रविवार, 19 जुलाई 2026

मनुष्य का ‌क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना अति आवश्यक है। कोई कुछ भी कहे या अहित कर दे तो भी उसके कृत्यों को अपने दिल से लगाकर नहीं बैठ जाना चाहिए। अनावश्यक रूप से पिष्टपेषण करते रहने से अपने मन में उस व्यक्ति के लिए नफरत की भावना बढ़ने लगती है। उसका बिगाड़ तो समय पर होगा किन्तु अपना ही मन अनावश्यक ही ‌कलुषित हो जाएगा और उसमें ईर्ष्या-क्रोध आदि की अधिकता हो जाती है। इस कारण मनुष्य चिड़चिड़ा हो जाता है।
          प्रतिकार करने से किसी का भला नहीं होता। किसी को माफ कर देने से बड़ा और कोई गुण नहीं होता। जितने भी महापुरुष इस भारतभूमि पर हुए हैं उन सबने इसे अस्त्र के रूप में अपनाया। तभी उन सबको हम याद करते हैं।
        यह भी सच है कि दूसरों को क्षमा करने वालों को लोग बहुधा कायर समझ लेते हैं। यह क्षमा दूसरों के हृदयों में अपना स्थान बनाने का ब्रह्मास्त्र है जिसका सन्धान करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। यह क्षमा रूपी गुण सज्जनों का अमूल्य आभूषण होता है।
              राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की एक प्रसिद्ध कविता है 'शक्ति और क्षमा' उसकी निम्न पंक्ति का अर्थ है कि क्षमा उसी व्यक्ति को शोभा देती है, जो शक्तिशाली हो -
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।।
अर्थात् कवि का कथन है कि शक्तिशाली व्यक्ति यदि किसी कमजोर व्यक्ति को क्षमा कर दे तो उसकी उदारता और महानता दिखाई देती है। सर्प का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि एक विषैले और शक्तिशाली सॉंप में यदि डसने की क्षमता या उसके पास विष हो और फिर भी वह किसी को न काटे तो उसका यह संयम महान माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कवि का मुख्य सन्देश यही है कि दया, त्याग और क्षमा जैसे गुण तभी सार्थक और प्रभावशाली बन सकते हैं जब एक व्यक्ति भीतर से शक्तिशाली और समर्थ हो।
          राजा रंजीत सिंह के जीवन की एक घटना की चर्चा करते हैं। उनकी एक आँख नहीं थी। एक बार वे अपने सिपाहियों के साथ शहर की व्यवस्था देखने के लिए भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में एक बाग में थोड़ी देर विश्राम करने के लिए रुके।
        तभी कहीं से एक पत्थर आकर उन्हें लगा। सिपाहियों को बहुत क्रोध आ गया और पत्थर मारने वाले बालक को पकड़कर वे राजा के सामने ले आए। राजा ने कड़ककर उससे पत्थर मारने का कारण पूछा, "बच्चे तुमने पत्थर क्यों मारा?"
          उस बालक ने बड़ी निडरता से उत्तर दिया, "महाराज, वह फल तोड़ने के लिए वृक्ष पर पत्थर मारा था। मेरी कोई गलती नहीं है कि वह पत्थर आपको लग गया।"
          बालक के इस निर्भीक उत्तर को सुनकर राजा ने सिपाहियों को आदेश देते हुए कहा, "इस बालक को मेरी ओर से एक पुरस्कार दिया जाए।"
          वे सभी सिपाही राजा के इस निर्णय को सुनकर हैरान हो गए।
          तब राजा रंजीत सिंह ने उनसे कहा, "वृक्ष को पत्थर मारो तो वह फल देता हैं और मैं राजा होकर यानी इन्सान होकर भी इस बालक को पुरस्कार नहीं दे सकता। समर्थ होकर भी क्या मैं इतना गया गुजरा हूँ कि फल पाने की आस से पेड़ पर पत्थर मारने वाले को वह फल देता है और मैं इस बालक को निराश करूँ।"
          ऐसी होती हैं महान् लोगों की बातें जिन्हें युगों तक याद किया जाता है। इसीलिए कहा है कि क्षमा से बढ़कर कोई अस्त्र नहीं होता। सामने वाला व्यक्ति बिना मोल अपना बन जाता है। कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन दूसरों को क्षमा कर देने से अपना मन कलुषित नहीं होता। दिल पर से बोझ उतर जाता है और हृदय सदा प्रसन्न रहता है।
          कुछ लोगों का मानना है कि दुर्बल व्यक्ति की क्षमा कोई मायने नहीं रखती। वह क्षमा नहीं करेगा तो क्या करेगा? इसके लिए वे कहते हैं कि क्षमा उसे सुशोभित करती है जिसके पास दूसरे को दण्ड देने की सामर्थ्य हो। मेरे विचार से यह कहना अनुचित है क्योंकि क्षमा करने का गुण उसी में होगा जिसमें आत्मिक व मानसिक बल होगा। 
          शारीरिक दुर्बलता की बात करना बेमायने हो जाती है। यदि शरीर से व्यक्ति दुबला-पतला हो किन्तु उसमें आत्मिक बल हो तो वह संसार की किसी शक्ति से नहीं डरता। सबका डटकर मुकाबला करता है व हर चुनौती से भिड़ने की सामर्थ्य रखता है। शरीर से कमजोर होने पर महात्मा गान्धी की तरह व्यक्ति अपने व्यवहार से सिद्ध कर सकता है कि वह अच्छे अच्छों की हवा टाइट करके उन्हें उखाड़कर फैंक सकता है।
          क्षमा को अपनाने वाला व्यक्ति हमेशा प्रथम पंक्ति में रहता है। ऐसे सज्जन की चाहे कोई बुराई कर ले परन्तु उसका यह एक गुण सब पर भारी पड़ता है। ईश्वर को भी विनयी और क्षमाशील लोग पसन्द आते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

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