बुधवार, 22 अप्रैल 2026

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

अपने अन्त:करण में विद्यमान ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, लालच, अहंकार आदि के कूड़े को मनुष्य सम्हालकर रखता रहता है। कुछ समय पश्चात कचरा बने हुए ये सभी दूषित भाव धीरे-धीरे सड़कर बदबू देने लगते हैं। पिष्टपेषण किए गए वे विचार मनुष्य के मन-मस्तिष्क को और अधिक प्रभावित करने लगते हैं। उस समय अपने अहं के कारण जब मनुष्य विश्लेषण करने लगता है तो उसका अपने परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों पर से विश्वास उठने लगता है।
           उन कुविचारों पर बार-बार मन्थन करने पर उसे यह लगने लगता है कि इस संसार में सभी उससे जलते हैं, कोई भी उसे तरक्की करते हुए नहीं देखना चाहता। सभी लोग उसका फायदा उठाना चाहते हैं पर उससे उन्हें कोई लगाव नहीं है। सब लोग उसके साथ स्वार्थवश जुड़े हुए हैं। वह इससे परे कुछ सोचना ही नहीं चाहता। उसकी प्रवृत्ति जब नकारात्मक होने‌ लगती है तब उसकी सोच का दायरा संकुचित होने लगता है। उस समय वह कुछ भी अच्छा नहीं कर पाता।
              सदा ही इस प्रकार सोच-विचार करते रहने वाले व्यक्ति धीरे-धीरे समय बीतते नकारात्मक दृष्टिकोण वाले बन जाते हैं। उन्हें हर मनुष्य में खोट ही नजर आने लगता है चाहे वह उनका प्रिय ही क्यों न हो। वे हर व्यक्ति को वे सन्देहभरी नजरों से देखते हैं। वे इस बात का दावा करते हैं कि लोग उन्हें समझते ही नहीं है। उन लोगों की बुद्धि ही ऐसी है जो उन्हें उनकी अच्छाई दिखाई नहीं देती। अपने अन्तस में झॉंककर देखने के स्थान पर वे सबमें खोट निकालने का कार्य करते हैं।
             उन्हें हर समय यही लगता है कि एक वे ही हैं जो दुनिया बदल देने की सामर्थ्य रखते हैं और उनके आसपास रहने वाले बाकी सभी लोग मूर्ख हैं। उनकी सोच संकुचित है। वे हर अच्छी चर्चा को अपने नकारात्मक विचारों से बर्बाद करके सबकी आलोचना का शिकार बन जाते हैं। निराश होकर बाद में वे यही शिकायत करते हैं कि उनकी बात को कोई सुनकर लाभ ही नहीं उठाना चाहता और एक दिन वे सब अपनी इस गलती के लिए पश्चाताप करेंगे। तब उन्हें समझ आएगा।
              मोह-माया के बन्धन में जकड़ा हुआ मनुष्य इनसे अपना पल्लू नहीं झाड़ पाता। न चाहते हुए भी अज्ञानतावश बार-बार इनके जाल में फँस जाता है। इसलिए वह केवल अपनों के लिए सब सुख-सुविधाएँ जुटाता है और दूसरे सभी लोगों को अनदेखा करने लगता है। जैसे अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को दे, उसी प्रकार अपनों के मोह में फंसे मनुष्य भी बारबार जाने-अनजाने सब गलत-सही काम करने से परहेज नहीं करते। बाद में परेशान होते हैं और पश्चाताप करते हैं।
              इसी प्रकार क्रोध करते हुए ऐसे लोग अपना विवेक दाँव पर लगा देते हैं। वे किसी ऐसे मनुष्य से दोस्ती नहीं करना चाहते जो अनावश्यक ही क्रोध करके अपने सामने वाले का अपमान करे अथवा दूसरों से अलग होता जाए।
             जिस प्रकार अपने घर के अन्दर जमा हुए कूड़े-कचरे को फैंकने के लिए उसका विज्ञापन अखबार आदि में नहीं किया जाता बल्कि चुपचाप प्रसन्नतापूर्वक बाहर जाकर कूड़दान में फैंक दिया जाता है। उसी प्रकार अपने अन्तस् में विद्यमान कुत्सित भावरूपी कचरे को निकालकर फैंकने के लिए भी ढिंढोरा नहीं पीटा जाता या विज्ञापित नहीं किया जाता। इन विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। न ही इन्हें अपने जीवन को नरक के तुल्य कष्टदायी बनाने देना चाहिए। इन्हें नियन्त्रित करना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। 
            ईश्वर की शरण में जाने से और अपने सद् ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय करने से मन में बसे हुए इन कुत्सित नकारात्मक विचारों को वश में किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपनी संगति पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए। यथासम्भव सज्जनों की संगति में रहने का प्रयास करना चाहिए। नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने के लिए निरन्तर अभ्यास आवश्यक है। यदि विचार बहुत अधिक परेशान कर रहे हों तो किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। स्वयं को सकारात्मक बनाने के लिए प्रयास तो करना ही पड़ेगा। 
          नकारात्मक विचारों को मन से निकालना मानसिक शान्ति और स्वस्थ जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए नकारात्मक विचारों को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए। उन्हें साक्षी भाव से देखना चाहिए और फिर धीरे-धीरे नकारात्मक विचारों को ध्यान तथा स्व-देखभाल‌ से बदलना चाहिए। खुद की आलोचना करने से बचना चाहिए। यदि विचार बार-बार आऍं तो धैर्य रखना चाहिए। धीरे-धीरे सकारात्मकता की ओर कदम बढ़ना चाहिए। मन को खाली न छोड़ें। अच्छी किताबें पढ़ें, सकारात्मक संगीत सुनें या आभारी रहने की आदत डालनी चाहिए।
           अपने मन को साधने के लिए प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। रात को सोते समय कुछ वक्त निकालकर एक बार सारे दिन के कार्य व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। इससे अपनी अच्छाई-बुराई का भान हो जाता है। उससे सबक लेकर अच्छे कृत्यों को बढ़ाते जाना चाहिए और अपनी कमियों को यथासम्भव दूर करते रहना चाहिए। वास्तव में थोड़ा-सा प्रयत्न करने से व्यक्ति स्वयं ही समझदार मनुष्य बनकर सबका प्रिय हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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