रविवार, 4 अक्टूबर 2020

घर में झगड़े का कारण

 घर में झगड़े का कारण

घर के सभी सदस्यों में कभी न कभी किसी बात को लेकर मनमुटाव हो जाता है। फिर यही झगड़े का कारण बन जाता है। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य ऐसे घर की कल्पना करता है, जहाँ सभी परिवारी जन मिल-जुलकर परस्पर प्रेम से रहते हैं। बड़े छोटों के सिर पर अपना वरद हस्त रखते हैं और छोटे बड़ों की आज्ञा का पालन करते हैं। इस प्रकार ऐसे घर में देवताओं का वास माना जाता है, और घर स्वर्ग की भाँति सुख से पूर्ण कहा जाता है।
           घर में चार सदस्‍य होते हैं, तो यह सम्भव है कि किसी भी मुद्दे पर सबकी राय अलग-अलग हो। मतभेद होना कोई बड़ी बात नहीं है। यह मतभेद जब मनभेद का रूप लेकर झगड़े का कारण बन जाता है, तो बात चिन्ताजनक हो जाती है। अक्‍सर देखने में आता है कि कई घरों में न चाहते हुए भी अक्‍सर लड़ाई-झगड़े होते हैं। झगड़े के कारण कई लोगों को मानसिक तनाव की समस्‍या से गुजरना पड़ता है।
         आर्थिक पक्ष झगड़े का प्रमुख कारण होता है। अक्सर पैसे को लेकर घर पर तनातनी होती रहती हैं। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने पर मनुष्य अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाता। धन का अभाव में मनुष्य के सारे कार्य स्थगित हो जाते हैं। वह केवल दो जून रोटी का जुगाड़ किसी तरह करने का प्रयास करता है। अतः घर के सदस्य एक-दूसरे को बुरा-भला कहते रहते हैं।
          पति-पत्नी में झगड़े के कई कारण होते हैं। दोनों में से एक का कम पढ़ा होना, रंग-रूप में कमतर होना, पत्नी की आय पति से अधिक होना। इसे हम मिस मैच विवाह भी कह सकते हैं। ऐसी स्थितियों में एक-दूसरे को नापसन्द करने के कारण परस्पर छींटाकशी होने से घर का माहौल प्रभावित होता है। कई बार पति अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए पत्नी पर घर से बाहर जाकर अय्याशी करने का आरोप लगाता है।
           विवाहेत्तर सम्बन्ध चाहे पति का हो अथवा पत्नी का, झगड़े का कारण बनते हैं। कोई भी मनुष्य अपने साथी के इस प्रकार के सम्बन्ध को सहन नहीं कर पाता। इसलिए उनके झगड़े दिन-प्रतिदिन बढ़ते रहते हैं। इससे घर का वातावरण बोझिल हो जाता है। इस सम्बन्ध का अन्त अलगाव यानी तलाक होता है। धन की कमी या अन्य कोई कमी तो सहन की जा सकती है, पर चरित्र की इस कमी को कोई भी साथी बर्दाश्त नहीं कर पाता।
           अनेक बार पिता और पुत्र में झगड़ा हो जाता है, माता और बेटी में झगड़ा हो जाता है। इसका कारण बच्चों की मनमानी कही जा सकती है। बच्चे सोचते हैं कि वे बड़े हो रहे हैं और उनके माता-पिता उन्हें समझते नहीं हैं। वे बस कूप मण्डूक ही हैं। और दूसरी ओर माता-पिता का मानना है कि पढ़-लिखकर बच्चों के दिमाग खराब हो गया है। वे सोचते हैं कि वे बहुत बड़े हो गए हैं। वे अपने बराबर किसी को समझदार समझते ही नहीं हैं।
          बड़े दुर्भाग्य की बात है कि सास-बहू में झगड़ा प्रायः घरों में होता रहता है। यह लड़ाई सारी प्रभुत्व की होती है। सास घर पर बना अपना एकाधिकार छोड़ना नहीं चाहती। वह सोचती है कि कल की आई लड़की को वह घर की जिम्मेदारी कैसे सौंप दे। बहू सोचती हैं कि घर उसका भी उतना है, जितना सास का है। फिर एक-दूसरे की कमियाँ निकालने के कारण झगड़े होते हैं। इसके अतिरिक्त दहेज को लेकर भी बहू को प्रताड़ित किया जाता है।
          कभी-कभी भाई-बहन या भाई-भाई में भी झगड़ा हो जाता है। धन-सम्पत्ति को लेकर प्रायः विवाद होते रहते हैं। इसलिए उत्तराधिकार का झगड़ा भाई-बहनों में परस्पर दूरियाँ बना दता है। बेटी या बेटा कोई भी माता-पिता की सम्पत्ति से अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता। भाई सोचते हैं कि बहन को कुछ क्यों दें और बहन सोचती हैं कि वह अपने अधिकार का प्रयोग क्यों न करे। एक भाई दूसरे भाई से अधिक हड़पना चाहता है।
         झगड़ा अक्सर किसी गलतफहमी के कारण हो जाता है। एक-दूसरे से खुलकर बातचीत न करने की वजह से भी झगड़ा हो जाता है। कई बार घर के सदस्यों के बीच लड़ाई इसलिए भी हो जाती है, क्योंकि वे अनजाने में ही किसी बात का बतंगड़ बना देते हैं। कभी कभार घर के किसी सदस्य का चिल्लाकर बोलना भी झगड़े का कारण बन जाता है। इनके अतिरिक्त भी कई और कारण हो जाते हैं, जिनसे घर का माहौल बोझिल हो जाता है।
          सांसारिक भौतिक वस्तुओं के पीछे इन्सान पागल हुए रहते हैं। जबकि सब जानते हैं कि दुनिया को छोड़ते समय सब यहीं रह जाना है, चाहे वह धन-सम्पत्ति हो या रिश्ते हों। सबको इनके लिए झगड़ना नहीं चाहिए। मिल-जुलकर, प्यार से अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। पता नहीं कौन पहले दुनिया को छोड़ेगा और कौन बाद में। उस समय पश्चाताप करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। इसलिए अपने लालच और अहं का त्याग करके हर मनुष्य को सद्भावना से जीवन व्यतीत करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

मन की बात मन में

 मन की बात मन में

मनुष्य के साथ बहुधा ऐसा होता है कि वह बहुत कुछ कहना चाहता है, पर उसकी बात उसके मन में ही रह जाती है। समय बीत जाने के बाद वह सोचता है कि उसे ऐसे कहना चाहिए था या वैसे कह देना चाहिए था। पर अब तो कुछ भी नहीं हो सकता। तब तक वह कहने का अवसर खो चुका होता है। अपने मन की बात को दूसरों के समक्ष प्रकट न कर पाने के कई कारण हो सकते हैं।
           बड़ों का सम्मान करना एक कारण हो सकता है। माता-पिता अथवा गुरुजनों के सम्मान के कारण  मनुष्य उन्हें उत्तर नहीं दे पाता। उसे लगता है कि यदि उन्हें पलटकर जवाब दिया गया, तो कहीं वे इसे अपना अपमान न समझ लें। इसलिए वह उस समय चुप लगा जाता है। शायद बड़े लोग मनुष्य की इस चुप्पी को उसकी भूल मानकर लानत-मलानत करते हैं।
         मनुष्य जिससे प्यार करता है, उसे ठेस न लगे या उसे बुरा न लग जाए, यह सोचकर वह अपने मन को मारकर खामोश हो जाता है। अपने प्रियजन का दिल दुखाने के विषय में वह स्वप्न में भी कभी सोच नहीं सकता। यह मनुष्य का दुर्भाग्य है कि इस चक्कर में कभी-कभी वह कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। अपने प्यार को बचाने के लिए वह अपनी अवमानना सहन कर जाता है।
            जो मनुष्य अपने रिश्तों का सम्मान करता है, वह उन्हें किसी भी शर्त पर कभी बिगड़ने नहीं देना चाहता। रिश्ते न बिगड़ जाएँ, इसलिए वह गम खा लेता है। परन्तु वह किसी से कुछ नहीं कहता। अपने रिश्तों को वह सहेजकर रखना चाहता है। यदि कोई छोटी-मोटी बात उनमें हो भी जाए, तो उसे दरकिनार कर देता है। सच कहा जाए तो रिश्ते इसी प्रकार निभाए जाते हैं। समय आने पर उनकी दूरी मिट जाती है।
         मन की बात को न कह सकने का कारण डर भी हो सकता है। डर के कारण मनुष्य सामने वाले को जानते-बुझते हुए कुछ कह नहीं पाता। वह अपनी सफाई में बहुत कुछ कहना चाहता है, पर वह डर के कारण बोलने में असमर्थ हो जाता है। वहाँ मानो उसकी घिघ्घी बँध जाती है और वह मौन रह जाता है। यह डर उसके अवसाद का कारण बन जाता है। इस तरह मनुष्य का डर जीत जाता है और वह स्वयं हार जाता है।
        जब किसी बन्धु-बान्धव की मृत्यु हो जाती है, तब मनुष्य सोचता है कि जाने वाला तो चला गया, अब इसके बारे में कुछ कहने का कोई लाभ नहीं। इसलिए बहुत कुछ जानते हुए भी वह चुप रह जाता है। यह मनुष्य की समझदारी होती है, जो वह मृतक की छीछालेदर नहीं करता। वह उसके सारे रहस्यों को अपने मन के किसी कोने में ही दफन कर देता है। उन्हें प्रकट नहीं करता।
       किसी का दिल दुखाना जब मनुष्य को  अच्छा नहीं लगता, तब वह मौन साध लेता है। प्रत्येक मनुष्य अपने परिवारी जनों और प्रियजनों के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। वह नहीं चाहता कि उसकी किसी भी बात से उन्हें चोट पहुँचे। इसलिए वह अपने मन की बात को प्रकट नहीं करता। वह यही चाहता है कि उसके अपने सदा प्रसन्न रहें। तभी वह कड़वा घूँट स्वयं पीकर सबको खुशियाँ देता है।
       यदि मनुष्य को किसी व्यक्ति से लाभ मिलता होता है, तब वह उसके सामने अपना मुँह नहीं खोलता। उस समय उसकी हर अच्छी-बुरी बात को वह सहन कर लेता है, पर पलटकर उसे जवाब नहीं देते। वह उसकी हाँ में हाँ मिलता रहता है। उसके पीछे कारण यही होता है कि वह उस व्यक्ति को नाराज करके वह अपना अहित नहीं करना चाहता। इसलिए वहाँ मौन ही उसका अस्त्र होता है।
          इस प्रकार मनुष्य सही होते हुए भी दूसरे लोगों से कुछ नहीं कह पाता। कई बार मनुष्य की यह चुप्पी उसे भारी पड़ जाती है। लोग उसे गलत समझने की भूल करने लगते हैं। तब उसे कुछ न बोलने का खामियाजा भुगतना पड़ जाता है। इसलिए हर मनुष्य को चाहिए कि वह उचित समय पर अपने मन की बात बिना डरे कह डाले। इससे उसे अपने मन को मारकर पश्चाताप नहीं करना पड़ेगा। सत्य बात को कहने से उसके मन को सन्तोष होगा।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

मृत्यु मनुष्य का मित्र

  मृत्यु मनुष्य का मित्र

मनुष्य के जन्म लेने से लेकर इस संसार से विदा लेने तक मृत्यु सदा उसके साथ रहती है। वह मनुष्य का साथ पल भर के लिए भी नहीं छोड़ती। वह एक मित्र की तरह सदा उसके साथ-साथ चलती है यानी मृत्यु का साया सदैव मनुष्य के साथ ही रहता है या उसके ऊपर मँडराता रहता है। यह सत्य है कि चाहकर भी इससे वह कभी अलग नहीं हो सकता। कोई भी सम्बन्ध मनुष्य के साथ मृत्यु की तरह इतना समय तक साथ नहीं निभा पाता।
           मनीषी कहते हैं कि परछाई हमेशा मनुष्य के साथ ही चलती है। इसलिए वह अपने आस-पास अपनी परछाई को देखता है। समुद्रशास्त्र और सूर्य अरुण संवाद के अनुसार जब आत्मा मनुष्य को छोड़कर जाने लगती है, तब उसकी परछाई भी उसका साथ छोड़ देती है। कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति की परछाई तो उस समय भी होती है, लेकिन मरणासन्न व्यक्ति की दृष्टि अपनी परछाई को देख नहीं पाती है। उस समय उसकी आँखों में परछाई देखने की शक्ति समाप्त हो जाती है।
          मृत्यु कोई डरावनी वस्तु नहीं है। वह मनुष्य की विश्राम स्थली है। जिस प्रकार मनुष्य दिनभर परिश्रम करके थक जाता है, तब रात होने पर सो जाता है। प्रातःकाल तरोताजा होकर फिर से अपने काम में जुट जाता है। उसी प्रकार सारा जीवन मनुष्य सुख-दुख के थपेड़ों को खाता हुआ थक जाता है। तब वह मृत्यु की गोद में जाकर सो जाता है। फिर जागने के उपरान्त वह अपने नए जीवन की यात्रा के लिए तैयार हो जाता है।
            विकिपीडिया के अनुसार मृत्यु कोई शब्द नहीं है। महाभारत ग्रन्थ के अनुसार मृत्यु एक परम पवित्र मंगलकारी देवी है। सामान्य भाषा में किसी भी जीवात्मा अर्थात् प्राणी के जीवन के अन्त को मृत्यु कहते हैं। सामान्यतः वृद्धावस्था, लालच, मोह, रोग, कुपोषण के फलस्वरूप होती है। मुख्यत: मृत्यु के 101 स्वरूप होते है, लेकिन यह 8 प्रकार की मुख्य होती है। जिसमे बुढ़ापा, रोग, दुर्घटना, अकस्माती आघात, शोक, चिन्ता और लालच मृत्यु के मुख्य रूप है।
            मृत्यु उतनी ही सत्य है, जितना मनुष्य का इस संसार में जन्म लेना होता है। मनुष्य जन्म लेता है, धीरे-धीरे बड़ा होता है। वह पढ़-लिखकर योग्य बनता है। फिर कोई नौकरी करता है या व्यवसाय। उसके उपरान्त विवाह करके अपनी गृहस्थी बसता है। फिर बच्चों का पालन-पोषण करता है। उनके सैटल हो जाने पर, उनका विवाह करता है। तब तक वह स्वयं वृद्धावस्था की ओर कदम रख देता है। तदुपरान्त समय बीतते उसके इस संसार से विदा होने का समय आ जाता है यानी वह मृत्यु की गोद में चल जाता है।
        कहते हैं मृत्यु आने से नौ महीने पहले से ही कुछ ऐसी घटनाएँ होने लगती हैं, जो मृत्यु का संकेत देती हैं। यह संकेत इतने सूक्ष्म होते हैं कि मनुष्य अपनी प्रतिदिन की जिन्दगी में उन पर ध्यान ही नहीं दे पाता। जब मृत्यु एकदम करीब आ जाती है, तो पता लगता है कि कई काम तो अधूरे ही रह गए हैं।  ऐसी स्थिति में अन्तिम क्षणों में मन भटकने लगता है, तब मृत्यु कष्टदायक हो जाती है। 
           पुराणों का कथन है कि मृत्यु के समय यदि मनुष्य का मन शान्त और इच्छाओं से मुक्त होता है, तब वह बिना कष्ट के प्राण त्याग देता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा को परलोक में सुख की अनुभूति होती है। सयाने लोगों को ऐसा भी कहते सुना है कि मृत्यु के समय मनुष्य की जैसी वृत्ति होती है, उसे उसी के अनुरूप नया जन्म मिलता है। इसीलिए उस समय उसके पास बैठकर बन्धुजन किसी धर्मिक ग्रन्थ का पाठ करते हैं या फिर ईश्वर के नाम का जाप करते हैं।
            इस प्रकार मनुष्य के जीवन की यह साइकिल या एक चक्र समाप्त हो जाता है। यानी मनुष्य की मृत्यु उसके जीवन चक्र की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस प्रकार भी कह सकते हैं कि मृत्यु एक जन्म के अन्त और दूसरे जन्म के आरम्भ की एक प्रक्रिया है। जीवन का अन्त समय सुधारने के लिए अभी से ईश्वर का नाम स्मरण करने का अभ्यास करना चाहिए। ताकि उस समय पश्चाताप न करना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

पति-पत्नी में विश्वास

 पति-पत्नी में विश्वास

घर-परिवार का आधार पति और पत्नी दोनों ही होते हैं। इनके सम्बन्धों में परस्पर विश्वास और पारदर्शिता का होना बहुत ही आवश्यक होता है। जब तक ये दोनों एक-दूसरे के प्रति समर्पित भाव से रहते हैं, तब तक इनकी गृहस्थी की गाड़ी बहुत ही सुन्दर ढंग से चलती रहती है। यदि इनमें से एक भी मनमानी करने लगे अथवा टेढ़ी चाल चलनी लगे, तब गृहस्थी में धीरे-धीरे घुन लगने लगता है।
          पति-पत्नी के रिश्ते लम्बे समय तक प्रेमपूर्वक तभी चलते हैं, जब वे दोनों विश्वास की मजबूत डोर से बँधे रहते हैं। उन दोनों में दो जिस्म एक जान वाला रिश्ता होना चाहिए। घर में पति कहे कि वह कमाता है, तो धन पर उसका अधिकार है। वह जैसे चाहे उसे खर्च करे। पत्नी कहे कि वह कमाती है, तो धन उसका है। वह उसे घर में खर्च नहीं करेगी। इस तरह तो गाड़ी नहीं चलती।
           पति-पत्नी जब तेरे और मेरे की बोली को छोड़कर हमारे वाली भाषा बोलने लगें, तब जाकर उनके रिश्ते मजबूत होने लगते हैं। इसका यही अर्थ होता है कि उन दोनों में एक गहरी सोच पनपने लगी है। ऐसी गृहस्थी में कलह-क्लेश नहीं होता। यहाँ प्यार का साम्राज्य होता है। यह बात दोनों को सदा याद रखनी चाहिए कि पति और पत्नी का रिश्ता रक्त सम्बन्ध नहीं होता। इसे आपसी सूझबूझ से दृढ़ बनाया जा सकता है।
          किसी कवि ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में पति के द्वारा किए गए विश्वासघात के विषय में कहा है-
कलत्रं  पृष्टतः कृत्वा  रमते  यः  परस्त्रियः।अधर्मश्चापदस्तस्य  सद्यः  फलति  नित्यशः।
अर्थात् अपनी पत्नी के पीठ पीछे छिपकर जो व्यक्ति दूसरों की स्त्रियों से अनैतिक प्रेमसम्बन्ध बनाते हैं, अपने  इस अधार्मिक कृत्य के फल स्वरूप वे शीघ्र ही  सदा के लिये आपदाग्रस्त हो जाते हैं।
           पत्नी से छिपकर किसी भी कारण से पुरुष यानी पति जब विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाता है, तब वह उसी ही समय अपनी गृहस्थी में विष घोलने का कार्य करने लगता है। सयाने कहते हैं-
     इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते।
पति चाहे कितना भी यत्न कर ले, यह सम्बन्ध कभी न कभी मुखर हो उठता है। उस समय आपसी विश्वास की धज्जियाँ उड़ जाती हैं।
          यह सत्य है कि जितना पुरुष इस नाजायज सम्बन्ध के लिए दोषी होता है, उतनी ही दोषी वह स्त्री भी होती है, जो इसमें बराबर की भागीदार होती है। ऐसी स्त्री की स्वयं की गृहस्थी को बर्बाद होने से कोई नहीं बचा सकता। इस प्रकार ये लोग दो-दो घरों के बिखराव का कारण बनते हैं।नित्य प्रति होने वाले झगड़ों के कारण घर टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं। जिसके लिए दोषी वे स्वयं होते हैं।
           पति अथवा पत्नी किसी एक की गलती के कारण घर टूटने की कगार पर आ जाता है। उन लोगों का परस्पर सम्बन्ध विच्छेद होने पर उनके मासूम बच्चे पिसते हैं, जिनका कोई दोष नहीं होता। वे दोनों तो शायद अपनी-अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ जाते हैं, पर उनके बच्चे वहीं कहीं पीछे छूट जाते हैं। वे बेचारे आगे नहीं बढ़ पाते। माँ के पास रहते हैं, तो पिता की याद में तड़पते हैं। यदि पिता के पास रहते हैं, तो माँ की याद में ये आँसू बहाते हैं।
           यदि पति-पत्नी दोनों फूँक-फूँक कर अपना कदम बढ़ाएँ, तब इस समस्या से बचा जा सकता है। दोनों का ही जीवन एक खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए। वे जब चाहें एक-दूसरे को सरलता से पढ़ सकें। उन दोनों में किसी भी तरह का कोई छिपाव-दुराव नहीं होना चाहिए। उन्हें अपने मोबाइल को लॉक करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। न ही उन्हें किसी के पीछे जासूस लगाने पढ़ें।
           मैं किसी और लोक की बात नहीं कर रही। बहुत से घरों में इस प्रकार का व्यवहार देखने को मिलता है। उन लोगों को देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वे दोनों अपने इस रिश्ते के प्रति संवेदनशील हों। आपस में प्यार और विश्वास को बनाने के लिए दोनों ईमानदारी से प्रयत्न करें। तभी उन दोनों में विश्वास की महीन रेखा सुदृढ़ हो सकती है। अपनी गृहस्थी को आदर्श बनाने के लिए पति और पत्नी दोनों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 30 सितंबर 2020

अपनों से बिछोह

 अपनों से बिछोह

अपने प्रियजन से बिछोह या वियोग हृदय की गहराई तक विदीर्ण कर देता है। अपनों का साथ एक सुखद अहसास करवाता है। उनसे बिछुड़ जाने की कल्पना मात्र से जी हलकान होने लगता है। मनुष्य को अपना परिवार, अपने बन्धु-बान्धव अपनी जान से भी प्यारे होते हैं। वह उनसे कुछ दिन की दूरी बनाने से ही परेशान हो जाता है, फिर उनसे सदा के लिए बिछुड़ जाने के विषय में वह सोच ही नहीं सकता।
          मनुष्य को इस जीवन में धन-वैभव, सुख-समृद्धि, भाई-बन्धु, पति या पत्नी, सन्तान आदि जो भी मिलता है, वह ईश्वर का दिया हुआ उपहार ही होता है। मनुष्य को जो कुछ मिल जाता है, उस पर वह अपना एकाधिकार समझने लगता है। यानी वे उसकी पर्सनल प्रॉपर्टी हो जाते हैं। उन्हें वह किसी भी मूल्य पर अपने से अलग नहीं होने देना चाहता। फिर हमेशा के लिए खो देना, तो कभी भी नहीं।
         सृष्टि का नियम है कि जिस जीव ने यहाँ जन्म लिया है, उसे अपने पूर्वजन्मों के कर्मफल स्वरूप प्राप्त अपनी आयु को भोगकर, इस असार संसार से विदा होना पड़ता है। फिर भी मनुष्य इस सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहता। उसके सभी सगे-सम्बन्धी और वह स्वयं सोचता है कि वह पट्टा लिखवाकर आया है। वह इस दुनिया से विदा नहीं होगा। पर ऐसा हो नहीं पाता है।
           यह सृष्टि अपने नियम से चलती रहती है। जीव का आवागमन यहाँ होता ही रहता है। जो कुछ भी मनुष्य का है, वह ईश्वर का दिया हुआ। इस सत्य को अनदेखा करता हुआ मनुष्य अपनी कही जाने वाली कोई वस्तु उसे वापिस नहीं करना चाहता। वह अमानत में खयानत करना चाहता है। भौतिक जगत में यदि मनुष्य किसी से कोई वस्तु या धन आदि उधार स्वरूप लेता है, तो निश्चित अवधि के उपरान्त उसे वापिस करना पड़ता है।
            ईश्वर की दी हुई किसी वस्तु को निश्चित अवधि के उपरान्त भी यह मनुष्य बिल्कुल लौटाना नहीं चाहता। उस समय मनुष्य अधीर हो जाता है। वह दुखी होता है रोता है, चिल्लाता रहता है। पर वह भूल जाता है कि नेमत भी तो उसी ने ही दी थी। सदा के लिए तो मालिक ने उसे वह नहीं सौंपी थी। कभी तो उसने उसे वापिस लेना ही था।
            अपना कोई प्रिय जन जब हमसे बिछुड़कर यानी इस असार संसार को छोड़कर परलोक गमन करता है या ईश्वर की शरण में जाता है, तो वह वियोग किसी भी मनुष्य को असह्य पीड़ा दे जाता है। वह उसे जीवन पर्यन्त भूल नहीं सकता। उसे याद करके रोता रहता है, आहें भरता रहता है। यह मनुष्य की मजबूरी है कि उसे मृतक का दाह संस्कार करना पड़ता है, नहीं तो वह उसे मम्मी बनाकर अपने पास ही रख लेता।
          वैसे तो मनुष्य सदा अपने मुख से यही कहता है-
  मेरा मुझमें कुछ नहीं जो कुछ है सब तोर।
  तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर।।
यानी मनुष्य कहता तो यही है कि है प्रभु! सब कुछ तुम्हारा है, मेरा कुछ भी नहीं है। तेरी वस्तु तुझे सौंपते हुए मेरा क्या लगता है? 
          यानी मनुष्य की कथनी और करनी में अन्तर होता है। वह कहता कुछ और हैं, पर करता कुछ और है।
          मनुष्य सांसारिक लोगों के साथ तो छल-फरेब, दुराव-छिपाव कर सकता है, पर ईश्वर के साथ उसका यह व्यवहार नहीं चल सकता है। यहाँ तो सीधा सा गणित चलता है। जितना जिस बन्धु-बान्धव के साथ मनुष्य का लेन देन का सम्बन्ध होता है, उतना ही उनको साथ निभाना होता है। उसके उपरान्त यह जुदाई निश्चित होती है। मनुष्य के चाहने अथवा न चाहने से कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला।
          यह संसार रिश्तों की मण्डी है। यहाँ रिश्ते अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार मिलते हैं। जो रिश्ता इस जन्म में साथ छोड़कर बिछुड़ गया, वह फिर किसी अन्य जन्म में, किसी न किसी रूप में मिल जाता है। बस हम उस समय यह सब समझ नहीं पाते। इस संसार में रहते हुए हम कुछ समय के लिए एक-दूसरे से दूर जाते हैं और फिर वापिस मिलते हैं, उसी प्रकार परलोक गमन करने पर भी होगा। इसलिए अपनों से वियोग को मनुष्य को यही सोचकर सहन करना चाहिए कि इस संसार में रहते हुए फिर किसी जन्म में और किसी रूप में हमारा मिलना सम्भव हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

मूर्ख लाइलाज

 मूर्ख लाइलाज

'मूर्ख मित्र से शत्रु अच्छा' यह उक्ति कहकर मनीषी मनुष्य को आगाह करते हैं कि मूर्ख व्यक्ति से कभी मित्रता नहीं करनी चाहिए। उसे समझदार बनाने का कितना भी प्रयास कर लिया जाय, कितना ही माथा फोड़ा जाए, उस पर कोई असर नहीं होता। वह मूर्ख का मूर्ख ही बना रहता है। अपना ही दिमाग खराब हो जाएगा, परन्तु वह सुधरने का नाम नहीं लेता। उससे दूरी बना लेना ही श्रेयस्कर होता है।
         महाराज भर्तृहरि ने 'नीतिशतकम्' ग्रन्थ में कहा है-
शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो
 नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
 व्याधिर्भेषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्
अर्थात् अग्नि को जल से बुझाया जा सकता है, तीव्र धूप में छाते द्वारा बचा जा सकता है, जंगली हाथी को भी एक लम्बे डंडे(जिसमे हुक लगा होता है ) की मदद से नियन्त्रित किया जा सकता है, गायों और गधों से झुंडों को छड़ी से नियन्त्रित किया सकता है। अगर कोई असाध्य बीमारी हो तो उसे भी औषधियों से ठीक किया जा सकता है। यहाँ तक की जहर दिए गए व्यक्ति को भी मन्त्रों और औषधियों की मदद से ठीक किया जा सकता है। इस दुनिया में हर बीमारी का इलाज है, लेकिन किसी भी शास्त्र या विज्ञान में मूर्खता का कोई इलाज नहीं है।
          इस श्लोक के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि मूर्ख की मूर्खता का कोई इलाज नहीं हो सकता। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने यहाँ कई उदाहरण दिए हैं। किसी स्थान पर यदि आग लग जाए तो उसे जलने के लिए ऐसे नहीं छोड़ दिया जाता, बल्कि उस अग्नि को पानी डालकर बुझाया जा सकता है। आजकल फायरब्रिगेड को आग लगते ही फोन कर दिया जाता है। वह उसी समय आ जाती है और वह पानी की बौछारों के द्वारा आग को बुझा देती है। इस तरह आग बुझ जाती है।
          सूर्य जब अपनी युवावस्था यानी दोपहर के समय होता है, तब उसका प्रकाश और गर्मी अपने उत्कर्ष पर होते हैं यानी बहुत तीव्र होते हैं। उस समय ऐसा प्रतीत होता है, मानो मनुष्य का सिर जलने लगता है। उस समय यदि व्यक्ति छाते का उपयोग कर लेता है, तो वह उस छाते के कारण तीव्र धूप में जलने से बच सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो मनुष्य गर्मी से राहत पा सकता है। 
           जंगली हाथी को पकड़ने के लिए अंकुश या एक लम्बा डण्डा जिसमें एक हुक लगी हुई होती है, उसका सहारा लेकर उसे नियन्त्रित किया जाता है। इन जंगली हाथियों को सवारी करने के लिए, उनसे और काम करने के लिए या फिर सर्कस आदि में करतब दिखने के लिए पालतू बनाया जाता है। इसीलिए इन्हें इस प्रकार पकड़ा जाता है। फिर उन्हें ट्रेनिंग देकर उनसे कार्य करवाए जाते हैं।
          गायों को जब चराने ले जाते हैं या फिर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं, तब उन्हें चराने वाला छड़ी का उपयोग करता है, जिससे वे इधर-उधर न चली जाएँ। अथवा किसी वाहन से टकराकर घायल न हो जाएँ। इसी प्रकार गधों का मालिक से भी उनके झुंडों को छड़ी से ही नियन्त्रित करता है। इसका उद्देश्य भी यही होता है कि गधे भागकर कहीं और न चले जाएँ।
         मनुष्य को यदि कोई असाध्य बीमारी हो जाती है, तो उसे योग्य डॉक्टर के पास लेकर जाते हैं। वह उचित औषधियों के उपचार द्वारा उस मनुष्य को स्वस्थ कर देता है। इससे भी बढ़कर यदि किसी व्यक्ति को यदि विष या जहर दे दिए गया हो, तो उसे उचित इलाज के द्वारा निश्चित ही ठीक किया जा सकता है। उस व्यक्ति को मन्त्रों की सहायता से भी ठीक कर दिया जा सकता है।
          इतने सारे उदाहरणों को देने के पश्चात कवि कहते हैं कि इस दुनिया में हर बीमारी का इलाज किया जा सकता है और रोगी स्वस्थ भी हो जाता है। परन्तु किसी भी शास्त्र या विज्ञान में मूर्खता का कोई इलाज नहीं है। मूर्ख व्यक्ति को कितना भी बुद्धिमान बनाने का प्रयास कर लो, वह अपनी मूर्खता को नहीं छोड़ता। ऐसे मूर्ख के साथ माथापच्ची करने के स्थान पर उससे किनारा कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 28 सितंबर 2020

पैर से छूना वर्जित

 पैर से छूना वर्जित

भारतीय संस्कृति मानवीय मूल्यों की थाती है। वह पग-पग पर मनुष्य को अनुशासित करती है। हमारी संस्कृति जीवन मूल्यों को अपनाने पर बल देती है। यही कारण है कि विश्व की प्राचीनतम भरतीय संस्कृति अपने अमूल्य संस्कारों की बदौलत आज तक बची हुई है। यह कदम-कदम पर मनुष्य को ठोकर खाने से बचाने का प्रयास करती रहती है। जो लोग इन संस्कारों को अपनाते हैं, वे महान बन जाते हैं।
          आज हम चर्चा करेंगे कि किन लोगों को पैर से स्पर्श करना वर्जित किया गया है। आचार्य चाणक्य हमें बता रहें हैं कि निम्न लोगों को अपने पैर से कदपि स्पर्श नहीं करना चाहिए-
पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं गुरुं ब्राह्मणमेव च। 
नैव गां न कुमारीं च न वृद्धं न शिशुं तथा।।
अर्थात् इन सात को कभी पैर नहीं लगना चाहिए- अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गाय, कुमारी कन्या, वृद्ध पुरुष तथा अबोध बालक। इन्हें पैर से छूने का अर्थ है इनका अपमान करना है।
          अग्नि के विषय में सब लोग अच्छी तरह से जानते हैं। वह अपने पास आने वालों को भस्म कर देती है। वह छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, गोरे-काले या लिंग और जाति के भेद से परे है। वह किसी का भी पक्षपात नहीं करती। उसने उन सबको जला देने का अपना कार्य बड़ी अच्छी तरह से करना होता है। अपने पास आने वाले सबको वह जला देती है। अपनी सुरक्षा के लिए उसे पैर से कभी भी स्पर्श नहीं करना चाहिए।
           गुरु मनुष्य का सर्वांगीण विकास करता है। उसे विद्या का ज्ञान देता है। यदि किसी को सच्चे अर्थों में गुरु मिल जाए, तो वह उसे मुक्ति के मार्ग पर ले जाने का कार्य करता है। इसलिए गुरु को पिता भी कहा जाता है और देवता भी। वह पूजनीय तो होता ही है। ऐसे ज्ञानवान गुरु को कभी भी अपने पैर से नहीं छूना चाहिए। इस तरह करने से उसका अपमान होता है। मनुष्य को दोष तो लगता ही है और वह पाप का भागीदार भी बनता है।
            ब्राह्मण को हमारे शास्त्रों में देवता के समान माना जाता है। ब्राह्मण का यहाँ रूढ़ अर्थ नहीं है, बल्कि विद्वान व्यक्ति को कहते हैं। यह समाज को दिशा देने का कार्य करता है। इसका कार्य अध्ययन-अध्यापन करने का होता है। ऐसे विद्वान व्यक्ति को अपने पैर से छूने का निषेध शास्त्र करते हैं। इनका सदा सम्मान किया जाना चाहिए। इन लोगों का तिरस्कार कदापि नहीं करना चाहिए।
           गाय को भारतीय संस्कृति में माता कहा जाता है। इसकी माता के समान ही पूजा की जाती है। गोपाष्टमी इसी के नाम से मनाई जाती है। गाय के दूध, दही, घी और माखन आदि को खाकर मनुष्य पुष्ट होता है। इसका मूत्र में कई औषधीय गुण हैं। पुरातन काल में गोधन को सबसे बड़ा धन मन जाता था। जिसके पास अधिक गौवें होती थीं, वह उतना ही समृद्ध व्यक्ति माना जाता था। भगवान श्रीकृष्ण को इनसे बहुत प्यार था। इसीलिए इसे पैर से छूना वर्जित किया गया है।
          कुमारी कन्या भगवती देवी का रूप मानी जाती है। वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्रों में इसकी पूजा करने का विधान है। वैसे भी कहा जाता हैं कि बड़े पुण्यों का उदय होने पर किसी गृहस्थ के घर कन्या का जन्म होता है। कन्या का विवाह करना बहुत ही पुण्यकारक माना जाता है। लोग इसके पैर छूकर, इसका आशीर्वाद लेते हैं। ऐसी कन्या का अपने पैर से कभी स्पर्श नहीं करना चाहिए।
            वृद्ध पुरुष अनुभवों की खान होते हैं। आयु की दृष्टि से वृद्ध होने के कारण इनका सम्मान करना चाहिए, तिरस्कार कदापि नहीं करना चाहिए। उन्होनें अपना पूरा जीवन व्यतीत किया होता है। इस अवस्था में वे आदरणीय बन जाते हैं। वैसे भी हमारी संस्कृति बुजुर्गों की सेवा-सुश्रुषा करने पर बल देती है। उन्हें देवता के समान ही पूजनीय मानती है। पैर से छूकर इनका अनादर नहीं करना चाहिए।
            अबोध बालक को भगवान का ही रूप कहा जाता है। उसे अभी इस संसार की हवा नहीं लगी होती। वह छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष आदि अवगुणों से रहित होता है। उसका हृदय शुद्ध और पवित्र होता है। वह सबको अपना समझता है, इसलिए जो उसे प्यार से बुलाता है, उसके पास चला जाता है। उनके साथ खेलता है, मस्ती करता है। ऐसे अबोध बालक को अपने पैर से नहीं छूना चाहिए।
           कहने का तात्पर्य यह है कि इन सबको पैर से छूना असभ्यता कहलाती है। ये सभी वन्दनीय होते हैं। इनका हृदय से सम्मान करना चाहिए। कैसी भी परिस्थिति हो सभ्य इन्सान को कभी भी अपने पैर से छूकर इनका निरादर नहीं करना चाहिए। यदि गलती से इन्हें पैर लग जाता, तो हमारे पूर्वज उसे अपने सिर पर लगाकर क्षमा याचना करते थे।
चन्द्र प्रभा सूद