शनिवार, 7 जून 2025

लेखन एक साधना

लेखन एक साधना

लेखन वह साधना है जिसे साधकर लेखक या कवि दिशादर्शन का कार्य करता है। साधना करने का अर्थ साधु-संन्यासी बनकर धूनी रमाकर बैठ जाना नहीं है। बल्कि एक रचनाकार को सदा अपना कदम फूँक-फूँक कर रखना चाहिए। जो जितनी साधना करता है, वह उतना ही महान रचनाकार बनता है। युगों-युगों तक उसका नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है। 
          साधना शब्द का मैंने प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य यह है कि हर रचनाकार को अधिक से अधिक स्वाध्याय करना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों व पुरातन रचनाकारों की रचनाओं के साथ-साथ समकालीन लेखकों का भी गहनता से अध्ययन करना चाहिए। यदि वह ऐसा करता है तो उसके साहित्य को पढ़ने वालों को भी आत्मिक सन्तोष मिलता है।
            डाकू वाल्मीकि व महामूर्ख कहे जाते कालिदास विद्वानों की संगति में रहकर प्रकाण्ड पण्डित बने, ये प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। वाल्मीकि ने घर-घर में पूजनीय भगवान राम का चरित्र लिखा। महाकवि बनकर कालिदास ने कालजयी ग्रन्थ लिखे जो विश्व की अनेकानेक भाषाओं में अनूदित हैं। गुरुकुल में ज्ञान न प्राप्त कर पाने पर घर जाते समय कुऍं में रस्सी के निशान को देखकर परिश्रम करने का मन्त्र लेकर बोपदेव ने अध्ययन किया। विद्वान बनकर इन्होंने संस्कृत भाषा के व्याकरण की रचना की और महान बन गए। ये और अनेकों अन्य रचनाकार स्वाध्याय की बदौलत महान बने जिनका नाम हम श्रद्धा से लेते हैं।
           आज के नवोदित लेखकों व कवियों में इतनी भी सहनशीलता नहीं है कि वे साहित्य साधना करें। वे अपने अतिरिक्त किसी दूसरे रचनाकार को साहित्यकार नहीं मानते। न ही वे किसी अन्य रचनाकार की रचनाओं या पुस्तकों को पढ़ना ही चाहते हैं। उनके पास साहित्य की साधना करने का समय ही नहीं है।
        काव्य लिखने वाले नवोदितों को प्रायः  छन्द, अलंकार, लय, गति, यति व गेयात्मकता आदि के विषय में जानकारी ही नहीं है। उन्हें यह भी ज्ञान नहीं होता कि काव्य को समृद्ध कैसे बनाया जाता है? काव्य का भी अपना एक अनुशासन होता है जिसका पालन करना चाहिए। कुछ लोगों को पुस्तक छपवाने की बहुत जल्दी रहती है। चाहे उनके पास एक पुस्तक लायक रचनाएँ भी न हों। कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये सभी लोग रातोंरात महाकवि की श्रेणी में आ जाएँगें।
          आज के रचनाकारों की साधना न होने के कारण बहुत से ऐसे लोग हैं जो भाषा के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। उनकी रचनाओं में लिंग, वचन की अशुद्धियाँ बहुधा मिलती हैं। उन लोगों को वर्तनी (spelling) का भी ज्ञान नहीं। इसलिए उनकी रचनाओं में अशुद्धियों की भरमार होती है। जिससे पाठक का मन व्यथित होता है।
             गद्य लिखना पद्य से भी कठिन माना जाता है। संस्कृत भाषा के महाकवि दण्डी इस विषय में रचनाकारों को कहते हैं -
          'गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति' 
अर्थात् है, गद्य को कवि की कसौटी कहा जाता है। इसका मतलब है कि अच्छा गद्य लिखने में किसी व्यक्ति के विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने की क्षमता, उसकी लेखन क्षमता और कला को दर्शाता है। लेखकों का साहित्य भी तभी समृद्ध होता है जब उसमें लेखक की साधना की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। काव्य की ही तरह गद्य का भी अपना अनुशासन होता है।
           एक-दूसरे का सामना होने पर प्रशंसा करना पर और पीठ पीछे सबको गाली-गलौच करने से कोई साहित्यकार नहीं बन सकता। मेरा ऐसा मानना है कि जो अच्छा मनुष्य नहीं बन सकता, वह कदापि अच्छा लेखक नहीं हो सकता। दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने के लिए रचनाकार का स्वयं का जीवन भी क्रियात्मक होना चाहिए।
           पीत पत्रकारिता की चर्चा सोशल नेटवर्क, पत्र-पत्रिकाओं, टीवी आदि पर यदा कदा होती रहती है। उसी प्रकार रचनाओं की चोरी की घटनाएँ भी प्रकाश में आती रहती हैं। इनके कारण न्यायालयों में केस किए जाने के समाचार भी प्राप्त होते रहते हैं। इसका शिकार बहुत से लोग होते रहते हैं। वे अपनी व्यथा प्रकट करते रहते हैं।
          ये कुछ संकेत हैं रचनाकारों के लिए। इसके साथ यह भी जोड़ना चाहती हूँ कि यदि रचना केवल फूहड़ता अथवा अश्लीलता लिए होती है तो साहित्य की श्रेणी में वह कदापि नहीं आती। ऐसा साहित्य कदापि सम्मानजनक नहीं होता जिसे छिप-छिपा कर पढ़ना पढ़ा जाए या बेचा जाए।
           समाज में बढ़ती विकृतियों को देखते हुए, आज के साहित्यकारों का दायित्व बढ़ जाता है। उनके लेखन में इतना ओज होना चाहिए जो नयी पीढ़ी को दिशा दे सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 6 जून 2025

घर की शोभा बच्चों से

घर की शोभा बच्चों से

घर की शोभा बच्चों से होती है। उनके न होने पर घर सुनसान हो जाता है। उनके बिना घर काटने को दौड़ता है व घर-घर नहीं लगता। घर को घर बनाने में माता-पिता व दादा-दादी का सहयोग आवश्यक होता है पर बच्चों के सहयोग के बिना तो घर-घर ही नहीं कहला सकता।
           बच्चों की चहल-पहल किसी भी घर को जीवन्त बनाती है। उनकी मात्र उपस्थिति ही घर की रौनक बन जाती है। इसीलिए उन्हें चिराग कहा जाता है। 
          मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि लोग अपने बच्चों को बेसहारा कैसे छोड़ देते हैं या थोड़े से तुच्छ धन के लिए किसी अन्जान को सौंपने के लिए तैयार हो जाते हैं। पता नहीं शायद उन्हें अपने बच्चे का मोह नहीं होता। अथवा वे किसी विवशता के कारण अपने जिगर के टुकड़े को दूसरे के हाथों में सौंप देते हैं।
            कितने ही बड़े लोग एक स्थान पर बैठे हों पर वहाँ वह चहल-पहल नहीं हो सकती जितना एक छोटे बच्चे की मौजूदगी में होती है। उन सबकी उपस्थिति में भी शान्ति होती है। परन्तु एक बच्चे के आते ही सारा वातावरण जीवन्त हो जाता है।
            बच्चों का हृदय बहुत ही कोमल होता है। जरा सी ठेस लगने पर वह काँच की तरह टूटकर बिखर जाता है। वे कुछ समझ ही नहीं पाते क्योंकि वे दुनियादारी से अभिज्ञ होते हैं।
          इनकी सुरक्षा हमारा दायित्व हैं। यद्यपि आज के युग में जब तक पति-पत्नी दोनों काम न करें गुजारा नहीं होता। पर साथ ही यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि ये बच्चे घर में नौकरों की मेहरबानी पर न रहें। आपसी मनमुटाव और अहं को छोड़कर बच्चों को उनके दादा-दादी की छत्रछाया में पलने दें। उनके प्यार-दुलार से बच्चों को सुरक्षाकवच तो मिलेगी ही साथ में उनको संस्कार भी मिलेंगे। इससे वे सुसंस्कृत व सभ्य बनेंगे।
            सभी माता-पिता अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए जीतोड़ मेहनत करते हैं। बड़े दुख की बात है कि वे समयाभाव के कारण उनको यथोचित संस्कार नहीं दे पाते। जब बच्चे बिगड़ जाते हैं या उनके हाथ से निकल जाते हैं तो उन्हें पछताना पड़ता है।
            घर-बाहर हर स्थान पर उनका अमर्यादित व्यवहार माता-पिता के लिए शर्मिंदगी का कारण बन जाता है। ऐसे बच्चों को कोई मित्र या रिश्तेदार अपने घर नहीं बुलाना चाहता। आस-पड़ोस और स्कूल हर स्थान से उसकी मिलती हुई शिकायतें भी माता-पिता को नजरें झुकाने को मजबूर कर देती हैं। यह सच है कि ‌सभी लोग ऐसे बच्चों से दूरी बनाना पसन्द करते हैं।
           बच्चे जब चलना या बोलना सीखते हैं तभी से उनको संस्कार देना प्रारम्भ कर देना चाहिए तभी वे सुसंस्कृत बनते हैं। जैसे गुण आप अपने बच्चों में देखना चाहतें हैं, उन्हें स्वयं में भी ढालें।
           आजकल फैशन हो गया है कि नर्सरी कक्षा से ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए भेजने का। जहाँ तक हो सके उन्हें स्वयं पढ़ाएँ। जितना अच्छा व प्यार से आप पढ़ा सकते हैं वो कोई दूसरा नहीं पढ़ा सकता। यथासम्भव अपने बच्चों के मित्र बनें जिससे वे अपने मन की हर बात आपको बता पाएँ। अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को आपके साथ बाँटकर निश्चिन्त हो सकें।
          यदि बच्चा आपका अमर्यादित जीवन देखेगा तो वह भी वही सब कुछ सीखेगा। वह बिना सिखाए घर-परिवार के वातावरण को देखकर बहुत कुछ सुन-समझ जाता है जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। इसका कारण है कि बच्चे बहुत बारीकी से सब ऑबरब्ज करते हैं।
             बच्चों के सुखद भविष्य के लिए उनका मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होना बहुत आवश्यक होता है। माता-पिता का यह नैतिक दायित्व है कि वे देश, धर्म व समाज का भविष्य, अपने बच्चों को हर प्रकार से योग्य बनाएँ ताकि वे सिर उठाकर चलें व अपना एक स्थान बनाकर सम्मानित जीवन व्यतीत कर सकें।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 5 जून 2025

रिश्तों में विश्वास

रिश्तों में विश्वास

जिस रिश्ते में सबसे ज्यादा विश्वास होना चाहिए उसी में सबसे ज्यादा बेवफाई होती है समझ नहीं आता। यह वाक्य अन्तस को झकझोर कर रखने वाला है। विचार मन्थन चलता रहता है। इस विचार को आपके साथ साझा करना चाहती हूँ।
         सारे भौतिक सम्बन्धों में पति-पत्नी का रिश्ता बहुत करीबी होता है। जिसे दूसरे शब्दों में हम दो जिस्म और एक जान मानते हैं। एक जान होने का अर्थ है सब कुछ एक। फिर यहाँ अलगाव वाली बात की तो गुँजाइश ही नहीं बचती। मुझे समझ में नहीं आता कि 'तेरा और मेरा' का यह भाव इन दोनों के रिश्ते के बीच में कहाँ से अपनी नाक घुसा लेता है। उस समय बड़ी हैरानी होती है जब आसपास के माहौल में पति और पत्नी को परस्पर आपस में जाने-अनजाने लड़ते-झगड़ते देखती हूँ।
           पति आगे बढ़े, तरक्क़ी करे तो पत्नी फूली नहीं समाती। उसके लिए खुशियॉं मनाती हैं। खुद ही उसे समाज में हीरो बना देती है। दूसरी ओर पत्नी आगे बढ़े, पति से अधिक तरक्की करे तो पति के अहं को ठेस लग जाती है और वह घायल होने लगता है। उसका पुरुषत्व या उसका अहं शायद ऐसे काँच का बना हुआ है जो जरा हल्की-सी चोट लगने से टूटकर किरच-किरच हो  जाता है। इसे दुर्भाग्य ही कहा सकते हैं।
           आज भी पुरुष प्रायः बच्चों की जिम्मेदारी लेने, घरेलू कामकाज में पत्नी ( कामकाजी ) का हाथ बटाना अपनी शान के खिलाफ समझता है।प्राय: पुरुषों का तकिया कलाम होता है कि वे तो पत्नी से बड़ा डरते हैं या घर जाते ही उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है आदि-आदि। उसे न जाने किन-किन नामों से उसे सम्बोधित कर अपने अहं की तुष्टि करते हैं। दिखावा या छलावा करना इन पुरुषों की फितरत में शामिल है। मौके-बेमौके सबके सामने पत्नी को अपमानित करने से भी ये लोग नहीं चूकते।
          पुरुषवादी सोच उस पर हमेशा हावी रहती है। कहने को तो स्त्री को वह लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा और काली रूप में भगवती मानता है। पर क्या अपनी पत्नी को जीवन में वाकई वह मुकाम दे पाता है? शायद नहीं। खुद को देवता कहलवा कर वह अपने अहं को तुष्ट करना चाहता है पर पत्नी को देवी बनाकर नहीं रखना चाहता। जब तक स्त्री पति के हाथ की कठपुतली बनकर रहे तो वह सती, सावित्री व पूज्या कहलाती है। परन्तु यदि पत्नी अपनी इच्छा से कोई भी एक कार्य करना चाहे तो न जाने उसे किन-किन विशेषणों से उसे नवाजा जाता है। उसकी इच्छा का तो मानो पुरुष की नजर में कोई मूल्य ही नहीं है।
          दोनों में बहुधा परस्पर विश्वास व सामंजस्य की कमी दिखाई देती है। प्रायः दोनों अपनी-अपनी बचत व अपने-अपने बैंक खातों को छुपाकर रखते हैं कि दूसरे को कहीं भनक न लग जाए। अपने फोन, फेसबुक अकाउण्ट या वाट्सएप जैसी सोशल साइट्स को ऐसे छुपाते फिरते हैं जैसे कोई खजाना छिपा रहे हों। अरे भाई अगर एक-दूसरे से दुराव-छिपाव की नौबत आ रही है तो क्यों गलत काम करते हो? इसका अन्त कभी भी भला नहीं हो सकता।
            दोनों में परस्पर विश्वास बहुत आवश्यक है। जहाँ अविश्वास होता है या एक-दूसरे से विश्वासघात किया जाता है वहाँ तलाक हो जाते हैं। कभी-कभी अपने दूसरे पार्टनर को मार दिया जाता है या किसी के साथ मिलकर मरवा दिया जाता है। ऐसी स्थिति वाकई बहुत दुखदाई होती है।
           स्त्री के चरित्र को अबूझ पहेली कहकर पुरुष उसे अपमानित करते हैं पर वे स्वयं कितने षड्यन्त्र करते हैं, इसे मानने के लिए भी तैयार नहीं होते। हर आज्ञा का पालन होते देखने का आदि पति किसी भी कदम पर अपनी अवहेलना सहन नहीं कर सकता। इस कारण सम्बन्धों में कटुता बढ़ने लगती है। यह आपसी सम्बन्धों के लिए बहुत घातक होती है।
          जीवन का कुछ भी पता नहीं कि कौन पहले जाएगा और कौन बाद में। इसलिए जिन्दगी के जितने पल ईश्वर ने दिए हँस-खेलकर बिता लेना चाहिए। अन्यथा बाद में पश्चाताप न करना पड़ता है। आपसी सामंजस्य से पति-पत्नी रहें तो घर स्वर्ग बन जाता है अन्यथा नरक। उचित यही है कि हम अपने जीवन को संगीत की भाँति गुनगुनाते हुए व्यतीत करें।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 4 जून 2025

पुस्तकें मनुष्य का अच्छा मित्र

पुस्तकें मनुष्य का अच्छा मित्र 

मनुष्य का सबसे अच्छा मित्र पुस्तकें होती हैं। जो व्यक्ति पुस्तकों को मित्र बना लेता है, वह ज्ञान का आगार(खजाना) बन जाता है। दूसरे शब्दों में लोग ऐसे पुस्तक प्रेमी को एनसाइक्लोपिडिया कहने लगते हैं। कोई उसका मित्र बने या न बने, उसे इसकी चिन्ता नहीं होती।
           अपने सद् ग्रन्थों के अध्ययन से हमें ऐसा आत्मिक ज्ञान प्राप्त होता है जो हमारा इहलोक ही नहीं परलोक भी सुधारता है। इस संसार की असारयता को समझाकर हमारे जीवन लेने के लक्ष्य मोक्ष के समीप हमें ले जाता है।
            पुस्तकों का मित्र जीवन में कभी अकेलेपन का अनुभव नहीं करता। दुनिया के सारे मित्र साथ छोड़ सकते हैं पर ये हमारा साथ कभी नहीं छोड़ते। मित्र यदि सन्मित्र हो तो जीवन सफल हो जाता है परन्तु यदि कुमित्र से संगति हो जाती है तो जीवन बरबाद हो जाता है।
            पुस्तक रूपी मित्र हमारे सन्मित्र होते हैं ये कदापि कुमित्र नहीं हो सकते। इनके साथ रहने से मनुष्य को कुमार्गगामी होने का भय नहीं रहता और मनुष्य व्यसनों से बचा रहता है। ये पुस्तकें हमें सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करके हमारी सर्वविध उन्नति कराती हैं।
           यद्यपि आज मंहगाई के इस युग में अन्य सारी वस्तुओं की भाँति पुस्तकों का मूल्य भी कुछ अधिक होता जा रहा है तथापि पुस्तक प्रेमियों के लिए उनका मूल्य कोई मायने नहीं रखता। वे अपनी मनचाही पुस्तकें खरीदते हैं और यह भी परवाह नहीं करते कि उस पर उन्हें कमीशन भी मिल रहा है या नहीं। ये पुस्तक प्रेमी भौतिक वस्तुओं के स्थान पर पुस्तकों को अधिक महत्त्व देते हैं।
           यहाँ मैं एक बात जोड़ना चाहती हूँ कि लोग अपने कुव्यसनों के लिए लाखों-करोड़ों रुपए बर्बाद कर देते हैं। अपना व अपनों की चिन्ता किए बिना धन और समय को नष्ट करते हैं। परन्तु पुस्तकों का साथ करने से हम अपने समय व धन का सदुपयोग करते हैं। 
           यदि कोई पुस्तक प्रेमी उन्हें खरीदने में असमर्थ है तो भी समस्या आड़े नहीं आती। बहुत-से सरकारी, गैरसरकारी व निजी पुस्तकालय भारत में स्थान-स्थान पर उपलब्ध  हैं। थोड़ा-सा शुल्क देकर उन पुस्तकालयों का सदस्य बना जा सकता है। सदस्य बनने के बाद वहाँ से पुस्तकें इश्यू करवाकर घर ले जाकर पढ़ सकते हैं। अन्यथा वहाँ बैठकर भी अपनी मनचाही पुस्तकों का अध्ययन किया जा सकता है। इन पुस्तकालयों में विभिन्न विषयों की पुस्तकें उपलब्ध होती हैं। पाठक अपनी रुचि के अनुसार पुस्तक लेकर पढ़ सकता है। 
            इन पुस्तकालयों के अतिरिक्त स्थान-स्थान पर बहुत से वाचनालय भी हैं। जहाँ बैठकर समाचार पत्र पढ़कर भी सरलता से अपना ज्ञानवर्धन किया जा सकता है। कुछ पुस्तक प्रेमी मिलकर भी अपना पुस्तकालय बना सकते हैं। अपनी रुचि के अनुसार पुस्तकों का चयन करके पढ़ सकते हैं और अपना शौक पूरा करके ज्ञानवर्धन कर सकते हैं।
           लेखन भी तभी श्रेष्ठ बनता है जब हम स्वाध्याय करते हैं। हमारे विचारों की परिपक्वता अध्ययन से आती है। जिस प्रकार विद्यार्थी, संगीतज्ञ आदि पुनः पुनः रियाज़ करते हैं, उसी प्रकार लेखकों को भी पठन व मनन करना चाहिए। इससे भाषा के प्रति उनकी समझ विकसित होती है। भाषागत दोषों का निवारण भी होता है।
          पुस्तकें तो फिर हमारा पथप्रदर्शक होती हैं। वे हमें जीवन में भटकने से बचाती हैं। हमें दुर्व्यसनों की ओर प्रवृत्त नहीं होने देतीं। ये पुस्तकें माता की तरह हमारी रक्षा करती हैं। पिता की तरह ऊँचाइयों की ओर ले जाती हैं। गुरु की भाँति सदैव हमारा पथप्रदर्शन करती हैं। इसलिए यत्नपूर्वक इनसे मित्रता करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 3 जून 2025

न कहिए और सुखी रहिए

न कहिए और सुखी रहिए

आँख मूँद करके किसी बात को मानने के बजाय न कहने की आदत अपने जीवन में डालनी चाहिए। जीवन में बहुत से ऐसे मोड़ आते हैं जब मनुष्य के समक्ष दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उस समय भी यदि वह न नहीं कह पाए तो बहुत बड़ी समस्या में भी घिर सकते हैं। तब न कहिए और सुखी रहिए वाला मन्त्र अपनाइए। सुनने में थोड़ा विचित्र लग रहा होगा पर यह एक सत्य है। इसका स्वयं अनुभव कीजिए फिर बताइयेगा कि ऐसा करना उचित है।
          घर-परिवार में अक्सर ऐसा होता है कि माता-पिता, पति-पत्नी बन्धु-बान्धवों में आम व्यवहार में कई बातें नापसन्द होती हैं। उस समय उनकी बातों को न चाहते हुए भी हम चुप रह जाते हैं और बाद में अपने मन में जलते-कुढ़ते रहते हैं। उस समय हमारे पास अपना मन मसोस कर रह जाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचता। ऐसा करने से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। हम अनचाहे रोगों को अनायास ही दावत दे देते हैं। कई बार देखा है सोचते और कुढ़ते लोग कुण्ठा का शिकार हो जाते हैं।
           उस समय यदि मन कड़ा करके न कह देते तो शायद मानसिक परेशानी से मुक्ति मिल जाती। इसका यह तात्पर्य कदाचित नहीं कि हर बात के लिए न कह दिया जाए। कभी-कभी अनावश्यक न कह देने से परिवारों में विघटनकारी स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे समय चुप लगाना श्रेयस्कर होता है या फिर विवाद की स्थिति टलने के बाद अपने मन की बात स्पष्ट करनी चाहिए।
          माता-पिता सन्तान के हित चिन्तक होते हैं। अगर वे बच्चों को उनके किसी व्यवहार के लिए रोकते हैं या डाँट-डपट करते हैं तो बच्चों को उनका कहना मानना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि वे उनका कहना न मानकर उन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं। हाँ, इस प्रसंग में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगी कि यदि बच्चों को माता-पिता की कोई बात पसन्द नहीं आती तो उन्हें चुप रहकर उनकी बात माननी चाहिए। उनका अनुभव बच्चों से कहीं अधिक होता है। दूसरी सत्य बात यह है कि वे बच्चों के हित चिन्तक होते हैं।
           समय बीतने पर जब उनका गुस्सा ठण्डा हो जाए तब अपनी बात दृढ़ता पूर्वक रखनी चाहिए, यदि वह बात उचित है तो। यदि वे मान जाएँ तो बहुत अच्छी बात है और न मानें तो यह समझ लेना चाहिए कि उनकी माँग नाजायज है। वे बड़े हैं और अधिक अनुभवी हैं तथा उन्हें दुनियादारी का ज्ञान भी बच्चों से अधिक होता है। इसके अतिरिक्त भी जीवन में बहुत-से ऐसे पल आते हैं जब बच्चे सही होते हैं और माता-पिता को अनावश्यक हठ करके उनकी बात को न नहीं करनी चाहिए।
            बड़ों की गलत बातों को न अवश्य कहना चाहिए पर फिर भी कोशिश यही होनी चाहिए कि परिवार में किसी भी प्रकार से कटुता न आए। इसी प्रकार मित्रों को भी उनकी नाजायज बात या योजना के लिए स्पष्ट रूप से दृढ़ता पूर्वक न कर देनी चाहिए और उनको समझदारी से अपने न कहने का कारण स्पष्ट कर देना चाहिए। यदि वे सच्चे मित्र होंगे तो आपकी बात से सहमत हो जाऍंगे। फिर वे स्वयं भी उस गलत कार्य को नहीं करना चाहेंगे।
            इसी प्रकार आस-पड़ोस में भी दूसरों के गलत फैसलों पर ऑंख मूॅंदकर अपनी मोहर न लगाएँ बल्कि उन्हें सही और गलत के बारे में भी समझाएँ। वे लोग यदि विवेकी होंगे तो आपकी कही बात की गहराई को समझकर आपका लौहा मानेंगे और सयम-सयम पर आपसे विचार-विमर्श भी करेंग। सभी सुधीजनों से मैं कहना चाहती हूॅं कि जहाँ आवश्यक हो वहाँ न कहकर अपनी सुख और शान्ति बनाए रखने का यत्न करें।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 2 जून 2025

आत्मविश्लेषण

आत्मविश्लेषण

आत्मविश्लेषण करने वाला व्यक्ति सदा सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता है। स्वयं के विषय में विचार करना ही आत्मविश्लेषण कहा जाता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम चौबीसों घण्टे अपने बारे में सोचते-सोचते स्वार्थी बन जाएँ। अपनी धार्मिक, सामाजिक व पारिवारिक जिम्मेदारियों से पिण्ड छुड़ा लें और हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएँ। ऐसा करके तो हम आलसी बनकर जीवन की रेस में पिछड़ जाएँगे। यह स्थिति तो किसी भी शर्त पर स्वीकार नहीं की जा सकती।
          जीवन की भागदौड़ का हिस्सा बनते हुए ही आत्मचिन्तन अपेक्षित है। वैसे तो आज के भौतिक जीवन हमें धन कमाने के लिए जी तोड़ परिश्रम करना पड़ता है अन्यथा अपने सभी दायित्वों को अर्थाभाव में पूर्ण नहीं कर पाएँगे। समय का अभाव तो हमेशा ही रहता है। इस समयाभाव में थोड़ा-सा समय निकालकर अपना निरीक्षण-परीक्षण करना श्रेयस्कर होता है। हम अपने आराम के समय में से कुछ पल चुरा कर विचार कर सकते हैं। रात को सोने के लिए बिस्तर में लेटते हुए विचार करने का समय सबसे उत्तम होता है।
           यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि हमें विचार क्या करना है ? सबसे पहले यह देखना है कि हमने अपनी दिनचर्चा के अनुसार आज के कार्य सम्पादन कर लिए हैं। उत्तर यदि हाँ है तो बहुत अच्छा। यानी हमने आज का लक्ष्य सन्धान कर लिया है। परन्तु इसके विपरीत यदि उत्तर न में मिले तो इसका सीधा-सा अर्थ है कि आज हमने कहीं चूक कर दी है। यह समस्या गम्भीरतापूर्वक विचारणीय है। आने वाले कल के लिए कटिबद्ध होकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करना है।
           दिनभर में जो भी कार्य किये हैं, उन पर एक नजर डालनी चाहिए। स्वत: ही हमें समझ में आ जाएगा कि हमने जो- जो कार्य आज दिन के लिए निर्धारित किए थे उनके पूरा न होने का कारण क्या था। हो सकता है वे कार्य हमारी असावधानी के कारण पूरे नहीं हो सके हों या यह भी हो सकता है कि किसी ऐसे आवश्यक कार्य में उलझ जाने के कारण वह कार्य नहीं कर पाए। इसलिए अगले दिन उन्हें पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए।
          इसके अतिरिक्त कभी-कभी घर-परिवार या आस-पड़ोस में कोई ऐसी अनहोनी घटना घट जाती है जिस पर हमारा जोर नहीं चलता। इनमें से कोई भी कारण हो विचार तो करना ही होगा। अब उचित यही है कि अपनी कमी को दूर करके अगले दिन संकल्पपूर्वक निर्धारित कार्य का लक्ष्य पूर्ण करने का यत्नपूर्वक प्रयास करेंगे तो अवश्य सफलता मिलेगी और हमारा मन भी प्रसन्न होगा। इससे आत्मसन्तोष भी होगा।
           इसी प्रकार दिनभर  के किए गए कार्यों के चिन्तन के साथ ही यह भी विचार करना है कि आज के दिन हमने कितने गलत कार्य किए, किस का दिल दुखाया, किस के साथ अनावश्यक नोकझोंक की या अपने काम में ईमानदारी से चूक गए, कितनी बार झूठ-सच किया आदि।
          यदि हमें हमारे मन ने हमें हरी झण्डी दिखा दी तो समझिए कि आज का हमारा दिन सफल रहा। परन्तु यदि अपने-आपको सन्तुष्ट करने के लिए हमें किन्तु-परन्तु जैसे बहाने तलाशने की आवश्यकता पड़ें तो निश्चित ही कहीं गलती हुई है। फिर उन गललतयों की सूची बनाएँ। अगले दिन उन्हें न दोहराने का संकल्प करें। और फिर अगले दिन भी यही क्रम अपनाएँ। इस क्रम को अन्य आवश्यक हिस्सों की तरह  अपने जीवन में ढाल लेना चाहिए। इस प्रकार यदि जीवन में हम इन छोटे-छोटे लक्ष्यों को प्राप्त करते जाएँगे तो आत्मोत्थान करने व भौतिक सफलताओं को प्राप्त करने से हमें कोई नहीं रोक सकता।
          एवंविध आत्मचिन्तन करने वाला मनुष्य अपनी कमियों को दूर करके महान बनता है। अपने विवेक से आत्ममन्थन करके हम अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 1 जून 2025

उपभोक्तावादी युग में जीवन का सुकून

उपभोक्तावादी युग में जीवन का सुकून

आज के इस भौतिकतावादी एवं उपभोक्तावादी युग में हर व्यक्ति जीवन की भागदौड़ में इतना उलझा हुआ है कि इस आपाधापी की जिन्दगी में उसे सुकून के दो पल भी नसीब नहीं हो पाते। अब या तो वह आराम कर ले या फिर परिश्रम ही करे। यदि वह आराम करेगा तो जीवन की दौड़ में पिछड़ जाएगा और अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकेगा। इसके विपरीत यदि मेहनत करते हुए चौबीसों घण्टे व्यस्त रहेगा तो सुख-शान्ति नहीं प्राप्त कर सकेगा।
          उसकी यह भटकन मृगतृष्णा की तरह है।  जब रेगिस्तान में चलते हुए प्यास लगती है तो धूप में चमकती हुई रेत में पानी का आभास होता है। अर्थात् ऐसा प्रतीत होता है कि सामने पानी है और जब पास जाओ तो मनुष्य को चारों ओर रेत ही रेत दिखाई देती है। पानी के उस आभास में हम फिर प्यासे रह जाते हैं।
          बहिर्मुखी मानव भौतिक वस्तुओं, सुख के उपकरणों और सुख-सुविधा के साधनों को ही सुख-शान्ति का उत्स(झरना) मानकर अपने जीवन का बहुमूल्य समय व्यर्थ गँवा देता है। उसकी इच्छाएँ या कामनाएँ ऐसी हैं जो समाप्त ही नहीं होतीं। एक के बाद एक प्रलोभनों के जाल में उसे फँसाए रखती हैं जिससे बाहर निकलने का वह असफल प्रयास करता रहता है।
           मानव मन संकल्प-विकल्प में भंवर में सदा ही गोते खाता रहता है। उसका चंचल मन सदैव उठा-पटक में लगा रहता है। इससे उसका मस्तिष्क भी अस्थिर होता रहता है। एवंविध मन और मस्तिष्क के टकराव में वह हरपल पिसता रहता है। मन मनुष्य को भटकाता रहता है, उलझाए रखता है। जबकि उसका मस्तिष्क विवेक बुद्धि उसे सन्मार्ग दिखाता है। उसे भटकने से रोकता है। कभी उसका विवेक हावी हो उसे दिशा देता है और कभी मन हावी होकर उसे अस्थिर बनाता है।
          इसीलिए यहाँ-वहाँ वह सुख-शान्ति को खोजता फिरता है। कभी-कभी मनुष्य ढोंगी बाबाओं के पीछे भागता है। कभी तथाकथित ज्योतिषियों व तान्त्रिकों के चक्कर में पड़ जाता है। फिर तीर्थस्थलों की खाक छानता फिरता है। ये सब भी उसकी मनचाही तलाश को पूर्ण नहीं करते।
           शान्ति की खोज में कस्तूरी मृग की भाँति मनुष्य हर समय इधर-उधर  मारा-मारा फिरता रहता है फिर भी उसे सुख-शान्ति नहीं मिलती। कस्तूरी मृग वह होता है जिसकी नाभि में कस्तूरी होती है। जब मृग को उसकी खुशबू आती है तो वह उसे जंगल में उसे ढूँढने के लिए भटकता है पर उसके हाथ निराशा ही लगती है। इसका कारण है कि वह खुशबू तो उसके अन्दर ही होती है। इसलिए उसका जंगल की खाक छानना व्यर्थ हो जाता है। वैसे ही सुख व शान्ति उसके अन्तर्मुखी होने पर अन्त:करण में ही मिलती है। उसका बाहर भटकना व्यर्थ ही सिद्ध होता है। कबीरदास जी ने कहा है कि ईश्वर कहते हैं- '
     मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।
ना तो कौन क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तलास में।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में
अर्थात् कबीरदास जी कहते हैं, ऐ मनुष्य, तू मुझे कहाँ ढूँढ़ता फिर रहा है, मैं तो तेरे पास ही हूँ। न मैं मन्दिर में मिलूँगा, न मस्जिद में, न काबे और कैलाश में, न पूजा-पाठ में, न योग-बैराग में। सच्चे मन से खोजने वाला हो तो उसे मैं पल-भर की तलाश में मिल जाऊँगा। कबीर कहते हैं, भाई साधु सुनो, वह तो हर साँस में मौजूद है।
             सुख और शान्ति की तलाश तब पूरी हो सकती है जब मनुष्य अपने मन को साधकर भटकने से बचे। मन की लगाम कसने के लिए  विवेक का आश्रय लेना आवश्यक है। भगवान कृष्ण ने गीता में समझाया है कि वैराग्य और अभ्यास से इस मन को साधने में सफलता प्राप्त होती है। 
           जहाँ यह मन इधर-उधर भागने लगे उसे समझिये कि इस भागमभाग का कोई अन्त नहीं है।अपने विवेक का सहारा लेकर आगे बढ़ें। इससे उन्नति भी होगी और ऊहापोह की स्थिति से भी बचा जा सकता है। तभी सही मायने में सुख और शान्ति से हम अपना यह जीवन व्यतीत कर सकेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद