गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

मनुष्य यदि सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है तो वह कभी व्यर्थ नहीं होती। वह उस ईश्वर तक पहुँच ही जाती है और वह भी ऐसे व्यक्ति को अपनी शरण में ले लेता है। उसके दुखों को दूर करके उसे कुन्दन बना देता है। ईश्वर को मनुष्य की भौतिक पद प्रतिष्ठा से कोई अन्तर नहीं पड़ता। उसे तो बस मनुष्य के हृदयगत भावों की आवश्यकता होती है। वह प्रभु मनुष्य के भाव में ही अपना बसेरा बनाना पसन्द करता है। निम्न श्लोक इसी बात पर प्रकाश डाल रहा है -
       न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
    भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥  
अर्थात् न ही लकड़ी या पत्थर की मूर्ति में , न ही मिट्टी में देवता का निवास होता है। देवता का निवास तो भाव यानी हृदय में होता है। अतः भाव ही सर्वोपरि कारण है। यानी हृदय में ही देवता का निवास होता है।
               इस भौतिक संसार में एक बच्चा जब अपनी माता को करुणा से रोते हुए पुकारता है तो उसकी माँ उसे अपने आँचल में छुपा लेती है। उसे हर तरह से सान्त्वना देती है, उसके कष्ट का निवारण करती है। उसी प्रकार वह जगत जननी भी अपने बच्चों करुण पुकार सुनकर द्रवित हो जाती है और फिर झट से उन्हें सहारा देकर कृतार्थ करती है। उस जगज्जननी मॉं पर पूर्ण विश्वास करना चाहिए। स्वयं को उसे सच्चे मन से सौंपने पर वह कभी मनुष्य को निराश नहीं करती। बस हम लोग ही उस पर भरोसा नहीं कर पाते।
            यदि मनुष्य की प्रार्थना मात्र आडम्बर हो तो उसका कोई औचित्य नहीं होता। तब वह बस व्यर्थ होकर रह जाती है। उस व्यक्ति को उसका कोई भी लाभ नहीं मिल पाता। सच्चे मन से ईश्वर की अराधना करने वाले को कभी‌ हताशा का मुॅंह नहीं देखना पड़ता। सुख का समय हो अथवा दुःख का, ईश्वर हर परिस्थिति में अपने भक्त की सुरक्षा करता है। कभी उसे अकेला नहीं रहने देता। हर कदम पर उसके साथ होता है। हम मनुष्य प्रभु की इस कृपा को समझ नहीं पाते।
             बहुत से लोग इस संसार में ऐसे भी होते हैं जो केवल मात्र दूसरों को दिखाने के लिए ही पूजा-अर्चना करते हैं, उनके मन में कोई भाव नहीं होते। ऐसे लोग जो बरसों बरस प्रदर्शन करते रहते हैं, उनका बस यही उद्देश्य होता है कि  लोग उन्हें सबसे बड़ा भक्त मानें। बताइए जब स्वयं पर ही उस प्रार्थना का प्रभाव नहीं हो रहा तो उस ईश्वर के पास भी तो वह नहीं पहुँच सकेगी।
           अब यहाँ मैं एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है। ईश्वर को कभी आडम्बर वाली भक्ति नहीं चाहिए। उसे तो श्रद्धा से ओतप्रोत स्तुति चाहिए। जब व्यक्ति ईश्वर की उपासना आत्मोन्नति के लिए करता है तो उसके पास अणिमा, गरिमा आदि सारी सिद्धियाँ स्वयं ही आ जाती हैं। उसके उपरान्त मनुष्य को वहीं रुकना नहीं चाहिए अपितु और अधिक प्रयास में जुट जाना चाहिए। यदि वह उन पर ध्यान केन्द्रित करेगा तो उसकी उन्नति वहीं रुकना जाती है।
             उसका हृदय शुद्ध, पवित्र और निर्मल हो जाता है। उसके मनोविकार स्वत: ही दूर होने लगते हैं। तब मनुष्य एक साधारण मानव न रहकर एक महामानव बन जाता है। उसके मुख से निकला हुआ हर शब्द पत्थर पर पड़ी लकीर की तरह सच होने लगता है। उसका बोला हुआ हर वाक्य सारगर्भित होता है। उसके चेहरे का दिव्य तेज देखते ही बनता है। उसके आभामण्डल या औरा से निकलने वाली सात्विक किरणें किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करने में सक्षम होती हैं।
             इनके पास आने वालों को इनकी सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित करती है। इनकी वाणी में एक ओज होता है जिससे कुमार्गगामी लोग भी भयभीत होते हैं। इन लोगों का तेज ही इतना अधिक होता है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक इनसे घबराते हैं। शरीरिक बल न होने पर भी मानसिक और आत्मिक बल के कारण ये किसी का भी सामना कर सकते हैं। कैसा भी कार्य क्यों न हो, कर गुजरते हैं। इतिहास के पन्नों को खंगालने पर इन महापुरुषों के विषय में बहुत कुछ पढ़ने और जानने के लिए मिल जाएगा।
             हम देखते हैं कि बादल इस पृथ्वी से जल लेते हैं और उसे वापिस इस धरा को लौटा देते हैं। आकाश से बादलों के द्वारा गिरा हुआ जल किसी-न-किसी रास्ते से होकर अपने लक्ष्य समुद्र तक पहुँच ही जाता है। उसी प्रकार नि:स्वार्थ भाव से ईश्वर की गई प्रार्थना भी किसी-न-किसी प्रकार से उस प्रभु तक पहुँच ही जाती है। कहते हैं ईश्वर को चाहे छप्पन व्यंजनों का भी भोग लगा लो तो वे सब व्यर्थ हो जाते हैं, यदि ईश्वर को पाने की मन में ललक न हो। 
           ईश्वर ने दुनिया की सब नेमते हमें दी हैं। हमारी क्या सामर्थ्य कि हम उसे कुछ भेंट में दे सकें? हम लोग तो बस उसे रिश्वत देकर रिझाने का यत्न करते हैं। यह तो मनुष्य की भावना नहीं कहलाती। इसे हम सौदा करना ही कह सकते हैं। संक्षेप में ईश्वर मनुष्य के मन के भाव में रहता है, ये भाव ही उस तक पहुँचने का कारण हैं, माध्यम हैं। इसलिए अपने मन में उसे पाने की उत्कट भावना रखते हुए उसका स्मरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें