हम मिलावटी युग में जी रहे
समय परिवर्तनशील है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। कुछ दशकों पूर्व तक सभी प्राकृतिक संसाधन यानी जल, वायु सभी शुद्ध मिलते थे। उसी प्रकार सभी खाद्यान्न भी शुद्ध मिलते थे। परन्तु आज की वास्तविकता यही है कि हम लोग मिलावट वाले युग में जी रहे हैं। जिस भी चीज में देखा जाए कुछ-न-कुछ मिला हुआ ही होता है। न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। हम लोगों को कोई भी खाद्य पदार्थ अपने शुद्ध रूप में नहीं मिल पाता जिनको पाना हम सबका अधिकार है।
हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे जीवन के साथ यह मिलावट का खेल चल रहा है। प्रायः टीवी और समाचार पत्रों ये खाद्यान्नों में मिलावट के समाचार सुर्खियाँ बनती रहती हैं। यूरिया आदि मिलाकर सिन्थेटिक दूध बनाना, मिलावटी खोया व पनीर बिकना, फलों और सब्जियों पर आर्टिफिशयल रंग करना व उनको आकार में बड़ा करने के लिए अथवा मिठास के लिए इन्जेकशन लगाना, काली मिर्च में पपीते के बीज डालना, चीनी में हड्डियों का चूरा, बहुत से खाद्य तेलों में जानवरों की चर्बी मिलना आदि।
हम लोग फल और सब्जियों को इस उम्मीद में बाजार से खरीदकर लाते हैं कि वे स्वास्थ्यवर्धक हैं।पर बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि घर में सब्जियों को जब धोने लगो तो उन पर लगा अप्राकृतिक रंग निकलने लगता है। हैरानी की बात यह है कि फल खाने लगो तो एक ही फल का कुछ हिस्सा अजीब तरह से मीठा होता है और कुछ फीका। इन पर पता नहीं किसका लेप लगाते हैं जिसके कारण ये सब एकदम चमकते हुए और आकर्षक दिखाई देते हैं। उन्हें देखते ही खरीदने का मन कर जाता है।
सुन्दरता में चार चाँद लगाने की सलाह देने वाले विज्ञापनों के अनुसार यदि उनका इस्तेमाल किया जाए तो उन सौन्दर्य प्रसाधनों में की गई मिलावट त्वचा को हानि पहुँचा रही है। इसी प्रकार कुछ समय पहले मैगी, कोक और टूथपेस्ट आदि में हानिकारक तत्त्वों की चर्चा टीवी और समाचार पत्रों में प्रमुखता से कवरेज दी गई।
खेती में पैदावार बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक आदि भी मानव शरीर के लिए हानिकारक हैं। और तो और जल को फैक्टरियों का केमिकल युक्त वेस्ट और सीवर की गन्दगी दूषित कर रही है। वायु को हम पेड़ काटकर और गाड़ियों, एसी, फैक्टरियों के धुँए से प्रदूषित कर रहे हैं। यानी कि प्रकृति से की जा रही छेड़छाड़ हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रही है।इनके कारण कई रोग बढ़ते जा रहे हैं।
ईश्वर ने हमें हर पदार्थ शुद्धरूप में दिया है परन्तु मुट्ठी भर स्वार्थी लोग अपने तुच्छ स्वार्थ के कारण पूरे भारत देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसा कुकृत्य करते समय न उनका जमीर उन्हें कचोटता है और न ही उनके हाथ काँपते हैं। पता नहीं पर शायद ऐसे लोग मोटी चमड़ी के बन जाते हैं। इसीलिए उन लोगों पर कोई असर नहीं होता।
आज स्थिति यह हो गई है कि न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। फल-सब्जियाँ तथा खाद्यान्न भी हमें पुष्ट नहीं करते। इस प्रकार अपनी मूर्खताओं के कारण हम अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं। समझ नहीं आता कि हम आने वाली पीढ़ी को क्या खिला रहे हैं? हमारे बच्चे ऐसे मिलावटी पदार्थों को खाकर कैसे स्वस्थ रहेंगे?
इन प्रदूषित खाद्यों का सेवन करके हम स्वयं ही अनेकानेक बिमारियों को न्योता देते जा रहे हैं। इसी कारण ही कुकुरमुत्ते की तरह मल्टीस्पेशैलिटी वाले हस्पलात नित्य प्रति खुलते जा रहे हैं जो हमारे स्वास्थ्य और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई पर डाका डाल रहे हैं। ये दुनिया भर के टेस्ट करवाते हैं फिर भी कोई गारण्टी नहीं कि इलाज सही हो सकेगा। कितने ही ऐसे उदाहरणों की चर्चा सोशल मीडिया, समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर होती रहती है।
देश में कई प्रदेशों में टेस्टिंगलेब हैं जहाँ इन खाद्यान्नों के सैम्पल चैक किए जाते हैं। अब समस्या यही है कि यदि इन समाजविरोधियों को सजा मिल सके तो शायद इस समस्या से किसी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। केवल सरकार के आधे-अधूरे प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला। बस ऐसे ही ये खबरें सुर्खियाँ बटोरती रहेंगी और फिर सब टाँय-टाँय फिस्स होता रहेगा।
सरकार के साथ-साथ सामाजिक संगठनों को भी आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा। जन साधारण के भी जागरूक रहने की बहुत आवश्यकता है। यदि आमजन इन अशुद्ध वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे तो शायद भविष्य में कुछ राहत मिलने की सम्भावना बन सकती है।
यदि समय रहते हम न जागे तो पता नहीं हम सबके स्वास्थ्य का कितना और विनाश होगा और इस विनाशलीला के लिए किसी ओर को दोष नहीं दे सकेंगे, इसके जिम्मेदार हम खुद ही होंगे। यह हमारे लिए खतरे की घण्टी है। यदि शीघ्र ही कोई ठोस कदम न उठाया गया तो जनसाधारण के स्वास्थ्य की रक्षा किसी तरह नहीं की जा सकेगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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