मर्यादाओं का पोषक मध्यमवर्ग
समाज और देश में जो नैतिकता बची हुई है उसका श्रेय मध्यमवर्गीय परिवारों को ही जाता है। नैतिकता और मर्यादा से परे ऐसे बहुत से सारे कार्य होते हैं जिनका प्रभाव सिर्फ मध्यमवर्गीय परिवारों पर होता है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि समाज और परिवार का भय सिर्फ उन्हीं को ही होता है और आत्मग्लानि का भाव भी उन्हें ही अधिक होता है।
बेटी ससुराल वालों के अत्याचारों से परेशान होकर मायके में शरण लेती है। अपने पति के दुर्व्यवहार के कारण या उसके विवाहेत्तर सम्बन्धों के चलते अपने माता-पिता के पास आ जाती है। कभी पति या पत्नी में किसी समस्या के कारण सन्तान न होने पर पत्नी को दोषी मानकर उसे मायके जाने के लिए विवश कर दिया जाता है। इनमें से कोई भी कारण हो सकता है जब किसी लड़की को अपने पति या ससुराल को छोड़ना पड़ जाता है। इन सब कारणों के अतिरिक्त किन्हीं अपरिहार्य कारणों से तलाक लेना पड़ जाता है। इन सब परिस्थितियों में लड़की का जीना समाज दुश्वार कर देता है। उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता है, समाज का डर दिखाया जाता है। हालात कैसे भी रहते हों, उस पर ही हर हाल में सामंजस्य स्थापित करने के लिए दबाव बनाया जाता है।
यदि हम उच्चवर्णीय परिवारों की ओर देखें तो पता चलता है कि वे इन सभी बन्धनों से मुक्त हैं। वहॉं शायद इन सब नियमों के मायने ही अलग हैं। पति-पत्नी दोनों ही अपने आचार-व्यवहार के प्रति उदासीन प्रतीत होते हैं। इनके अतिरिक्त टीवी और फिल्म जगत के नायक-नायिकाओं की ओर मध्यमवर्ग टकटकी लगाए देखता रहता है। उनके जैसे जीवन मूल्यों को अपनाना चाह कर भी समाज के डर से मन मसोस कर रह जाता है। फिर अपने कदम समेट लेता है।
उच्चवर्ग के अतिरिक्त नव धनाढ्य वर्ग भी सभी वर्जनाओं को तोड़कर लम्बी उड़ान भरना चाहता है। वह कहीं दूर आगे निकल जाना चाहता है। उसके लिए किसी सामाजिक नियम अथवा मर्यादा की अवहेलना करना मामूली-सी बात बन जाती है। ऐसा करते हुए उसे किसी प्रकार का अपराधबोध भी नहीं होता। वह इन सबसे परे अपनी ही मौज-मस्ती में व्यस्त रहता है। उसकी बला से यह दुनिया भाड़ में जाए।
निम्नवर्ग अपनी दैनन्दिन समस्याओं से ही सदा जूझता रहता है। वह अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए जोड़-तोड़ में लगा रहता है। उसे दो समय का खाना भी प्रतिदिन मिल जाए तो वही उसके लिए बहुत होता है। ऐसी स्थिति में संस्कार या मर्यादा जैसे शब्द उसे भारी भरकम प्रतीत होते हैं। इनके विषय में यदि वह सोचने लगे तो उलझकर ही रह जाएगा।
तुलसीदास जी ने रामायण में एक स्थान पर बहुत ही सत्य कहा है -
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
इसका यही अर्थ हुआ कि समर्थ या शक्ति सम्पन्न व्यक्ति को कोई दोष नहीं दिया जाता। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सारे सामाजिक नीति नियम और परम्पराओं को मानने की आशा केवल निर्बल व्यक्ति से ही की जाती है। शक्तिशाली व्यक्ति किसी परम्परा अथवा नियम को मानने या न मानने के लिए बाध्य नहीं होता। उस पर किसी का कोई जोर नहीं चलता। यदि वह किसी पर अन्याय करता है या समाज विरोधी कार्य करता है तब भी समाज उसका विरोध न करके उसकी हॉं में हॉं मिलाता है।
विवाहेतर सम्बन्ध चाहे स्त्री के हों या पुरुष के, हमारे समाज में हेय समझे जाते हैं। ऐसे सम्बन्धों वाले स्त्री और पुरुष का व्यवहार कुछ ज्यादा ही मधुर होता है। वे अपने आश्रितों का अधिक ध्यान रखते हैं ताकि उनका विश्वास बना रहे। उन पर कोई अविश्वास न कर सके।
यहॉं भी मध्यमवर्ग ऐसे सम्बन्धों को कदापि सहन नहीं कर सकता। जबकि आर्थिक युग में उच्चवर्ग में ये सम्बन्ध आम होने लगे हैं। वे लोग इसकी परवाह भी नहीं करते और न ही कोई किसी पर अंगुली उठाता है। सभी अपने में मस्त रहते हैं। अपनी समस्याओं में उलझा निम्नवर्ग अपनी दो जून की रोटी कमाने की जद्दोजहद में लगा रहता है। उसे इन सबसे कोई लेना-देना नहीं होता।
भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, हेराफेरी, दूसरे का गला काटना आदि समाज विरोधी कार्य मध्यमवर्ग के लिए बहुत निम्न स्तर के कार्य होते हैं। इन कार्यों में लिप्त पाए जाने पर यदि न्याय व्यवस्था के दोषी बनकर जेल की हवा खानी पड़ जाए तो उनके लिए मृत्यु तुल्य होता है। उन्हें लगता है कि वे किसी को मुॅंह दिखाने लायक नहीं रहे।
इसके विपरीत उच्चवर्ग और निम्नवर्ग के लोगों के जमीर पर इन सबका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे धड़ल्ले से समाज विरोधी इन गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं। उच्चवर्ग के लोग ये सब करने में अपनी शान समझते हैं। उनके लिए यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। निम्नवर्ग अपनी मजबूरियों के कारण ऐसे कार्य करता है। उसे लगता है दो रोटी ही तो खानी हैं चाहे कहीं भी रहकर मिल जाऍं।
अपवाद सर्वत्र हो सकते हैं। हर वर्ग के व्यक्तियों की अपनी अलग सोच हो सकती है। मेरे इस विश्लेषण का तात्पर्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुॅंचाना नहीं है। समाज के विभिन्न लोगों के विचारों को पढ़ने और उनसे मिलने के उपरान्त ही ऐसा लिखा है।
चन्द्र प्रभा सूद
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