बुधवार, 6 अगस्त 2025

मनुष्यों की श्रेणियॉं

मनुष्यों की श्रेणियॉं

मनुष्यों को उनकी प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार तीन श्रेणियों  में विभक्त किया गया है। प्रथम श्रेणी के लोगों को उत्तम जन कहा जाता है। ये अपने इरादों में बड़े पक्के होते हैं। मध्यम श्रेणी के लोग द्वितीय कोटि के होते हैं इनमें कुछ गुण महान लोगों की तरह होते हैं और अपने को मजबूत बनाना चाहते हैं। परन्तु निम्न कोटि के लोगों की तरह हड़बड़ाहट में रहते हैं। इसलिए जल्दी घबरा कर अपने लक्ष्य से चूक जाते हैं। तीसरी कोटि के लोगों को निम्न श्रेणी का कहा जाता है। ये ढुलमुल व्यवहार करते हैं और शीघ्र ही घबरा जाते हैं। किसी कार्य को करने का कष्ट ही नहीं उठाते।
           अपने-अपने व्यवहार के कारण ही तीन श्रेणियों में बॉंटे गए लोगों के विषय में यहाँ हम महाराज भर्तृहरि के इस श्लोक के माध्यम से विवेचना करते हैं-
        प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचै:
       प्रारभ्य विघ्नविहिता विरमन्ति मध्या:।
        विघ्नै: पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना:
        प्रारभ्य तु उत्तमजना न परित्यजन्ति॥
अर्थात् नीच यानी निम्न कोटि के लोग विघ्नों (मुसीबतों) के डर से किसी कार्य को आरम्भ ही नहीं करते। वे परेशान रहते हैं। मध्यम कोटि के लोग कार्य आरम्भ करते हैं परन्तु जब विघ्न-बाधाऍं आती हैं तो घबराकर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। इनके विपरीत उत्तम कोटि के लोग बारबार मुसीबतें आने पर भी अपने आरम्भ किए गए कार्य को बीच में नहीं छोड़ते अपितु पूरा करके ही चैन लेते हैं।
             इस वर्गीकरण के अनुसार तृतीय श्रेणी के लोगों को हम कायर कह सकते हैं। वे जीवन में आगे बढ़ना तो चाहते हैं पर कोई कार्य करना नहीं चाहते। अब बैठे बिठाए तो कुछ भी नहीं मिलता, कष्ट तो उठाना पड़ता है। वे कठिनाइयों के आने के भय से किसी कार्य को हाथ ही नहीं लगाते। यह उनका स्वभाव बन जाता है। वे यह भी नहीं सोचते कि थाली में पड़ा हुआ रोटी का निवाला खुद मुँह में नहीं जाता बल्कि उसे तोड़कर मुँह में डाला जाता है। तभी भोजन का आनन्द लिया जा सकता है और उससे पेट भी भरता है।
            मध्यम श्रेणी के लोग जीवन में सबकुछ पाना चाहते हैं। उसके लिए योजना बनाते हैं और फिर क्रियान्वित भी करते हैं। अब यह तो सभ्भव नहीं कि कोई कार्य निर्विरोध या निर्विघ्न सम्पन्न हो जाए। बाधाएँ तो कदम-कदम पर रास्ता रोक कर खड़ी रहती हैं। हमें उन रास्ते की रुकावटों को दूर करके आगे लक्ष्य की ओर बढ़ना होता है। परन्तु इस श्रेणी के लोग जहाँ तक सब बाधारहित है, वहॉं तक सब भला। परन्तु जहाँ सामने परेशानी आई वहीं पल्ला झाड़ लेते हैं। स्वयं को उससे परे कर लेते हैं। ऐसे ये हमेशा ही अपनी मूर्खताओं से जीवन की रेस में पिछड़ जाते हैं।
            उत्तम श्रेणी के लोग वास्तव में महान होते हैं। ये एकबार किसी कार्य को करने का संकल्प कर लेते हैं तो पीछे मुड़कर नहीं देखते। उनके कार्यों में अथवा जीवन में कितने ही ऑंधी-तूफान क्यों न आ जाएँ ये बिना डरे, बिना घबराए अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से कदम बढ़ाते हैं। जब तक उनका मनचाहा कार्य पूर्ण नहीं हो जाता पलभर भी आराम नहीं करते। ऐसे कर्मठ एवं जुझारू ही जीवन के हर क्षेत्र में सफल होते हैं। ये सब पर अपनी छाप छोड़ते हैं। इन्हीं लोगों को समाज में एक महत्त्वपूर्ण स्थान मिलता है। 
            सभी सुधी जनों से प्रार्थना है कि अपने अन्तस में झाँककर देखिए और आत्मविशलेषण कीजिए कि आप किस श्रेणी में आ रहे हैं? यदि प्रथम श्रेणी में आने की कामना करते हैं तो अभी से कृतसंकल्प होकर जुट जाइए। अपने मन में आने वाले सभी डरों को शीघ्र ही झटककर प्रभु का स्मरण करते हुए तत्क्षण आगे बढ़िए। सफलता आपके कदम चूमने के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रही है। ईश्वर आपको मनोवॉंछित फल अवश्य ही प्रदान देगा।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 5 अगस्त 2025

स्वार्थों की पूर्ति करना

स्वार्थों की पूर्ति करना

हम मनुष्य अपने स्वार्थों की पूर्ति करने में इतना अधिक डूब जाते हैं कि दीन और दुनिया को ही भूल जाते हैं। दिन और रात के चौबीस घण्टे हमारे लिए कम पड़ने लगते हैं। उस समय हम यह सोचने लगते हैं कि काश समय को भी रबर की तरह खींचकर बड़ा कर सकते। परन्तु अफसोस इस बात का है कि न तो हम समय के साथ छेड़- छाड़ कर सकते हैं और न ही दिन के घण्टे बढ़ा सकते हैं। चौबीसों घण्टे कोल्हू के बैल की तरह हम जुटे रहते हैं। बहुत दुख का विषय है कि हमारे ये स्वार्थ फिर भी समाप्त होने का नाम नहीं लेते। 
              आज हम मैं और मेरा परिवार यानी हम पति-पत्नी और हमारे बच्चे तक सीमित होते जा रहे हैं। इस परिवार में माता-पिता का स्थान भी लुप्त होता जा रहा है। जितना अधिक हमारा दृष्टिकोण संकुचित होता जा रहा है, उतना ही स्वार्थ हम पर हावी होता जा रहा है। अपने धन-वैभव का प्रदर्शन तो हम बहुत करते हैं। अपने परिवारी जनों अथवा बन्धु-बान्धवों की तो छोड़ो, हम अपने भाई-बहन तक को उसकी हवा नहीं लगने देते। माता-पिता जिनका ऋण हम आयुपर्यन्त सेवा करके भी नहीं चुका सकते, उनसे कुछ भी साझा नहीं करना चाहते।
              ईश्वर हमें बिन माँगे बहुत कुछ देता है। वह हमसे कोई अपेक्षा नहीं रखता। उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा दायित्व बनता है। उसका धन्यवाद करना हम अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। ईश्वर प्रदत्त नेमतों पर हम अपना पूर्ण अधिकार जमाना जानते हैं। जिन वस्तुओं पर दूसरों का हक है, वह भी हम छीन लेना चाहते हैं। जिनके प्रति हमें अपने सभी दायित्व निभाने चाहिए, हम स्वार्थवश उन लोगों से किनारा करते जा रहे हैं। यह वास्तव में बहुत दुखद स्थिति है।
              हम यह भूल जाते हैं कि जो अमानत ईश्वर ने हमें सौंपी है, वह केवल हमारे लिए नहीं है बल्कि घर-परिवार, भाई-बन्धुओं, समाज व देश का भी उसमें अंश है। जब हम अमानत में खयानत करते हैं तो भूल जाते हैं कि जो हम कर रहे हैं वह एक अपराध है। भौतिक जगत में अमानत में खयानत करने वाले को कभी माफी नहीं मिलती बल्कि उसे सजा मिलती है। तो फिर उस मालिक से हम कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह हमें इस अपराध के लिए क्षमा कर देगा। अपने कर्म का फल हमें भोगना पड़ता है।
            मनीषी कहते हैं और हम सुनते हैं -  'ईश्वर की लाठी में आवाज नहीं होती। जब पड़ती है तो अच्छे-अच्छों की नानी याद दिला देती है।'
           पता भी नहीं चल पाता और बहुत ही कठोर दण्ड हमें मिल जाता है। फिर उस समय हम बहुत दुखी होते हैं और सारी दुनिया में अपने कष्टों को गाते फिरते हैं। सुख में चाहे किसी को पूछा हो या न पूछा हो पर दुख में बेगानों को अपना बनाना चाहते हैं। ईश्वर को उलाहना देते हैं और कोसते हैं। उस पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं। वह तो परम न्यायकारी है, वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। फिर भी हम अपने को बचाने के लिए उसे कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकते। परन्तु फिर भी न तो अपने गिरहबान में झाँककर देखते हैं और न ही हम कभी आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता समझते हैं।
             हमारी स्वार्थी प्रवृत्ति हमें कहीं का भी नहीं छोड़ती। इन स्वार्थों को पूरा करते हुए बहुधा लोग गलत रास्ते पर चलने लगते हैं। कुमार्गगामी होकर वे देश व समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने लगते हैं। यह स्वार्थ जब हमारे सिर पर चढ़कर बोलने लगता है तब पारिवारिक विघटन तक की स्थिति बन जाती है। उसका परिणाम घर-परिवार के सदस्य तो भोगते ही हैं, मनुष्य स्वयं भी भोगते हैं परन्तु वे बच्चे इस सबसे बहुत अधिक प्रभावित होते हैं जिनका कोई दोष नहीं होता।
              हमें सदा ही उस प्रभु का धन्यवाद करना चाहिए जिसने हमें अपार खजाने दिए हैं। हमें जीवन जीने के लिए ईश्वर ने हमारी सुख-सुविधा के सभी साधन उपलब्ध करवाए हैं। यदि वह भी हमारी ही तरह स्वार्थी हो जाए तो कल्पना कीजिए हमारी कैसी दुर्दशा होगी? हम हर वस्तु के लिए तरस जाऍंगे। ईश्वर तथा प्रकृति की भाँति हम मनुष्यों को भी उदारहृदय बनना चाहिए। जीवन में अपने सभी बन्धु-बान्धवों के साथ मिलकर आनन्द का उपभोग करना चाहिए, अकेले नहीं।
             इस स्वार्थ वृत्ति से किसी भी मनुष्य का भला नहीं होता। इसलिए जब स्वार्थी प्रवृत्ति से ऊपर उठकर जब हम मनुष्य परमार्थ के विषय में सोचने लगेंगे तब बहुत-सी समस्याएँ स्वतः ही हल हो जाएँगी। दिग्दिशाओं में हमारा यश फैलेगा सो अलग। इसलिए मित्रो, स्वार्थपरता रूपी घाटे का सौदा करना छोड़ दीजिए। अच्छा यही होगा कि हमें उदारहृदय बनकर सभी के दिलों पर राज करने के विषय में सोचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 4 अगस्त 2025

जैसा राजा वैसी प्रजा

जैसा राजा वैसी प्रजा 

हम सब अक्सर सुनते हैं-  
            यथा राजा तथा प्रजा
अर्थात् इस उक्ति का अर्थ है कि प्रजा वैसी ही बन जाती है जैसा उस देश का राजा होता है। सत्ता पर आसीन राजा के चाल-चलन अथवा चरित्र का प्रभाव प्रजा पर अवश्य पड़ता है।
          आजकल शासनकर्त्ता राजा तो रहे नहीं हैं परन्तु सत्ता जिसके अधिकार में है या जो देश पर शासन कर रहा है, उसे हम यहाँ राजा कहकर सम्बोधित कर लेते हैं।
             राजा यदि सदाचारी होता है तो प्रजा में भी सदाचार बढ़ता है। राजा के अनुसार ही प्रजा में नैतिकता, ईमानदारी, सच्चाई, दूसरों की परवाह करना आदि गुण देखादेखी स्वयमेव आ जाते है। जिस देश का राजा देशहित को सर्वोपरि रखता है, उस देश की प्रजा देशभक्त होती है। वहॉं के लोग अपने देश के साथ कभी गद्दारी करने के विषय में सोच ही नहीं सकते।
             इसके विपरीत जिस देश में राजा सदा लूट-खसोट करता है और प्रजा के हक पर डाका डालता है, वहाँ अराजकता फैल जाती है। प्रजाजन भी लूटमार करते हैं और दूसरों का हक छीनते हैं। उस देश में भ्रष्टाचार, चोरबाजारी, कालाबाजारी, रिश्वतखोरी आदि बुराइयाँ मुँह बाये खड़ी रहती हैं। शासनतन्त्र अपना बीभत्स रूप उदाहरण के तौर पर सबके समक्ष रखता है तब उस देश का ईश्वर ही मालिक होता है।
            न्यायपालिका, पुलिस व प्रशासन से सभी लोगों का विश्वास तब उठने लगता है। जब प्रजा यह देखती हैं कि सत्ताधारी व्यक्तियों को आम आदमी जैसे समान अपराध के लिए या तो सजा मिलती ही नहीं या मिलती है तो जनसाधारण की आँखों में धूल झौंकने के लिए होती है। वहॉं न्याय व्यवस्था चरमराने लगती है। जन साधारण का विश्वास न्याय पालिका से उठने लगता है। स्थिति यहॉं तक पहुॅंच जाती है कि लोग स्वयं ही दोषी को दण्ड देने का कार्य करने लगते हैं।
             जिस देश में इस प्रकार अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है, वह भीतरघात का शिकार बनता है। जब तक देश के शासक व प्रजा सच्चरित्र नहीं होंगें, अपने देश, वेष व संस्कृति के लिए उनमें मर-मिटने का जज्बा नहीं होगा तो वे चन्द टुकड़ों के लालच में देश के रहस्य विदेशियों को बेचने में जरा भी हिचकिचाएँगे नहीं। इस प्रकार विदेशी उस देश की सभी अच्छाइयों, बुराइयों और सैन्य बल आदि सभी जानकारियाँ जुटा लेंगे।
              ऐसे अशान्त व अराजक देश को शीघ्र ही अपने अधिकार में कर लेना किसी भी अन्य देश के लिए कठिन नहीं होता। वह बिना अधिक कठिनाई के अपनी मनमानी करने में सफल हो जाता है। उस अराजक देश को गुलाम बना लेता है।
             एक रामराज्य था जिसकी कल्पना हम आज भी करते हैं। उस राज्य में आपसी सौहार्द था, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान किया जाता था। राजा अपनी प्रजा पर पुत्रवत स्नेह रखता था। उसका सुख-दुख राजा का होता था। इसी प्रकार प्रजा भी अपने राजा पर न्योछावर हो जाती थी। दोनों का सामंजस्य देखकर कोई दूसरा राजा उनकी ओर नजर उठाकर भी नहीं देख सकता था।
            दूसरी ओर महाभारत काल था जहाँ भाई ही भाई का शत्रु बन गया था। सभी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। उस समय सारी मान्यताओं को ताक पर रख दिया गया था। चारों ओर स्वार्थ हावी हो गया था। इसके  परिणाम स्वरूप ही तब महाभारत का युद्ध हुआ जिसका फल हम आजतक भुगत रहे हैं। उसके बाद आने वाले शासक भी स्वार्थी, पदलोलुप व प्रजा के स्थान पर अपने हितों को सर्वोपरि रखने लगे। इसी कारण ही पहले मुगलों का शासन व अत्याचार देश पर हुआ और फिर अंग्रेजों का। इनसे मुक्ति के लिए न जाने कितने ही युवकों ने अपने बलिदान दिए। तब जाकर कहीं देश स्वतन्त्र हो सका।
           राजा और प्रजा में आपसी सामंजस्य का होना बहुत आवश्यक होता है। प्रजा के बिना राजा का कोई अस्तित्व नहीं होता और राजा के बिना प्रजा का। यह बात राजसत्ता को अच्छी तरह से आत्मसात कर लेनी चाहिए। यथासम्भव प्रजा के हितों की रक्षा राजा को करनी चाहिए तभी देश उन्नति के सोपानों पर चढ़ सकता है। राजा और प्रजा के सम्मिलित प्रयास से देश विश्व में अग्रणी बन सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 3 अगस्त 2025

अपने कर्त्तव्यों से जी चुराना

अपने कर्त्तव्यों से जी चुराना 

अपने कर्त्तव्यों से कभी जी नहीं चुराना चाहिए। जो व्यक्ति अपने दायित्वों से जी चुराता है, वह कभी भी सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता। अपनी हानि तो वह करता ही है, साथ ही अपने लोगों को भी नुकसान पहुँचाता है। मनुष्य को अपने घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने का भरसक यत्न करना चाहिए। परन्तु यदि वह इसमें चूक जाता है तो उसकी पत्नी, उसके माता-पिता और उसके अपने बच्चे उसे लानत-मलानत करते हैं। ऐसी स्थिति में परिवार तक बिखर जाता है।
          अब देखिए एक व्यक्ति बीमार पड़ा है और उसे तुरन्त डाक्टर के पास ले जाने की आवश्यकता है। यदि मनुष्य आजकल करके समय बर्बाद करेगा तो हो सकता है रोगी का रोग इतना बढ़ जाए कि उसे प्राणों से ही हाथ धोने पड़ जाएँ। उसके पश्चात तो बस प्रायश्चित करना ही शेष बचता है। सारी आयु उसके मन में कसक रह जाती है कि यदि उचित समय पर इलाज करवा लिया जाता तो वह प्रियजन शायद उन्हें छोड़कर न जाता।
          अपने कार्यक्षेत्र में काम में कोताही करने से अपने बॉस या मालिक से डाँट-फटकार सुनने को मिलती है। यदि बारबार चेतावनी मिलने पर भी यदि मनुष्य अपनी आदत में सुधार नहीं करता तो नौकरी से हाथ भी धोना पड़ सकता है। उस समय मनुष्य पैसे-पैसे का मोहताज हो जाता है। घर-परिवार में हर स्थान पर उसे तिरस्कृत होना पड़ता है। पर अब तीर हाथ से निकल चुका होता है। नयी नौकरी मिलने में पता नहीं कितना समय लग जाए। तब तक क्या स्थिति होगी? इसकी कल्पना हम सब कर सकते हैं।
           अपने व्यापार में मनुष्य को अपनी सुस्ती के कारण हानि उठानी पड़ सकती है। हद तो तब हो जाती है जब उसकी योजनाओं का लाभ कोई और उठा लेता है। तब हाथ मलने के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं बचता। इसका यह अर्थ हुआ कि जब तक मनुष्य अपने काम को सच्चाई व ईमानदारी से न करे तो उसे सफलता नहीं मिलती। वह जीवन की रेस में पिछड़ जाता है। 
             हम अपने आसपास देखते हैं कि कुछ लोगो को अपने धन-वैभव का, किसी को अपनी सुन्दरता का, किसी को अपनी योग्यता आदि का घमण्ड होता है। वे अपने सामने दूसरे लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं। अपने दम्भ के कारण सबसे अलग दिखना चाहते हैं। इसलिए किसी के साथ मिलना या काम करने में अपना अपमान समझते हैं। ऐसे लोगों को आम जन जब नजरअंदाज करते हैं तो उन्हें बहुत कष्ट होता है। सीधा-सा अर्थ है कि यदि समाज में किसी के काम न आ सकें तो यह मानव जीवन व्यर्थ है।
            अपने घर-परिवार की ओर नजर डालिए। कितनी भी सुन्दर व पढ़ी लिखी गुणी बहु-बेटी हो पर यदि काम न करे तो वह बड़े-बजुर्गों की नजर से उतर जाती है। इस संसार में उसी की इज्जत होती है जो सबके साथ मिल-जुलकर रहे व घर-बाहर के कार्यों को सुघड़ता से पूरे करे। इसीलिए हमारे बड़े-बुजुर्ग कहा करते है- 
              काम प्यारा होता है चाम नहीं।
                        और 
       इस देह को चील कौवे ने भी नहीं खाना।
अर्थात् हर व्यक्ति को काम अच्छा लगता है, सुन्दर शरीर नहीं भाता। इस शरीर को चील और कौवों ने भी नहीं खाना। इस कथन का अर्थ है कि हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार मृत्यु के अन्तर यह शरीर अग्नि के हवाले कर दिया जाता है।        
           एवंविध घर-परिवार में जो लड़का अपने  समय पर पढ़ाई न करके मस्ती करता है, वह रदौड़ में पिछड़ जाता है। फिर समय आने पर वह ठीक से काम-धन्धा नहीं करता और उनकी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता, वह किसी का भी प्रिय नहीं होता। गाहे-बगाहे चलते-फिरते उसे सबकी छींटाकशी का शिकार बनना पड़ता है। समाज में उसी को सम्मान मिलता है जो अपनी मेहनत के बल पर अपना एक स्थान बनाता है। दूसरों को अपनी योग्यता के बल पर पछाड़ कर कहीं ऊँचाइयों को छूने का साहस करता है। कामचोर कहीं भी रहे सफल व्यक्ति नही बन सकता।
            दुनिया का दस्तूर है कि वह चढ़ती कला को प्रणाम करते हैं। प्रातःकालीन उदय होते सूर्य को सभी प्रणाम करते हैं, उसे अर्घ्य देते हैं और उसकी पूजा करते हैं। वहीं पर अस्त होते सूर्य को कोई पूछता ही नहीं है। मनुष्य उदय का चाहने वाला है अस्त का नहीं। सफल व्यक्ति के आस-पास लोग इस प्रकार मंडराते हैं जिस प्रकार गुड़ के ऊपर मक्खियाँ। असफल व्यक्ति के साथ एक कदम भी चलने के लिए कोई तैयार नहीं होता।
            अपने जीवन से कामचोरी की आदत को शीघ्रातिशीघ्र छोड़कर यत्नशील बनना चाहिए। परिश्रम करने वाले की कभी हार नहीं होती। स्वयं को इस समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए हमें अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए आगे बढ़ते रहना है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 2 अगस्त 2025

परमात्मा से एकाकार

परमात्मा से एकाकार 

सन्त कबीरदास जी का एक दोहा मुझे स्मरण हो  रहा है -
     जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहि।
     अन्धियारा मिट गया दीपक रेखा माहि॥
अर्थात् जब तक मनुष्य में अहंकार रहता है तब तक उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। जब उसके अहंकार का नाश हो जाता है तब ईश्वर का प्रकाश मनुष्य के हृदय में प्रकाशित होने लगता है। 
             इस दोहे को पढ़कर मन भाव विभोर हो उठा है। मन यह सोचने के लिए विवश हो जाता है कि मेरी ऐसी स्थिति कब आएगी? जब उस मैं परमात्मा के साथ एकाकार हो पाऊँ। मुझमें और उसमें किसी प्रकार का कोई भेद न रहे। हम दो नहीं एक हो जाएँ। 
            किसी अन्धेरे कक्ष में जब एक छोटा-सा दीपक हम जलाते हैं तो तब उस अन्धियारे का नामोनिशान तक मिट जाता है। फिर वह अन्धकार प्रकाश का रूप होकर उजाला करने लगता है। हम उस समय समझ ही नहीं पाते कि कभी वहाँ उस कक्ष में अन्धेरा था।
              इसी प्रकार प्रभु की निष्काम उपासना करते-करते जब उससे लौ लग जाती है तब हम उसी का रूप हो जाने के लिए व्याकुल  हो जाते हैं। दिन-रात उसी के विषय में ही सोचते रहते हैं। हमारे सम्पूर्ण क्रियाकलाप उसी के निमित्त होने लगते हैं। हमारा अपना स्वयं का कुछ नहीं रहता। उस समय हम कबीरदास जी के शब्दों में कह उठते हैं-
        मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सब तोर। 
        तेरा  तुझको  सौंपते, क्या  लागत है मोर॥
अर्थात् मेरे पास अपना कुछ भी नहीं है। मेरा यश, मेरी धन-सम्पत्ति, मेरी शारीरिक-मानसिक शक्ति, सब कुछ तुम्हारा ही है। जब मेरा कुछ भी नहीं है तो उसके प्रति ममता कैसी? तेरी दी हुई वस्तुओं को तुम्हें समर्पित करते हुए मेरी क्या बिगड़ता है? इसमें मेरा अपना लगता ही क्या है?
           जब हम इस दुनिया में मोहमाया के बन्धन में फॅंसे हुए चौरासी लाख योनियों में ही भटकते रहते हैं तब ईश्वर की दी हुई सारी नेमते मात्र केवल हमारी होती हैं। उनसे जुदाई के बारे में हम सोच भी नहीं सकते। यदि उनसे विमुख होना पड़े तो हमारे लिए बहुत कठिनाई हो जाती है। अपनी कमियों एवं हानियों का ठीकरा उस प्रभु के सिर पर फोड़ते हैं। इतने पर भी मन नहीं भरता तो उस समय हम रोते हैं व चीखते-चिल्लाते हैं। सबके साथ ईश्वर को भी बुरा-भला कहते हैं और पानी पी-पीकर उसको कोसते हैं। 
           जब हमारे जीवन में कठिन समय आता है तब हम अपना आपा खो देते हैं। हम बहुत स्वार्थी हो जाते हैं। हम बस यही चाहते हैं कि सारी दुनिया को छोड़कर ईश्वर सिर्फ और सिर्फ हमारी सुने। वह हमारे सभी दुखों और कष्टों को दूर करे। उस असहाय अवस्था में हम उसकी पूजा-अर्चना करने लगते हैं। हमारा उद्देश्य तब केवल अपना वर्तमान सुधारना होता है। यदि हम हर स्थिति में प्रभु का स्मरण करें तो हमें आत्मिक बल मिलता है। हमारे कष्ट दूर तो नहीं होते परन्तु उन्हें सहन करने की शक्ति मिलती है।
            इसके विपरीत जब सुख-समृद्धि का समय आता है तब हम अहंकारी होने लगते हैं। यह भी हम भूल जाते हैं कि उस पिता ने हमें इस संसार में भेजा है। वह चाहता है कि हम जन्म-मरण के इस कष्टप्रद चक्र से मुक्त होकर अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष तक पहुँचने में सफल हो जाएँ। सत्य यही है कि सुख का समय आने पर हम हर सफलता का श्रेय ईश्वर को न देकर स्वयं को देते हैं। शायद उस समय हम अपने आप को मालिक से भी अधिक बुद्धिमान और सर्वगुण सम्पन्न समझने लगते है।
           हमारा अहं हमें उस प्रभु से दूर कर देता है। जब तक हम अपने घमण्ड में रहते हैं तब किसी को कुछ नहीं समझते। ईश्वर तक की हस्ती को मानने से इन्कार कर देते हैं। रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि न जाने कितने ही अहंकारियों के उदाहरणों से इतिहास भरा हुआ है। इस बात को अपने मन में अच्छे से आत्मसात कर लेना चाहिए कि घमण्डी का सिर हमेशा नीचा होता है। उसका अन्त बिल्कुल अच्छा नहीं होता।
            इसीलिए जब हम अपने अहं में डूब जाते हैं तो वह प्रभु हमसे दूर हो जाता है। अपने परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों के होते हुए भी हम इस दुनिया में निपट अकेले रह जाते हैं। परन्तु जब संसार की असारता को जानकर उस मालिक से हम अपनी लौ लगा लेते हैं तब उसे पाने की तड़प हमें उसके करीब ले जाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ईश्वर के साथ एकाकार होने के लिए अहं का त्याग करना पड़ता है व सच्चे भाव से उसकी शरण में जाना होता है। 
              हमारा अहं उससे अनावश्यक ही दूरी बना लेता है। अहं का त्याग करते ही हम उसके हो जाते हैं और वह हमारा हो जाता है। उपर्युक्त दोहे में यही कहा गया है कि जब मैं(अहं) था तब ईश्वर मेरे पास नहीं था, वह मुझसे बहुत दूर था। जब मैंने अपने अहं को तिलांजलि दे दी तो वह हरि मेरे पास है। तब हमारे मन का सारा अन्धकार दूर हो जाता है, हम भी परमात्मा की तरह प्रकाशमय हो जाते हैं। उस स्थिति में तेरे और मेरे का भेद सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

बलिवैश्वदेव यज्ञ

बलिवैश्वदेव यज्ञ

 बलिवैश्वदेव यज्ञ पञ्च महाभूतों में पाँचवाँ  व अन्तिम यज्ञ है। इस यज्ञ के नाम में बलि शब्द आया है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि किसी जीव की बलि देना या हत्या करना है। शास्त्रों ने ईश्वर व अन्य देवताओं को कृतज्ञता ज्ञापन करने के लिए हमें पहले दो यज्ञों में समझाया है। तीसरे महायज्ञ में शास्त्रों ने हमें अपने जन्मदाता माता-पिता के प्रति कर्त्तव्यों को निभाने का आदेश दिया है। फिर चौथे महायज्ञ यानी भूतयज्ञ में अतिथि सत्कार जैसे सामाजिक दायित्व के निर्वहण के प्रति हमें सजग किया है।
              अब इस अन्तिम यज्ञ में अन्य जीवों के पोषण हेतु सजग किया गया है जिनके विषय में हमारे ध्यान में कभी आता ही नहीं। शास्त्र कहते हैं कि घर में जो भी भोजन बने उसमें से नमकीन, तीखा व क्षार अन्न को छोड़कर, शेष अन्न में घी व मिष्टान्न मिला लें। फिर भोजन बनाते समय चूल्हे से अग्नि लेकर उपरोक्त मिश्रण की आहुतियाँ मनुस्मृति के अनुसार निम्न मन्त्रों से दीजिए-
      ऊँ अग्नये स्वाहा। सोमाय स्वाहा।अग्नीसोमाभ्यां स्वाहा। विश्वेभ्यो देवेभ्य: स्वाहा। धन्वन्तरये स्वाहा। कुह्वै स्वाहा। अनुमत्यै स्वाहा। प्रजापत्ये स्वाहा। सह द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा। स्विष्टकृते स्वाहा।
इस विधि से आहुति देने के साथ लवण(नमक) वाले अन्न के पन्द्रह भाग करें। इनमें एक भाग कुत्ते का, दूसरा पापी का, तीसरा चाण्डाल का, चौथा भाग रोगी का, पाँचवाँ भाग कौवे का, छटा भाग कृमि(कीड़े) का भाग रखकर कुत्ते आदि को दें। उन भागों को किसी अतिथि को भी दे सकते हैं जो वहाँ उपस्थित हो अन्यथा उन्हें अग्नि को समर्पित कर देना चाहिए।
           यद्यपि आज घरों में चूल्हा नहीं जलता अतः चूल्हे से अग्नि लेकर आहुति देना कठिन है। फिर आज के इस युग की आपाधापी वाले जीवन में समयाभाव में सम्पूर्ण प्रक्रिया करना नामुकिन नहीं कठिन अवश्य है। ऐसी स्थिति में उन जीवों को हम उनका अंश दे सकते हैं। जैसे गाय को, कुत्ते को, कौवे को, चिड़ियों को, कबूतरों को, चींटियों आदि को उनका भोज्य दे सकते हैं।
             इस प्रकार आहुति देने से घर की वायु शुद्ध होती है। जो अदृश्य जीवों की हत्या होती है, उसका प्रत्युपकार होता है। इतनी सुन्दर परिकल्पना हमारी ही भारतीय संस्कृति में मिलती है जहाँ पर कृमि-कीटों तक को उनका अंश देने का आदेश हमें शास्त्र देते हैं।
             इसका सीधा व सरल अर्थ यही है कि हम स्वार्थी न बनें अपितु हर जीव-जन्तु को उसका यथोचित अंश प्रदान करें। यह भी दान का ही एक रूप है। संसार के सभी जीवों को भोजन का अधिकार है। हम उन्हें नहीं खिलाते बल्कि हम मात्र माध्यम हैं। ईश्वर ने हमें इतना समर्थ बनाया है कि हम सृष्टि के अन्य जीवों के लिए कुछ कर सकते हैं। ऐसी भावना मन में रखने से अहं नहीं जागता अपितु कर्त्तव्यबोध होता है।
             हम में से बहुत लोग ऐसे हैं जो खाना बनाते समय पहले एक रोटी ऐसी बनाते हैं जिसे गाय या कुत्ते को खाने के लिए डाल देते हैं। इसी प्रकार लोग चींटियों, चिड़ियों, कबूतरों, मछलियों आदि को भी उनका भोज्य खिलाते हैं। इस प्रकार प्रकृति में सामंजस्य बना रहता है। हमारी कमाई का कुछ अंश परोपकार के सद्कार्यों में खर्च होता है और हमारा लोक व परलोक सुधरता है।
            एवंविध सभी जीवों को उनका भोज्य मिलता रहता है तो प्राणिमात्र का भला होता है। वे सुखपूर्वक रह सकते हैं। हमें भी यह सन्तोष होता है कि हम अपने दायित्वों का निर्वहण भली भाँति कर रहे हैं। इससे बड़ा कोई और सुख मनुष्य के लिए नहीं हो सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

अतिथियज्ञ

अतिथियज्ञ

अतिथियज्ञ अथवा भूतयज्ञ हमारे पंच महायज्ञों में महत्त्वपूर्ण है। हमारी संस्कृति में 'अतिथिदेवो भव' की परिकल्पना है। इसका अर्थ है अतिथि यानी घर पर आए हुए मेहमान को भगवान के समान मानो। ऐसा समझाकर हमें अतिथि का सम्मान करना सीखाने वाली हमारी भारतीय सांकृतिक परम्परा ही हो सकती है, अन्य कोई और नहीं।
          हमारे ग्रन्थों के अनुसार अतिथि साधु, सन्तों या विद्वानों को कहते थे। ये वे लोग होते थे जो दुनियादारी से दूर रहकार समाज का दिशा-निर्देश करते थे। ऐसे ज्ञानी जन कभी भी किसी भी गाँव या प्रदेश में चले जाते थे। जहाँ शाम या रात हो गयी वहीं डेरा डाल लेते थे। जन-साधारण को ज्ञानोपदेश देकर एक-दो दिन रुककर आगे पड़ाव के लिए निकल जाते थे। ऐसे विद्वान समाज की अमानत होते थे। इसलिए इनका आदर-सत्कार करना प्रत्येक सद् गृहस्थ का कर्तव्य होता था।
                ये विद्वत जन मोह-माया से परे किसी स्थान पर अधिक समय नहीं ठहरते थे। इन लोगों के आने का कोई निश्चित समय नहीं होता था इसलिए अ + तिथि यानी बिना तिथि आने वाले कहलाते थे। बिना कोई नखरा किए जो मिल जाता था, खा लिया करते थे। फिर अगले पड़ाव के लिए प्रस्थान किया करते थे।
            वास्तव में ये अतिथि समाज की धरोहर होते थे जिनके भरण-पोषण करने का दायित्व समाज पर होता था। इन्हें बोझ नहीं माना जाता था बल्कि समाज उन्हें सिर आँखों पर बिठाता था। ये अतिथि समाज का मार्ग दर्शन करके उनकी आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते थे।
            आजकल अन्यों की तरह अतिथि के मायने भी बदल गए हैं। अतिथि तो अब भी हमारे घरों में आते हैं पर बिना बताए नहीं आते। आज इस भौतिक युग में चारों ओर मारामारी हो रही है, आपाधापी मची हुई है। किसी को किसी से मिलने का समय ही नहीं है। सच्ची बात तो यह है कि कोई किसी से मिलना ही नहीं चाहता। सभी अपने को तीसमारखाँ समझते हैं। अगर मजबूरी में मिलना भी पड़े तो भारी लगता है। आज सभी समय न होने की मजबूरी का रोना रोते रहते हैं।
              वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है केवल हममें इच्छा शक्ति की कमी है। अपनी मर्जी से हम मोबाइल में, टी वी देखने में घण्टों बरबाद कर देते हैं। फिर भी मेहमानों का आना जाना तो लगा ही रहता है। मेहमान भी अब समझदार हो गए हैं तथा दूसरे की मजबूरी समझते हैं। अत: बिना पूर्व सूचना के नहीं आते। जो लोग हमें पसन्द होते हैं, उनका स्वागत हम गर्मजोशी से करते हैं और जो लोग नापसन्द होते हैं, उनके आने पर हम अनमने से हो जाते हैं। उनका सत्कार तो हम करते हैं पर भार समझ कर करते हैं।
           आज के युग में किसी के घर में कुछ दिन रहने की बात बड़ी विचित्र-सी प्रतीत  होती है। परन्तु कुछेक स्थितियों में रहने के लिए भी आना होता है। जब किसी के घर पर रहने की आवश्यकता हो तो अतिथि धर्म का निर्वहण करना चाहिए। यही कहना  है कि मेहमान को दूसरे के घर में मेहमान न बनकर घर के सदस्य की भाँति व्यवहार करना चाहिए। ऐसा करने पर वह बोझ नहीं बनता बल्कि सबका प्रिय बन जाता है। जब वह पुनः कभी उस घर में जाता है तो खुले दिल से उसका स्वागत किया जाता है।
           इसके विपरीत जो मनुष्य अपनी अकड़ में रहकर दूसरे के घर की व्यवस्था के अनुरूप ढलना नहीं चाहता, वह अतिथि अपने मेजबान की आँखों में खटकता है। उससे कोई भी प्रसन्न नहीं होता और सभी यही मनाते हैं कि वह शीघ्र ही चलता बने। मेजबान यही मनाते हैं कि दुबारा वह उनके घर पर न ही आए तो अच्छा रहेगा।
           मित्रों अथवा सम्बन्धियों के घर पर जाते समय स्वयं को सन्तुलित रखना चाहिए। बच्चों को अनुशासन में रहना चाहिए तभी सम्मान मिलता है। बच्चों की उद्दण्डता के कारण भी कई बार अतिथि व आतिथेय में मनमुटाव हो जाता है। इस प्रकार की अप्रिय स्थिति से यथासम्भव बचना चाहिए। समय व परिस्थितियों के चलते अतिथि को भगवान की तरह मानने की परम्परा वाले हमारे देश में यद्यपि कई स्वाभाविक बदलाव आए हैं पर आज भी अतिथि का स्वागत-सत्कार अपनी सामर्थ्य से बढ़कर किया जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
एक और जहां मेजवान का नैतिक दायित्व है कि वह अतिथि का यथोचित मान सम्मान करे वही अतिथि के लिए भी कहा गया है कि -
" देखत ही हरख नहीं, नैनन नहीं स्नेह।
तां घर कभी ना जाइये,चाहे कंचन बरसे मेह।।"