चिकित्सा सुविधाएँ
विज्ञान की कृपा से आज आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं। बहुत से सरकारी एवं प्राइवेट अस्पतालों में विभिन्न रोगों की चिकित्सा कराई जा सकती है। इनमें प्रशिक्षित और स्पेशलिस्ट डॉक्टर विद्यमान रहते हैं। अब अनेकानेक मल्टी स्पेशिलटी अस्पताल बड़े-बड़े शहरों में खुल चुके हैं। उन्हें हम फाइव स्टार होटलों की श्रेणी में रख सकते हैं। जितना अधिक पैसा मनुष्य खर्च कर सकता है, वहॉं उतनी ही अधिक सुविधाएँ उसे उपलब्ध कराई जाती हैं।
जितनी ऊपरी चमक-दमक ये हमें दिखाते हैं, उतनी ही अधिक जेब भी काटते हैं। ऐसा भी सुनने में आया है कि यहाँ कार्यरत डाक्टरों को अस्पताल की आय बढ़ाने के लिए टारगेट दिए जाते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है, कम-से-कम मैं तो नहीं कह सकती। इन अस्पतालों की सबसे बड़ी सुविधा यही है कि एक ही छत के नीचे सभी कार्य हो जाते हैं। रोगी को अपने विभिन्न टेस्ट, एक्स-रे, ईसीजी आदि करवाने के लिए कहीं अन्यत्र नहीं भागना पड़ता। वहीं पर टेस्ट करवाओ और डॉक्टर को दिखाकर परामर्श लें लो।
आजकल वे डाक्टर बहुत ही कम रह गए हैं जो नब्ज पकड़ते ही रोग की जड़ तक पहुँच जाते थे। एक रोग को समझने के लिए आजकल के ये डॉक्टर न जाने कितने ही टेस्ट करवा लेते हैं। उस पर भी बिमारी ठीक से पकड़ में आ जाएगी कोई गारण्टी नहीं। इस विषय पर भी सोशल मीडिया टी. वी., समाचार पत्र प्रकाशित करते रहते हैं कि रोग कोई और था, इलाज कुछ और हो रहा था। होने वाली ऐसी लापरवाही रोगी का मनोबल तोड़ देती है। इसीलिए लोग परेशान होकर डॉक्टरों पर अदालत में केस दायर कर देते हैं।
आज के समय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि युवा डॉक्टरों की इस पीढ़ी में सहनशक्ति का बहुत अभाव है। इनकी सोच यही होती जा रही है कि जरा सी भी परेशानी हो जाए तो शरीर का वह अंग काटकर फैंक दो। उसके बाद होने वाले जो दुष्परिणाम रोगी को भोगने पड़ते हैं, उसके विषय में कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है। कष्ट से जूझ रहे असहाय व्यक्ति का धन और समय तो बर्बाद होता ही है, साथ में जीवन भर की परेशानी वह मोल ले लेता है।
हो सकता है इसके पीछे यही कारण हो कि वे सोचते हैं कि लाखों रुपए खर्च करके पढ़ाई की है तो उस पैसे को जितनी जल्दी हो सके वसूल कर लिया जाए। वे भूल जाते हैं कि बहुत नोबल व्यवसाय है डॉक्टरी पेशा। डॉक्टर को हम भगवान के समान मानते हैं। उससे यही आशा की जाती है कि वह अपने मरीज को उचित परामर्श दे और उसका ध्यान बिना किसी लालच के करे। रुग्ण व्यक्ति बड़े विश्वास के साथ किसी डॉक्टर के पास जाता है। वह चाहता है कि उसके साथ किसी प्रकार का अन्याय न किया जाए।
बहुत से ऐसे किस्से हमने सुने हैं, समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं और टी.वी. के अनेक चैनलों पर दिखाए जाने वाले टॉक शो में भी देखते हैं, जहाँ रोगियों के साथ अन्याय किया जाता है। कभी-कभी किसी रोग का आपरेशन करते समय उसके शरीर के दूसरे अंग को निकालकर उसे महंगे दामों में भी बेच दिया जाता है। इस प्रकार के मानव अंगों की तस्करी के रेकेट चलते रहते हैं। उनके विषय में भी संचार माध्यमों पर प्रायः चर्चा होती रहती है। इस नोबेल प्रोफेशन में आने के पश्चात ऐसे कुकर्मों से बचना चाहिए। ऐसे दुष्कृत्य तो सीधे-सीधे
समय बीतने पर जब उसको कोई अन्य शारीरिक समस्या सामने आती है तब पता चलता है कि रोगी का कोई अंग विशेष निकाल लिया गया है। तब पीड़ित व्यक्ति ठगा-का-ठगा रह जाता है। फिर वह पुलिस में शिकायत करता है और अदालतों के चक्कर लगाता रह जाता है। ऐसे भी एपीसोड टी.वी. पर दिखाए गए हैं जिनमें नवजात शिशु को बेच दिया गया अथवा उन्हें पैसो के लालच में बदल दिया गया। यहाँ तक भी कह दिया गया कि उनके घर मृत बच्चे ने जन्म लिया है। ऐसा दुष्कर्म करते समय इन लोगों को उन बेचारे माता-पिता के दुख का भी ध्यान नहीं आता। दिल दहलाने वाले ये हादसे हैरान कर देते हैं।
मेडिक्लेम के कारण रोगी आश्वस्त हो जाता है कि कोई भी रोग आ जाए उसके इलाज में कोई कमी नहीं रहेगी। शायद यही उसके जंजाल का कारण भी बनता जा रहा है। इस मेडिक्लेम का दुरुपयोग यही है कि आवश्यकता न होने पर भी रोगी को ऐसे डरा दिया जाता है कि उसे लगता है कि आप्रेशन के अतिरिक्त उसके पास कोई और उपाय नहीं है। इसका जिक्र भी टी.वी. व समाचार पत्रों में अक्सर होता रहता है।
सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण लोग वहाँ इलाज के लिए जाना नहीं चाहते और इन लुभावने नामों के पीछे भागते हैं। इसी का फायदा उठाकर ये लोग बकरा हलाल करने वाली प्रवृत्ति के बनते जा रहे हैं। इसकी चर्चा भी समाचार पत्रों आदि में होती रहती है कि पैसे के लालच में ये इतने अन्धे हो गए हैं कि रोगी की मृत्यु हो जाने की सूचना एक-दो दिन बाद उसके परिजनों को दी गई।
जगमग चमकते हुए ये सभी अस्पताल लोगों के जीवन में कितनी रोशनी कर पाते हैं, बस यही देखना और समझना है।
चन्द्र प्रभा सूद
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