बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

भारी भरकम बोझ तले दब रहा बचपन

भारी भरकम बोझ तले दब रहा बचपन 

बच्चे बेचारे आजकल बस्ते यानी बैग के भार से दबे जा रहे हैं जो बहुत अधिक है। आजकाल यह फैशन बनता जा रहा है कि जितना बड़ा और भारी स्कूल का बैग होगा, उस विद्यालय में उतनी ही अच्छी पढाई होगी। हालॉंकि भारी बैग शिक्षा की गुणवत्ता का कोई प्रमाण नहीं हो सकता।
          विचारणीय है कि क्या वास्तव में शिक्षा का स्तर इतना बढ़ गया है कि भारी भरकम बोझ के बिना पढाई सम्भव नहीं हो सकती? क्या शिक्षाविद बच्चों को इस बोझ से कभी मुक्ति दिलाने में समर्थ हो सकेंगे।
           प्राचीन काल में भारतीय शिक्षण पद्धति ऐसी होती थी जहाँ बच्चों पर पुस्तकों का बोझ कम होता था। उस समय जीवन को क्रियात्मक बनाने पर बल दिया जाता था। बड़े दुख की बात है कि आज की शिक्षा व्यावसायिक हो गई है। शिक्षण संस्थान मोटी फीस को ही महत्त्व देते हैं।
        बैग के इस बोझ के कारण बच्चों की रीढ़ की हड्डी पर बहुत दुष्प्रभाव पड़ता है और वे कमर दर्द, कन्धो के दर्द और थकान आदि से परेशान हो सकते हैं। यद्यपि उतना अधिक वजन उठाना बच्चों के लिए कठिन होता है।
         स्कूल बैग का वजन बच्चे के स्वास्थ्य और शारीरिक विकास पर बुरा असर डाल रहा है। सन 2014 में की गई एक स्टडी के अनुसार भारत में बच्चों के स्कूल बैग का औसत वजन 8 किलो होता है। यह वास्तव में बहुत अधिक है।
        एक साल में लगभग 200 दिन तक बच्चे स्कूल जाते हैं। स्कूल जाने और वहाँ से वापस आने के समय जो भार बच्चा अपने कन्धों पर उठाता है यदि उसे आधार मानकर गणना की जाए तो वह साल भर में 3200 किलो का वजन उठा लेता है। ये भार एक Pickup ट्रक के बराबर है। अच्छे अंक लाने के दबाव और भारी भरकम बोझ के नीचे बचपन दब रहा है। हैरानी की बात है कि कोई इसके विरोध मे आवाज नहीं उठाता। 
        स्कूल अभिभावकों को जिम्मेदार बताते हैं कि वे बच्चों के टाइम टेबल चेक नहीं करते। दूसरी ओर अभिभावकों का कहना है कि स्कूली बच्चों के पास अनेक विषयों की अलग-अलग किताबें और कापियाँ होती हैं। उन्हें हर दिन स्कूल ले जानी पड़ती हैं जिससे वे परेशान हो जाते हैं। बच्चों को सिखाएँ कि स्कूल बस या वैन में बैग को नीचे रखें। अनावश्यक वस्तुओं को स्कूल बैग में न रखें। कुछ बच्चे इतने आलसी होते हैं जो हर रोज बैग न लगाना पड़े अत: सारा सामान उसी में रखते हैं।
          कुछ समय पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने एक अनोखी पहल की। तीसरी कक्षा से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को बिना बस्ते के स्कूल बुलाया गया। स्कूल ने इस दिन को 'वाचन प्रेरणा दिवस' का नाम दिया। इसी तर्ज पर केरल ने भी यह पहल की। हालॉंकि बच्चों के बस्ते का बढ़ता बोझ अब दिल्ली में भी कम होने लगा है। सरकारी स्कूलों के साथ-साथ कई प्राइवेट स्कूलों ने भी यह कदम उठाना शुरू किया है। गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अन्य प्रदेशों के मुकाबले स्कूली बस्तों का बोझ कम ही है। 
          तीसरी कक्षा में बच्चों के लिए भारी बैग मुसीबत बन जाता है। कई ऐसे भी पीरियड होते हैं, जो किसी भी कारण से स्कूलों में खाली चले जाते हैं। कई बार कुछ पढ़ाई भी नहीं होती पर बैग में किताबें, कापियाँ तो सारी ले जानी पड़ती हैं।
            सीबीएसई के अनुसार दूसरी कक्षा तक के बच्चों के बस्ते स्कूल में ही रहने चाहिए। बाकी बच्चों के लिए शिक्षकों और प्रिंसिपल को मिलकर ऐसा टाइम टेबल बनाना चाहिए जिसमें बच्चों को ज्यादा किताबें न लानी पड़ें। चिकित्सकों की राय मानें तो भारी बस्ता शारीरिक और मानसिक विकास पर असर डालता है।
          1980 में आर. के. नारायण ने राज्यसभा में बच्चों के बस्ते के बोझ को कम करने की आवाज उठाई थी। बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आज 46 वर्षों बाद भी बच्चे उसी बोझ के तले दबे जा रहे हैं। 
        स्कूली बस्ते का बोझ कम करने के लिए कुछ समय पूर्व दिल्ली सरकार ने पहल की थी। सरकार का मानना है कि स्कूलों में पढ़ाई का समय कम करके खेल-कूद और दूसरी गतिविधियों का समय बढ़ाया जाना चाहिए। 
          इस पहल का लाभ तभी हो सकता है जब बच्चों को रोबोट की तरह न पढ़ाया जाए। बस्ते रखने का प्रबन्ध स्कूल को सुनिश्चित करना चाहिए। कुछ स्कूलों ने ऐसे उपाय किए हैं। बच्चे उतनी ही किताबें घर ले जाएँ जितनी उन्हें जरूरत है। शेष पुस्तकें वे अपने विद्यालय से मिले लॉकर‌ में सुरक्षित रख सकते हैं।
          भारी बस्ते के बोझ से छुटकारे के लिए सटीक उपाय ढूँढने होंगे। दृढ़ इच्छाशक्ति से निश्चित ही नए विकल्प खुल सकते हैं। बच्चों के सुखमय भविष्य और बेहतर शिक्षा उनमें स्वस्थ जीवन ला सकते हैं।
           कुछ समय पूर्व महाराष्ट्र के चन्द्रपुर में दो स्कूली बच्चों ने भारी बस्ते के खिलाफ आवाज उठाई। इन्होंने एक Press Confrence करके पत्रकारों को बच्चे की शारीरिक क्षमता से अधिक भार उठाने पर मजबूरी को बताया।
           हम चाहते हैं कि भारत सरकार का शिक्षा विभाग बच्चों की इस महत्वपूर्ण समस्या की ओर ध्यान दे। प्रयास यही होना चाहिए कि बच्चों से इस भारी बस्ते के बोझ को कम किया जाए। 
चन्द्र प्रभा सूद

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें