बच्चा-बूढ़ा एकसमान
समय बीतते-बीतते एक आयु के पश्चात मनुष्य बच्चे के समान हो जाता है। तब उसकी देखभाल बच्चे के समान ही करनी पड़ती है। वह भी बारबार बच्चों की तरह रूठने-मानने लगता है। अधिक बोलने लगता है। यदि किसी कारण से उसकी बात को अनसुना कर दिया जाए तो वह बौखला जाता है कभी-कभी अनाप-शनाप भी बोलने लगता है। उसे सबसे शिकायत रहने लगती है। यदि कोई उसे अनदेखा कर दे तो बच्चों की तरह इस बात को वह अपने अहं का प्रश्न बना लेता है।
इसका कारण है कि सारी आयु वह संघर्ष करता रहता है। उसे अपना व अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए दिन-रात एक करना पड़ता है। अपने बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए वह स्वयं को भूला बैठता है। स्वयं के विषय में सोचने के लिए ऐसी परिस्थितियों में उसके पास समय ही नहीं होता। जीवन की आपाधापी में अथवा भागदौड़ में उसे पता ही नहीं चलता कि वह कब युवा से वृद्ध हो गया? कब उसका उसका रिटायरमेंट का समय आ गया?
रिटायरमेंट यानी साठ साल की आयु के बाद उसके जीवन में एक खालीपन-सा आने लगता है। सवेरे से रात तक की उसकी व्यस्तता अब नहीं रहती। उसके लिए समय व्यतीत करना भारी पड़ने लगता है। ऐसे समय में कुछ लोग पुनः नौकरी का प्रयास करते हैं और कुछ लोग अपना मन बहलाने के लिए दोस्तों का आसरा ढूँढते हैं, ताश खेलते हैं, सवेरे सैर करने जाते हैं, ग्रुप बनाकर कभी-कभार घूमने चले जाते हैं। परन्तु कुछ लोग अपने घर में ही रहना पसन्द करते हैं।
व्यापारियों की रिटायरमेंट थोड़ी देर से होती है। जब तक वे स्वस्थ हैं काम करते रहते हैं। क्लब जाते हैं, पार्टियाँ देते रहते हैं और अपनी मीटिंगस में व्यस्त रहते हैं। परन्तु एक समय के पश्चात उनके सामने भी वही समय बीताने की समस्या आने लगती है।
जो लोग ऐसे समय में जो लोग हाबी अपना लेते हैं, वे इस समस्या से निजात पा लेते हैं। कुछ समय पूजा-पाठ में बिताने से मन को शान्ति मिलती है। कोई सामाजिक कार्य करके समय का सदुपयोग किया जा सकता है। इससे मनुष्य व्यस्त रहता है और उसका खालीपन भी उसे कचोटता नहीं है और समाज का भी भला होता है।
कुछ और आयु बीतने पर मनुष्य की शक्ति कमतर होने लगती है। फिर वह अशक्त होने लगता है। बिमारियाँ उसे घेरने लगती हैं। उसे स्वस्थ होने में समय अधिक लगता है। डाक्टरों व अस्पतालों के चक्कर लगाते हुए उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है। उस समय उसे अपने बच्चों के सहारे की आवश्यकता होती है। अपनों के प्यार व दुलार की जरूरत होती है।
ऐसे समय में जब उसकी बातों को बच्चे अनसुना करते हैं तो वह यह सहन नहीं कर पाता। उसे लगता है कि आयुभर जो अनुभव उसने कमाया है, बच्चे उसका लाभ नहीं उठा रहे। वे उसे मूर्ख और स्वयं को अधिक समझदार मान रहे हैं। इसे वह अपना अपमान समझता है। शरीरिक शक्ति क्षीण होने से वह स्वयं अपने कार्यों को पहले की तरह चुस्ती से नहीं कर पाता। इसलिए चिड़चिड़ा होने लगता है। इसी कारण वह अपेक्षाकृतअधिक बोलने लगता है।
आज बच्चे अपने दायित्वों को निभाने में दिन-रात एक कर रहे हैं। परन्तु उस वृद्ध को लगता है कि वे उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहे। वे उसे बोझ समझ रहे हैं। अत: वह उनसे खफा रहने लगता है, शिकायतें करता है। आयु का यह दौर सबके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है। सेवा करने वाले भी परेशान हो जाते हैं और सेवा करवाने वाले भी। नकारेपन के अहसास के कारण सेवा करवाना बहुत मुश्किल होता है।
इन आयुप्राप्त लोगों को बस अपनों के प्यार-दुलार, सहारे और विश्वास की ही आवश्यकता होती है। यथासम्भव थोड़ा-सा समय निकालकर उनकी बात सुनें और उन्हें मात्र इतना भर अहसास दिला दें कि वे उन पर बोझ नहीं हैं। वे उनके अपने हैं और उन्हें बहुत प्यार करते हैं। बच्चों को उनके पास बैठने के लिए प्रेरित करें ताकि उन बजुर्गों के जीवन का अन्तिम दौर शान्ति व प्रसन्नता से व्यतीत हो जाए। उनकी नागवार बातों को अनदेखा व अनसुना करके बच्चों के समान उनका ख्याल रखें। इसीलिए कहते हैं-
'बच्चा-बूढ़ा एकसमान।'
चन्द्र प्रभा सूद
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