आयु से परिपक्वता का लेना-देना नहीं
एक आयु के पश्चात मनुष्य को परिपक्व हो जाना चाहिए। उसे बचकानी हरकतें करने से बचना चाहिए। यदि मनुष्य ऐसा नहीं करता है तो वह अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में हंसी का पात्र बनता है। कोई भी उसे सीरियसली नहीं लेता बल्कि मसखरा या जोकर समझकर उसको अनदेखा करते हैं। कुछ समय मन बहलाने के लिए तो ठीक है पर अधिक समय तक उसे सहन करना कठिन हो जाता है। तब उसे उन सब पर क्रोध आता है। वह सोचता है कि सभी लोग मूर्ख हैं जो उसका सम्मान नहीं करते।
मनुष्य को आयु के बढ़ने के साथ-साथ स्वयं की ओर ध्यान देना आरम्भ करना चाहिए। उसे अनावश्यक तनाव लेने से बचना चाहिए। हर परिस्थिति में शान्त रहने का प्रयास करना चाहिए। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह जो भी कर रहा है, वह अपनी स्वयं की शान्ति के लिए है। तभी वह स्वयं के लिए जीना प्रारम्भ करता है। सबसे आवश्यक बात यह है कि उसे दूसरों से अपनी तुलना करनी बन्द कर देनी चाहिए। इसका कारण यही है कि हर व्यक्ति की कार्य करने की सामर्थ्य और स्थितियॉं भिन्न होती हैं।
मनुष्य को अपनी जरूरतों और इच्छाओं के बीच का अन्तर समझ लेना चाहिए। अपनी चाहतों को, अपनी प्रसन्नता को भौतिक सांसारिक वस्तुओं के साथ जोड़ना उचित नहीं होता। इन वस्तुओं के पीछे भागना मृगतृष्णा के समान है। एक वस्तु की कामना करना और उसे यत्नपूर्वक प्राप्त कर लेने के बाद दूसरी ही इच्छा मुॅंहबाये खड़ी हो जाती है। तो कब तक इस छलावे में जिया जा सकता है। कभी तो अपनी अनावश्यक कामनाओं से किनारा करना ही पड़ेगा। तभी तो घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास सम्भव हो सकता है।
हर व्यक्ति अपने हिसाब से ठीक होता है। यही सोचना चाहिए कि हर व्यक्ति की अपनी-अपनी सोच है। किसी को उसके आधार पर सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए अपने रिश्तों से अधिक उम्मीद करना त्याग देना चाहिए। उसके स्थान पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। यही सोच बनानी चाहिए कि कोई हमारे लिए कुछ कर दे ठीक है और यदि न करें तो भी हम पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। इस प्रकार की मानसिकता जब मनुष्य बना लेता है तब वह मस्त रहना सीख जता है।
किसी को भी दुनिया में यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है कि आप कितने अधिक बुद्धिमान हैं। अतः दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना छोड़ देना चाहिए। समाज को स्वयं ही यह समझने दीजिए कि आप बहुत योग्य हैं। जब लोग आपसे व्यवहार करेंगे तो वे स्वयं ही आपकी बुद्धिमत्ता का लोहा मानने लगेंगे। इसलिए सब समय पर छोड़ दीजिए। यह मानकर चलिए कि हीरा खुद होकर कभी किसी को अपना मूल्य नहीं बताता बल्कि जौहरी स्वयं ही उसे देख-परखकर उसका मूल्यांकन कर लेता है।
इन सबसे भी बढ़कर मनुष्य को अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। दूसरों को बदलने का प्रयास करना छोड़ देना चाहिए। इसके स्थान पर स्वयं की ओर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। आत्मोद्धार के लिए प्रयास करना श्रेयस्कर होता है। यही सोचना चाहिए कि जब मनीषी समाज में लोगों को नहीं बदल पाते तो फिर हम कैसे यह कार्य कर सकते हैं? समझदारी इसी में है कि जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाए। 'छोड़ो जाने दो' वाली उक्ति को समझकर सीख लेना चाहिए। तब मन को कष्ट नहीं होता।
लोग क्या कहते हैं, क्या करते हैं? इसकी चिन्ता में अपना समय व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। जिन्होंने नहीं समझना उनके लिए अपना समय और शक्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जानते-बूझते भी अज्ञ यानी मूर्ख बन जाते हैं। उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। इसका कारण है कि सोए हुए व्यक्ति को तो जगाया जा सकता है पर जो ऑंख बन्द करके सोने का अभिनय कर रहा हो, उसे किसी भी तरह नहीं जगाया जा सकता। उसे उसी अवस्था में छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए।
समझदार होने या परिपक्व होने की आयु में व्यक्ति को अनावश्यक ही रूठना, मानना या नखरे नहीं दिखाने चाहिए। उसे इन भावों से ऊपर उठ जाना चाहिए। उसकी आयु को देखते हुए शायद मुॅंह पर उसे कोई कुछ न कहे पर वह अपना सम्मान दूसरों की नजरों में खो देता है। घर-परिवार के सदस्य अथवा बन्धु-बान्धव उसके ऐसे व्यवहार के कारण उसे अनदेखा करने लगते हैं। तब उसे उन सब पर क्रोध आने लगता है और वह अनर्गल प्रलाप करने लगता है। यह स्थिति किसी भी प्रकार से अच्छी नहीं कही जा सकती।
आयु से परिपक्वता का कोई लेना-देना नहीं है। यदि मनुष्य अपना मान-सम्मान बनाए रखना चाहता है तो उसे स्वयं पर नियन्त्रण रखना चाहिए। छोटे-बड़े को यथोचित आदर और मान देना चाहिए। उसे अपने मन की संकीर्णता का त्याग करके विशाल हृदय बनना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह समय का सदुपयोग कर सकता है। अपनी रुचि का कार्य कर सकता है। स्वाध्याय करने में समय व्यतीत कर सकता है। ईश्वर की उपासना में मन लगा सकता है। जनहित के कार्य करके समाज को दिशा दे सकता है।
जीवनकाल में मनुष्य यदि इन छोटी-छोटी बातों पर गहनता से विचार करने लगे तो वास्तव में वह परिपक्व लोगों की श्रेणी में गिना जाता है। उसे हर स्थान पर महत्त्व दिया जाता है। उससे विचार-विमर्श किया जाता है। इस प्रकार उसका इहलोक और परलोक संवर जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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