अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमारा भारतीय संविधान हर भारतवासी को देता है। अपने विचारों का अदान-प्रदान करना आवश्यक होता है। यदि अपने विचारों को दूसरों के समक्ष न रख सकें तो कोई हमारे विषय में जान नहीं सकेगा।
स्वतन्त्रता का अर्थ उच्छ्रंखलता कदापि नहीं होता। मर्यादित विचारों की अभिव्यक्ति जहाँ मन को प्रफुल्लित करती है वहीं श्रोता को भी अभिभूत करती है। यहाँ आत्मानुशासन की लगाम का होना बहुत अनिवार्य होता है। जब तक सद् बुद्धि का चाबुक न पकड़ा जाए तब तक विचारों के प्रदूषित होने का खतरा मंडराता रहता है। यह दूषण सहृदय जनों के कष्ट का कारण बनता है। इससे हर बुद्धिमान व्यक्ति को बचना चाहिए।
बोलने से पहले मनुष्य को दस बार सोचना चाहिए कि कहीं ऐसा कुछ न कह दिया जाए जो सामने वाले को आहत कर दे अथवा उसके आत्मसम्मान को ठेस लग जाए। शब्द रूपी बाणों से यदि किसी को घायल कर दिया जाए तो मर्मान्तक पीड़ा होती है। इसीलिए हमारे मनीषी कहते हैं -'पहले तोलो फिर बोलो।'
जिस मनुष्य को अपनी वाणी पर नियन्त्रण नहीं है वह इन्सान कहलाने के योग्य ही नहीं है। यही वाणी मनुष्य को सबके सिरों पर बिठाकर यश और मान देती है। दूसरी ओर सबकी नजरों से गिराकर अपमान का दंश झेलने के लिए विवश करती है।
जिस देश में हम रहते हैं, जिसका अन्न खाते है, जिसका जल पीते हैं, उसके प्रति हमारा दायित्व बढ़ जाता है। जिस मातृभूमि की गोद में खेलकर बड़े हुए हैं, उसका सम्मान करना बहुत ही आवश्यक है। विश्व के किसी भी व्यक्ति को अथवा किसी भी देशवासी को यह अधिकार नहीं है कि वह उसका अपमान करे। चाहे जननी हो अथवा जन्मभूमि हो, इन दोनों का निरादर करने वालों को किसी भी सूरत में क्षमा नहीं किया जा सकता।
अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए देश का सौदा करने वालों और उसके साथ द्रोह करने वालों को नरक में भी स्थान नहीं मिलता। ईश्वर भी ऐसे अहसानफरामोशों से नाराज हो जाता है।
सोशल मीडिया, समाचार पत्रों, टी.वी. चैनलों और रेडियो सबका नैतिक दायित्व है कि वे सभी एकजुट होकर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों के विरूद्ध जनजागरण की मुहिम चलाकर उन देशद्रोहियों को उनके अन्जाम तक पहुँचाने में सरकार की सहायता करें।
राजनेताओं का दायित्व बनता है कि वे अपने देश के प्रति वफादारी निभाएँ और जन साधारण को भी जागरूक बनाएँ। देशद्रोहियों को अनावश्यक प्रश्रय न दें। तुच्छ राजनैतिक लाभ के लिए देश को हानि पहुँचाने के बारे में स्वप्न में भी न सोचें।
जो भी व्यक्ति देश में अलगाव की स्थितियाँ पैदा कर रहे हैं अथवा देश की अखण्डता पर प्रहार कर रहे हैं, उन सब देशद्रोहियों को किसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान न करके उन्हें अविलम्ब कानून के हवाले करके राजद्रोह का अभियोग चलाना चाहिए। किसी भी तरह की रियायत न देकर कठोर-से-कठोर दण्ड देकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति हमारे देश भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का दुस्साहस न कर सकें।
जो लोग केवल अपने अधिकारों की दुहाई देते हैं और उन्हें कर्त्तव्यों का भान नहीं है, उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से वंचित कर देना चाहिए। जो सब लोग स्वतन्त्रता पाने के इच्छुक हैं, उनके समक्ष उसका सदुपयोग करने की शर्त रखी जानी चाहिए ताकि कोई भी उसका दुरूपयोग न कर सके।
केवल सरकार या कानून को इसके लिए कभी भी चाबुक न चलाना पड़े बल्कि आत्मानुशासन का पालन करके बोलने की स्वतन्त्रता का आनन्द उठाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016
अभ्व्यक्ति की स्वतंत्रता
सोमवार, 22 फ़रवरी 2016
रिश्तों की गरिमा
रिश्तों की अपनी ही गरिमा होती है। उनकी अनुपालना करना तलवार की धार पर चलने से कम नहीं होता। जहाँ कभी थोड़ी-सी चूक हुई वहीं रिश्ते लहुलूहान हो जाते हैं। उन्हें बड़े ही नजाकत से सम्हालना होता है।
रिश्ते हमें जीवन में ईश्वर की ओर से दिया गया उपहार होते हैं। वे जन्म से ही हमारे पूर्वकृत कर्मों के अनुसार हमारे साथ जुड़े हुए होते हैं। उनके साथ जितना लेनदेन का सम्बन्ध होता है, उसी के अनुरूप उन रिश्तों का हमसे जुडाव होता है। ये सभी हमारे सुखों और दुखों में हमारे साथी बनते हैं। जितना जिसके साथ सम्बन्ध निश्चित होता है, उसे भोगकर वह रिश्ता हमसे विदा लेकर सदा के लिए बिछुड़ जाता है।
मित्रों का चुनाव हम स्वयं करते हैं। हमें उन्हें अपने विवेक से परखना होता है। कुछ लोगों का मानना है कि रिश्ते वो बड़े नहीं होते जिनका सम्बन्ध जन्म से होता है। बल्कि रिश्ते वो बड़े कहलाते हैं जो दिल से जुड़ते हैं। ऐसे सम्बन्ध कुछ दूर तक साथ देते हैं। जहाँ दिलों में दरार आती है वहीं वे रिश्ते भी मन से उतर जाते हैं और वहाँ नफरत की दीवारें खड़ी हो जाती हैं।
आज के भौतिकतावादी युग से पहले लोग भावुक होते थे और रिश्तों का महत्त्व समझते थे। वे यही मानते थे कि मनुष्य अपने रिश्तेदारों से सुशोभित होता है। इसलिए वे उन्हें सहृदयता से निभाते थे। उसके बाद धीरे-धीरे लोग प्रैक्टिकल होने लगे, तब वे अपने रिश्तों से लाभ उठाने में दक्ष होने लगे। वहाँ उनके बीच स्वार्थ हावी होने लगे। आज इस भौतिक युग के लोग प्रोफेशनल हो गए हैं। इसलिए वे केवल उन लोगों के साथ अपना रिश्ता बनाना चाहते हैं जिनसे भविष्य में फायदा उठाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में आज स्वार्थ की बुनियाद पर रिश्ते बनाए जाने लगे हैं।
यह स्मरण रखना चाहिए कि ऐसे रिश्ते बहुत सीमित समय तक जीवित रहते हैं। हमें उनका अन्त समीप ही मानकर चलना चाहिए।
रिश्तों को निभाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। रिश्ते शीशे की तरह नाजुक होते हैं, जरा-सी चोट लगने पर चटककर टूट जाते हैं और चकनाचूर हो जाते हैं। रिश्ते और शीशे दोनों ही में अन्तर होता है। शीशा हमारी मूर्खता अथवा लापरवाही से टूटता है परन्तु रिश्तों के टूटने में हम लोगों की गलतफहमी कारण होती हैं।
रिश्ते अन्त तक हमारा साथ न छोड़ें उसके लिए हमें सबके साथ बराबरी का व्यवहार करना चाहिए। जब हम इनसे असमानता बरतते हैं तब मनमुटाव होने लगते हैं और दूरिया बढ़ने लगती हैं। यथायोग्य व्यवहार करना आवश्यक होता है।
रिश्तों में एक-दूसरे की परीक्षा भी नहीं लेनी चाहिए। इससे सम्बन्धों की गरमाहट घटने लगती है। तब वे रिश्ते मात्र औपचारिक बनकर रह जाते हैं। हर रिश्ते में विश्वास होना भी आवश्यक होता है। माता-पिता का बच्चों पर विश्वास होना चाहिए। पति-पत्नी के रिश्ते में परस्पर विश्वास ही उन्हें जोड़कर रखता है। इसी प्रकार भाई-बहन में आपसी विश्वास की डोर उन्हें आजन्म बाँधे रखती है।
ईश्वर के साथ हमारा रिश्ता सबसे अन्य सब से अलग तरह का होता है। वहाँ हम उस मालिक से गिला-शिकवा करते हैं और उससे नाराज हो जाने पर लानत-मलानत भी करते हैं। फिर भी वह रिश्ता बना रहता है। हम उसके बिना नहीं रह सकते। कुछ दिन की नाराजगी के बाद हम फिर उसकी शरण में चले जाते हैं।
सांसारिक अथवा भौतिक रिश्तों में ऐसा नहीं होता। मनमुटाव या शिकवा-शिकायत की स्थिति में रिश्तों के टूटने में समय नहीं लगता। फिर सबका अहं आड़े लगता है और रिश्ते मृतप्राय: हो जाते हैं। अर्थात् केवल नाम के या दिखावे के रह जाते हैं। इसलिए प्रेम, विश्वास, आपसी भाईचारे और समव्यवहार से सभी रिश्तों को निभाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 21 फ़रवरी 2016
भाई खून के प्यासे क्यों?
बहुत विचार करने पर भी मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि आज एक भाई अपने दूसरे भाई के खून का प्यासा क्यों होता जा रहा है? क्या वे प्यार से मिल-जुलकर नहीं रह सकते? क्या आज सबके खून सफेद हो रहे हैं? ऐसा क्या हो गया है कि रिश्तों के मायने ही बदलते जा रहे हैं?
हमारे स्वार्थ शायद इतने अधिक टकराने लगे है कि हम असहिष्णु होते जा रहे हैं। उन्हें पूरा करने के लिए हम सब अनावश्यक ही दिन-रात अपना सुख-चैन गँवाकर निरन्तर रेस में शामिल हो रहे हैं। मैं, मेरा परिवार और मेरे बच्चे बस यहीं तक हम सभी सीमित होते जा रहे हैं। इनके अतिरिक्त न हमें कोई दिखाई देता है और न ही हम किसी अन्य भाई-बन्धु के विषय में सोचना चाहते हैं।
हमारा अहंकार इतना अधिक प्रबल होता जा रहा है जो किसी शर्त पर, किसी के साथ भी समझौता नहीं करना चाहता। सारी दुनिया को देख लेने अथवा उसमें आग लगा देने की मानसिकता समाज का बहुत अहित कर रही है। हमारा यही अहं हमें दूसरों के साथ सामञ्जस्य स्थापित नहीं करने देता। इसलिए हमें सबसे अलग-थलग करने में सफल हो रहा है और हम इसके शिकार हो रहे हैं।
ये स्वार्थ और अहंकार दोनों ही घर-परिवार के बिखराव में अहं रोल निभा रहे हैं। यही कारण है कि बच्चे माता-पिता की धन-सम्पत्ति, व्यापार आदि का उनके जीवन काल में ही बटवारा करके सुख की साँस लेना चाहते हैं। उन्हें सदा यही लगता है कि दूसरे भाई या बहन को माता-पिता कहीं उनसे अधिक न दे दें। यदि ऐसा हो गया तो वे घाटे में रह जाएँगे। सबसे बड़ी बात कि घाटे का सौदा कोई भी नही करना चाहता। इसलिए अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए वे जुगत भिड़ाते रहते हैं। जायज-नाजायज हथकंडे अपनाकर वे माता-पिता की मेहनत की कमाई हथिया लेते हैं।
आज के बच्चों को अपने अधिकारों को पाना तो आता है परन्तु अपने दायित्वों से अनजान बने रहना चाहते हैं। माता-पिता की सेवा करना तो वे प्राय: भूल जाते हैं। अपने भाई-बहनों के साथ अच्छा व्यवहार करना भी उन्हें याद नहीं रहता।
अपने पैतृक घर में ऊपर-नीचे के तल अथवा मंजिल में बच्चे नहीं रह सकते परन्तु फ्लैटों जाकर दूसरे अनजान लोगों के साथ रहना पसन्द करते हैं। वहाँ रहकर समझौता कर सकते हैं पर अपने भाई-बहनों की शक्ल तक वे देखना पसन्द नहीं करते। उन्हें लगता है कि परायों के साथ रहकर वे सुखी रहेंगे पर जीवन में ऐसा हो नहीं पाता।
इन्सानी कमजोरी है कि जिस किसी वस्तु की वह कामना करता है और जब वह उसे उपलब्ध हो जाती है, तब वह उससे ऊब जाता है और कुछ नया पाना चाहता है। यही उसके भटकाव का कारण है जो उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता।
सम्बन्धों में आपसी मनमुटाव के कारण ही शायद खून सफेद होने की बात कह दी जाती है। भाई-बहन धन-सम्पत्ति के लालच में इतने अन्धे हो जाते हैं कि एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। इसके लिए एक-दूसरे की हत्या करने या करवाने के लिए षडयन्त्र तक रच डालते हैं। फिर जीवन पर्यन्त घर-परिवार, समाज और न्याय के दुश्मन बन जाते हैं। जिनके लिए ऐसा जघन्य अपराध करते हैं, उन्हें दुनिया की भीड़ में संघर्ष करने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।
हमारे सयाने कहते हैं- 'अपना यदि मारेगा तो भी छाया में फैंकेगा।' कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर प्रदत्त अपने सम्बन्धों की कद्र करनी चाहिए। वह मालिक नहीं चाहता कि अपने भाई-बन्धुओं से अनुचित व्यवहार किया जाए। धन-वैभव तो आना-जाना है, इसके लिए आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर लगाने से बचना चाहिए। हम सभी को सथासम्भव भाईचारा बनाकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 20 फ़रवरी 2016
चल मेरे मन मयूर
चल मेरे मन मयूर
ऐसी जगह जहाँ पर
कोई गम न हो रुलाने को
खुशियाँ मिलें सदा हसाने के लिए
दुख की बदली अब
छंटकर बिखर रही है
नया सूरज चमक रहा है
नव जीवन का संदेश लेकर जग में
रात के घने तम को
रवि ने दबोच लिया है
उसे छूमंतर कर दिया है
सबको को प्रकाशित करने लगा है
एक नया आरम्भ है
उठो जागो आगे बढ़ जाओ
तभी आह्लादक दिन बन सकेगा
जीवन का एक नया प्रेरक प्रसंग बनेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016
दुनिया चला चली का मेला
यह दुनिया चला चली का मेला है। निश्चित समय के लिए हम इस संसार में आते हैं। अपना-अपना समय पूर्ण करके हम यहाँ से विदा ले लेते हैं और नयी यात्रा की शुरूआत करते हैं। पुनः पुनः वही क्रम जब तक संसार में अपने आने के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते। वह लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति। जब तक अपना लक्ष्य हम पा नहीं जाते तब तक जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं। चौरासी लाख योनियों में भटकते रहते हैं।
इसे एक कथा से समझते हैं। एक बड़ा सा कक्ष है जहाँ बहुत से द्वार हैं। उन सभी द्वारों में केवल एक ही द्वार खुला हुआ है। एक अंधा मनुष्य उस कमरे में बंद है। वह बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है। कमरे की दीवारों को टटोल कर खुले हुए द्वार को ढूँढकर बाहर निकालने का यत्न कर रहा है। बार-बार वह दीवारें टटोलता हुआ ज्योंहि वह खुले हुए दरवाजे तक पहुँचता है उसे खुजली हो जाती है। वह खुजाने लगता है और उसका हाथ दीवार से छूट जाता है। इस तरह वह दरवाजे से आगे निकल जाता है। फिर से वही भटकाव और नयी यात्रा। इस तरह बारंबार उसके साथ घटता है। वह परेशान है, रोता है, चिल्लाता है पर उसकी पुकार सुनने वाला वहाँ कोई नहीं है जो उसे कक्ष से बाहर निकाल सके।
इस कथा को पढ़कर अंधे पर गुस्सा आ रहा है न। यदि एकांत में बैठकर मनन करें तो हम समझ जाएंगे कि वह अंधा व्यक्ति कोई और नहीं हम स्वयं हैं। चौरासी लाख योनियों वाले कक्ष में काम, क्रोध, अहंकार, मोह-माया आदि की पट्टी बांध कर हम बार-बार चक्कर लगा रहे हैं। जब एक खुला हुआ मोक्ष का द्वार पास आता है अर्थात् मानव जन्म मिलता है तो विषय-वासनाओं की खुजली के कारण उस द्वार को पारकर आगे निकल जाते हैं। फिर जन्मजन्मान्तर तक इस संसार में भटकते रहते हैं।
समय रहते यदि हम न जागे तो पता नहीं कब हम उस अवसर को प्राप्त कर सकेंगे जब हम हाथ बढ़ाकर अपना लक्ष्य छू सकेंगे। इस जन्म-मरण के चक्र से हम ईश्वर की सच्चे मन से की गई प्रार्थना से ही मुक्त हो सकते हैं। अन्ततोगत्वा वही हमारी शरणस्थली है। उसकी गोद में जाकर ही हम सच्चा सुख और शांति पा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016
देशप्रेम
देशप्रेम एक ऐसा अनमोल भाव है जो हर उस मनुष्य के खून में उबाल मारता रहता है जो अपने देश पर बलिदान हो जाने के लिए सिर पर कफन बाँधकर रखता है। अपने देश के लिए मर-मिटने का यही एक जज्बा मनुष्य को सच्चा देशभक्त बनाता है।
देशप्रेम कोई खिलौना नहीं है जिसे बाजार जाकर खरीद लिया जाए। जब तक मन ने चाहा उससे खेल लिया और जब मन भर गया तो उसे तोड़कर कूड़ेदान में डाल दिया जाए अथवा किसी और को दे दिया जाए। यह देशप्रेम कोई स्वादिष्ट मिठाई भी नहीं है जिसे खरीदकर गप्प से खा लिया जाए। फिर महान देशभक्त होने का तमगा पहन लिया जाए।
यह देशप्रेम बहुत ही पवित्र और उच्च भावना है। जिस समय लोग रजाई ओढ़कर या ए.सी. चलाकर चैन की नींद सोते हैं। उस समय इस देशप्रेम के कारण लेह-लद्दाख में -40 या -50 डिग्री तापमान होने पर और रेगिस्तान की झुलसा देने वाली दोपहरी में बिना अपने प्राणों की परवाह किए वफादार सैनिक देश की रक्षा के लिए सन्नद्ध रहते हैं। उनके तप और त्याग की बदौलत हम जीवन का सुख भोगते हैं।
जिस मनुष्य को अपने देश, अपने वेष, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति से प्रेम नहीं है, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। जो वास्तव में सच्चा देशप्रेमी होता है, वह कभी अपने देश के दुश्मनों के साथ मिलकर उसका सौदा नहीं करता। वह किसी प्रकार के प्रलोभनों में नहीं फंसता। उसका ईमान अपनी मातृभूमि की रक्षा करना होता है।
गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
'जित्वा वा भोक्ष्यसे महीं हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं'
अर्थात् देश के लिए अपनी आहुति देने वाले को स्वर्ग मिलता है, इसे हम आम भाषा में वीरगति पाना कहते हैं। यदि युद्ध में विजयी हो जाओ तो राज्य का भोग करो।
जब अपना देश पहले मुगलों के और फिर अंग्रेजों का गुलाम था तब देश को परसत्ता से मुक्त करवाने के लिए लड़ाई लड़ी गई थी। हमारे रणबाँकुरों ने युवावस्था में ही अपने माता-पिता अथवा परिवार की परवाह न करते हुए, देश को स्वतन्त्र कराने के लिए मातृभूमि पर स्वयं को स्वेच्छा से होम कर दिया था। उनके बलिदानों को इतने सस्ते में व्यर्थ नहीं गंवाया जा सकता।
जिन लोगों को विदेशियों अथवा देशद्रोहियों से लगाव हो उन्हें अपने देश को छोड़कर, उस तथाकथित अपने प्रिय देश में चले जाना चाहिए तब उन्हें अपनी औकात ज्ञात हो जाएगी। उस समय वे न घर के रहेंगे और न घाट के। पश्चाताप करने पर भी उन्हें चैन नहीं मिल सकेगा।
रावण को युद्ध में परास्त करके जब भगवान राम ने लंका का राज्य विभीषण को सौंपा था, उस समय उन्होंने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा था-
न मे सुवर्णमयी लकाSपि रोचते लक्ष्मण।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
अर्थात् हे लक्ष्मण! यह सोने की लंका भी मुझे रुचिकर प्रतीत नहीं होती। जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान होती हैं।
ऐसी महान सोच रखने वाले हमारे भारत देश में देशविरोधी उन ताकतों का समर्थन किसी भी शर्त पर नहीं किया जाना चाहिए। देशद्रोह अथवा देश का अहित करने वालों के लिए कहते हैं कि उन्हें नरक से भी अधिक असहनीय कष्टों का सामना करना पड़ता है।
अपना देश कैसा भी हो, उसमें रहते हुए चाहे कठिनाइयों का सामना करना पड़े तब भी उसके प्रति वफादारी में किसी भी तरह की कमी नहीं आनी चाहिए। अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए अपने देश की जड़ों को खोखला करने वालों को ईश्वर भी क्षमा नहीं करता।
जिन लोगों को विदेशियों अथवा देशद्रोहियों से लगाव हो, उन्हें अपने वास्तविक देश को छोड़कर, अपने उस तथाकथित प्रिय देश में चले जाना चाहिए तब उन्हें अपनी औकात ज्ञात हो जाएगी। उस समय वे न घर के रहेंगे और न घाट के। पश्चाताप करने पर भी उन्हें चैन नहीं मिल सकेगा।
रावण को युद्ध में परास्त करके जब भगवान राम ने लंका का राज्य विभीषण को सौंपा था, उस समय उन्होंने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा था-
न मे सुवर्णमयी लकाSपि रोचते लक्ष्मण।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
अर्थात् हे लक्ष्मण! यह सोने की लंका भी मुझे रुचिकर प्रतीत नहीं होती। जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान होती हैं।
ऐसी महान सोच रखने वाले हमारे भारत देश में देशविरोधी उन ताकतों का समर्थन किसी भी शर्त पर नहीं किया जाना चाहिए। देशद्रोह अथवा देश का अहित करने वालो के लिए कहते हैं कि उन्हें नरक से भी अधिक असहनीय कष्टों का सामना करना पड़ता है।
अपने देश कैसा भी हो, उसमे रहते हुए चाहे कठिनाइयों का सामना करना पड़े तब भी उसके प्रति वफादारी में किसी भी तरह की कमी नहीं आनी चाहिए। अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए अपने देश की जड़ों को खोखला करने वाले को ईश्वर कदापि क्षमा नहीं करता।
मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके अपने देश से ही होती है। विदेश में जाकर शरण लेने वाले व्यक्तियों को वह सम्मान नहीं मिलता जो अपने देश के नागरिकों को दिया जाता है। इसलिए अपने देश के प्रति वफादार रहना चाहिए। जिस थाली में खाओ उसमें छेद करने वाला नहीं बनना चाहिए।
देशविरोधी ताकतों के कारण अपना महान भारत देश इस समय संक्रमण काल से गुजर रहा है। सभी राजनीतिज्ञों और देशवासियों को अपने पूर्वाग्रह छोड़कर एकजुट होकर देश की सुरक्षा के लिए प्रयास करना चाहिए ताकि हमारे भारत देश की गरिमा और अखण्डता बनी रह सके।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp
बुधवार, 17 फ़रवरी 2016
ईश्वर की कुदरत
ईश्वर की कुदरत को निहारने लगो तो हमें उसका ओर-छोर ही समझ नहीं आता। कहाँ से आरम्भ करें? यह सबसे बड़ा प्रश्न सामने आ जाता है। हम जितना अधिक उसकी सृष्टि के बारे में सोचते हैं, उतना ही उसमें डूबते जाते हैं।
उसकी सृष्टि में डूबे रहने वालों को हम दार्शनिक कहते हैं। वे उसके चमत्कारों की विवेचना करते रहते हैं। उसकी बनाई हुई हर वस्तु की पूर्णता हमें विचार करने के लिए विवश कर देती है कि हम उसकी तरह क्यों नहीं हो सकते? उसकी बनाई किसी भी वस्तु को निहारने लगो, उस पर गहराई से विचार करने लगो तो बहुत खोजने पर भी हम उसमें कमी नहीं निकाल सकते।
प्रकृति को ही ले लो। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, नदी, समुद्र, ग्रह और नक्षत्र आदि सभी अपने कामों को नियमपूर्वक बिना रुके, बिना थके चौबीसों घण्टे करते रहते हैं। उनके लिए न किसी अलार्म क्लाक की आवश्यकता है और न ही उन्हे अपने कार्य में कोताही बरतने के लिए डाँट-डपट की आवश्यकता होती है। ईश्वर को कभी भी समय-असमय उनकी क्लास लेने अथवा उन्हें समझाने की जरूरत नहीं पड़ती।
न ही वे सब अवकाश के लिए प्रार्थना पत्र मालिक को भेजते हैं कि वे थक गए हैं या सैर-सपाटे के लिए जाना चाहते हैं, इसलिए उन्हें अपने नित्य प्रतिदिन के कार्य कुछ समय के लिए मुक्त किया जाए। वे तो अनुशासन बद्ध होकर निरन्तर गतिमान रहते हैं। वे सब कभी शिकायत का मौका नहीं देते।
जहाँ भी दृष्टि डालो सृष्टि में प्रकृति का नैसर्गिक सौन्दर्य बिखरा हुआ है। उसे कुरूप बनाने में हम अपनी ओर से कोई भी कसर नहीं छोड़ते। फिर भी वह सौन्दर्य हम सबको बरबस आकृष्ट कर लेता है। शहरों और जंगलों में रंग-बिरंगे फलों और फूलो से लदे हुए वृक्ष हमें चमत्कृत कर देते हैं। फूलों का महकना उनकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देता है। वह बहुत बड़ा चित्रकार है। उसका रंग-विन्यास हमारी समझ से परे की बात है।
इतने सुन्दर जलचर, नभचर और भूचर जीव बनाए हैं कि उन्हें निहारते ही बनता है। हम उन जीवों को अपनी जीभ के स्वाद के लिए निर्ममता से मारकार खा जाते हैं।
इसी प्रकार अन्य पदार्थों का भी जितना अधिक विश्लेषण हम करते जाते हैं, उतना ही उनमें डूबते चले जाते हैं। उस समय मन करता है कि काश वह जगत्कर्त्ता हमें मिल जाए तो हम अपनी जिज्ञासा शान्त कर लें।
हम भनुष्य यदि कोई भी नई वस्तु बनाते हैं तो कितनी बार उसका परीक्षण करते हैं कि कहीं कोई कमी न रह जाए। इतना सब होने के बाद भी हमसे कहीं-न-कहीं चूक हो ही जाती है। हम पुतले तो बना सकते हैं, उसे बैटरी से रटा-रटाया बुलवा सकते हैं परन्तु उसमें प्राण डालकर उसे सजीव नहीं कर सकते।
हम सांसारिक प्राणी एक परिवार अथवा कुटुम्ब में कुछ सीमित लोगों के साथ मिलकर नहीं रह सकते। हमारे आपसी मतभेद हमें दूरियाँ बनाने के लिए विवश कर देते हैं। उनके लिए सब साधन नहीं जुटा पाते अथवा अपने अहं के कारण हम चाहकर भी सबका साथ नहीं निभा पाते। एक वह परमपिता है जिसने न जाने कितने अरबों-खरबों जीवों को इस धरती पर उत्पन्न किया है और बड़ी ही सरलता से उन सबका ध्यान रखता है उन्हें सारी सुख-सुविधाएँ देता है।
हमारी बनाई हुई किसी भी रचना में कमी निकलना बहुत सरल है परन्तु उस परमात्मा की बनाई हुई एक भी रचना में कहीं त्रुटि की गुँजाइश नहीं है। इसीलिए वस महान् है और उसके समक्ष हम सब नतमस्तक हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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