समय बहुत मूल्यवान है। इस समय का मूल्य पहचानते हुए मनुष्य को इसकी कद्र करनी चाहिए। जो लोग समय की कीमत नहीं पहचानते उन्हें सिर धुनकर पछताना पड़ता है। कवि ने हमें समझाने का प्रयास किया है कि-
काले खलु समारब्धा नीतय: फलन्ति।
अर्थात् यथासमय आरम्भ की गई नीतियाँ ही सदा फलदायी होती हैं।
समय बीत जाने के बाद लकीर पीटते रहने का कोई लाभ नहीं होता। वे नीतियाँ हमारे लिए अनुपयोगी होकर मात्र कागजों में कैद होकर रह जाती हैं। चाहकर भी वे हमारे लिए कुछ नहीं कर सकती।
न जाने विश्व की कितनी ही महान संस्कृतियाँ इस काल के गाल में समा गई हैं, जिनके बारे में आज शायद ही कोई जान पाता होगा। इसी प्रकार बड़े-बड़े साम्राज्यों को भी समय ने सम्हलने के लिए मोहलत नहीं दी। फिर हम लोग किस खेत की मूली हैँ? जो समय हमारे साथ ही सहानुभूति रखेगा। इसीलिए मनुष्य को समय का मूल्य पहचानना चाहिए।
समय पलक झपकते ही एक राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा। यह वक्त नूर को भी बेनूर बना देता है और बेनूर को नूर दे देता है। समय कोयले को भी कोहिनूर बना देता है। बड़े कहते हैं- ‘वक्त बलवान तो गधा पहलवान।: यानी मनुष्य का समय यदि अनुकूल हो तो मूर्खों की भी पौ बारह हो जाती है। अन्यथा बड़े-बड़े पहलवानों को भी यह समय पटखनी दे देता है अर्थात् इन्सान देखता रह जाता है और यह समय चुटकियों में उन्हें मसलकर रख देता है।
हर मनुष्य को जिन्दगी बदलने के लिए एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस मौके का लाभ उठा लेते हैं वे समाज के सफल व्यक्तियों में गिने जाते हैं। जो लोग मिले हुए अवसर को गँवा देते हैं वे सारी उम्र अच्छे समय के आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं पर उनका मनचाहा पुनः उन्हें कभी नहीं मिल पाता। यदि मिलता है तो लम्बा इन्तजार। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें समय बदलने के लिए जिन्दगी दोबारा नहीं मिल सकती। यदि समझदारी से वक्त को पहचान करके मनुष्य अपनी योजनाओं को क्रियान्वित कर सके तो उसे ऊँचाइयाँ छूने से कोई नहीं रोक सकता।
इसके विपरीत समय को किसी भी कारण से अथवा आलस्यवश गँवाने वाले रेस में पिछड़कर नाकामयाबी का तमगा अपने माथे पर लगाकर घूमते हैं।
सयाने एक उक्ति कहते हैं - 'का वर्षा या कृषि सुखाने' अर्थात् उस वर्षा का क्या लाभ जब खेती सूख गई।
इसका यही अर्थ है कि जुते हुए खेत वर्षा के अभाव में सूख गए, वहाँ अब खेती नहीं हो सकती और आकाल पड़ना निश्चित हऊओ गया है, यदि तब छमाछम करती मूसलाधार बारिश हो भी जाए तो सब व्यर्थ है। जो जान-माल का नुकसान होना था, सो तो हो गया।
समय पर वृक्ष फल देते हैं, माली चाहे सैंकड़ों घड़े पानी क्यों न डाल दे। एक छोटा बच्चा जिसने अभी विद्यालय में प्रवेश लिया है, वह अपनी चौदह वर्ष की अवधि के बाद ही स्कूल की पढ़ाई करके वहाँ से बाहर निकलेगा। उसके बाद उच्च शिक्षा, फिर नौकरी या व्यापार और तब शादी करके अपने जीवन को व्यवस्थित करता है।
सारे जीवन की आधार निश्चित ही समयावधि की गणना है। इतने वर्ष पश्चात एल. आई. सी. या एफ. डी. परिपक्व हो जाएगी, हम अपना घर बना लेंगे, बच्चों की शादियाँ करके हम फ्री हो जाएँगे, मकान या गाड़ी का लोन चुक जाएगा, रिटायर हो जाएँगे आदि। इसी तरह मनुष्य का सारा जीवन समय की गणना करते हुए बीत जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
इसीलिए हमारे मनीषी समय के महत्त्व को पहचानने पर बल देते हैं। इस वक्त को अपनी मुट्ठी में कोई भी कैद नहीं कर सकता। यह रेत पर पड़ी मछली की तरह मनुष्य के हाथ से फिसल जाता है। यदि इसकी कद्र की जाए तो यह मनुष्य को आसमान छूने में सहायक बनता है और इसे बरबाद करने वालो को मसलकर रख देता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp
सोमवार, 9 मई 2016
समय को पहचानो
गुरुवार, 5 मई 2016
अनमोल मानव शारीर
हमारा यह शरीर बहुत ही अनमोल खजाना है। इसकी हम कद्र नहीं करते और न ही उस ईश्वर का धन्यवाद करते हैं जिसने यह अमूल्य रत्न दिया है। इस शरीर के एक-एक अंग का यदि हम मूल्य लगाने लगें तो स्वयं ही आश्चर्यचकित हो जाएँगे।
इस शरीर में विद्यमान मस्तिष्क, आँखें, हाथ, पैर, हृदय, किडनी, गाल ब्लेडर, लीवर, घुटने आदि जितने भी अंग हैं, यदि अकेले-अकेले उन सबका मूल्य चिकित्सक की दृष्टि से लगाया जाए तो करोड़ों-अरबों रूपए होगा। इसी प्रकार इनके अस्वस्थ हो जाने की स्थिति में एक-एक अंग पर लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं।
इतना सब जानते-समझते हुए और अपने आसपास देखते हुए भी हम ईश्वर प्रदत्त अपने इस खजाने से सदा अनजान बने रहते हैं। जब भी मौका मिलता है, बिना सोचे-समझे उस मालिक पर दोष लगाते हैं कि उसने हमें दिया क्या है? हम उस परम न्यायकारी मालिक पर पक्षपात करने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकते।
हमारी अवस्था वास्तव में एक भिखारी जैसी है जो किसी भी स्थिति में सन्तुष्ट नहीं रह सकता। उसे सोना, चाँदी अथवा राजपाट सब दे दिया जाए पर उसे सन्तोष नहीं मिलता। उसे तो बस गन्दी नाली में गिरा हुआ, भिक्षा में पहले मिला हुआ ताँबे का सिक्का ही चाहिए।
इसी आशय को यह कथा स्पष्ट करती है। एक राजा का जन्मदिन था। उसने सोचा कि सवेरे उठते ही जो व्यक्ति सबसे पहले उसे मिलेगा, उसे वह खुश कर देगा। प्रातः उठने पर सबसे पहले एक भिखारी उसे दिखाई दिया। राजा ने उस भिखारी के सामने ताँबे का एक सिक्का उछाल दिया। सिक्का भिखारी के हाथ सें छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी नाली में हाथ डालकर ताँबे का वह सिक्का ढूँढने लगा।
राजा ने उसे बुलाकर ताँबे का दूसरा सिक्का दे दिया। भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापिस जाकर नाली में गिरा हुआ वह सिक्का ढूँढने लगा। राजा को ऐसा लगा कि यह भिखारी बहुत ही गरीब है।
उसने भिखारी को फिर बुलाया और एक चाँदी का सिक्का दिया। भिखारी ने राजा की जय-जयकार करते हुये चाँदी का सिक्का रख लिया और फिर नाली में ताँबे वाला सिक्का ढूँढने लगा। राजा ने उसे फिर बुलाकर, उसकी हालत देखकर एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी खुशी से झूम उठा और वापिस भागकर अपना हाथ नाली की तरफ बढाने लगा।
राजा को बहुत ही बुरा लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को उसे आज खुश एवं सन्तुष्ट करना है। उसने भिखारी को फिर बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूँ। अब तो खुश और सन्तुष्ट हो जाओ तुम। भिखारी ने कहा कि वह खुश और संतुष्ट तभी हो सकेगा, जब नाली में गिरा हुआ ताँबे का वह सिक्का भी उसे मिल जाएगा।
हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है। आधा राजपाट, सोने-चाँदी के सिक्कों के मिल जाने के बाद भी गंदी नाली में हाथ डालने से बाज नहीं आ रहा। हमें परमात्मा ने मानव शरीर रुपी यह अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रुपी नाली में से ताँबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे हैं।
इस अनमोल मानव जीवन रूपी उपहार के लिए उस प्रभु का कोटि-कोटि धन्यवाद हमें करते रहना चाहिए। यदि इस शरीर का एक भी अंग किसी कारण से भंग हो जाए अथवा ठीक से अपना कार्य न कर सके तो हमारा यह जीवन नरक के समान कष्टदायी हो जाता है। उसके द्वारा दिए गए इस बेशकीमती खजाने का यदि हम उचित प्रकार से इस्तेमाल कर सकें, तभी हमारा यह जीवन धन्य हो सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp
बुधवार, 4 मई 2016
जैसी सोच वैसी सृष्टि
मनुष्य जैसी सोच रखता है, उसे यह सृष्टि वैसी ही दिखाई देती है। सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति को सारी सृष्टि बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक प्रतीत होती है। हर ओर अच्छाई देखने के कारण वह हर परिस्थिति में शान्त और प्रसन्न रहता है। वह अपने चारों के वातावरण को अपनी सकारात्मक सोच से महकाता है। उसके पास आने वाला हर व्यक्ति अपने कष्टों को भूलकर प्रसन्नता से भर जाता है।
इसके विपरीत नकारात्मक सोच वाला मनुष्य अच्छाई में भी बुराई ढूँढ लेता है और कल्पता रहता है। उसे अपनी इस सोच के कारण दो पल का भी सुकून जीवन में नहीं मिल पाता। वह स्वयं तो परेशान रहता ही है, अपने बन्धु- बान्धवों को भी चैन नहीं लेने देता। अपने चिड़चिड़े स्वभाव के कारण वह उन्हें बिना किसी मतलब के परेशानियों मे डाल देता है।
सकारात्मक और नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों के विषय में हम इस कथा से समझते हैं। किसी ऋषि के दो शिष्य थे। उनमें से एक शिष्य की सकारात्मक सोच थी। वह हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचता था और दूसरा नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी था। एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें जंगल में ले गये। जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे। ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से उस पेड़ को ध्यान से देखने के लिए कहा।
तब उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है? शिष्य ने कहा कि यह पेड़ बहुत विनम्र है, लोग इसे पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे उन्हें फल देता है। इंसान को भी इसी तरह होना चाहिए, जीवन में कितनी भी परेशानी क्यों न हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए।
फिर उन्होंने दूसरे शिष्य से पूछा कि तुम क्या देखते हो? उसने क्रोधित होते हुए कहा कि यह पेड़ बहुत धूर्त है। बिना पत्थर मारे यह कभी फल नहीं देता। यदि इससे फल लेने हैं तो इसे मारना ही पड़ेगा। इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीनकर ले लेनी चाहिए।
गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की प्रशंसा की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा। सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती है। नकारात्मक सोच के व्यक्ति सदा अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूँढते हैं।
इसी बात को पुष्ट करने के लिए हम गुलाब के फूल को देखते हैं। गुलाब के फूल को काँटों से घिरा हुआ देखते ही वह नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कहेगा कि इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा? इतना सुंदर होकर पर भी यह काँटों से घिरा हुआ है। जो भी इस फूल को तोड़ने का यत्न करेगा उसे ये दुष्ट काँटे उसे लहुलूहान कर देंगे।
इसके विपरीत उसी ही फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कहेगा कि वाह! यह फूल प्रकृति की कितनी सुंदर रचना है जो इतने काँटों के बीच भी सुरक्षित खिला हुआ है। सबका मन मोह रहा है और चारों ओर अपनी सुगन्ध फैला रहा है। दोनों ने अपनी समझ के अनुसार बात एक ही कही ही है लेकिन केवल उनकी दृष्टि और कथनी का अन्तर है।
एक व्यक्ति को हरेक में गुण दिखाई देते हैं और दूसरे को उसमें दोष ही दिखाई देते हैं। मनुष्य जितना सरल, निष्कपट और सहृदय होगा उतना ही वह दूसरों की हर कठिनाई को समझेगा और उसे दूर करने का यथासंभव प्रयास करेगा। परन्तु कठोर हृदम, निर्मम और छिद्रान्वेषी व्यक्ति दूसरों की कमियों को ढूँढकर उनका उपहास करेगा। वह भूल जाता है कि उसके अपने भीतर कमियों का भंडार है।
दूसरों की कमियों अथवा गलतियों को अनदेखा करके सदा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। ऐसे व्यक्तियों के चेहरे पर एक अलग तरह की चमक होती है। नकारात्मक सोच वाले हमेशा मुरझाए से रहते हैँ।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp
मंगलवार, 3 मई 2016
ईश्वर भक्ति बिसरा दी
अपने घर-परिवार और नौकरी-व्यापार आदि के दैनन्दिन दायित्वों को पूरा करने की फिराक में मनुष्य उस परमात्मा को बिल्कुल ही भूल जाता है जिसने उसे इस संसार में भेजा है। वह रोजी-रोटी जुटाने के चक्कर में दिन-रात एक कर देता है पर मालिक की याद उसे नहीं आती।
इस संसार में आने से पूर्व अंधेरे से घबराकर वह बार-बार मालिक से प्रार्थना करता है कि उसे अंधकार से मुक्ति देकर उजाले की ओर ले चलो। दुनिया में जाकर वह प्रभु का स्मरण करेगा, उसे पलभर के लिए भी नहीं भूलेगा। और इसी प्रकार इस जगत से विदा लेते समय दाता से रो-रोकर प्रार्थना करता है कि आगे मानव तन देना ताकि इस जन्म में पूरी तरह से जो तेरी भक्ति नहीं कर पाया, तब करूँगा। मैं अपना अगला जीवन पूर्णरूप से तुझे समर्पित करूँगा।
पुराना तन पीछे छूट गया और नया चोला भी मनुष्य को मिल गया, अब क्या? बचपन से बुढ़ापे की ओर तेजी से कदम बढ़ाता जा रहा है पर उस मालिक को याद करना तो फिर से पीछे छूटता जा रहा है। दुनिया के सारे व्यापार अपनी गति से चलते जा रहे हैं पर केवल उसकी भक्ति की गाड़ी अभी तक स्टार्ट ही नहीं हो पाई। वाह रे इन्सान! क्या यही है तेरी वचनबद्धता?
इस एक जुबान के भरोसे पर अरबों-खरबों के व्यापार तो मनुष्य कर लेता है किन्तु ईश्वर को दी गई यह जबान क्योंकर हार जाता है, आज तक समझ नहीं आया। सारी आयु इन्सान सोचता रहता है बड़ा हो जाऊँगा तब प्रभु का भजन करूँगा। सारी आयु बीत जाती है, दुनिया से विदा लेने का समय भी पास आ जाता है परन्तु तब भी हरि भजन की वेला नहीं आती।
भक्ति के पथ पर चलने के लिए वृद्ध होने का इन्तजार नहीं करना चाहिए। किसी भी आयु में उसका नाम ले सकते हैं। जो सारी उम्र उसका स्मरण नहीं कर पाया, वह निश्चित ही बुढ़ापे में भी ईश्वर को नहीं भज सकेगा। कुछ लोग कहते हैं कि बासी फूल तो प्रतिमा पर भी नहीं चढ़ाए जाते, फिर बूढ़ा अशक्त शरीर ईश्वर को कैसे अर्पित किया जा सकता है? इस विषय पर विचार आवश्य करना चाहिए।
मालिक ने यह मानव तन दिया है। हमें अब मौका मिल गया है कि जिसको पाने के लिए अगणित जन्म गँवा दिए हैं, उसे पाने का प्रयास करें। अब भी यदि अनजान बने रहे तब उसे किसी सूरत नहीं पा सकेंगे। अगला जन्म मनुष्य का मिलेगा या नहीं मिलेगा, इसका कोई भरोसा नहीं है।
ईश्वर की पूजा-अर्चना सच्चे मन से करनी चाहिए। उसमें लेशमात्र भी प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। ईश्वर जो बारम्बार हमें बिनमाँगे झोलियाँ भर-भरकर खजाने देता है, उसे हम क्या दे सकते हैं? उसे केवल श्रद्धा अथवा भावना से की गई भक्ति ही चाहिए और कुछ नहीं। प्रार्थना का ढोंग करना स्वयं को छलना है। ऐसा करके दुनिया से वाहवाही तो लूटी जा सकती है पर उसकी नजर में ऐसी भक्ति का मूल्य शून्य से अधिक कुछ नहीं होता।
पक्षी एक-एक दाना करके चुगता है और सौ-सौ बार अपना शीश झुकाता है। हम इन्सान क्या उन बेजुबान पक्षियों से भी गए गुजरे हैं कि सौ-सौ नेमते पाकर भी उस मालिक का अहसान नहीं मानते। उसका धन्यवाद करने में भी कंजूसी करते हैं।
जब तक यह शरीर स्वस्थ है, मृत्यु दूर है, तब तक हरि भजन की ओर ध्यान दे देना चाहिए।हम नहीं नहीं जानते कि भविष्य के गर्भ में क्या लिखा है? कब हमारी आँखें मुँद जाएँ और एक बार फिर हम रो-रोकर हरि भजन करने के लिए कुछ समय की प्रार्थना करने लगें। उस समय एक अतिरिक्त पल की भी मोहलत नहीं मिलेगी। इसलिए जो कुछ हैं, जीवन के यही अनमोल पल हैं। इनका सदुपयोग उस मालिक को सच्चे मन से सिमरण करने में बिता सकें तो हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही संवर जाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp
सोमवार, 2 मई 2016
बड़े बोल बोलना
बड़े बोल बोलना अर्थात अपने अहंकार का प्रदर्शन करना। बड़े बोल बोलने वाले व्यक्ति को कोई पसंद नहीं करता सभी उससे बचकर निकलना चाहते हैं। बड़े बोल को अहंकार की श्रेणी में रखा जाता है। यह अहंकार विष की बेल के समान है। इसके सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति का विनाश निश्चित है।
रहीम जी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में कहा है-
बड़े बड़ाई न करें और बड़े न बोलें बोल
रहीमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल
अर्थात मनुष्य को न अपनी प्रशंसा करनी चाहिए और न ही बड़े बोल बोलने चाहिए। यदि ऐसा होता तो बेशकीमती हीरे को भी तो घमण्ड में इतराना चाहिए कि वह बहुत मूल्यवान है। पर वह बेचारा तो किसी से कुछ नहीं कहता। पारखी जौहरी उसका मूल्यांकन करता है, तब उसकी कीमत कआ अहसास सबको होता है।
मनुष्य को अपने रग-रूप, अपने उच्च पद, अपने ज्ञान, आज्ञाकारी सन्तान अथवा अपने धन-वैभव किसी का भी गर्व नहीं करना चाहिए। ये सब आनी-जानी हैं, स्थायी नहीं हैं। शरीर के नष्ट होने से पहले ही मनुष्य का साथ छोड़ देती हैं।
इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि सफलता की ऊँचाइयों को छूकर भी कभी अहंकार मत करना क्योंकि ढलान हमेशा शिखर से ही शुरु होती है। यदि ऊँचाई को छूने के बाद जरा-सा धक्का लग जाए तो मनुष्य सीधा धरालत पर धड़ाम से गिर पड़ता है। तब उसे सम्हलने में बरसों लग जाते हैं और तब तक दुनिया से विदा लेने का समय करीब आ जाता है।
इस बात को हम नींबू के उदाहरण द्वारा समझते हैं। नीबू के रस की एक बूँद यदि हजारों लीटर दूध में डाल दी जाए तो वह उस सारे दूध को बरबाद कर देती है। यानि दूध फट जाता है या खराब हो जाता है। तब उसे किसी भी उपाय से पुरानी स्थिति में वापिस नहीं लाया जा सकता। उसे उपयोग में लाना कठिन होता है।
उसी प्रकार अहंकार भी अच्छे-से-अच्छे लोगों को भ्रष्ट कर देता है। वह बन्धु-बान्धवों से उसके प्यार प्रगाढ़ सम्बन्धों को भी बिगाड़ देता है। अपने इस अहंकार की आदत के कारण समय बीतने पर जब वह पीछे मुड़कर देखता है तब स्वयं को निपट अकेला खड़ा पाता है। उस समय उसे अपनों के साथ और सहारे की बहुत ही आवश्यकता होती है।
हर मनुष्य को सरल, निष्कपट, सहृदय लोग अच्छे लगते हैं। वे उन लोगों के साथ जुड़ना चाहते हैं जो क्षमाशील हों और हर समय अकड़कर न रहें और दूसरों की भावनाओं को समझें। प्यार से सम्बन्ध लम्बे समय तक साथ चलते हैं। किसी भी गलती के हो जाने की स्थिति में एक-दूसरे से क्षमा याचना करने में उन्हें कोई परहेज नहीं होता। अहंकारी हमेशा दूसरों को उसकी गलती पर जलील करना जानता है। वह केवल सारी सुनना पसंद करता है पर सारी कहना नहीं चाहता। यदि किसी भी कारण से उसे झुकना पड़ जाए तो उसकी नाक कटती है या उसे अपनी हेठी समझने लगता है।
अहंकारी व्यक्ति को यह भी पता नहीं चलता कि वह किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके उनके हृदय को घायल कर रहा है। वह अपने अहं के नशे में दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए बिना सोचे-समझे अन्धाधुन्ध पैसे भी बरबाद करने से पीछे नहीं हटता। चाहे बाद में उसे कितना ही पछताना क्यों न पड़े। इसीलिए विद्वानों का मानना है कि मनुष्य को किसी का भी मजाक सोच-समझ करके उड़ाना चाहिए और अपना पैसा भी व्यर्थ नही गंवाना चाहिए। दोनों ही स्थितियाँ मनुष्य के लिए कष्टकारी होती हैं।
मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए अहंकारी नहीं। अहंकार से उसका किसी भी तरह से मंगल नहीं हो सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp
रविवार, 1 मई 2016
काँटे बिछाने वालों को फूल नहीं
'इस हाथ दो और उस हाथ लो' यह एक सार्वभौमिक नियम है जो सब पर लागू होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं- 'जैसा बोओगे वैसा काटोगे।'
किसी भी व्यक्ति को यहाँ छूट दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। बिना किसी पक्षपात के ईश्वर निर्दिष्ट नियमों से ही यह संसार चलता है। हर जीव को भरपूर अवसर मिलता है। यदि उस मौके का वह लाभ उठा लेता है तो सर्वविध सुखों का खजाना उसे प्राप्त होता है। इसके विपरीत आचरण करने वालों के हिस्से बेशुमार कष्ट और परेशानियाँ आती हैं।
बहुत वर्षों पहले किसी फिल्म में एक गाना आया था-
गरीबों की सुनो वह तुम्हारी सुनेगा।
तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा।
इसका यही अर्थ हुआ कि वह मालिक हमारे लिए खजाने लुटाने को तैयार बैठा है। हम अपने को उसके योग्य सिद्ध करेंगे तभी तो वह हमारी झोलियाँ भरेगा। हमें बस अपनी झोली के छेदों को सिलकर उसे मजबूत बनाना है।
मनुष्य दूसरों से बहुत अपेक्षाएँ रखता है। वह भूल जाता है कि दूसरों से जो वह चाहता है पहले उसे वही दूसरों को देना होता है। तभी तो ईश्वर अनन्त गुणा करके उसे मनुष्य को वापिस लौटा देता है। यदि मनुष्य दूसरों से सेवा करवाना चाहता है तो उसे निस्वार्थ भाव से, बिना पक्षपात के सबकी सेवा करनी होती है। यदि मनुष्य दूसरों से मान की अपेक्षा करता है तो उसे सबको समान रूप से मान देना होगा। यदि मनुष्य दूसरों से यश की कामना करता है तो उसका कर्त्तव्य बनता है कि वह सबको यश दे। यानि यथायोग्य व्यवहार उससे अपेक्षित है।
इस बात को गाँठ बाँध लो कि जब शुभकर्म का फल हमारे लिए शुभ होगा तब अशुभकर्म का फल हमारी आशा के सर्वथा विपरीत अशुभ ही होगा। इस अशुभ फल को भोगते समय मनुष्य को नानी याद आ जाती है। कितने भी हाथ-पैर मार लो उससे बचने का कोई भी रास्ता नहीं मिल पिता। इसलिए किसी दूसरे के रास्ते में काँटे बिछाने पर फूलों की अपेक्षा करना अनुचित है। अर्थात दूसरों को दुख देने पर उसके बदले दुख ही मिलेंगे, सुख कदापि नहीं। किसी का अपमान करने के बदले में मनुष्य को भी अपमान ही सहन करना पता है। उसे प्रशंसा नहीं मिल सकती।
यदि भ्रष्टाचार, अन्याय, आतंक, रिश्वतखोरी आदि के बीज मनुष्य बोएगा तो अपने जीवन में उसे सुख-शान्ति के पलों की कामना नहीं करनी चाहिए।
इस संसार में हम अपने आसपास देखते हैं और बन्धु-बान्धवों को परामर्श भी देते हैं। जब किसी व्यक्ति की सन्तान उसकी आशा के विपरीत सामाजिक तौर से नालायक निकल जाए, अपने दुर्व्यवहार से उसका जीना दूभर कर दे, समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल हो जाए अथवा धोखे से उसका सब धन, सम्पत्ति या व्यापार हथिया ले तब वे माता-पिता उस बच्चे से निराश होकर उससे कानूनी तौर पर सारे रिश्ते समाप्त कर लेते हैं अर्थात उसे disown कर देते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब उनका वह बच्चा उनके लिए अजनबी के समान है, उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं रहा।
पारस्परिक भौतिक सम्बन्धों में जब ऐसा व्यवहार किया जा सकता है तो फिर सामाजिक सम्बन्धों में भी यह न्याय हो सकता है। सरल भाषा में हम कह सकते हैं कि जैसा व्यवहार अपने लिए मनुष्य को दूसरों से चाहिए उसे वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करना चाहिए।
दूसरों के साथ अच्छा या बुरा व्यवहार हमारे सामने कर्मफल बनकर आता है। उसे भोगना हमारी मजबूरी होती है, वहाँ शार्टकट अथवा बचाव का कोई उपाय कारगर नहीं होता। ये कर्मफल जन्म-जन्मान्तरों तक हमारे साथ-साथ चलते हैं, इन्हीं से हमारा इहलोक और परलोक प्रभावित होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp