गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

उपार्जित धन की अवधि

उपार्जित धन की अवधि निश्चित 

मनीषी कहते हैं कि लक्ष्मी बहुत ही चंचल होती है। 'कबीर बानी' में कबीरदास जी का एक सबद है - 
  माया महा ठगनी हम जानी।
  तिरगुन फाँसि लिये कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
 केसव के कमला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
 पंडा के मूरत होइ बैठी तीरथहू में पानी।
 जोगी के जोगिन होइ बैठी, काहू के कौड़ी कानी।
 भक्तन के भक्तिन होइ बैठी, ब्रह्मा के ब्रह्मानी।
 कहैं कबीर सुनो भाई साधो, 
  यह सब अकथ कहानी।।
         इस सबद के अनुसार लक्ष्मी एक स्थान पर टिककर नहीं रहती। वह यहाँ वहाँ भ्रमण करती रहती है। यदि उसे चोरी, जुआ, अन्याय और धोखे से कमाया जाए, तब लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है। फिर शीघ्र ही साथ छोड़कर, अँगूठा दिखाकर अन्यत्र चली जाती है। इसलिए मनुष्य को अन्याय से कभी धन कमाने का न प्रयास करना चाहिए और न ही सोचना चाहिए।
           पैसे या धन की प्रधानता प्राचीन काल यानी हर काल में ही रही है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हर व्यक्ति को अपने जीवन को चलाने के लिए बहुत सारा धन चाहिए होता है। वह दुनिया के सारे ऐश्वर्य जुटा लेना चाहता है, ताकि उसका परिवार सुख-सुविधा से रहे। उन्हें किसी वस्तु की कमी न रहे। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मनुष्य को धन के अभाव में अपने जीवन का निर्वाह कर पाना असम्भव-सा प्रतीत होता है। 
         आजकल मनुष्य के मन में पैसे की भूख इतनी अधिक बढ़ गई है कि वह जायज-नाजायज किसी भी तरह से शीघ्र ही धन कमा लेना चाहता है। रातों रात धनवान बनना चाहता है। ऐसा नहीं है कि आज ही के समय में इस प्रकार के अनैतिक कार्यों से धन कमाने को होड़ लगी हुई है बल्कि प्राचीन काल में भी अनेक लोग अनुचित मार्गों से धन कमाया करते थे। चोरी, डकैती, सेंधमारी जैसे अनुचित मार्ग कुछ लोग अपनाते थे। सत्य बात यह है कि उस समय उन लोगों को समाज हेय दृष्टि से देखा करता था।
           'चाणक्यनीति:' में आचार्य चाणक्य का इस विषय में कथन है-
       अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति।
       प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति।।
अर्थात् अन्याय के द्वारा उपार्जित यानी कमाया हुआ धन दस वर्ष तक ही मनुष्य के पास टिकता है। ग्यारहवें वर्ष में मूल सहित वह सब नष्ट हो जाता है।
         कहने का अर्थ यही है कि अन्याय से कमाया धन एक निश्चित अवधि तक ही मनुष्य के पास स्थिर रहता है, उसके बाद वह नष्ट होने लगता है। अतः मनुष्य को अन्यायपूर्वक धन अर्जित करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यदि वह ऐसा करता है, तो धन उस व्यक्ति का अधिक समय तक साथ नहीं निभाता। पापकर्म द्वारा कमाया गया यह धन अपने साथ कई बुराइयों को भी लेकर आता है। इनके चलते धन की बर्बादी होती है तथा घर में रोग अपना स्थायी डेरा जमा लेते हैं।
        अनुचित तरीके से कमाने वाले लोगों के घर के सदस्यों का परस्पर व्यवहार कटु होने लगता है। वे लोग एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसन्द नहीं करते। वे आपस में एक-दूसरे पर सन्देह की नजर से देखने लगते हैं। उन सबमें छत्तीस का आंकड़ा रहता है। ऐसे घरों के बच्चे भी अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते। वे बहुत ही घमण्डी और अनुशासनहीन हो जाते हैं। ऐसे वे बच्चे अपने माता-पिता का सम्मान तक नहीं करते। उनकी दृष्टि में वे केवल एटीएम कार्ड होते हैं, जिससे मनचाहा पैसा लेकर खर्च किया जा सकता है। 
          इसीलिए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि पैसा कमाने के लिए लालची लोग अन्याय और पापकर्म करते हैं। दूसरों को कष्ट देकर कमाया गया धन अधिक समय तक सुख नहीं देता। ऐसे लोग चाहे कितना भी धन कमा लें लेकिन इन्हें मानसिक शान्ति नहीं प्राप्त होती। इनका मन सदा विचलित रहता है। इनका मन कभी न कभी इन्हें गलत कामों के लिए धिक्कारता है। ऊपर से वे कितना शान्त दिखने का प्रयास करें परन्तु चेहरे पर परेशानी के भाव आ ही जाते हैं।
         इसके विपरीत जो लोग धर्मानुसार धन कमाते हैं, वे भले ही समाज की दृष्टि में अभावों में जीवन व्यतीत कर रहे हों, उनका घर अधिक साधन सम्पन्न न हों परन्तु मन की शान्ति उनके पास होती है। उनके घर में वास्तव में स्वर्ग होता है। वहॉं के लोगों में परस्पर प्यार होता है। वे सामंजस्यपूर्वक रहकर जीवन व्यतीत करते हैं। वे आचार्य चाणक्य इसीलिए हमें समझा रहे हैं कि सदा धर्म के अनुसार ही धन को कमाना श्रेयस्कर होता है अन्यथा भविष्य में कई प्रकार के कष्ट भोगने पड़ सकते हैं।
            लोभ के चलते किए गए गलत कार्य निश्चित ही मनुष्य को कड़वा फल प्रदान करते हैं। उस समय मनुष्य को बहुत कष्ट होता है, जिसे सहन करना उसके लिए कठिन हो जाता है। तब मनुष्य ईश्वर को दोष देता है कि वह उसके साथ अन्याय कर रहा है। जबकि ईश्वर बड़ा ही दयालु और न्याय करने वाला है। बड़ी ही सरलता से अपने दोष ईश्वर पर डालकर हम सब अपने अहं को झूठी तसल्ली देने का प्रयास करते हैं।
           धन सदा ही सात्विक तरीकों से कमाना चाहिए। उसी में बरकत होती है। शुद्ध कमाई के धन से खरीदे गए अन्न को खाकर परिवारी जनों के मनोमस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। ऐसे ही घर स्वर्ग के समान सुन्दर होते हैं जो सबके हृदयों पर अपनी छाप छोड़ते हैं। अन्याय से धन कमाने वाले की लोग परोक्ष में निन्दा करते हैं। इसलिए मनुष्य को स्वयं ही विचार करना है कि वह किस मार्ग का अनुगामी बनना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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