मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

सबका सहयोग अपेक्षित।

सबका सहयोग अपेक्षित

मनुष्य को अपना जीवन बाधारहित चलाने के लिए सबका सहयोग अपेक्षित होता है। घर-परिवार में शान्ति बनी रहनी चाहिए यह आवश्यक है। हर मनुष्य हर काम नहीं कर सकता। यदि वह अपनी अकड़ में रहेगा तो बहुत बड़ी समस्या का सामना उसे करना पड़ता है। इसलिए किसी मनुष्य को छोटा या बड़ा समझने की भूल उसे नहीं करनी चाहिए। और न ही किसी कार्य को छोटा समझकर मुॅंह बनाना चाहिए। छोटे-बड़े सभी कार्यों को करने के लिए उसे बहुत से दूसरे लोगों की आवश्यकता होती है।
            प्राय: घर में काम करने वालों में आया और कामवाली बाई की प्रत्यक्ष रूप से भूमिका होती है। घर की सफाई, बर्तनों की धुलाई, कपड़ों की धुलाई, घर की झाड़-पौंछ इत्यादि वहीं करती हैं। यदि घर में एक दिन भी ये कार्य न हों तो बस तूफान आ जाता है। ऐसा लगता है कि सारा घर अस्त-व्यस्त हो गया है। घर में हर ओर गन्दगी का साम्राज्य दिखाई देने लगता है। फिर न खाना खाने का मजा आता है और न घर में बैठने में चैन आता है। मन जो है वह अलग से परेशान होने लगता है। 
           ऐसे समय में बच्चों की मौज हो जाती है क्योंकि प्रायः बाजार से खाना मंगवाकर खा लिया जाता है। अब कामवाली जब घरेलू कार्य करती है तो स्वयं के काम करने की आदत छूट जाती है। हम उन पर पूर्णतया आश्रित हो जाते हैं। जब सारे कार्य स्वयं करने पड़ते हैं तो बुखार चढ़ने लगता है। सारा समय चिड़चिड़ाहट का माहौल बन जाता है। ऐसा लगता है मानो घर का सुख चैन ही छिन गया है। यदि घर से बाहर कहीं जाना हो तो सब कैंसिल कर दिया जाता है।
           घर से यदि सफाई कर्मचारी चार दिन तक कचरा लेने न आए तो रसोईघर में और घर में बदबू आने लगती है। यदि किसी लोकेलिटी से कचरा न उठे तो वातावरण में दुर्गन्ध फैल जाती है। बिमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी तरह यदि घर का सीवर बन्द हो जाए तो हम स्वयं उसे खोल नहीं सकते। उसके लिए सफाई कर्मचारी की सहायता लेनी पड़ती है। उसके बिना वह कदापि खुल नहीं सकता। ऐसा ही हाल दफ्तर आदि का भी हाल होता है। 
            अब बात करते हैं उनकी जो गाड़ी स्वयं नहीं चलाते। वे लोग ड्राइवर पर निर्भर रहते हैं। यदि वह कभी छुट्टी माँग ले तो वे भड़क जाते हैं। ऐसा करते समय वे भूल जाते हैं कि उस ड्राइवर का भी अपना घर-परिवार है और उसको भी तो किसी समस्या से दो-चार होना पड़ सकता है।
           धोबी यदि कुछ दिन कपड़ों को प्रेस न करे तो घर में बिना प्रेस के कपड़ों का बहुत बड़ा ढेर लग जाता है। घर से बाहर जाते समय पहनने के लिए कपड़े नहीं मिलते तो कपड़े स्वयं प्रेस करने पड़ जाते हैं। एक-एक जोड़ी कपड़े बड़ी कठिनाई से प्रेस करने पड़ते हैं। समय के अभाव में यह एक झंझट और बढ़ जाता है।
           इसी प्रकार घर में बिजली के कार्य के लिए इलेक्ट्रिशियन, नल या फ्लश आदि के लिए पलम्बर, 
लकड़ी का काम करवाने के लिए कारपेंटर, केबल वाला, माली, नाई आदि के न मिल पाने की स्थिति में भी मनुष्य को अनावश्यक रूप से परेशानी होने लगती है। आजकल इन्टरनेट जिसके बिना एक पल भी नहीं चल पाता उसकी रिपेयर के लिए भी काम करने वाले की आवश्यकता पड़ती है।
          वैसे जब तक सब ठीक-ठाक चलता रहता है तो बढ़िया अन्यथा हम स्वयं को दुनिया का सबसे दुखी इन्सान समझने लगते हैं। जरा-सी भी परेशानी आने पर हम ईश्वर को दोष देने लगते हैं और उसे कोसते रहते हैं।
        अपने गिरेबान में यदि झॉंककर देखें तो हमें स्वयं पर ग्लानि होने लगेगी। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने पास काम करने वाले नौकर, माली, ड्राइवर आदि को नाम से पुकारने में भी अपनी हेठी समझते हैं। उनके बिना एक कदम भी नहीं चल सकते पर पैसे का ऐसा नशा है जो उन सबको एक इन्सान मानने से भी इन्कार करते हैं जैसे उनका कोई वजूद ही नहीं है। सभी कार्य करने वालों को उनका मानदेय (हक का पैसा) ऐसे देते है जैसे उन पर उपकार कर रहे हों। 
           कभी उन सब लोगों को उनके नाम से पुकार कर देखिए, उनकी दुख-परेशानियों में उनसे सहानुभूति जताइए, उनके कन्धे पर हाथ रखकर यह दिखाइए कि वे भी आप ही की तरह इन्सान हैं, वे सब आपके मुरीद हो जाएँगे। आपके कष्ट के समय एक ही इशारे पर भागे चले आएँगे। इसके विपरीत अपना काम निकल जाने पर उनके साथ अभद्र व्यवहार करना अथवा उनका मानदेय काटकर पैसे देने से वे दुबारा आने में आनाकानी करते हैं।
            इसलिए किसी भी व्यक्ति को उसके व्यवसाय को आधार मानकर उससे घृणा करना छोड़ दीजिए। कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे दूसरे लोगों की आवश्यकता पड़ती ही है। इस सत्य को सदा स्मरण करना चाहिए। ईश्वर की बनाई सृष्टि के जीवों से जो व्यक्ति भेदभाव करता है या नफरत करता है उससे वह बहुत नाराज होता है। जब वह सबको समान दृष्टि से देखता है तो किसी को हक नहीं देता कि वह अन्य जीवों से घृणा करें या उनके साथ अन्याय करे। 
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

बच्चा-बूढ़ा एकसमान

बच्चा-बूढ़ा एकसमान 

समय बीतते-बीतते एक आयु के पश्चात मनुष्य बच्चे के समान हो जाता है। तब उसकी देखभाल बच्चे के समान ही करनी पड़ती है। वह भी बारबार बच्चों की तरह रूठने-मानने लगता है। अधिक बोलने लगता है। यदि किसी कारण से उसकी बात को अनसुना कर दिया जाए तो वह बौखला जाता है कभी-कभी अनाप-शनाप भी बोलने लगता है। उसे सबसे शिकायत रहने लगती है। यदि कोई उसे अनदेखा कर दे तो बच्चों की तरह इस बात को वह अपने अहं का प्रश्न बना लेता है।
        इसका कारण है कि सारी आयु वह संघर्ष करता रहता है। उसे अपना व अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए दिन-रात एक करना पड़ता है। अपने बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए वह स्वयं को भूला बैठता है। स्वयं के विषय में सोचने के लिए ऐसी परिस्थितियों में उसके पास समय ही नहीं होता। जीवन की आपाधापी में अथवा भागदौड़ में उसे पता ही नहीं चलता कि वह कब युवा से वृद्ध हो गया? कब उसका उसका रिटायरमेंट का समय आ गया?
          रिटायरमेंट यानी साठ साल की आयु के बाद उसके जीवन में एक खालीपन-सा आने लगता है। सवेरे से रात तक की उसकी व्यस्तता अब नहीं रहती। उसके लिए समय व्यतीत करना भारी पड़ने लगता है। ऐसे समय में कुछ लोग पुनः नौकरी का प्रयास करते हैं और कुछ लोग अपना मन बहलाने के लिए दोस्तों का आसरा ढूँढते हैं, ताश खेलते हैं, सवेरे सैर करने जाते हैं, ग्रुप बनाकर कभी-कभार घूमने चले जाते हैं। परन्तु कुछ लोग अपने घर में ही रहना पसन्द करते हैं।
           व्यापारियों की रिटायरमेंट थोड़ी देर से होती है। जब तक वे स्वस्थ हैं काम करते रहते हैं। क्लब जाते हैं, पार्टियाँ देते रहते हैं और अपनी मीटिंगस में व्यस्त रहते हैं। परन्तु एक समय के पश्चात उनके सामने भी वही समय बीताने की समस्या आने लगती है।
          जो लोग ऐसे समय में जो लोग हाबी अपना लेते हैं, वे इस समस्या से निजात पा लेते हैं। कुछ समय पूजा-पाठ में बिताने से मन को शान्ति मिलती है। कोई सामाजिक कार्य करके समय का सदुपयोग किया जा सकता है। इससे मनुष्य व्यस्त रहता है और उसका खालीपन भी उसे कचोटता नहीं है और समाज का भी भला होता है।
            कुछ और आयु बीतने पर मनुष्य की शक्ति कमतर होने लगती है। फिर वह अशक्त होने लगता है। बिमारियाँ उसे घेरने लगती हैं। उसे स्वस्थ होने में समय अधिक लगता है। डाक्टरों व अस्पतालों के चक्कर लगाते हुए उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है। उस समय उसे अपने बच्चों के सहारे की आवश्यकता होती है। अपनों के प्यार व दुलार की जरूरत होती है।
              ऐसे समय में जब उसकी बातों को बच्चे अनसुना करते हैं तो वह यह सहन नहीं कर पाता। उसे लगता है कि आयुभर जो अनुभव उसने कमाया है, बच्चे उसका लाभ नहीं उठा रहे। वे उसे मूर्ख और स्वयं को अधिक समझदार मान रहे हैं। इसे वह अपना अपमान समझता है। शरीरिक शक्ति क्षीण होने से वह स्वयं अपने कार्यों को पहले की तरह चुस्ती से नहीं कर पाता। इसलिए चिड़चिड़ा होने लगता है। इसी कारण वह अपेक्षाकृतअधिक बोलने लगता है।
             आज बच्चे अपने दायित्वों को निभाने में दिन-रात एक कर रहे हैं। परन्तु उस वृद्ध को लगता है कि वे उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहे। वे उसे बोझ समझ रहे हैं। अत: वह उनसे खफा रहने लगता है, शिकायतें करता है। आयु का यह दौर सबके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है। सेवा करने वाले भी परेशान हो जाते हैं और सेवा करवाने वाले भी। नकारेपन के अहसास के कारण सेवा करवाना बहुत मुश्किल होता है।
              इन आयुप्राप्त लोगों को बस अपनों के प्यार-दुलार, सहारे और विश्वास की ही आवश्यकता होती है। यथासम्भव थोड़ा-सा समय निकालकर उनकी बात सुनें और उन्हें मात्र इतना भर अहसास दिला दें कि वे उन पर बोझ नहीं हैं। वे उनके अपने हैं और उन्हें बहुत प्यार करते हैं। बच्चों को उनके पास बैठने के लिए प्रेरित करें ताकि उन बजुर्गों के जीवन का अन्तिम दौर शान्ति व प्रसन्नता से व्यतीत हो जाए। उनकी नागवार बातों को अनदेखा व अनसुना करके बच्चों के समान उनका ख्याल रखें। इसीलिए कहते हैं-
                'बच्चा-बूढ़ा एकसमान।'
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 30 नवंबर 2025

आकर्षक पैकेजिंग से सावधान

आकर्षक पैकेजिंग से सावधान 

आकर्षक पैकेजिंग को देखकर हम प्रभावित हो जाते हैं और यह मान लेते हैं कि इसके अन्दर रखी वस्तु भी उतनी ही अच्छी क्वालिटी की होगी जितनी यह दिखाई देती है। परन्तु हमेशा ही ऐसा नहीं होता। यहॉं पर बहुधा हम धोखा खा जाते हैं और अपने धन एवं समय की हानि कर बैठते हैं। बाद में हम पश्चाताप करते हैं। तब हम पानी पी-पीकर उन धोखेबाजों को कोसते हैं। यह बात समझनी चाहिए कि पर अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने के बाद पछतावा व्यर्थ हो जाता है।
            उस समय हम स्वयं को ठगा हुआ सा महसूस करते हैं। तब हमें इतना क्रोध आता है कि हमें ठगने वाला यदि हमारे सामने आ जाए तो उसका सिर फोड़ दें। परन्तु यह तो समस्या का कोई समाधान नहीं है। आज किसी एक व्यक्ति या संस्था विशेष ने हमें धोखा दिया है तो इसकी क्या गारंटी है कि कोई और उसके झांसे में आकर ठगा नहीं जाएगा। हमें पग-पग पर सतर्क रहने की महती आवश्यकता है। अनावश्यक ही स्वयं को इन धूर्तों के चंगुल में नहीं फंसने देना चाहिए।
           सोशल मीडिया पर, टी. वी.पर, समाचार पत्रों में हमें अक्सर ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं जो किसी भी व्यक्ति को बहुत अधिक प्रभावित कर लेते हैं। उनमें तरह-तरह के लालच परोसे जाते हैं। उन्हें देखकर लोग उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। अपनी मेहनत से कमाए गए धन को लुटाकर लोग बर्बाद हो जाते हैं।
            आप लोगों को शायद याद होगा कि कुछ वर्ष पूर्व प्लांटेशन वालों ने सबको बहुत भरमाया था। समयावधि का तो मुझे ध्यान नहीं जिसके पश्चात इन्वेस्ट की गई राशि से कई गुणा राशि लौटाने का वादा किया गया था। उसके बाद सब कहाँ चले गए किसी को पता नहीं। उस समय लोगों अपनी जमा पूॅंजी उस योजना में लगा दी थी। मुझे याद है कि कुछ लोगों ने इस योजना में शामिल होने के लिए अपनी जमीन और अपने घर तक बेच दिए थे। अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए लोगों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी।
             गली-मुहल्लों में भी बहुत बार ठगने की नियत से लोग आते हैं जो वादा करते हैं कि सोने को दुगना कर देंगे। सोने को दुगना तो क्या करेंगे परन्तु वे ठग कर चले जाते हैं। गृहणियॉं इन धूर्तों की चिकनी-चुपडी बातों में आ जाती हैं और अपना सोना गॅंवा बैठती हैं। वे धूर्त तो पलभर में नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। वे महिलाऍं अपनी मूर्खता की कहानी किसी को सुना भी नहीं सकतीं। बस मन मसोसकर रह जाती हैं।
           इसी प्रकार बहुत-सी ऐसी कम्पनियाँ हैं जो उनके पास पैसा इन्वेस्ट करने वालों को बैंक की ब्याज दर से दुगना या तिगुना देने का वादा करती हैं। पर फिर थोड़े दिनों के पश्चात ही आम लोगों की मेहनत की कमाई बटोरकर रातोंरात गायब हो जाती हैं। अब ढूँढ लीजिए उन मक्कारों को। आप बस खोजते रहिए ऐसे दुष्टों को। वे आपके हाथ नहीं लगने वाले। पुलिस में शिकायत कर लीजिए। कुछ नहीं होता। वे लोग जो पहले ही फरार हो जाते हैं। हम कह नहीं सकते कि कब वे न्याय व्यवस्था के हत्थे चढ़ पाते हैं।
            ऐसे ही कई शेयर या डिविडेंड ऐसे भी हैं जिनमें यह पंक्ति लिखी रहती है कि मार्केट रिस्क इसमें रहेगा। सोच-समझकर पैसा इनमें लगाइए। फिर भी लोग धोखा खाते हैं। तो फिर इनमें पैसा इंनवेस्ट करने का तो मुझे कोई औचित्य समझ नहीं आता। बहुधा लोगों को इनमें पैसा लगाकर नुकसान उठाना पड़ता है।
           इसी प्रकार सस्ते व किश्तों पर प्लाट बेचने वाले विज्ञापन भी आकर्षित करते हैं क्योंकि सिर पर छत तो हर व्यक्ति चाहता है। वहाँ लोग पैसा फंसा देते है और जब कब्जा लेने की बारी आती है तो पता चलता है कि वहाँ या तो ऐसी कोई जमीन नहीं जो उन्होंने खरीदी थी या उस जमीन को कई लोगों को बेचा गया है। फिर कवायद शुरू हो जाती है। जो दबंग होगा वह कब्जा कर लेगा। बाकी लोग अपने लुटने का तमाशा खड़े-खड़े देखते रह जाते हैं पर कर कुछ नहीं पाते।
            लोगों को विदेश भेजने का धन्धा भी जोरों पर चलता है। बिना पूरे कागजों के विदेश जाने वालों का क्या हाल होता है इसके उदाहरण हमें अपने आसपास ही मिल जाते हैं। अपनी जमीन बेचकर बहुत से लोग इन धूर्तों को पैसा देते हैं ।विदेश जाकर वे छिप-छिप कर रहते हैं। वे लोग पेट भरने के लिए अपनी योग्यता से भी कम पैसों पर काम करते हैं। कभी-कभी तो उन्हें वहॉं पर न्याय व्यवस्था के दोषी मानकर कारागार की सजा भी भुगतनी पड़ जाती है।
        यह कुछ उदाहरण मैंने लिखे हैं जहाँ फंसकर मनुष्य न घर का रहता है न घाट का। एक व्यक्ति जब अनजाने में इस तरह के प्रलोभनों में फंस जाता है तो ठगे जाने के बाद ही उसे समझ आती कि वह ठगा जा चुका है। उस समय सिर धुनकर रोने या चिल्लाने से कुछ नहीं होता। वे मक्कार लोग अपना काम कर जाते हैं और लोग असहाय होकर न्याय व्यवस्था का दरवाजा खटखटाते हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उनका लगाया हुआ धन उन्हें मिल भी सकेगा या नहीं।
              उस समय यदि कोई साथी या रिश्तेदार उन्हें चेतावनी देने का प्रयास करता है तो उसे वे अपना शत्रु समझते हैं। उन्हें उस समय लगता है कि सभी उसकी तरक्की से जलते हैं। कोई नहीं चाहता कि वह सभी सुख-सुविधाओं से सम्पन्न हो जाए।उस समय वे सोचते हैं कि यह सब प्राप्त करना उनके बूते की बात नहीं है इसलिए ऐसी बातें कर रहे हैं। उनके लिए वे प्रायः इन मुहावरों का प्रयोग करके उनकी हंसी उड़ाते हैं- 'अंगूर खट्टे हैं। और हाथ न पहुँचे थे कौड़ी।'
              तुच्छ लालच में आकर इन धोखेबाजों से बचना चाहिए। अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को यूँ ही बरबाद नहीं करना चाहिए।
        बाद में पुलिस स्टेशन में जाकर कितनी ही शिकायतें कर लीजिए पर वे लुटेरे तो लूटकर कर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। उन्हें पकड़ने में वर्षों लग जाते हैं। केवल सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठकर स्वयं अपने विवेक पर भरोसा कीजिए। अपने धन को व्यर्थ न गंवाकर उसे अपने पास या बैंक में सम्हाल कर रखना चाहिए ताकि वह धन भविष्य में हमारे सुख-दुख में काम आ सके। इन लोगों के विषय में हम यही कह सकते हैं-
            'ऊँची दुकान फीका पकवान।'
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 29 नवंबर 2025

मूर्ख मित्र से शत्रु अच्छा

मूर्ख मित्र से शत्रु अच्छा

इस कथन से कोई भी मनुष्य इन्कार नहीं कर सकता कि मूर्ख मित्र से शत्रु अच्छा होता है। मूर्ख मित्र अपनी मूर्खता के कारण कब वार कर दे यह कोई नहीं जान सकता। इसका कारण यही है कि ऐसा मित्र स्वयं ही नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है? वह जानबूझकर हमारा अहित नहीं करता अपितु अनजाने में उससे गलती हो जाती है। वह अपने ही प्रिय मित्र पर घात तक कर बैठता है और उस मित्र की हानि हो जाती है।
           अपने शत्रु के विषय में हम जानते हैं कि वह तो दुश्मनी निभाएगा ही। उससे हम सदा ही सतर्क रहते हैं। हमारा यही प्रयास रहता है कि शत्रु वार करे उससे पहले हम चौकस हो जाएँ। ऐसा करने से शत्रु के वार का हम पर प्रभाव कम पड़ता है। वैसे तो हमारा यत्न यही रहता है कि उसे ऐसा कोई मौका न दिया जाए कि वह हम पर हावी हो जाए।
           एक कथा प्रचलित है कि किसी राजा ने एक बन्दर को पाला था। उसे वह मित्र की तरह मानता था। वह बन्दर राजा की बहुत सेवा करता था। एक बार राजा सो रहा था और बन्दर उसे पंखा कर रहा था। इतने में एक मक्खी उड़कर राजा के मुँह पर इधर-उधर बैठने लगी। बन्दर उसे उड़ाने का यत्न करने लगा पर वह मक्खी इतनी ढीठ थी कि वह मान ही नहीं रही थी। मक्खी की इस ढिठाई पर बन्दर को क्रोध आ गया और तलवार लेकर उसे मारने के लिए सोचने लगा। इसी बीच राजा की नींद खुल गयी। उसने बन्दर के हाथ में तलवार देखकर सोचा कि मूर्ख मित्र से तो शत्रु ही अच्छा है। यदि मैं समय पर न जागता तो यह मूर्ख बन्दर मुझे मार ही डालता।
        यह कथा हमें समझाने के लिए है कि क्रोध में आकर मूर्ख मित्र कब हम पर वार कर दे पता नहीं चलता। शत्रु के वार करने का तो हमें हमेशा अंदेशा रहता है। सबसे बड़ी बात यह है कि शत्रु को छुपकर वार करने की आवश्यकता नहीं होती। उसका तो खुला चैलेंज होता है।
         अतः इस प्रकार मूर्ख मित्र के हाथों विनाश करवाने से अच्छा है कि शत्रु से ही हाथ मिला लिया जाए और उसे अपना बना लिया जाए।
         मूर्ख को मित्र बनाना चाहें तो अवश्य बनाइए। पर उससे समझदारी की उम्मीद रखना मनुष्य की मूर्खता है। हाँ, अपनी जी हजूरी आप उससे करवा सकते हैं। उसे अपना चमचा बना सकते हैं। अपने बराबर बिठाकर परामर्श नहीं कर सकते। उससे दूरी बनाकर रखने में ही सदा अपनी भलाई समझनी चाहिए।
        आज हम राजनीति में देखते हैं कि एक दल के सदस्य दूसरे दल वालों को अनाप-शनाप कोसते हैं, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है और आम जनों के सामने ऐसा  प्रदर्शन करते हैं कि मानो एक-दूसरे को कच्चा चबा जाएँगे। परन्तु जब किसी कारणवश अपना दल छोड़कर कर किसी अन्य दल में जाकर शामिल हो जाते हैं तो कुछ देर पहले वाले सब प्रसंगों को भुलाकर नए दल का गुणगान करते नहीं थकते। अपने पुराने दल के साथियों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जो पहले इस दल के सदस्यों के साथ करते थे।
           इस प्रकार रातों-रात सभी समीकरण बदल जाते हैं। जब हमारे पथप्रदर्शक नेता लोग अपने हित के लिए शत्रु को मित्र बनाने में संकोच नहीं करते तो आम जन को भी अपने शत्रु से हाथ मिलाने से बचना नहीं चाहिए। 
          यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम कैसे मित्रों का चुनाव करना चाहते हैं? जैसा रुचिकर हो वैसा मानकर अपने भविष्य के लिए जीवन का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

ऑंखों देखी और कानों सुनी

आँखों देखी और कानों सुनी 

दूसरे मनुष्य के बारे में कही गई बातों पर ऑंख मूॅंदकर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। उन कही गई बातों की सच्चाई की जॉंच-परख करके ही उन्हें सच मानना चाहिए। इससे भी बढ़कर आँखों देखी और कानों सुनी हुई बात पर भी हमें पूर्णरूपेण विश्वास नहीं कर लेना चाहिए। प्रायः ऐसा होता है कि हम आधी-अधूरी बातें सुनकर ही किसी व्यक्ति विशेष के प्रति अपनी राय बना लेते हैं। उसी के अनुरूप उस व्यक्ति से व्यवहार करने लगते हैं। परन्तु जब वास्तविकता से परिचय होता है तब उसका दुष्परिणाम हमें भुगतना पड़ता है।
           लोग सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करके किसी व्यक्ति के विषय में धारणा बना लेते हैं जबकि वास्तविकता से उसका दूर-दूर तक लेना देना नहीं होता। सच्चाई के सामने आते ही मनुष्य को शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है और फिर वह बगलें झाँकने लगता है। ऐसी स्थिति से बचने का प्रयास करना चाहिए।
        आजकल टीवी पर अक्सर यह सब दिखाई देता है। वहाँ किसी वाक्य विशेष पर टीका-टिप्पणी अथवा चर्चाएँ नित्य होती रहती हैं। बाद में संबंधित व्यक्ति यह कहकर अपनी सफाई देता है कि मैंने जो इस वाक्य से पहले कहा था या उसके बाद, सारे प्रसंग को मिलाकर देखिए फिर कथन का अर्थ कीजिए। इस प्रकार कभी-कभी अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है।
          सयाने हमें सोच-समझकर बात करने के लिए कहते हैं- 'पहले तोलो फिर बोलो।' यानि कि एक-एक शब्द को इस प्रकार सोचकर बोलो जिससे कोई उन शब्दों को अपने अनुसार ढालकर आपको अपमानित न कर सके। इसी कड़ी में आगे चेतावनी देते हुए कहते हैं- 
        'दीवारों के भी कान होते हैं।'
इसका अर्थ यह नहीं है कि दीवारों के कान  लग गए हैं और उन्होंने ने सुनना शुरु कर दिया है। इसका अर्थ है कि कमरे के बाहर खड़ा हुआ कोई व्यक्ति शायद बात सुन रहा होगा। चोरी-छिपे दूसरों की बातों को सुनने वाले अक्सर गच्चा खा जाते हैं। पूरी बात न सुन पाने के कारण वे अधूरे विचारों को ही ब्रह्म वाक्य मान लेते हैं तथा शत्रुता तक कर बैठते हैं। पूर्वाग्रह पाले हुए वे आजन्म इसे निभाने का प्रयास करते हैं।
        घर-परिवार में, बन्धु-बान्धवों में अथवा कार्यक्षेत्र में हर स्थान पर ही यह समस्या सामने आती है। लोग अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में इस प्रकार के कुत्सित कार्यों में लिप्त हो जाते हैं। 
          दूसरों की बातों को तोड़-मरोड़कर अथवा नमक-मिर्च लगाकर किसी व्यक्ति विशेष की छवि घर-परिवार में या साथियों में धूमिल करना चाहते हैं। वे अक्सर भूल जाते हैं कि उन्हीं की तरह कोई अन्य व्यक्ति भी ऐसा घृणित खेल खेल सकता है। इस सबसे बचने के लिए मनुष्य को हर कदम पर सदा सतर्क रहना चाहिए। उसे सदा अपनी आँखों और कानों को खुला रखना चाहिए।
        मनुष्य को किसी के भी मुँह से कोई बात सुनकर तैश में नहीं आना चाहिए। उसे बात की तह तक जाना चाहिए। हो सकता है कि कहने वाले का वह तात्पर्य कदापि न हो जैसा उसने सुन-समझ लिया हो। यदि बात को गहराई से समझने का मन न हो तो उस व्यक्ति से सीधी बात करके तथ्य को जाना जा सकता है। 
        दूसरी बात यह कि दूसरे व्यक्ति को स्पष्टीकरण का मौका भी दिया जाना चाहिए। इससे अनावश्यक मन-मुटाव से बच सकते हैं। ऐसा यदि कर लिया जाए तो आपसी वैमन्स्य नहीं बढ़ता। न अपने मन को कष्ट होगा न दूसरे का दिल दुखता है। ऐसे समझदार व्यक्ति की संसार में सभी लोग सराहना करते हैं कि बड़ी सूझबूझ से समस्या को हल कर लिया।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

निठल्ला बैठना सबसे कठिन कार्य

निठल्ला बैठना सबसे कठिन कार्य

मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि खाली रहना अर्थात् निठल्ला बैठना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है। परिश्रम करते-करते जब थक जाते हैं तब हम कहते हैं कि अब हमें ब्रेक चाहिए। थोड़ा-सा विश्राम करके या फिर घूम-फिर कर हम तरोताजा हो जाते हैं और फिर अपने काम में उसी ऊर्जा से वापिस जुट जाते हैं।
           मैं कभी-कभी उन लोगों के विषय में सोचती हूँ जो सवेरे से शाम तक कोई कार्य नहीं करते। यानी निरुद्देश्य जीवन जीते हैँ। सारे दिन में बस खा लिया और सो गए। बहुत हुआ तो दोस्तों के साथ शापिंग कर ली या फिर क्लब की सैर कर ली। इस प्रकार के जीवन में न कोई जिम्मेदारी होती है और न ही कोई आकर्षण होता है।
        कुछ गृहिणियाँ जो ईश्वर की कृपा से समृद्ध हैं और घर पर रहती हैं। उनके घर में नौकर-चाकर काम करते हैं। उन्हें तो यह भी पता नहीं होता कि बच्चे स्कूल गए हैं या छुट्टी कर गए। उन्होंने कुछ खाया भी है या नहीं। नौकरों ने जो कुछ उल्टा-सीधा बना दिया, वह बच्चे को पसन्द आया या नहीं। उसने वह खाया था क्या? उनका पति अपने व्यापार के लिए कुछ खाकर या बिना खाए कब घर से चला गया? 
          इसी प्रकार जो पुरुष भी खाली बैठे रहते हैं, वे भी अपने जीवन से निराश हो जाते हैं। कुछ लोग ताश खेलकर या व्यर्थ निन्दा-चुगली करके समय व्यतीत करते हैं। नवयुवा जो इधर-उधर डोलते रहते हैं, उन्हें सब टोक देते हैं कि कोई काम-धन्धा करो, अवारा मत फिरो। स्पष्ट बात यह है कि खाली बैठा हुआ कोई भी व्यक्ति सबकी आँखों में खटकता है। अपना कार्य करने में व्यस्त व्यक्ति को ही सब पसन्द करते हैं।
            खाली बैठने के कारण मनुष्य धीरे-धीरे अनावश्यक बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है। उसका एक काम बढ़ जाता है, वह काम है रोज डाक्टरों के पास चक्कर काटना। जबकि उनकी बीमारी होती है उनका खालीपन होती है।
            खाली बैठकर अनावश्यक सोचते रहने से मन और शरीर दोनों प्रभावित होते हैं। विचार प्रवाह प्रायः नकारात्मक होने लगता है सकारात्मक नहीं। सयाने कहते हैं कि-
               खाली घर भूतों का डेरा।
अर्थात् खाली पड़ा हुआ घर हमेशा भूतों की निवास स्थली बन जाता है। 
          कहने का तात्पर्य है यह है कि वहाँ उस घर में नकारात्मक ऊर्जा आने लगती है। जब वहाँ चहल-पहल होने लगती है तब स्थितियाँ अलग हो जाती हैं। वही हाल खाली दिमाग का भी होता है। इसीलिए कहते हैं-
           खाली दिमाग शैतान का घर।
यानी कि फालतू बैठे-बैठे सोचते रहने से दिमाग में प्रायः सकारात्मक विचार नहीं आ पाते बल्कि नकारात्मक विचार घर करने लग जाते हैं। उस समय ऐसा लगने लगता है कि मानो मस्तिष्क की नसें फटने लगी हैं। मनुष्य का सारा शरीर बेकार-सा हो रहा है। 
          ऐसी स्थिति में जो स्वयं को सम्हाल पाते हैं वे बच जाते हैं और जिनका अपने ऊपर वश नहीं रहता, वे समय बीतते मनोरोगी बन जाते हैं। नित्य डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए वे धन व समय को व्यय करते हैं।
          अपने आप को किसी सकारात्मक कार्य में लगाए रखना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो किसी हाबी में स्वयं को व्यस्त रखना चाहिए। किसी सामाजिक कार्य को करते हुए भी व्यस्त रहा जा सकता है।
        कहने का तात्पर्य है कि इस दिमाग को खाली मत छोड़ो। जहाँ इसे मौका मिलता है, यह तोड़फोड़ करना आरम्भ कर देगा। जितना अधिक यह व्यस्त रहेगा उतना ही खालीपन का या अकेलेपन का अहसास नहीं करेगा। यह कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि क्या करे बोर हो रहे हैं। इसे भी खुराक मिलती रहनी चाहिए अन्यथा यह बागी होकर कहर ढाने लगता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

भावनाओं का क्षणिक आवेग

भावनाओं का क्षणिक आवेग

भावनाओं के क्षणिक आवेश में बहकर हम किसी और का नहीं स्वयं का ही नुकसान कर लेते हैं। यह आवेग एक प्रकार से ज्वर(बुखार) के समान होता है जिसके ताप में जलते हुए हम स्वयं ही कष्ट प्राप्त करते हैं। इससे बाहर निकलने का रास्ता भी हमें स्वयं ही खोजना होता है।
           हम आवेश में क्यों आ जाते हैं? यह हमारा नुकसान क्यों और किसलिए करता है? इन प्रश्नों को हल करना बहुत आवश्यक है।
          एक कहानी पढ़ी थी कि एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी अपने छोटे से बच्चे के साथ किसी गाँव में रहते थे। उनकी आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी। एक बार ब्राह्मणी स्नान करने के लिए नदी पर गई तो ब्राह्मण को शिशु की देखभख के लिए कहकर गई। ब्राह्मणी के जाने के बाद ब्राह्मण को श्राद्ध लेने के लिए राजमहल से न्योता आया। 
          अब वह परेशान हो गया कि वह बच्चे को कहाँ छोड़कर जाए? ऐसा सोचते हुए उसके मन में विचार आया कि अपने पुत्र की तरह पाले हुए नेवले को बच्चे की रक्षा में छोड़कर चला जाता हूँ। ऐसा करके वह राजमहल चला जाता है। इसी बीच एक साँप बालक की ओर बढ़ता है। उसे देखकर नेवला उस सॉंप को मार देता है।
          जब ब्राह्मण वापिस आता है तो नेवले के मुँह पर लगे खून को देखकर दुखी होता है। उसे ऐसा लगता है कि इस नेवले ने मेरे बच्चे को मार दिया है। ब्राह्मण उसे उसी क्षण मार देता है। पर घर के भीतर जाकर साँप को मरा हुआ देखता है तो सब समझ जाता है। अपने पर परोपकार करने वाले नेवले को मारकर पश्चाताप करता है।
             इसी प्रकार क्षणिक आवेश में आकर हम अपनों को स्वयं से दूर कर लेते हैं। उस समय हम कहते हैं कि जीवन भर इसकी शक्ल नहीं देखेंगे। घर-परिवार में किसी की जरा सी गलती या स्वयं में हुई गलतफहमी के कारण किसीका त्याग कर देना समझदारी नहीं कहलाती। 
          इसी प्रकार दोस्तों में कभी-कभी होने वाले मनमुटाव के कारण अपने प्रिय दोस्तों से जानलेवा दुश्मनी तक लोग निभाने लगते हैं।
          नौकरी अथवा व्यापार के क्षेत्र में भी यदाकदा अपरिहार्य कारणों से मतभेद हो जाते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम उन लोगों को अपना शत्रु ही मानकर बैठ जाएँ।
           यह आवेश हमारे सोचने-समझने की शक्ति का शत्रु होता है। जरा-सा गुस्सा आने पर हम अपने वश में नहीं रहते और दूसरे को दोषी मानते हुए उससे किनारा कर लेते हैं। चाहे उसके लिए बाद में मन-ही-मन कितना ही दुखी व परेशान क्यों न होना पड़े। हम कठोर बनकर दुनिया को अपने फैसले पर डटे रहते हुए दिखाना चाहते हैं। अपनी नाक नीची न हो जाए इस के लिए हमें चाहे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़ जाए पर हमारी जिद्द पूरी हो जानी चाहिए।
            इस आवेश से हम बच सकते हैं यदि पुनर्विचार कर लें तो। ईश्वर ने मनुष्यों को बुद्धि का वरदान इसीलिए दिया है जो हमें सृष्टि के सभी जीवों से विशेष बनाता है। यदि हम इस नेमत का सदुपयोग नहीं करेंगे तो मनुष्यों और पशुओं में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा। मनुष्य अपने विवेक से काम लेकर बहुत से अनावश्यक कष्टों से बचकर निकल सकता है। 'हितोपदेशम्' ग्रन्थ में में नारायण पण्डित हमें समझाते हुए कहते हैं-
             अविवेक: परमापदां पदम्।
अर्थात् अविवेक सभी मुसीबतों की जड़ है। अत: अपने सभी निर्णय विवेक से लेने चाहिए। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए जिससे हमें अपनों से दूर रहकर उनके वियोग में वर्षों तक घुलना न पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद