वृद्धावस्था का आधार गीता का सार
जीवन के संध्याकाल में मनुष्य को इस संसार में जल में कमल की तरह रहना चाहिए। जिस प्रकार जल में रहते हुए भी कमल को जल छू भी नहीं पाता। उसी प्रकार सकारात्मक विचार रखते हुए मनुष्य को भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार मोह-माया से स्वयं को दूर करके ईश्वर की उपासना में मन लगाना चाहिए। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जैसे महाराज जनक राजकाज करते हुए भी दुनिया की मोह-माया से विरक्त थे, तभी उन्हें विदेहराज कहते हैं। उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने सभी दायित्वों को पूर्ण करना चाहिए पर उनमें फॅंसकर नहीं रह जाना चाहिए।
हर कार्य को परमात्मा को समर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य में कर्त्तापन का भाव नहीं आता। तब अहंकार उसके पास फटकता तक नहीं है। निस्सन्देह वृद्धावस्था का आधार गीता का सार ही है। 'श्रीमद्भगवद् गीता' धर्मज्ञान के साथ साथ मनुष्य को जीवन जीने की कला भी समझाती है। गीता के उपदेशों का अनुसरण करके वृद्धावस्था में मनुष्य न केवल स्वयं का बल्कि समाज का भी भला कर सकता है।
महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन शत्रु सेना में अपने बंधु-बांधवों को देखकर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दुख का त्याग करके अपने कर्तव्य के पथ पर अग्रसर होने का उपदेश दिया था। कहने का अर्थ है कि मनुष्य को केवल कर्म करते रहना चाहिए, शेष सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसे परिणाम की प्राप्ति होती है। इसलिए अपने शेष बचे हुए जीवन में सकारात्मक रहकर अच्छे कर्म करने का यत्न करना चाहिए।
वृद्धावस्था में मन पर नियन्त्रण रखना बहुत आवश्यक होता है। मन बहुत चंचल होता है और वह सदा यहाँ वहाँ भटकता रहता है। इस अशांत मन को अभ्यास और वैराग्य के नियमित अभ्यास से वश में किया जा सकता है। जब मनुष्य इस मन को साध लेता है तो मन उसके अनुसार चलने लगता है। यानी मनुष्य मन का स्वामी बन जाता है, उसका सेवक नहीं बनता। इससे यह मन अनावश्यक ही उसे अपने इशारों पर नहीं नचा पाता। मन के कहने में न आकर मनुष्य स्वयं ही अपने लिए नियमों को बनाता है।
वृद्धावस्था में प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य तनाव से मुक्त रहे। यह तनाव मनुष्य के विनाश का कारण बन जाता है। इससे डिप्रेशन में जाने की सम्भावना बनी रहती है। व्यर्थ की चिन्ता और असुरक्षा की भावना से व्यथित नहीं होना चाहिए। वृद्धों में साधारणत: यह भावना दिखाई देती है। इस आयु में अनावश्यक ही पूर्वाग्रह नहीं पालने चाहिए। ऐसा करने से आखिर वह किस पर विश्वास कर सकेगा। इस प्रकार तो जीना ही कठिन हो जाएगा। इसलिए तनाव से मुक्त रहने के लिए धर्म और कर्म का मार्ग अपनाना चाहिए।
वृद्धावस्था में भी मनुष्य को आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। जहॉं तक सम्भव हो अपने कार्य स्वयं ही करने का उसे अभ्यास बनाना चाहिए।अपना कार्य ईमानदारी से करना चाहिए। इस आयु में आकर भी मनुष्य यदि जोड़-तोड़ में लगा रहता है तो वह अपना सम्मान खो देता है। सारी आयु मनुष्य भागमभाग में व्यस्त रहता है। अब उस आपाधापी वाली जिन्दगी से दूर रहकर उसे अपने जीवन को संयत कर लेना चाहिए। शान्त मन से बैठकर स्वाध्याय करना चाहिए और ईश्वर की आराधना में अपना समय व्यतीत करना चाहिए।
वृद्धावस्था में क्रोध पर नियन्त्रण रखना बहुत आवश्यक होता है। क्रोध सभी बुराइयों का मूल है। गीता में लिखा है कि क्रोध भ्रम पैदा करता है और भ्रम से बुद्धि विचलित होती है। घर या बाहर यदि मनुष्य अनावश्यक क्रोध करता रहेगा तो वह अपना सम्मान खो देगा। कोई भी उसकी बात को सुनने के लिए तैयार नहीं होगा। वह घर में अलग थलग होकर अकेलेपन का शिकार हो जाएगा। इसका सबसे बड़ा कारण है कि क्रोधी मनुष्य को कोई भी पसन्द नहीं करता। सभी उससे कन्नी काटकर निकलने का प्रयास करते हैं।
यह शरीर नश्वर है, इसे एक दिन अवश्य ही इस संसार को त्यागकर जाना होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के शरीर परिवर्तन को मनुष्य के वस्त्र परिवर्तन के समान बताया है। उनके अनुसार मृत्यु समयानुसार आनी है। इसलिए इसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए। हमारा शरीर एक रथ के समान है जो आत्मा रूपी सवार का साधन मात्र है। इसका सही तरीके से रख-रखाव करना बहुत आवश्यक है। इसे उचित आहार-विहार से पुष्ट करना चाहिए। जिह्वा के स्वादों को इस अवस्था में त्याग देना उचित होता है।
इस संसार में सभी जीव यात्री हैं। हमें निश्चत समय व निश्चत स्टेशन पर उतर जाना होता है। अत: वृद्ध होने पर भी प्रसन्नतापूर्वक जीना चाहिए। अपने मन में निराशा या हताशा का भाव कदापि नहीं रखना चाहिए। पुनर्जन्म होने पर शरीर फिर से प्राप्त होना ही होता है। समयानुसार किसी न किसी रूप में जीव को इस नश्वर संसार में आना होता है। उस समय फिर से सभी रिश्ते-नाते पुनः नए रूप में ही मिलते हैं। इसलिए साथ छोड़कर जाने वालों के लिए शोक या दुख नहीं करना चाहिए।
इस आयु तक आते-आते मनुष्य के पास अनुभव रूपी ज्ञान का खजाना एकत्रित हो जाता है। अपनी सुखद वृद्धावस्था के लिए मनुष्य धन का संचय भी करता है। अपने अर्जित धन को यथायोग्य निर्धन व जरूरतमन्द के लिए यदा-कदा दान देना चाहिए। इस तरह धन की सार्थकता का अनुभव होता रहेगा। अपने ज्ञान के कोश का सदुपयोग करके मनुष्य को आत्म सन्तोष होता है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसका ज्ञान व्यर्थ नहीं गया। उससे किसी का तो मार्गदर्शन हुआ। समाज को दिशा देने का कार्य समाज के बुजुर्गों को करना चाहिए।
वृद्धावस्था में आत्मचिन्तन करना बहुत आवश्यक होता है। मनुुष्य को प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। इससे व्यक्ति के अंतस में छुपे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सकता है। सभी जीवों में परमात्मा का अंश जीवात्मा विद्यमान है। इसलिए उन्हें अपने समान समझते हुए सभी प्राणियों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। अपने बच्चों से आशा व अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। जितना हो सके उनकी सहायता करनी चाहिए। हर परिस्थति में ईश्वर का धन्यवाद करते हुए प्रसन्न रहना चाहिए।
'श्रीमद्भगवद्गीता' को सभी उपनिषदों का सार कहा जाता है। इसमें बताए गए जीवन मूल्यों से जीवन के हर पड़ाव की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति मनुष्य को मिलती है। उसका आत्मिक बल बढ़ता है। इसलिए मनुष्य को गीता में बताए गए सूत्रों को हृदय की गहराई से अपना कर्तव्य मानकर अपनाना चाहिए। इसके लिए किन्तु या परन्तु नहीं करना चाहिए। वृद्धावस्था में इन बताए गए सूत्रों को अपनाने से निस्संदेह व्यक्ति उन्नति के पथ की ओर निरन्तर अग्रसर होता है। उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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