रविवार, 20 अप्रैल 2025

जीवन का सार

 जीवन का सार

मनुष्य इस संसार में सीमित समय के लिए आता है।उसे यह समझ लेना चाहिए कि जितने साल तक वह अपना जीवन जी चुका है, उसका उसके बाद का शेष जीवन अब कुछ ही वर्षों का बच गया है। इसलिए प्रसन्न रहने के लिए उसे जीवन में कई परिवर्तन लाने चाहिए। उसे स्वयं के लिए समय निकालना चाहिए। जिन कार्यों को वह अभी तक अपनी व्यस्तता के कारण पूर्ण नहीं कर सका, उन पर उसे ध्यान देना चाहिए। तभी उसका जीवन सुखमय हो सकता है।
          सबसे पहले मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि यह संसार मरणधर्मा है। यहॉं कोई भी सदा के लिए नहीं रहने वाला। आज उसका कोई प्रियजन दुनिया से विदा ले रहा है, तो कल उसका भी नम्बर आने वाला है। किसी के चले जाने से संसार का कोई काम नहीं रुकता। सृष्टि पहले की ही भॉंति चलती रहती है। दो-चार दिन रोने-धोने के पश्चात घर-परिवार के लोग, पड़ोसी, बन्धुजन सभी अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाऍंगे। वे मौज-मस्ती, खाने पहनने में मस्त रहेंगे।  
         यथासम्भव स्वयं के लिए समय निकालता चाहिए। अपनी भागदौड़ वाली जिन्दगी में अपने और अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल सके। उस समय कार्यक्षेत्र की व्यस्तता की मजबूरी रही थी, परन्तु अब समय मिला है, तो उसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए। बच्चों के और अपने जीवनसाथी के साथ क्वालिटी टाइम बिताने का प्रयास करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार शापिंग करिए, यात्रा पर जाइए और बन्धु-बान्धवों के पिकनिक पर जाइए। इसके अतिरिक्त कभी-कभी फाइव स्टार होटल में रहने के स्थान पर प्रकृति की गोद में रहने जाइए। रिसोर्ट में रहने का अनुभव लीजिए। इससे जीवन में और भी आनन्द आएगा।
          यह बात स्मरण रखने योग्य है कि हमारे सामने कोई व्यक्ति चाहे पैसे, पावर और पोजीशन वाला क्यों न हो, किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। कोई किसी को कुछ नहीं देने वाला। सबको अपनी कमाई पर ही सन्तोष करना होता है। जहॉं अपना स्वार्थ सिद्ध होता हो, लोग उसी से ही अपना सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास करते हैं। जब स्वार्थ की पूर्ति हो जाती है, तब वे पहचानने से ही इन्कार कर देते हैं। फिर ऐसे इन लोगों को क्योंकर भाव देकर महान बनाना।
          लोगों के अच्छे कार्यों और विचारों की खुले दिल से प्रशंसा करनी चाहिए। ऐसा करने से मन को वास्तविक आनन्द मिलता है।‌ ऐसे लोगों से सदा दूरी बनाकर रखनी चाहिए, जो अपनी बुरी आदतों और जड़ मान्यताओं को दूसरे लोगों पर थोपने का यत्न करते हैं। ऐसे लोगों को सुधारने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कोई जीवन की दौड़ में एक कदम पीछे करे, तो उससे दस कदम पीछे हट जाना चाहिए। एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य को स्वयं से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, अन्य किसी से नहीं। अपनी प्रसन्नता को इसलिए बलि नहीं चढ़ाना चाहिए कि लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे। यानी चार लोगों को खुश रखने के लिए स्वयं का मन नहीं मारना चाहिए।
          किसी गलत व्यक्ति के सामने अपने आप को सही साबित करने के स्थान पर मौन रहना उचित होता है। इससे अपनी मानसिक शान्ति बनी रहती है। मनुष्य को खुद से प्यार करना चाहिए। अपने दुख और कठिनाइयों को उजागर नहीं करना चाहिए। लोग सामने सहानुभूति दिखाते हैं, पर पीठ पीछे मजाक उड़ाते हैं। जो अपना होता है वह स्वयं ही बिना कहे दूसरे की परेशानी समझ जाता है, उसे कहना नहीं पड़ता। बाकी लोगों के समक्ष अपने मन की बात कहने से बचना चाहिए।
          हम बड़े-बड़े शोरूम में जाते हैं या मॉल में जाते हैं, वहॉं बिना मोलभाव किए जरूरत का ब्रॉंडेड सामान खरीद कर ले आते हैं। परन्तु हम रेहड़ी पटरी वालों से मोलभाव करते हैं। हम जानते हैं कि उन मंहगे स्थानों पर ठगे जा रहा हैं, फिर भी परवाह नहीं करते। जो बेचारे कम कीमत पर हमें सामान बेचते हैं, उन्हें हम बुरा-भला कहते हैं। इस ठगने-ठगाने के विषय में मुझे कबीरदास जी का एक दोहा स्मरण हो रहा है -
     कबीरा आप ठगाइये और न ठगिये कोय।
    आप ठगै सुख ऊपजे और ठगे दुख होय।। 
कबीरदास जी ने बहुत अच्छी बात कही है कि स्वयं बेशक ठगे जाइए, परन्तु किसी को ठगना अच्छी बात नहीं है। जब हम ठगे जाते हैं, तो सुख की उत्पत्ति होती है यानी मन में सन्तोष होता है कि हमने किसी का अहित नहीं किया। किन्तु जब हम दूसरे को ठगते हैं तो दुख होता है। हमारा मन हमें कचोटता है।
          जीवन काल में अपने और अपने घर-परिवार पर हम हजारों-लाखों रुपये खर्च कर देते हैं। यदि हो सके तो किसी जरूरतमन्द व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए। उसकी समय पर आवश्यकता पूरी होगी, तो उसके मन से निकली दुआ हमारे लिए बहुत उपयोगी होती है। वैसे भी हमारे मनीषी दान का बहुत महत्व बताते हैं। वे हमें सुपात्र को दान देने के लिए सदा प्रेरित करते रहते हैं। 
            जीवन बहुत ही अमूल्य है। हर पल को मस्ती के साथ बिताइए। सुख या दुख केवल अपने ही हैं, जितनी जल्दी मनुष्य यह सार समझ ले, उसे दुनिया के थपेडों से डर नहीं लगता। यह निश्चित है कि समय कैसा भी हो बीत जाता है। आत्मिक सुख के लिए मानवता की सेवा, जीवों पर दया और प्रकृति की सेवा करनी चाहिए। अपने ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए और सबसे बढ़कर ईश्वर की उपासना में भी समय व्यतीत करना चाहिए। अनन्त का मार्ग इन्हीं उपायों से मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें