सोमवार, 8 सितंबर 2025

मुखिया को निष्पक्ष होना चाहिए

मुखिया को निष्पक्ष होना चाहिए 

घर हो, या देश हो या कोई संस्थान हो, वहॉं के मुखिया या Head को निष्पक्ष होना चाहिए। उसकी दृष्टि में सभी बराबर होने चाहिए। मुखिया कैसा होना चाहिए? इस विषय पर तुलसीदास जी ने कहा है-
       मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक।
      पाले पैसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक॥
अर्थात् इस दोहे में तुलसीदास जी का कहना है कि मुखिया को मुख के समान होना चाहिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मुख में जब कोई खाद्य पदार्थ डाला जाता है तो वह खाने में कोई भेदभाव नहीं करता। अब चाहे वह खाना नमकीन, खट्टा, मीठा, तीखा, कसैला आदि किसी भी स्वाद का हो। वह सभी पदार्थों को एक ही प्रकार से बिना किसी झिकझिक के खाता है। उसी प्रकार एक ही प्रक्रिया से उन सबको पचने व शरीर के सम्पूर्ण अंगों को पुष्ट करने के लिए आगे भेज देता है।
              इसी प्रकार मुखिया भी होना चाहिए। उसे किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। धर्म-जाति, रंग-रूप, अमीर-गरीब आदि के भेद को अनदेखा करते हुए सबको एक समान समझना चाहिए और सभी लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए। अब प्रश्न यह उठता है कि मुखिया किसे कहते हैं? वह कौन होता है? उसके क्या कर्त्तव्य हैं? आदि।
         ‌‌     इन प्रश्नों के उत्तर में हम कह सकते हैं कि मुखिया सबसे बड़े या प्रमुख को कहते हैं। अब वह किसी व्यापारिक संस्था, किसी आफिस का बास हो सकता है। किसी धार्मिक संस्था आदि का प्रधान हो सकता है। घर-परिवार में सबसे बड़ा सदस्य हो सकता है या फिर किसी देश का राष्ट्रपति अथवा प्रधानमन्त्री कोई भी हो सकता है।
             व्यापारिक संस्था या किसी आफिस का मुखिया यानी मालिक या बास यदि अपने सभी कर्मचारियों के साथ मधुरता और सहृदयता का व्यवहार करता है, उनके घर-परिवार की जानकारी रखता है, उनके सुख-दुख में उनसे सहानुभूति रखता है तो वहाँ का माहौल बहुत ही सौहार्दपूर्ण होता है। सभी कर्मचारी अपनी क्षमता से भी बढ़कर अपने काम निपटाते हैं। वे किसी को शिकायत का मौका नहीं देते। फलस्वरूप ऐसी ही संस्थाएँ निरन्तर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती हैं।
           इसी प्रकार अन्य धार्मिक, समाजिक आदि संस्थाओं में प्रधान आदि के समतापूर्वक व्यवहार से कार्य कुशलतापूर्वक सम्पन्न होते हैं। वहाँ पर सभी लोग मिलजुल कर संस्था को उन्नत करने का प्रयास करते हैं। 
               शिक्षण संस्थानों की सफलता भी वहाँ के मुखिया यानी प्रिंसिपल के व्यवहार पर निर्भर करता है। यह उसके हाथ में होता है कि संस्था को नम्बर वन बनाए ताकि उसकी धूम मच सके। अन्यथा संस्था के लोग उसके विरूद्ध हो जाते हैं और उस संस्थान की टी आर पी नित्य गिरने लगती है। ऐसे में लोग अपने बच्चों को वहॉं पर पढ़ने के लिए भेजने‌ के लिए उत्साहित नहीं दिखाई देते।
            घर-परिवार में यदि मुखिया छोटे-बड़े सभी सदस्यों के साथ समता का व्यवहार करेगा, सबको यथायोग्य सम्मान देगा तो उस घर में सौहार्द व सद्भावना का माहौल रहेगा। सबकी शक्ति मिलकर जब एक हो जाती है तो वहाँ सभी परेशानियाँ पलक झपकते दूर हो जाती हैं। ऐसे परिवारों में सुख, समृद्धि व शान्ति का साम्राज्य होता है जो सबको आह्लादित करता है। यदि  मुखिया पक्षपात करेगा तो वहाँ नित झगड़े होने लगते। सम्बन्धों में दरारें आने लगती हैं और घर नरक के तुल्य हो जाता है। सभी सदस्य एक-दूसरे से कटने लगते हैं और फिर वहॉं छुपाव-दुराव की स्थितियॉं बनने लग जाती हैं। इससे मनों की दूरियॉं बढ़ती हैं।
                किसी देश में राजा या राष्ट्रपति अथवा प्रधानमन्त्री जो भी कोई मुखिया है यदि वह अपने देशवासियों को एकसमान मानते हुए सबके लिए नीतियाँ और कानून बनाता है तो देश की भलाई होती है। वहाँ लूट- नहीं खसौट नहीं होती और न ही अराजकता का वातावरण होता है। शासक यदि सकारात्मक रुख अपनाएगा तो देश के लोग समृद्धि की ओर कदम बढ़ाते हैं। यही समृद्ध देश किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए सक्षम होता है। परन्तु यदि वह अपने प्रजाजनों के साथ भेदभाव करेगा तो लोगों में परस्पर में वैमनस्य बढ़ेगा, लोगों का आपस में एक-दूसरे पर विश्वास नहीं रहता और वहाँ अराजकता फैल जाती है। ऐसे देश पर कोई अन्य देश अपना आधिपत्य बहुत सरलता से कर लेता है।
               कोई भी मुखिया जब निष्पक्ष होकर अपने अधीनस्थों के लिए सोचता है तो सबका दिल जीत लेता है। वह प्रिय बनकर सबके हृदयों पर राज करता है। तब सर्वत्र ही खुशियाँ खुश होकर दस्तक देती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 7 सितंबर 2025

जिन्दगी के साथ छुपन छुपाई का खेल

जिन्दगी के साथ छुपन छुपाई का खेल

बच्चों की भाँति हम जिन्दगी के साथ आँख मिचौली या छुपन छुपाई का खेल खेलते रहते हैं। हम अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं और यह सोचते हैं कि हमें कोई नहीं देख रहा इसलिए हम अपनी मनमानी कर सकते हैं परन्तु यह किसी सूरत नहीं हो सकता।
            इस खेल में एक बच्चा आँखें बंद करके सौ तक गिनती गिनता है और बाकी सभी बच्चे ऐसी जगह छिपने की कोशिश करते हैं जहाँ बारी(den) देने वाला उनको आसानी से ढूँढ न सके। वह गिनती पूरी करके ढूँढने निकलता है। जिसे वह पकड़ लेता है उसे अपनी बारी देनी होती है। इस प्रकार यह खेल चलता रहता है। इस खेल में बच्चे के आँख बन्द कर देने के बाद उसे कोई नहीं दिखाई देता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वह मनमर्जी करे या सबको झाँसा देकर भाग जाए। अपना कार्य उसे करना पड़ता है तभी इस खेल को खेलने का आनन्द आता है।
            संसार में रहकर हम सबको खोजने में सारा समय व्यतीत करते रहते हैं। जितना हम अपनों की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते हैं, उतना ही वे हमारी पहुँच से दूर होते जाते हैं। यदि हम सबके साथ मिलकर रहें तो क्योंकर अपनों की खोज-खबर लेने के लिए हमें मारा मारा फिरना पड़े? सीधा व सरल सा गणित है जिसे अपना बनाओगे वह पराया होकर भी अपना बन जाएगा। इसके विपरीत यदि अपनों से दुर्व्यवहार करके पराया बना दोगे तो वे अपने हमसे ही छिटककर दूर चले जाएँगे। इसलिए अपना कौन है और पराया कौन है? हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है।
               हम अपने रिश्ते-नातों, भाई-बन्धुओं, सज्जनों-दुश्मनों के साथ जीवन पर्यन्त यह खेल खेलते रहते हैं। कभी अपनी आर्थिक मजबूरियों के चलते तो कभी सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक कारणों के चलते। कुछ समस्याओं का कारण सचमुच हमारी अपनी विवश्ताएँ होता है और कुछ हमारी मौजमस्ती में डूबकर दूसरों को अनदेखा करने से बन जाते हैं। 
             मानव जीवन हमें ईश्वर ने ऐसा दिया है कि हमें सबकी आवश्यकता होती है। हमें छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी हर वस्तु व हर सम्बन्ध चाहिए होता है। किसी के भी न होने की स्थिति में हम पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।
          इसी प्रकार जीवन में सुख-दुख की भी आँख मिचौली चलती रहती है। न तो हम सुखों को नजर अंदाज कर सकते हैं और न ही दुखों से मुँह मोड़ सकते हैं। दोनों को कर्मानुसार भोगना हमारा प्रारब्ध है। छुटकारा हमारे चाहने से हमें नहीं मिलेगा बल्कि भोगकर ही मिलेगा।
             जब हम अपने अहं में प्रकृति के साथ यह खेल खेलने की बेवकूफी करते हैं तो उसका भयंकर दण्ड या प्रकृति का कोप प्राकृतिक आपदाओं के रूप में हमें सहना पड़ता है। ये आपदाऍं अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, बाढ़, सुनामी आदि किसी रूप आकार हमारे जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। हम बस कठपुतली की तरह मूक बने इन समस्याओं से दो-चार होते रहते हैं।
              हमारा वश चले तो हम जीवन व मृत्यु के साथ भी आँख मिचौली खेल लें। पर ईश्वर ने यह अधिकार अपने पास रखा हुआ है। मनुष्य की यह हस्ती नहीं है कि वह मालिक के न्याय में अपनी नाक घुसा सके। उसे हर हाल में परास्त होना ही होता है। यही विधि का विधान है जिसे हम लोगों को सिर झुकाकर स्वीकार करना होता है। यही इस जीव की नियति है।
          इस खेल को खेलते समय अपनी सीमाओं को हमें नहीं भूलना चाहिए। ईश्वर के न्याय को सिर झुकाकर स्वीकार कर लेंगे तो हम सुखी रहेंगे अन्यथा दुखों की चक्की में पिसते रहेंगे। ईश्वरीय विधान को मानने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई चारा भी तो नहीं है। हम अपनी मनमर्जी ईश्वर के समक्ष नहीं चला सकते। इस विषय पर हमें स्वयं ही मनन करना है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 6 सितंबर 2025

बिछड़े हुए दुबारा नहीं मिलते

बिछड़े हुए दुबारा नहीं मिलते

हमारे अपने जो इस दुनिया के मेले में हाथ छूट जाने के कारण बिछुड़ जाते हैं, वे दुबारा हमें नहीं मिलते। हम चाहे लाख सिर पटक लें या उन्हें दुनिया जहान में उन्हें क्यों न ढूँढ लें, हमारे सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। चाहे उनकी गुमशुदगी की हम कितनी ही रिपोर्ट लिखवा दें या सीआईडी या किसी जासूसी संस्था को पीछे लगा दें पर कोई भी उन्हें ढूँढकर हमारे सुपुर्द नहीं कर सकता है क्योंकि उनको ढूँढना पुलिस, सीआईडी या किसी जासूस के बस की बात है ही नहीं। हम भी ऐसे हैं कि उनको वापिस नहीं ला सकते। हम दिन-रात उनके वियोग में रोते-बिसूरते रहते हैं बस पर हल नहीं खोज पाते। उनको खोज पाना हमारी सामर्थ्य से परे है।
           उनका और हमारा साथ इसलिए छूट जाता है कि उनके साथ हमारा सम्बन्ध इतना ही होता है। हमारा साथ कितना होना चाहिए, यह हमारे पूर्वजन्म कृत कर्म सुनिश्चित करते हैं। यह असार संसार मात्र रिश्तों की एक मण्डी की तरह है। जैसे मण्डी से हम अपनी आवश्यकता के अनुरूप पदार्थ खरीद लेते हैं। उसी प्रकार इस रिश्तों की मण्डी में हमारे कर्म हमें रिश्तों की सौगात देते हैं। जब उनका समय समाप्त हो जाता है, वे हमें छोड़कर कहीं दूर न जाने किस लोक में चले जाते हैं।
              कर्म प्रधान इस व्यापारिक मण्डी में केवल वही रिश्ते हमें मिलते हैं जिनके साथ पूर्वजन्मों में हमारे लेनदेन के सम्बन्ध होते हैं। वे हमारे दादा, दादी, नाना, नानी, माता, पिता, चाचा, चाची, ताऊ, पति, पत्नी, भाई, बहन, मित्र, पड़ौसी या कोई अन्य भी किसी भी रूप में हो सकते हैं। जिन सम्बन्धों से हमने लेना या देना होता है, वे हमारे पास आकर किसी-न-किसी सम्बन्ध के नाम से हमें मिल जाते हैं। यही कर्मचक्र कहलाता है। यही मनुष्य का जीवन चक्र है।
              यह लेन-देन बीमारी के नाम पर खर्च कराता है, धन-सम्पत्ति देता या लेता है,  शारीरिक विकलांगता के कारण सारी आयु सेवा करता या कराता है, घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाना आदि किसी भी रूप में एक-दूसरे के साथ जुड़ने का कारण बनता है। इस सबके लिए हम स्वतन्त्र नहीं हैं। ये सब हमारे कर्मभोग कहलाते है। यही सत्य है कि हमें सभी रिश्ते अपने किए गए कर्मों के अनुसार मिलते हैं। चाहे वे अच्छे हैं या बुरे उनके साथ निभाना पड़ता है। इसमें हमारी इच्छा या अनिच्छा को कोई नहीं पूछता।
            अपने आसपास हम देखते हैं जिन घरों में सन्तान नहीं होती, वे ऐसे बच्चे को गोद ले लेते हैं, उस बच्चे के साथ उनका कोई खून का सम्बन्ध नहीं होता, न ही वे उन मातापिता को जानते हैं और न ही वे उनके करीब रहते हैं। पूर्वजन्म के कर्मों के कारण वे बच्चे उस परिवार में इसीलिए अपने आप ही आ जाते हैं। इसका कारण यही है कि पूर्वजन्म के सम्बन्ध के लेन-देन का हिसाब उन्हें चुकता करना होता है।
                इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र यानी स्कूल, कालेज, दफ्तर, पड़ौसी, सहयात्री आदि  अपने-अपने लेनदेन के अनुसार मात्र उतने समय के लिए मिलते और फिर अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। यानी उनका और हमारा साथ उतने समय के लिए होता है। कभी उनसे सुखद अनुभूति होती है और कभी दुखद अनुभव होता है। यद्यपि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं होता कि वे हमें सुख या दुखी पहुॅंचा दें परन्तु ऐसा हो जाता है।
             कभी-कभार चलते-फिरते अनजाने में ही किसी की ठोकर लग जाती है या धक्का लग जाता है जो यदा-कदा कष्टदायी भी बन जाता है। इसके विपरीत कोई अनजाना व्यक्ति सहायता कर देता है। इसी प्रकार हम किसी अतिथि का सत्कार भी करते हैं जिसे हम जानते तक नहीं। यह सब उतने समय के लिए ही हमें मिलते हैं।
              ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जहाँ किसी अनजान व्यक्ति ने की सहायता और कोई बच्चा पढ़कर ऊँचे पद पर आसीन हो गया। इसके विपरीत भी बहुत से उदाहरण मिल जाते हैं जहाँ बच्चों का बचपन छीन कर उन्हें दाने-दाने का मोहताज बना दिया जाता है। कुछ बच्चे सड़कों पर बलात भीख माँगने, चोरी करने, जेब काटने आदि दुष्कर्मों को करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। यदि वे उनकी बात मानने में आनाकानी करें तो उन्हें कठोर सजा दी जाती है। उन मासूम बच्चों को मारा-पीटा जाता है, भूखा रखा जाता है।
              जो लोग हमें छोड़कर चले गए उनके लिए हम ईश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं। परन्तु जो हमारे साथ हैं उनकी कद्र करनी चाहिए। पता नहीं इस जीवन में हमारे प्रारब्ध कर्मों के अनुसार कौन हमारा साथ कब छोड़ जाए? ईश्वर की ओर से जिसके लिए घण्टी बज जाती है, उसे इस संसार से और अपने प्रियजनों से सदा के लिए विदा लेनी ही होती है। इसलिए जीवन का एक-एक खूबसूरत पल अपनों के साथ गिला-शिकवा भूलकर सौहार्द से व्यतीत करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

ईश्वर की उपासना का प्रदर्शन

ईश्वर की उपासना का प्रदर्शन 

ईश्वर की उपासना का प्रदर्शन या ढोंग करने वाले मनुष्यों को आम भाषा मे बगुला भक्त कहा जाता है। बगुला भक्तों के लिए प्रायः यह कहा जाता है- 
             मुँह में राम बगल में छुरी।
इस उक्ति का अर्थ है कि मुॅंह से तो राम का नाम जपते हैं अपनी बगल में दूसरों को काटने के लिए छुरी रखते हैं। 
            मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे अपने भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा। हमें तो बस ईश्वर की नजर में सच्चा भक्त बनना है, दुनिया की नजर में नहीं।
              बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि मनुष्य को बगुला भक्त क्यों कहा गया है? कहते हैं कि जब बगुला जब मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टॉंग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयन्त्र को समझ नहीं सकीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगीं। अब बगुले की मौज हो गई। जो मछली उसके पास आती तो वह सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
           मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है, उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। उसका पारखी जौहरी उसका मूल्य स्वयं ही लगा लेता है। और जान लेता है वह हीरा कितना कीमती है।
             जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, वे मन्दिर में जाकर कितनी भी घण्टियाँ बजा लें, ईश्वर उनसे कभी प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय ही भयभीत रहते हैं। कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी को बचाए रखने का डर सताता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय परेशान करता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से ये लोग प्रायः पीड़ित रहते हैं। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं- 
         जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।
यानी नाजायज तरीके से कमाए धन का सभी लोग दुरूपयोग करते हैं।
        मन्दिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम लाखों रूपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर अन्याय और बेइमानी से कमाए ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। यह भी सत्य है कि ऐसे लोगों की कमाई में कभी बरकत भी नहीं होती।
               पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से अपनी आजीविका कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें। इन लोगों के धन का दुरुपयोग न के बराबर होता है। हो सकता है कि ऐसे लोग बहुत अधिक धन नहीं कमा सकते, भौतिक संसाधनों को नहीं जुटा पाते हों परन्तु इनके जीवन में सुकून और शान्ति रहती है। 
              कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घण्टों-घण्टों पूजापाठ करते हैं। बड़े दुख की बात है कि उनका यह सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे इस सत्य को भूल जाते हैं- 
       अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
अर्थात् जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस दण्ड विधान में उन लोगों की इच्छा नहीं पूछी जाती।
           अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से बचना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर सारे आडम्बर कर रहे हैं वह तो सर्वज्ञ है। कबूतर के आँखें बंद कर लेने से जैसे बिल्ली नहीं भाग जाती, उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर कहीं नहीं जा सकता। उसका मन उसे कचोटता रहता है, फिर भी वह समझता नहीं है।अतः बगुला भक्त न बनकर ईश्वर का सच्चा भक्त बनना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

शिक्षक कैसा होना चाहिए?

शिक्षक कैसा होना चाहिए?

विद्यार्थी को विद्या दान देने वाला शिक्षक कहलाता है। आज का विचारणीय विषय यह है कि शिक्षक या आचार्य कैसा होना चाहिए? यह विषय आज बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि हमारे लाड़लों के भविष्य निर्माण का दायित्व उनके कन्धों पर है। अब हम इस पर चर्चा करते हैं।
           प्राचीन काल में हमारे देश भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति होती थी। वहाँ गुरु पथप्रदर्शक होता था। उसके मार्गदर्शन में शिष्य सर्वांगीण विकास करता था। अपने छात्र के जीवन निर्माण का दायित्व उसका होता था इसलिए उसे गुरु कहा जाता था। दूसरे शब्दों में कहें तो वह गुरु निस्वार्थभाव से बिना किसी वेतन के शिक्षण कार्य करता था। अपने गुरुकुल में गुरु शिष्यों को निःशुल्क शिक्षा देता था। अपने गुरुकुल में ही वह‌ सारी सुविधाऍं जुटाता था जिससे जीवन यापन करने में कभी कोई कठिनाई न होने पाए।
             उपनिषद की 'शिक्षा वल्ली' में शिक्षा पूर्ण कर चुके शिष्यों को गुरुकुल से विदा होते समय आचार्य यह उपदेश देता है- 
मातृदेवो भव। पितृदोवो भव। आचार्य देवो भव। सृष्टिक्रम न यान्यस्मानि सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि नो इतराणि।
 अर्थात् माता को देवता मानो। पिता को देवता मानो। अतिथि को देवता मानो। सृष्टि के क्रम को न तोड़ना। जो हमारे अच्छे कार्य हैं उन्हें ग्रहण करते हुए उन पर चलो। परन्तु यदि कोई हमारा कार्य अनुकरणीय न हो तो उसे छोड़ देना।
            आज के इस भौतिक युग में धन के प्रधान हो जाने से जीवन के इन मूल्यों का अभाव ही होता जा रहा है। विद्यालय व्यवसाय के केन्द्र बनते जा रहे हैं। पैसा कमाने का माध्यम बनते जा रहे हैं। शिक्षक भी आज व्पापारी बनते जा रहे हैं। वे कक्षा में पढ़ाएँ या न पढ़ाएँ पर उनकी दुकानदारी चलनी चाहिए वाला कुछ शिक्षकों का एटीच्यूट शिक्षा पद्धति के लिए सचमुच घातक बनता जा रहा है। विद्यार्थी भी इन शिक्षकों का सम्मान नहीं करते। उन्हें यही लगता है कि हम इनकी आजीविका चला रहे हैं।
            आज समय व परिस्थितियाँ बदल गईं है। धन पहली आवश्यकता बन गया है। इसीलिए ट्यूशन सेंटर कुक्करमुत्ते की तरह फैलते जा रहे हैं। यही कारण है कि ट्यूशन का व्यवसाय बहुत तेजी से फलता-फूलता दिखाई देता है। कहीं पर मजबूरी में और कहीं भयवश बच्चे ट्यूशन के आदी बनते जा रहे हैं। इससे अध्यापकों की संवेदनशीलता पर प्रश्न चिह्न लगता जा रहा है। यह स्थिति वास्तव में बहुत गम्भीर है। इस पर चर्चा अवश्य होनी चाहिए।
               शिक्षक शब्द का अर्थ ही यही है कि वह शिक्षित करे यानी अपने छात्रों को अपनी जीवन पद्धति के अनुसार ढाले। एक शिक्षक से सभी यह उम्मीद करते हैं कि वह उन्हें अपनी पारिवारिक, सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत को यथावत सौंपे। अपने देश के प्रति समर्पण की भावना बच्चों में कूट-कूटकर भरे। वह स्वयं भी चरित्रवान बने और अपने छात्रों को भी इसका पालन करने के लिए प्रेरित करे। 
               कुछ मुट्ठी भर शिक्षकों के कदाचार के कारण यह गुरु-शिष्य का पवित्र सम्बन्ध आज कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। अध्यापक आज अपने ही शिष्यों लड़के या लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते पकड़े गए हैं। कुछेक बलात्कार जैसे घृणित कार्य तक कर बैठे हैं। इसकी चर्चा सोशल मीडिया, समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर होती रहती है। ऐसे शिक्षक अपने सांस्कृतिक जीवन मूल्य को भूल गए हैं कि शिष्य या शिष्या बेटे एवं बेटी ही होते हैं। इस प्रकार के चारित्रिक पतन ने उन्हें अधम बना दिया है।
             शिक्षकों की एक और गम्भीर समस्या है कि वे दैनन्दिन सामान्य ज्ञान से भी परे हैं। प्रायः वे मात्र केवल उस विषय की जानकारी रखना चाहते हैं जिसे स्कूल या कालेज में पढ़ाते हैं। उनमें से भी बहुत से ऐसे अध्यापक हैं जो अपना विषय है या जिसे पढ़ाते हैं उसमें भी दक्ष नहीं हैं। अपने ज्ञान की वृद्धि करने की ललक उनमें नहीं है। इसलिए अन्य पुस्तकें या पत्र-पत्रिकाएँ तो छोड़िए अपने विषय से सम्बन्धित पुस्तकें तक वे नहीं पढ़ना चाहते। बिना तैयारी के कक्षा में चले जाते हैं और वहॉं जाकर बच्चों में हंसी का पात्र बनते हैं।
           जहाँ शिक्षक को अपनी योग्यता व ज्ञान के बल पर अपना स्थान बनाना चाहिए था, वहाँ वह ऐसे शिष्यों की तलाश करता है जिनके माता-पिता धनाढ्य हैं या बड़े-बड़े व्यापारी हैं या राजनैतिक रुतबे वाले हैं या ऊँचे पदों पर कार्य रत हैं ताकि वह अपने तुच्छ भौतिक स्वार्थों की पूर्ति कर सके। ऐसा ही हाल शिक्षण संस्थानों का भी है। वे भी इन उच्च पदासीन लोगों से, व्यापारियों से अथवा राजनेताओं के माध्यम से अपना स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। यह भी कारण है जिस के चलते शिक्षक और शिक्षण संस्थान अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं। यह वाकई बहुत दुखद स्थिति है।
          शिक्षक या आचार्य को यदि अपनी गरिमा बनाए रखनी है व प्राचीन भारतीय गुरुओं की भाँति सम्मान चाहिए तो अपने को सामर्थ्यवान बनाना होगा। अपने सात्विक गुणों, निस्वार्थ सेवा और अपनी योग्यता आदि गुणों को अपने अन्तस में समाहित करना होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 3 सितंबर 2025

जैसा देश वैसा भेष

जैसा देश वैसा भेष

'जैसा देश वैसा भेष'-  यह उक्ति हमने बहुधा सुनी है। इस सूक्ति का अर्थ है जिस देश में रहो, उसे पूरी तरह अपना लेना चाहिए। वहॉं अच्छी तरह से रच-बस जाना चाहिए। इस प्रकार हर कथन के पीछे कोई-न-कोई सार अवश्य होता है। चाहे हम उसे समझ सकें अथवा नहीं। 
             व्यक्ति किसी भी देश का निवासी हो वह अपने रंग-रूप, अपनी वेशभूषा, अपनी भाषा, अपनी धार्मिक आस्थाओं, अपने सांस्कृतिक मूल्यों और अपनी ऐतिहासिक विरासतों से ही सदा पहचाना जाता है। अफगानिस्तान, अरब आदि देशों को हम उनके वेष व भाषाओं से पहचान लेते हैं। इसी तरह अन्य देशों के नागरिकों की भी एक पहचान है जिसे उसके अनुसार हम सरलता से जान लेते हैं।
              मनीषी कहते हैं जिस भी देश में रहो,  वहाँ की सभ्यता व संस्कृति में रच बस जाओ। उस देश के संविधान, कानून व्यवस्था, शिक्षण व्यवस्था आदि का पालन करना चाहिए। उनके रीति-रिवाजों का सम्मान करना चाहिए और मन भाएँ तो उन्हें अपना भी लो। वहाँ इस तरह घुलमिल जाओ जैसे पानी में शक्कर मिल जाती है। 
            यदि ऐसा नहीं कर पाओगे तो उस देश में रहने का कोई औचित्य नहीं होता। फिर तो सारा समय अपने देश व जहाँ निवास कर रहे हैं, उस देश के साथ तुलनात्मक अध्ययन में ही बीतेगा। ऐसा करके अपने लिए कष्ट व परेशानी ही जुटाई जा सकती है। सारा समय मन परेशान रहेगा, उसका कोई लाभ नहीं होता।
             उनकी अच्छाइयों को अपना लेना चाहिए पर दूषित विचारों व रूढ़ियों को नहीं। कहना बहुत आसान है परन्तु जीवन में ढाल पाना कठिन होता है। जो बच्चे वहाँ जन्म लेते हैं, वे तो वहीं के होकर रह जाते हैं। उनका अपना देश वही होता है। दूसरे देश में रहने के कारण अपने पितरों के देश से उन्हें लगाव कम होता है। हाँ, जब रक्त सम्बन्ध जोर मारते हैं या माता-पिता से अपने घर-परिवार की कहानियाँ सुन-सुनकर अथवा घूमने के उद्देश्य से वे अपने देश जाते हैं। तब वहाँ सभी चेहरे उन लोगों को अनजाने दिखाई देते हैं।
           अपने बन्धुजनों से मिलना यथासमय होता है परन्तु जिस देश में रहते हैं, वहॉं के लोगों को बन्धु मानकर उनके साथ सदैव सौहार्द रखना चाहिए। यह सदा याद रखना चाहिए कि वही हर समय, हर स्थिति में तत्क्षण साथ दे सकते हैं।
             अपनी सांस्कृतिक जड़ें इतनी मजबूत हैं कि चाहे नौकरी, व्यापार या पढ़ाई किसी भी कारण से जो दूसरे देश जाकर रहते हैं, वे उन्हें काट नहीं सकते। उन्हें हमेशा अपने देश की खट्टी-मीठी यादें कचोटती रहती हैं। इसलिए वे न अपने देश के रह जाते हैं और न ही उस देश के हो पाते हैं जहाँ वे रहते हैं। इस तरह मनोभावनाओं व यादों की आँख-मिचौनी का खेल उनके अन्तस में निरन्तर चलता रहता है।
             व्यक्ति जहाँ भी रहे खुले मन से उस देश व देशवासियों को अपनाए। तभी अन्तस में शान्ति बनी रहती है। मात्र ऊपरी दिखावे से बात नहीं बनती। वहाँ रच बस जाने अतिरिक्त उनके पास और कोई चारा नहीं बचता। इस रचने-बसने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि व्यक्ति अपने जन्मजात संस्कारों को ही तिलांजलि दे बैठे या फिर उन सबको गठरी में बॉंधकर सन्दूक के अन्दर सात परतों में छिपाकर रख दे। अपने संस्कारों को कभी न छोड़ते की सोचते हुए, दूसरी संस्कृति के साथ अपना सामंजस्य स्थापित करना ही श्रेयस्कर होता है। यही समझदार मनुष्य की पहचान होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 2 सितंबर 2025

बाल विवाह एक कुरीति

बाल विवाह एक कुरीति

भारत में जड़ कर गई कुरीतियों में बाल विवाह एक ज्वलन्त समस्या है। इक्कीसवीं सदी में जहाँ विश्व सफलता की बुलन्दियों को छू रहा है, हम इन सामाजिक कुरीतियों पर चर्चा कर रहे हैं। बड़े दुख की बात है कि टीवी व इन्टरनेट के जमाने में भी न जाने कितने मासूम इन ढकोसलों की बलि पर चढ़ जाते हैं। माता-पिता इन बच्चों का भविष्य सुधारने के स्थान पर बर्बाद कर देते हैं। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि माता-पिता भविष्य में अपने बच्चों के साथ होने वाली समस्याओं को अनदेखा करके अपने मासूमों को रूढ़ियों की बलि चढ़ाने में संकोच नहीं करते।
             वैदिक काल में बाल विवाह जैसी रूढ़ियाँ नहीं थी। तब पुरुष की विवाह की आयु 25 वर्ष निश्चित थी। भारतीय कानून के अनुसार, विवाह योग्य आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष एवं महिलाओं के लिए 18 वर्ष है। यदि इससे कम आयु में कोई भी विवाह करता है तो वह विवाह को निरस्त घोषित कर सकता है।
              जिस उम्र में बच्चे गुड्डे-गुड़ियों से खेलते हैं, इन्हें शादी के मण्डप में बिठा दिया जाता है। पढ़ने-लिखने की सुविधा से ये बच्चे वंचित रह जाते हैं। इसका दुष्परिणाम सारी जिन्दगी इन लोगों को भुगतना पड़ता है। अशिक्षित रह जाने के कारण इन्हें अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती। अतः इनके लिए जीवन की मुँह बाये खड़ी समस्याओं से जूझना बहुत कठिन हो जाता है। इन लोगों को पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। साथ ही कच्ची उम्र में विवाह का उपहार इन्हें बीमारियों के रूप में मिलता है। 
             जब तक वे शारीरिक रूप से परिपक्व न हों, उनका विवाह नहीं करना चाहिए। कम उम्र में सेक्स की शुरुआत एवं गर्भधारण से जुड़ी स्वास्थ समस्याओं की प्रबल सम्भावना होती है, जिनमें एच.आई.वी एवं ऑब्स्टेट्रिक फिस्चुला शामिल हैं। इस आयु में मातृत्व सम्बन्धी समस्याऍं अधिकतम होती है। साथ ही शिशु मृत्यु की दरें भी अधिकतम होती हैं।
            कम उम्र की लड़कियाँ परिपक्व नहीं होतीं। अक्सर वे घरेलू हिंसा, सेक्स सम्बन्धी ज्यादतियों एवं सामाजिक बहिष्कार का शिकार होती हैं। 
जिन लड़कियों का कम उम्र में विवाह हो जाता है। इन लड़कियों के पास रुतबा, शक्ति एवं परिपक्वता नहीं होते। अक्सर वे घरेलू हिंसा, सेक्स सम्बन्धी ज्यादतियों एवं सामाजिक बहिष्कार का शिकार होती हैं। कम उम्र में विवाह हमेशा लड़कियों को शिक्षा अथवा अर्थपूर्ण कार्यों से वंचित करता है। जो उनकी निरन्तर गरीबी का कारण बनता है। बाल विवाह लिंगभेद, बीमारी एवं गरीबी के भंवरजाल में फंसा देता है।‌ लड़कियों की शिक्षा का निचला स्तर रहता है। लड़कियों को कम रुतबा दिया जाता एवं उन्हें आर्थिक बोझ समझा जाता है।
            विभिन्न राज्यों में अठारह वर्ष से कम आयु में विवाहित हो रही लड़कियों का प्रतिशत खतरनाक है- मध्य प्रदेश में 73 %, उत्तर प्रदेश में 64%, राजस्थान में 68%,  आन्ध्र प्रदेश में 71%, बिहार में 67%।
              यूनीसेफ की “विश्व के बच्चों की स्थिति- 2009” रिपोर्ट के अनुसार भारत की 47 प्रतिशत महिलाएँ कानूनी रूप से मान्य आयु सीमा 18 वर्ष से कम आयु में ब्याही गईं, जिसमें 56 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों से थीं। यूनीसेफ के अनुसार (‘विश्व के बच्चों की स्थिति-2009’) विश्व के बाल विवाहों में से 40 प्रतिशत भारत में होते हैं। 
            वास्तव में इस प्रथा का प्रचलन मुगल काल में हुआ। ऐसा कहा जाता है कि उस समय मुगलों को जो सुन्दर लड़की दिखाई देती थी, उसे उठाकर ले जाते थे। शायद उस समय लड़कियों की सुरक्षा हेतु इसका प्रचलन हुआ होगा। आज हमारा देश स्वतन्त्र है। अब इस समय हम इन समस्याओं से सरलता से मुक्त हो सकते हैं फिर इन्हें सीने से लगाए रखने की कोई आवश्यकयता महसूस नहीं होती। 
              बाल विवाह उन्मूलन हेतु सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं की पहल पर इसके विरुद्ध कानून बनाया गया है। इसी कड़ी में राज्यों ने भी इसके लिए कानून पारित किए हैं। लड़कियों की शिक्षा को सुगम बनाना चाहिए। इन हानिकारक सामाजिक नियमों को बदलना चाहिए। यह समय की मॉंग है। सामुदायिक कार्यक्रमों को सहायता देनी चाहिए। युवा महिलाओं को आर्थिक अवसर प्रदान करने चाहिएँ। प्रत्येक विवाह को वैध बनाने के लिए सरकार ने उसका पंजीकरण आवश्यक कर दिया है। अब देखना यह हैं कि समाज कितना जागरूक हो रहा है।
             बच्चों के खुशहाल व स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए मैं आप सभी सुधी जनों से अनुरोध करती हूँ कि कुरीति को जड़ से उखाड़ने में समाज और न्याय की सहायता करें। जहॉं भी ऐसा अनर्थ होते हुए देखें तुरन्त अपने समीप के थाने में शिकायत दर्ज करवाऍं। ताकि इन मासूम बच्चों की जिन्दगी सुधर सके। हालॉंकि हमारे समाज सुधारक सैंकड़ों वर्षों  से इन कुरीतियों की मुक्ति के लिए प्रयास करते रहे। सरकार से भी कड़े कानून बनाने की अपील करती हूँ जिससे बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर लगाम कसी जा सके। साथ ही बच्चों के जीवन को बर्बाद होने से बचाया जा सके।
चन्द्र प्रभा सूद