शनिवार, 6 सितंबर 2025

बिछड़े हुए दुबारा नहीं मिलते

बिछड़े हुए दुबारा नहीं मिलते

हमारे अपने जो इस दुनिया के मेले में हाथ छूट जाने के कारण बिछुड़ जाते हैं, वे दुबारा हमें नहीं मिलते। हम चाहे लाख सिर पटक लें या उन्हें दुनिया जहान में उन्हें क्यों न ढूँढ लें, हमारे सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। चाहे उनकी गुमशुदगी की हम कितनी ही रिपोर्ट लिखवा दें या सीआईडी या किसी जासूसी संस्था को पीछे लगा दें पर कोई भी उन्हें ढूँढकर हमारे सुपुर्द नहीं कर सकता है क्योंकि उनको ढूँढना पुलिस, सीआईडी या किसी जासूस के बस की बात है ही नहीं। हम भी ऐसे हैं कि उनको वापिस नहीं ला सकते। हम दिन-रात उनके वियोग में रोते-बिसूरते रहते हैं बस पर हल नहीं खोज पाते। उनको खोज पाना हमारी सामर्थ्य से परे है।
           उनका और हमारा साथ इसलिए छूट जाता है कि उनके साथ हमारा सम्बन्ध इतना ही होता है। हमारा साथ कितना होना चाहिए, यह हमारे पूर्वजन्म कृत कर्म सुनिश्चित करते हैं। यह असार संसार मात्र रिश्तों की एक मण्डी की तरह है। जैसे मण्डी से हम अपनी आवश्यकता के अनुरूप पदार्थ खरीद लेते हैं। उसी प्रकार इस रिश्तों की मण्डी में हमारे कर्म हमें रिश्तों की सौगात देते हैं। जब उनका समय समाप्त हो जाता है, वे हमें छोड़कर कहीं दूर न जाने किस लोक में चले जाते हैं।
              कर्म प्रधान इस व्यापारिक मण्डी में केवल वही रिश्ते हमें मिलते हैं जिनके साथ पूर्वजन्मों में हमारे लेनदेन के सम्बन्ध होते हैं। वे हमारे दादा, दादी, नाना, नानी, माता, पिता, चाचा, चाची, ताऊ, पति, पत्नी, भाई, बहन, मित्र, पड़ौसी या कोई अन्य भी किसी भी रूप में हो सकते हैं। जिन सम्बन्धों से हमने लेना या देना होता है, वे हमारे पास आकर किसी-न-किसी सम्बन्ध के नाम से हमें मिल जाते हैं। यही कर्मचक्र कहलाता है। यही मनुष्य का जीवन चक्र है।
              यह लेन-देन बीमारी के नाम पर खर्च कराता है, धन-सम्पत्ति देता या लेता है,  शारीरिक विकलांगता के कारण सारी आयु सेवा करता या कराता है, घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाना आदि किसी भी रूप में एक-दूसरे के साथ जुड़ने का कारण बनता है। इस सबके लिए हम स्वतन्त्र नहीं हैं। ये सब हमारे कर्मभोग कहलाते है। यही सत्य है कि हमें सभी रिश्ते अपने किए गए कर्मों के अनुसार मिलते हैं। चाहे वे अच्छे हैं या बुरे उनके साथ निभाना पड़ता है। इसमें हमारी इच्छा या अनिच्छा को कोई नहीं पूछता।
            अपने आसपास हम देखते हैं जिन घरों में सन्तान नहीं होती, वे ऐसे बच्चे को गोद ले लेते हैं, उस बच्चे के साथ उनका कोई खून का सम्बन्ध नहीं होता, न ही वे उन मातापिता को जानते हैं और न ही वे उनके करीब रहते हैं। पूर्वजन्म के कर्मों के कारण वे बच्चे उस परिवार में इसीलिए अपने आप ही आ जाते हैं। इसका कारण यही है कि पूर्वजन्म के सम्बन्ध के लेन-देन का हिसाब उन्हें चुकता करना होता है।
                इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र यानी स्कूल, कालेज, दफ्तर, पड़ौसी, सहयात्री आदि  अपने-अपने लेनदेन के अनुसार मात्र उतने समय के लिए मिलते और फिर अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। यानी उनका और हमारा साथ उतने समय के लिए होता है। कभी उनसे सुखद अनुभूति होती है और कभी दुखद अनुभव होता है। यद्यपि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं होता कि वे हमें सुख या दुखी पहुॅंचा दें परन्तु ऐसा हो जाता है।
             कभी-कभार चलते-फिरते अनजाने में ही किसी की ठोकर लग जाती है या धक्का लग जाता है जो यदा-कदा कष्टदायी भी बन जाता है। इसके विपरीत कोई अनजाना व्यक्ति सहायता कर देता है। इसी प्रकार हम किसी अतिथि का सत्कार भी करते हैं जिसे हम जानते तक नहीं। यह सब उतने समय के लिए ही हमें मिलते हैं।
              ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जहाँ किसी अनजान व्यक्ति ने की सहायता और कोई बच्चा पढ़कर ऊँचे पद पर आसीन हो गया। इसके विपरीत भी बहुत से उदाहरण मिल जाते हैं जहाँ बच्चों का बचपन छीन कर उन्हें दाने-दाने का मोहताज बना दिया जाता है। कुछ बच्चे सड़कों पर बलात भीख माँगने, चोरी करने, जेब काटने आदि दुष्कर्मों को करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। यदि वे उनकी बात मानने में आनाकानी करें तो उन्हें कठोर सजा दी जाती है। उन मासूम बच्चों को मारा-पीटा जाता है, भूखा रखा जाता है।
              जो लोग हमें छोड़कर चले गए उनके लिए हम ईश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं। परन्तु जो हमारे साथ हैं उनकी कद्र करनी चाहिए। पता नहीं इस जीवन में हमारे प्रारब्ध कर्मों के अनुसार कौन हमारा साथ कब छोड़ जाए? ईश्वर की ओर से जिसके लिए घण्टी बज जाती है, उसे इस संसार से और अपने प्रियजनों से सदा के लिए विदा लेनी ही होती है। इसलिए जीवन का एक-एक खूबसूरत पल अपनों के साथ गिला-शिकवा भूलकर सौहार्द से व्यतीत करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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