मंगलवार, 19 मई 2026

आत्मचिन्तन करना आवश्यक

आत्मचिन्तन करना आवश्यक 

मनुष्य को प्रतिदिन समय निकालकर आत्मचिन्तन करना चाहिए। आत्मचिन्तन का अर्थ है अपने विषय में विचार करना। यह मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। इसका यह अर्थ नहीं कर सकते कि मनुष्य केवल अपने लाभ के विषय में सोचता हुआ स्वार्थी बन जाए। अपनी अच्छाइयों और बुराइयों दोनों पर मथन करना ही इस कथन का उपयुक्त अर्थ होगा। 
          आत्मचिन्तन का हम यह अर्थ कर सकते हैं कि है अपने स्वयं के विचारों, भावनाओं, कार्यों और अनुभवों का गहराई से विश्लेषण और मूल्यॉंकन करना। बाहरी दुनिया से हटकर अन्तर्मुखी होकर, अपनी कमियों और खूबियों को समझकर, व्यक्तित्व में सुधार और आत्म-विकास करने की यह एक सचेत प्रक्रिया है।अपने कार्यों की समीक्षा करना कि वे सही थे या गलत। गलतियों से सीखकर उन्हें भविष्य में न दोहराने का संकल्प लेना। 
          आत्ममन्थन करते समय अपने अन्तस् में विद्यमान बुराई को दूर करने का प्रयास ईमानदारी से करना चाहिए। उस बुराई को त्यागने का ढोंग नहीं करना चाहिए। ऐसा करना तो स्वयं को धोखा देना कहलाएगा। इससे अपना हितसाधन नहीं होगा बल्कि हम स्वयं के शत्रु बन जाएँगे।
          'पद्मपुराण' में मर्हषि वेदव्यास हमें समझा रहे हैं कि-
       सर्वथा   प्रातरुत्थाय   पुरुषेण   सुचेतसा।
       कुशलाकुशलं स्वस्य चिन्तनीयं विवेकत:॥
अर्थात् बुद्धिमान को प्रात:काल उठकर विवेकपूर्वक अपने हित-अहित का विचार करना चाहिए।
दूसरे शब्दों में प्रतिदिन मनुष्य को गहन चिन्तन करना चाहिए। उसे अपने भले-बुरे का विचार करते हुए अपने हित के कार्य करने चाहिए।
           अपनी कमियों को दूर करते हुए अपनी अच्छाइयों को बढ़ाते रहना चाहिए। ऐसा करते हुए धीरे-धीरे बुराइयों का त्याग करके मनुष्य अपनी आत्मोन्नति की यात्रा सुगमतापूर्वक तय करने लगता है। इस प्रकार जब उसे सही और गलत की पहचान हो जाती है तब वह गलत रास्ते पर चलकर अपने जीवन को कष्टमय होने से बचाकर स्वयं का मित्र बन जाता है।
          हमें किन-किन विषयों पर विवेचना करनी चाहिए? 'तन्त्रोपाख्यानम्' ग्रन्थ इस विषय में हमारा मार्गदर्शन करते हुए कहता है कि अतीत का चिन्तन छोड़कर वर्तमान के बारे सोचना चाहिए-
नातिकान्तानि शोचेत प्रस्तुतान्यानगतानि चिन्त्यानि।
अर्थात् अतीत का चिन्तन नहीं करना चाहिए। जो प्रस्तुत है या समक्ष है वही चिन्तनीय है। 
          अपने अतीत की समृद्धि का बखान करते हुए मनुष्य को उसका गर्व नहीं करना चाहिए। साथ ही मद में निठल्ला होकर भी नहीं बैठ जाना चाहिए। इसी तरह अपनी पुरानी असफलताओं और मिले हुए कष्टों से व्यथित होकर मनुष्य को निराशावादी नहीं बन जाना चाहिए। ऐसे चिन्तन का कोई लाभ नहीं होता। इसलिए इसका त्याग करना चाहिए। अपना वर्तमान ही मनुष्य के समक्ष प्रस्तुत होता है वही चिन्तनीय है।  
           'चाणक्यनीति:' में अन्यत्र आचार्य चाणक्य बताते हैं कि मनुष्य को किस-किस के विषय में चिन्तन करना चाहिए-
        क: काल: कानि मित्राणि 
             को देश: कौ व्ययाव्ययौ।
को वाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहु:॥         
अर्थात् कैसा समय है, कौन मित्र हैं, कैसा देश है, आय-व्यय कैसा है, वाहन कैसा है और मेरी शक्ति कैसी है, इस विषय पर पुन:पुन: चिन्तन करना चाहिए।
           मनुष्य यदि समय को पहचानकर उसके अनुरूप कार्य करता रहे तो उसे कभी निराश नहीं होना पड़ता। वह सदा सफलता के सोपानों को छू सकता है। उसे स्वयं ही ज्ञात हो जाएगा कि उसका सच्चा मित्र कौन है? और बरसाती मेंडकों की तरह टर्राने वाले मित्र कौन से है? तब वह अपने सच्चे मित्रों के साथ अपनी जीवन यात्रा का भरपूर आनन्द उठा सकता है और स्वार्थी मित्रों से अपनी रक्षा कर सकता है।
           मनुष्य अपने देश के विष्य में जानकारियाँ एकत्र करते हुए अपने आय और व्यय का सामंजस्य बिठा सकता है। इसी प्रकार वह अपने वाहन के रख-रखाव आदि पर नजर रखकर सुविधा का यथोचित लाभ ले सकता है। एवंविध अपनी शरीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों की परीक्षा करते हुए वह अपना इहलोक और परलोक सुधार सकता है।
           मनुष्य को चिन्तन आवश्य करना चाहिए पर केवल वर्तमान का। जो बीत चुका है उससे सबक लेकर आगे बढ़ना चाहिए। भविष्य में क्या होगा अथवा क्या नहीं? इस विषय में हम नहीं जानते। इसलिए उसके विषय में चिन्ता करना व्यर्थ है। अत: अपना वर्तमान सुधारने के लिए मनन करते हुए अथक परिश्रम करना चाहिए। तभी वह एक सफल मनुष्य बनकर समाज में मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वहन कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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