डर केवल एक भाव
डर क्या होता है यानी कि कुछ भी नहीं होता। यह केवल मन का एक भाव होता है। परन्तु यह व्यक्ति विशेष के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है। उसे सुख और आराम से नहीं रहने देता। उसके दिन-रात के चैन को लील जाता है। मनुष्य हर समय बदहवास-सा रहने लगता है। वास्तव में अक्सर मन में डर का कारण गलत धारणाऍं होती हैं। यह डर मनुष्य को कहीं बाहर से नहीं मिलता अपितु उसके अपने अन्तस् में होता है। मनुष्य को अनावश्यक रूप से नहीं डरना चाहिए।
डर लगने का मुख्य कारण मस्तिष्क में खतरे की पहचान और शारीरिक प्रतिक्रिया है जो मनुष्य को सम्भावित नुकसान से बचाने के लिए विकसित होती है। यह आघात सीखी हुई प्रतिक्रियाओं, अनिश्चितता अथवा मनोवैज्ञानिक समस्याओं के कारण हो सकता है। इससे दिल की धड़कन और सांस तेज हो जाती है। डर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो सुरक्षा के लिए होती है परन्तु इसकी अति हो जाने पर यह मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो सकती है।
इन्सान को अपने डर पर नियन्त्रण रखना चाहिए। यह डर उसके मन में कुण्डली मारकर पसरा रहता है। इस नाग से छुटकारा पाना इन्सान के लिए अति आवश्यक होता है। मनुष्य अपना सारा जीवन किसी-न-किसी कारण से डर-डरकर व्यतीत करता है। कभी धर्म के नाम पर डरता है तो कभी समाज से डरता रहता है। कभी वह अन्धेरे की घुटन से त्रस्त रहता है तो कभी उजाले से। बचपन में माँ से दूर होने का डर होता है। फिर गृहकार्य न करके स्कूल में जाकर मिलने वाली डाँट का भय रहता है। कभी परीक्षा में अपेक्षानुसार अंक न आने का भय उसे व्याकुल कर देता है।
बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक होने वाली असफलताओं का भय उसे जीने नहीं देता। जीवन में आने वाली परीक्षाओं में सफलता पाना उसका ध्येय होता है। इसलिए उसके मन में डर का घर कर जाना स्वाभाविक है कि अगर किसी कारण से चूक गए तो क्या होगा?
कभी मनुष्य को अपनी सफेदपोशी को बचाए रखने के लिए परेशानी रहती है। कभी-कभी न्याय व्यवस्था की पेचीदगियाँ और कभी इनकम टैक्स, सेल टैक्स आदि उसे भयभीत करते हैं। कभी कार्यालय में की गई किसी गलती के कारण बास या साथियों का डर उसे बेचैन कर देता है। कभी-कभी घर-परिवार के दायित्वों को ठीक से न निभा पाने पर होने वाला विस्फोट उसे भयभीत कर देता है।
किसी को पानी से, किसी को ऊँचाई से और किसी को आग से डर लगता है। किसी-किसी को तथाकथित भूत-प्रेतों का भय सताता है। और भी न जाने क्या क्या अनजाने डर उसे घेरकर उसके व्यक्तित्व को ग्रसने का कार्य करते हैं। उस समय वह थरथर काँपने लगता है। इस भय की अधिकता होने पर मनुष्य अपना मानसिक सन्तुलन तक खो देता है। किसी को कुछ कीड़ों से डर लगता है।
विचारणीय है कि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज सबके कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व होता है। उनके पालन में जहाँ भी चूक होती है, वहीं एक अनजाना-सा डर उसे सताने लगता है। 'लोग क्या कहेंगे' की यह चिन्ता उसके मन को निरन्तर व्यथित करने लगती है। यदि कभी मनुष्य से गलती हो जाए तो निस्सन्देह उसे डरना चाहिए। किन्तु उसके अलावा उसे कभी भी किसी से भी डरना नहीं चाहिए।
मनुष्य को अपनी की गई गलती का मन से प्रायश्चित करना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि वह गलती दुबारा न दोहराई जाए। मनुष्य अपनी जिन्दगी का मालिक स्वयं होता है। यदि मनुष्य अपनी गलती से सबक सीखकर आगे बढ़ता है तो उस जैसा कोई और इन्सान नहीं हो सकता।यदि मनुष्य सही तरीके से नियमानुसार कार्य करते हुए आगे बढ़ रहा हो तो कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह अपने सही रास्ते पर चलता रहे तो उसे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं होती, दूसरे उसका सामना करने से घबराते हैं।
जिस बात से डर लगता है, उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए। जब मनुष्य डर का सामना करता है तो वह धीरे-धीरे कम हो जाता है।इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या उसका डर वास्तव में तर्कसंगत है? डर लगने पर गहरी सांस लेनी शारीरिक व्यायाम (योगा) भी डर व घबराहट को कम करने में मददगार हैं। चाहिए, इससे शरीर को शान्त करने में सहायता मिलती है। मेडिटेशन (ध्यान) के जरिए मन को शान्त रखना चाहिए। नियमित मेडिटेशन मन को शान्त करती है और डर को नियन्त्रित करने में बहुत सहायता करता है। स्वयं को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए ताकि नकारात्मक विचार मन में न आ सकें। ईश्वर अथवा किसी मार्गदर्शक में विश्वास रखने से मन मजबूत होता है। शारीरिक व्यायाम यानी योग भी डर और घबराहट को कम करने में सहायक सिद्ध होता है।
इनके अतिरिक्त अपने डर पर काबू पाने के लिए मनुष्य को ईश्वर से सहायता की गुहार लगानी चाहिए। शौर्य सम्पन्न महपुरुषों की जीवन गथाएँ पढ़कर प्रेरणा लेनी चाहिए। ऐसे लोगो का साथ करना चाहिए जो सकारात्मक हों और उसे अनजाने डर से बाहर निकलने में सहायता कर सकें। सबसे बढ़कर उसे यह मानकर चलना चाहिए कि डर के आगे जीत है।
चन्द्र प्रभा सूद
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