू तो फिर भी कैसे न कैसे घर चला लेती है पर समस्या का सामना कामकाजी बहू को करना पड़ता है। घर और दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारियों को सम्हालते हुए उसका धैर्य जवाब देने लगता है।
           इन समस्याओं के फलस्वरूप ही घरों में विघटनकारी स्थितियाॅं उत्पन्न होने लगती हैं। घर में होने वाले कलह-क्लेश से बचने के लिए अन्ततः बच्चे उसी शहर में अलग घर लेकर उसमें अपना बसेरा बना लेते हैं। नहीं तो दूसरे शहर में अपनी बदली करवाकर घर से दूर चले जाते हैं। उन दुखद परिस्थितियों में माता-पिता अपने गिरेबान में नहीं झॉंकते। बल्कि अपनी बहू को ही दोषी देते हैं और कोसते हैं। न उन्हें अपने बेटे का दोष दिखाई देता और न ही अपना।
              मेरा अपना मानना यह है कि यदि घर में माता-पिता थोड़ा अपना बड़प्पन दिखाऍं तो यह ऐसा भी कोई कठिन कार्य नहीं है अपने परिवार को सम्हालना। आज के समय लड़के और लड़कियॉं दोनों ही पढ़कर नौकरी या अपना व्यवसाय करने लगे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए उन्हें अपने विचारों में थोड़ा बदलाव लाने की आवश्यकता है। बेटे-बेटी में अन्तर करने अथवा उनके कामों को बॉंटने के स्थान पर दोनों को ही घर-बाहर के कार्यों में निपुण बनाना चाहिए।
            जिन घरों के बच्चों को अपनी नौकरी के कारण देश में कहीं अन्यत्र अथवा विदेश में जाना पड़ता है, उनकी बात अलग है। परन्तु अपने घर में  होने वाली अनावश्यक रोक-टोक या झगड़ों से परेशन होकर यदि बहू-बेटे को अलग होना पड़े तो गलत है। केवल बच्चों का ही दायित्व नहीं है कि वे घर को जोड़कर रखें अपितु बड़ों का उत्तरदायित्व अधिक होता है। यदि छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया जाए तो परिवार को एकसूत्र में बॉंधकर रखा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

उपार्जित धन की अवधि

उपार्जित धन की अवधि निश्चित 

मनीषी कहते हैं कि लक्ष्मी बहुत ही चंचल होती है। 'कबीर बानी' में कबीरदास जी का एक सबद है - 
  माया महा ठगनी हम जानी।
  तिरगुन फाँसि लिये कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
 केसव के कमला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
 पंडा के मूरत होइ बैठी तीरथहू में पानी।
 जोगी के जोगिन होइ बैठी, काहू के कौड़ी कानी।
 भक्तन के भक्तिन होइ बैठी, ब्रह्मा के ब्रह्मानी।
 कहैं कबीर सुनो भाई साधो, 
  यह सब अकथ कहानी।।
         इस सबद के अनुसार लक्ष्मी एक स्थान पर टिककर नहीं रहती। वह यहाँ वहाँ भ्रमण करती रहती है। यदि उसे चोरी, जुआ, अन्याय और धोखे से कमाया जाए, तब लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है। फिर शीघ्र ही साथ छोड़कर, अँगूठा दिखाकर अन्यत्र चली जाती है। इसलिए मनुष्य को अन्याय से कभी धन कमाने का न प्रयास करना चाहिए और न ही सोचना चाहिए।
           पैसे या धन की प्रधानता प्राचीन काल यानी हर काल में ही रही है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हर व्यक्ति को अपने जीवन को चलाने के लिए बहुत सारा धन चाहिए होता है। वह दुनिया के सारे ऐश्वर्य जुटा लेना चाहता है, ताकि उसका परिवार सुख-सुविधा से रहे। उन्हें किसी वस्तु की कमी न रहे। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मनुष्य को धन के अभाव में अपने जीवन का निर्वाह कर पाना असम्भव-सा प्रतीत होता है। 
         आजकल मनुष्य के मन में पैसे की भूख इतनी अधिक बढ़ गई है कि वह जायज-नाजायज किसी भी तरह से शीघ्र ही धन कमा लेना चाहता है। रातों रात धनवान बनना चाहता है। ऐसा नहीं है कि आज ही के समय में इस प्रकार के अनैतिक कार्यों से धन कमाने को होड़ लगी हुई है बल्कि प्राचीन काल में भी अनेक लोग अनुचित मार्गों से धन कमाया करते थे। चोरी, डकैती, सेंधमारी जैसे अनुचित मार्ग कुछ लोग अपनाते थे। सत्य बात यह है कि उस समय उन लोगों को समाज हेय दृष्टि से देखा करता था।
           'चाणक्यनीति:' में आचार्य चाणक्य का इस विषय में कथन है-
       अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति।
       प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति।।
अर्थात् अन्याय के द्वारा उपार्जित यानी कमाया हुआ धन दस वर्ष तक ही मनुष्य के पास टिकता है। ग्यारहवें वर्ष में मूल सहित वह सब नष्ट हो जाता है।
         कहने का अर्थ यही है कि अन्याय से कमाया धन एक निश्चित अवधि तक ही मनुष्य के पास स्थिर रहता है, उसके बाद वह नष्ट होने लगता है। अतः मनुष्य को अन्यायपूर्वक धन अर्जित करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यदि वह ऐसा करता है, तो धन उस व्यक्ति का अधिक समय तक साथ नहीं निभाता। पापकर्म द्वारा कमाया गया यह धन अपने साथ कई बुराइयों को भी लेकर आता है। इनके चलते धन की बर्बादी होती है तथा घर में रोग अपना स्थायी डेरा जमा लेते हैं।
        अनुचित तरीके से कमाने वाले लोगों के घर के सदस्यों का परस्पर व्यवहार कटु होने लगता है। वे लोग एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसन्द नहीं करते। वे आपस में एक-दूसरे पर सन्देह की नजर से देखने लगते हैं। उन सबमें छत्तीस का आंकड़ा रहता है। ऐसे घरों के बच्चे भी अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते। वे बहुत ही घमण्डी और अनुशासनहीन हो जाते हैं। ऐसे वे बच्चे अपने माता-पिता का सम्मान तक नहीं करते। उनकी दृष्टि में वे केवल एटीएम कार्ड होते हैं, जिससे मनचाहा पैसा लेकर खर्च किया जा सकता है। 
          इसीलिए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि पैसा कमाने के लिए लालची लोग अन्याय और पापकर्म करते हैं। दूसरों को कष्ट देकर कमाया गया धन अधिक समय तक सुख नहीं देता। ऐसे लोग चाहे कितना भी धन कमा लें लेकिन इन्हें मानसिक शान्ति नहीं प्राप्त होती। इनका मन सदा विचलित रहता है। इनका मन कभी न कभी इन्हें गलत कामों के लिए धिक्कारता है। ऊपर से वे कितना शान्त दिखने का प्रयास करें परन्तु चेहरे पर परेशानी के भाव आ ही जाते हैं।
         इसके विपरीत जो लोग धर्मानुसार धन कमाते हैं, वे भले ही समाज की दृष्टि में अभावों में जीवन व्यतीत कर रहे हों, उनका घर अधिक साधन सम्पन्न न हों परन्तु मन की शान्ति उनके पास होती है। उनके घर में वास्तव में स्वर्ग होता है। वहॉं के लोगों में परस्पर प्यार होता है। वे सामंजस्यपूर्वक रहकर जीवन व्यतीत करते हैं। वे आचार्य चाणक्य इसीलिए हमें समझा रहे हैं कि सदा धर्म के अनुसार ही धन को कमाना श्रेयस्कर होता है अन्यथा भविष्य में कई प्रकार के कष्ट भोगने पड़ सकते हैं।
            लोभ के चलते किए गए गलत कार्य निश्चित ही मनुष्य को कड़वा फल प्रदान करते हैं। उस समय मनुष्य को बहुत कष्ट होता है, जिसे सहन करना उसके लिए कठिन हो जाता है। तब मनुष्य ईश्वर को दोष देता है कि वह उसके साथ अन्याय कर रहा है। जबकि ईश्वर बड़ा ही दयालु और न्याय करने वाला है। बड़ी ही सरलता से अपने दोष ईश्वर पर डालकर हम सब अपने अहं को झूठी तसल्ली देने का प्रयास करते हैं।
           धन सदा ही सात्विक तरीकों से कमाना चाहिए। उसी में बरकत होती है। शुद्ध कमाई के धन से खरीदे गए अन्न को खाकर परिवारी जनों के मनोमस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। ऐसे ही घर स्वर्ग के समान सुन्दर होते हैं जो सबके हृदयों पर अपनी छाप छोड़ते हैं। अन्याय से धन कमाने वाले की लोग परोक्ष में निन्दा करते हैं। इसलिए मनुष्य को स्वयं ही विचार करना है कि वह किस मार्ग का अनुगामी बनना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद