शनिवार, 7 मार्च 2015

मुहावरों के आधुनिक अर्थ

किसी मित्र ने मुहावरो के आधुनिक अर्थ वाटस अप पर भेजे हैं। इन्हें पढ़िए और हँसते हुए लोटपोट हो जाएज-

1. सुख की जान दुःख में डालना - शादी करना
2. आ बैल मुझे मार - पत्नी से पंगा लेना
3. दीवार से सर फोड़ना - पत्नी को कुछ समझाना
4. चार दिन की चांदनी वही अँधेरी रात - पत्नी का मायके से वापस आना
5. आत्म हत्या के लिए प्रेरित करना - शादी की राय देना
6. दुश्मनी निभाना - दोस्तों की शादी करवाना
7. खुद का स्वार्थ देखना - शादी ना करना
8. पाप की सजा मिलना - शादी हो जाना
9. लव मैरिज करना - खुद से युद्ध करने को योद्धा ढूंढना
10. जिंदगी के मज़े लेना - कुँवारा रहना
11. ओखली में सिर देना - शादी के लिए हाँ करना
12. दो पाटों में पिसना - दूसरी शादी करना
13. खुद को लुटते हुऐ देखना - पत्नी को पर्स से पैसे निकालते हुए देखना
14. पैरों तले जमीन खिसकना - पत्नी को साक्षात सामने दिखना
15. शादी के फ़ोटो देखना - गलती पर पश्चाताप करना
16. सर मुंडाते ही ओले पड़ना - परीक्षा में फेल होते ही शादी हो जाना
17. शादी के लिए हाँ करना - स्वेच्छा से जेल जाना
18. शादी = बिना अपराध की सजा
19. बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना = दुसरो के दुःख से खुश होना
20. साली आधी घर वाली = वो स्कीम जो दूल्हे को बताई जाती है लेकिन दी नहीं जाती...😌😌

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

जीवन का सार

हम जीव इस संसार में जन्म लेते हैं और सारा जीवन सोचते रहते हैं कि मैं कौन हूँ? मैं इस संसार में क्यों आया हूँ? उसके बाद मुझे कहाँ जाना है? आदि ये सभी प्रश्न हमें बेचैन करते रहते हैं। आयुपर्यन्त हम इन पहेलियों को सुलझाने के लिए सिरा तलाश करते रहते हैं पर न जाने वह कैसा सूत्र है जो हमारे हाथ ही नहीं लगता।
        स्वामी दयानन्द सरस्वती जब गुरु विरजानन्द जी के द्वार पर पहुँचे तो गुरु ने पूछा- 'कौन है?' स्वामी जी ने उत्तर दिया- 'यही जानने आया हूँ।' महात्मा बुद्ध भी इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए राजपाट छोड़कर चले गए।
       इन पर विचार करना आवश्यक है तभी तो हम अपने विषय में जान सकेंगे। वेद वाक्य है-  'अहं ब्रह्मास्मि।'
अर्थात मैं ब्रह्म हूँ। इस वाक्य को गहराई से सोचे तो समझ आ जाएगा कि मैं उस अजर, अमर, अविनाशी परमात्मा का ही अंश हूँ।इसीलिए अपना रूप परिवर्तन करके अपने कृत कर्मों को भोगने के लिए बारंबार इस असार संसार में जन्म लेता हूँ। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उस  परम आत्मा का एक अंश हूँ। उपनिषद् का मन्त्र है-
              द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया।
              समानवृक्षं परिषस्व जाते।
अर्थात एक ही वृक्ष पर दो पक्षी (परमात्मा व आत्मा) बैठे हुए हैं। एक (परमात्मा) केवल द्रष्टा है और दूसरा (आत्मा) भोग करने वाला है।
       इसी विचार को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं-     'ईश्वर अंस जीव अविनासी।'
ईश्वर का अंश यह जीव (आत्मा) अविनाशी है। मैं आत्मा अग्नि हूँ, ज्ञान, प्रकाश, गति एवं अग्रणी हूँ। मेरे अंतस् में संकल्प की अग्नि निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है।अत: मेरा जीवन पथ सदा प्रकाशमान रहता है-                      'अग्निरस्मि जन्मना जातवेद:।' 
यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि मैं ईश्वर का ही रूप हूँ और वह मेरे रोम-रोम में समाया हुआ है।
          मेरे सिर पर उसका वरद हस्त है। इसलिए संसार में आकर स्वयं को उसके निर्देश के अनुरूप बनाना है।
      मैं मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हूँ। मुझे अपनी इस श्रेष्ठता का मान रखते हुए अपने को योग्य सिद्ध करना है।
        मुझमें ईश्वर ने सभी पंच महाभूतों के गुणों का समावेश किया है। पृथ्वी जैसा धैर्य मुझे दिया है। जल के समान शीतलता प्रदान की है। वायु के समान मुझे गतिशील बनाया है। अग्नि की भाँति तेजस्वी बनाया है। आकाश के तुल्य व्यापकता दी है।
        प्रभु ने मुझे विवेक शक्ति, भुजबल, साहस, आत्मविश्वास व स्वाभिमान का वरदान दिया है। कहने को मैं एक व्यक्ति हूँ पर सभ्यता व संस्कृति का प्रतिमान हूँ। दया, ममता, करुणा, प्रेम, वात्सल्य, शान्ति, क्षमा आदि का पालन करना मेरा धर्म है। मुझे अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस मानव जीवन को व्यर्थ नहीं गवाना है।
        'सर्वभूतहिते रत:' अर्थात प्राणिमात्रउच की भलाई करना मेरा दायित्व है। मेरा घर-परिवार ही नहीं सारी पृथ्वी मेरा कुटुम्ब है जिसकी परिकल्पना हमारे ऋषियों ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' कहकर की है।
        ईश्वर ने जन्म इसलिए दिया है कि अपनी शक्तियों को जागृत कर आत्म साक्षात्कार करके उसमें लीन हो जाऊँ जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करूँ।
         अंत में यह कहना उपयुक्त होगा- 'सोहम् अस्मि।' दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मैं वही हूँ जो परमात्मा है। जैसा वह है वैसा मैं हूँ। मैं किसी रूप में उससे भिन्न नहीं हूँ। बस मुझे उसके गुणों का अपने में विस्तार करना है और उसके साथ एकरूप होना है।

गुरुवार, 5 मार्च 2015

होली का पर्व

सामाजिक त्योहार होली हमें भाईचारे का संदेश देता है जिसको हम भूलते जा रहे हैं और अपनी-अपनी दुनिया में खोए रहना अधिक पसंद करते हैं। यह मिलजुल कर रहने की सीख देता है। हम एक-दूसरे को गुलाल लगाकर गले मिलते हैं। यह परंपरा मनोमालिन्य को दूर करती है व सबको मिलाने का कार्य करती है।
      कुछ वर्ष पहले तक एक सप्ताह पूर्व ही इस त्योहार को बच्चे मनाना शुरू कर देते थे। शहरों में यह त्योहार अब केवल रंग खेलने तक ही सीमित रह गया है परन्तु ग्रामीण इलाकों में आज भी उसी उल्लास से इस त्योहार को मनाया जाता है।
       वसंत ऋतु में चारों ओर रंग-बिरंगे फूल अपनी छटा बिखेरते हैं। यह समय हवा में भी फूलों की सुगंध फैलती है। हवा सुगंधित व शीतल होती है। ठंड का प्रकोप भी कम होने लगता है। ऐसे खुशगवार मौसम में त्योहार मनाने की मस्ती छा जाती है। यदि फूलों के अर्क से होली खेली जाए तो हर व्यक्ति खुशबू से सराबोर हो जाएगा।
       रंगों से होली खेलने से पूर्व रात्रि को पारंपरिक होलिका दहन किया जाता है जिसके फेरे लेकर मनोकामना पूर्ण करने का विधान है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। न जलने का वरदान प्राप्त बुआ होलिका जब परम ईश्वर भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर बैठती है तब वह जल जाती है और प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं होता।
        तांत्रिक लोग विशेष पूजा का विधान करते हैं। इन दिनों तंत्र-मंत्र का प्रयोग करने लोग नहीं चूकते। होली के त्योहार से लगभग पन्द्रह दिन पहले व एक सप्ताह बाद तक कोई भी शुभकार्य सम्पन्न नहीं किया जाता।
       इस दिन कुछ लोग भांग पीते हैं और कुछ शराब। ऐसा करके वे त्योहार के दिन रंग में भंग डालते हैं। हुड़दंग मचाने से त्योहार की गरिमा नष्ट होती है। इसे बचना हमारा नैतिक दायित्व है।
        इसके अतिरिक्त लोग पक्के रंगों से खेलते हैं जो साबुन रगड़ कर भी नहीं उतरता बल्कि कई दिनों तक त्योहार की याद ताजा करता है। कुछ लोग कीचड़ आदि से खेलते हैं जो गलत है। लोग टोलियों में घर से बाहर निकलकर त्योहार का लुत्फ उठाते हैं। बच्चे विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी पिचकारियों व रंग या पानी भरे गुब्बारे फैंककर खूशी प्रकट करते हैं।
       ईको फ्रेंडली रंगों से अथवा रंगबिरंगे सुगंधित फूलों से ही होली खेलनी चाहिए। गंदगी को हमेशा ही नजरअंदाज करना चाहिए। वातावरण को दूषित न करके हमें बजाय आनन्द से सराबोर होना चाहिए। जोर-जोर से बजने वाले ढोल-डमाके इस त्योहार की रौनक में चार चाँद लगाते हैं।
       बरसाने की लट्ठमार होली भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भी प्रसिद्ध है। आजकल टीवी इसकी कवरेज करता है। बहुत से ऐसे लोग हैं जो विशेष रूप से बरसाने जाकर इस उत्सव के दर्शक बनते हैं और अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाते हैं।
        घरों में अनेक प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं जिन्हें खाकर सभी लोग उत्साहित होते हैं तथा मित्रों-संबंधियों को दावत भी देते हैं।
          होली के इस पावन त्योहार पर अपने अंतस् की बुराइयों को दहन करना चाहिए और इसमें होने वाली बुराइयों को यदि हम दूर कर सकें तभी इस त्योहार की सार्थकता है।

बुधवार, 4 मार्च 2015

जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन

हमारे आचरण पर हमारे खानपान का बहुत प्रभाव पड़ता है। शायद सुनने में अटपटा-सा लग रहा है पर यह सत्य है। छांदोग्य उपनिषद हमें बताती है-
            आहारशुद्धौ सत्तवशुद्धि: ध्रुवा स्मृति:।
             स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:॥
अर्थात आहार शुद्ध होने से अंत:करण शुद्ध होता है। इससे ईश्वर में स्मृति दृढ़ होती है। स्मृति प्राप्त हो जाने से हृदय की अविद्या जनित सभी गाँठे खुल जाती हैं।
हमारे बड़े-बजुर्ग कहते थे-
                'जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन'
जैसी कमाई का अन्न घर में आएगा वैसा ही परिवार जनों का आचरण भी हो जाएगा।
         तामसिक और राजसिक भोजन करने से स्वास्थ्य की हानि होती है जिसका मानसिक प्रभाव पड़ता है। मन में तमोगुण बढ़ता है अर्थात मनुष्य पर कुविचार हावी होते हैं जिसका परिणाम हम अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार, तेजाब फैंकना, पारिवारिक विघटन आदि बुराइयों के रूप में देखते हैं। मन में अवसाद बना रहता है व सद् कार्यों में मन नहीं लगता। हमारा मन इन्द्रियों के वश में होकर भटकता रहता है।
         यदि हम स्वास्थ्य के नियमों के अनुसार मौसम के अनुकूल भोजन करेंगे तो शरीर स्वस्थ रहेगा अन्यथा रोगी हो जाएगा। फिर अपनी मेहनत की कमाई डाक्टरों के हवाले करनी पड़ेगी। रोगी व्यक्ति स्वयं अपने को संभाल नहीं पाता तो घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण कैसे कर सकेगा? यह कष्ट उसे और अधिक पीड़ित करता है। इसीलिए कहा है-
             'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्'
शरीर स्वस्थ होगा तभी मनुष्य अपने धर्म का पालन करेगा और अपने दायित्वों को पूर्ण करेगा।
        यदि हम कहें कि शरीर और मन दोनों की सृष्टि अन्न से ही होती है तो यह कथन अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसीलिए हमारे ऋषि-मुनि सात्विक आहार पर बल देते थे।
        इससे शरीर पुष्ट होता है व मन सद् विचारों की अधिकता होती है। हम लोग खाने के लिए जीते हैं जबकि खाना जीने के लिए होना चाहिए। आजकल घर का शुद्ध खाना खाने के बजाय जंक फूड का प्रचलन बड़ता जा रहा जो स्वास्थ्य की हानि कर रहा है। छोटे-छोटे बच्चे बीपी, शूगर, मोटापा, दिल की बिमारी, कमजोर नजर और न जाने किन-किन बिमारियों के शिकार हो रहे हैं।
       विचारणीय है कि जिन परिवार जनों के लिए मनुष्य पाप-पुण्य, छल-फरेब, झूठ- सच सब करता है उसका पुण्य बटोरने के लिए तो सब तैयार हो जाएँगे पर पाप का हिस्सा बाँटने वाला उसके अतिरिक्त और कोई नहीं होगा। तो फिर यह अत्याचार व अनाचार से धन क्यों कमाना? क्यों किसी का गला काटना या दिल दुखाना?
         वास्तव में सच्चाई व ईमानदारी की कमाई में जो बरकत होती है उसका कोई मुकाबला नहीं हो सकता। इसी कमाई से घर-परिवार व स्वयं मनुष्य सुखी रहता है। संतान भी योग्य, आज्ञाकारी व संस्कारी होती है। हो सकता है वह दुनिया की नजर में लूज़र हो पर उसका कोई भी ऐसा कार्य नहीं जो सीमित साधन होने पर भी पूरा न हो। ईश्वर ऐसे व्यक्ति का खास ख्याल रखता है व उसे निराश नहीं होने देता।
      कहते हैं हमारे शरीर में सभी देवी-देवताओं का निवास होता है। तामसिक भोजन का अंश उनको मिलता है तो वे कमजोर हो जाते हैं और सात्विक भोजन से पुष्ट।
       अपने घर-परिवार को संस्कारी बनाने के लिए उन्हें सात्विक अन्न खिलाएँ जो तन और मन दोनों के लिए आवश्यक है।

मंगलवार, 3 मार्च 2015

बड़े होने का सार

मनुष्य जब बच्चा होता है तो उसे बड़े होने की जल्दी होती है। वह सोचता है कि कब वह बड़ा होगा और अपनी मनमर्जी के अनुसार चलेगा। उसे यह लगता है कि घर में जो बड़े हैं वे हमेशा उस पर हुक्म चलाते हैं। न चाहते हुए भी उसे सबका कहना मानना पड़ता है। वह सोचता है उसकी तो जैसे कोई इच्छा ही नहीं है। किसी से ऊँची आवाज में बात नहीं कर सकता। अगर आस-पड़ोस या स्कूल से शिकायत आ जाए तो बस खैर नहीं।
       वह हमेशा सोचता है कि मुझ बेचारे को मारने, पीटने व डांटने  का हक सबको है। वह बेचारा तो किसी का विरोध भी नहीं कर सकता और यदि करे तो उसे कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। छोटी-सी गलती हो जाने पर उसे सबसे डांट खानी पड़ती है।
        हर कोई उसे बात-बात पर टोकता है। कभी पढ़ाई के नाम और कभी खेलने के बहाने से बेचारा सबकी नसीहतें सुनता है। घर हो या स्कूल सब तरफ उसे बड़ों की मर्जी से चलना पड़ता है। उठने-बैठने, खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने यानी कि हर कदम पर वह बलि का बकरा बनता है।
         बच्चा हमेशा सोचता है कि बड़े लोग बहुत सुखी होते हैं। उन्हें नींद खराब करके स्कूल नहीं जाना पड़ता। न उन्हें होमवर्क की चिन्ता होती है और न परीक्षा व उसके परिणाम का डर होता है। जहाँ उनका दिल चाहता है चले जाते हैं। किसी से इजाजत लेने की भी आवश्यकता नहीं होती। वह सपने देखता है कि स्कूल पास करके कालेज जा रहा है। फिर कालेज के बाद नौकरी कर रहा है। वह धीरे-धीरे अपने खुशहाल जीवन के सपनों में खोने लगता है।
        थोड़ा और बड़ा होकर अपनी गृहस्थी बसाने को उत्साहित होता है। घर-गृहस्थी और नौकरी की चक्कर-घिन्नी में फंसा जब वह कोल्हू का बैल बनने लगता है तब उसे आपने बचपन की खट्टी-मीठी यादें सताने लगती हैं। तब गुहार लगता है कि कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दे।
         कहने का तात्पर्य है कि जब वह बड़ा हो जाता है तब उसे अपना बचपन याद आता है। फिर वह सोचता है काश उसका बचपन लौट आए।
       उस समय वह बच्चा बनना चाहता है। पर बचपन का समय तो कहीं पीछे छूट जाता है। वह सोचता है कि माता-पिता की छत्रछाया में बहुत आनन्द था। कोई चिन्ता, कोई फिक्र नहीं थी। बस खाना-पीना और मस्ती करना यही काम थे। किसी ने कहा-सुना तो चीख-चिल्ला लिए और पुचकार दिया तो अपने को खुदा समझ लिया।
       अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए जिद करना और उनके पूरा होने पर उत्सव मनाने जैसा आनन्द ही तो जीवन होता था। जीवन के थपेड़ों से माता-पिता बचाते थे। स्वयं कष्ट सहकर भी हमारी सारी जरूरतें पूरी करते थे। उस समय हम राजा थे। अपनी बालहठ 'येन केन प्रकारेण' अर्थात किसी भी तरह मनवा लेते थे।
         जीवन इसी तरह चलता रहता है। एक पड़ाव को पार करके उसमें लौटना किसी भी प्रकार संभव नहीं होता। अपने अगले पड़ाव को हम आशा भरी नजरों से देखते हैं। एक को खोने का गम व दूसरे को पाने का आनन्द भी स्थायी नहीं रह पाता। जीवन की जिस भी अवस्था में जी रहे हैं उसमें ईश्वर का धन्यवाद करते हुए आगे बढ़ते रहें तो फिर आनन्द-ही-आनन्द होता है। यही मानव जीवन का सार है जिसे समझकर उदासीनता से मुक्त हुआ जा सकता है।

सोमवार, 2 मार्च 2015

स्वर्ग नरक की परिकल्पना

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना प्रायः सभी धर्मो में मिलती है। इसके विषय में बहुत कुछ कहा व सुना जाता है। स्वर्ग व नरक के विषय में यदि विचार किया जाए तो मन इसके विपरीत सोचता है। माना यही जाता है कि बुरे कर्म करने वालों को नरक मिलता है जहाँ बदबू होती है, कड़ाहों में उबलता रहता है जिसमें दुष्कर्म करने वालों को डाला जाता है आदि। कहने का तात्पर्य है कि वहाँ उसे तरह-तरह की प्रताड़ना मिलती है। इसके विपरीत स्वर्ग में  वहाँ भोग विलास के लिए अपसराएँ हैं,  हरियाली है आदि। यानि कि सभी प्रकार के ऐशो आराम मिलते हैं।
        कहते हैं कि ईश्वर का परमधाम एक स्थान विशेष है जिसे प्राप्त करके मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। चित्रगुप्त सभी प्राणियों के लेखेजोखे का हिसाब रखने के लिए खाता रखते हैं। मृत्यु के पश्चात जब मृतक ऊपर जाता है तो उसे जीवन में किए गए कर्मों को पढ़कर सुनाया जाता है। तदनुसार उसे स्वर्ग या नरक उपहार या सजा के रूप में दिया जाता है। मृत्यु के देवता यमराज जीव के शरीर में विद्यमान आत्मा को ले जाने के लिए अपने दूतों यानि यमदूतों को भेजते हैं।
      यह विचारणीय है कि हमारे शरीर में रहने वाली आत्मा, अजर, अमर व नित्य है और इस पर किसी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
          न जायते म्रियते वा कदाचन
                नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
          अजो नित्यं शाश्वतोsयं पुराणो
                न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
इस श्लोक का अर्थ है कि आत्मा का न जन्म होता है और न मृत्यु होती है। ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा। आत्मा अजर, नित्य, शाश्वत व प्राचीन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।
यह श्लोक देखिए-
              नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
              न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥
      यह श्लोक समझा रहा है कि आत्मा को न शस्त्र काट सकते है, न इसे आग्नि जला सकती है। इसे जल गीला नहीं कर सकता और हवा सुखा नहीं सकती।
      अब प्रश्न यह उठता है कि सभी सुख -दुख, लाभ-हानि, जीवन-मरण आदि स्थितियाँ  अथवा भोग इस शरीर के हैं आत्मा के नहीं तो स्वर्ग अथवा नरक में दण्ड किसे मिलता है और किसे सुख-सुविधाएँ मिलती हैं।
       इस भौतिक शरीर को तो अपने अपने धर्म के अनुसार जला या दफना दिया जाता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि शरीर इस पृथ्वी पर ही समाप्त हो गया। फिर इसे सजा या पुरस्कार नहीं मिल सकता। आत्मा को तो हमारे ग्रंथ इन भोगों से परे  मानते हैं इनकी वह अधिकारी नहीं।
        हमारे मनन का विषय है कि आत्मा और शरीर जब दोनों ही स्वर्ग व नरक के अधिकारी नहीं तो कौन है?
       हमारी तर्क बुद्धि कहती है कि स्वर्ग व नरक किसी निश्चित स्थान पर नहीं हैं अपितु इसी धरा पर हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं तो जब हम सुख-सुविधाओं से सम्पन्न अपने बन्धु-बांधवों के साथ हर प्रकार से सुखी जीवन जी रहे होते हैं तो स्वर्ग में रहते हैं या स्वर्ग के समान सुख भोग रहे होते हैं।
        इसके विपरीत जब हम दुखों-परेशानियों में घिरे सबसे अलग-थलग रहकर कष्टों का सामना करते हैं, उस समय हम नरक तुल्य जीवन जीते हैं।
       हम कह सकते हैं कि स्वर्ग व नरक दोनों इसी धरती पर हैं जिन्हें हम अपने इस जीवनकाल में  कर्मानुसार भोगते हैं।

रविवार, 1 मार्च 2015

ईश्वर का प्रिय

ईश्वर को हम सब अपने-अपने तरीके से स्मरण करते हैं। कुछ कर्मकाण्ड से, कुछ पूजा-पाठ करके, कुछ जप-तप करके और कुछ व्रत आदि के द्वारा प्रभु को पाने का यत्न करते हैं। हम अपनी भक्ति में सफल हो पाते हैं या नहीं, हम नहीं जानते। केवल वह मालिक ही जानता है कि उसे हमारी आराधना में सच्चाई दिखाई देती है या मात्र प्रदर्शन।
         ईश्वर की उपासना यदि ईमानदारी व सच्चे मन से की जाए तभी उसे भाती है। प्राणीमात्र के प्रति मन में सद् भावना न हो तो मनुष्य उसका प्रिय नहीं बनता। हम अपने बच्चों व बन्धु-बान्धवों से प्यार करते हैं। उनके सुख-दुख में हर्ष-शोक का अनुभव करते हैं। उसी प्रकार वह मालिक चाहता है कि उसकी बनाई सृष्टि से भी हम प्यार करें।
         हम में से बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो अपने-आपको सबसे बड़ा भक्त मानते हैं। वे दावा करते हैं कि वे ईश्वर के बहुत पास हैं या यूँ कहें कि वे स्वयं को ईश्वर ही मानने लगते हैं। दूसरों पर अत्याचार करके अपना अहम तुष्ट करते हैं।
       ऐसी कथा सुनी थी कि नारद जी को बड़ा अभिमान था कि वे प्रभु के सबसे बड़े भक्त हैं। एक बार नारद जी भगवान के पास गए और कहा कि मुझसे बड़ा आपका कोई भक्त नहीं है। पर प्रभु ने उन्हें यह कहकर निराश किया कि वे सबसे बड़े भक्त नहीं बल्कि उनसे भी बड़ा भक्त कोई और है। नारद जी के पूछने पर उन्होंने गाँव में रहने वाले एक किसान के बारे में बताया। यह सुनकर नारद जी को अच्छा नहीं लगा, वे बहुत परेशान हो गए।
         नारद जी चल दिए उस परम भक्त से मिलने। वे जब उस किसान से मिले तो आश्चर्यचकित रह गए कि किसान दिन में सिर्फ तीन बार प्रभु को याद करता है। एक बार प्रातः खेत में जाते समय, दूसरा दिन में खाना खाते समय और तीसरी बार जब वह वापिस घर आता है।
        नारद जी को यह सब समझ नहीं आया कि दिन में केवल तीन बार प्रभु को याद करने वाला किसान उनसे बड़ा भक्त कैसे हो गया? यही प्रश्न उन्होंने प्रभु से किया। वे मुस्कुराए और तेल से भरा पात्र नारद जी को देते हुए बोले- 'जाओ पृथ्वी का चक्कर लगाकर आओ पर तेल की एक भी बूँद गिरनी नहीं चाहिए।'
        नारद जी भ्रमण कर प्रभु से प्रशंसा पाने की कामना से कार्य पूर्ण करने की चर्चा करने लगे। तब प्रभु ने पूछा इस कार्य को करते समय कितनी बार मुझे याद किया? नारद जी ने इंकार में सिर हिला दिया यह कहकर कि तेल पात्र से न गिरे बस इसी काम में लगा रहा।
        तब प्रभु ने उन्हें समझाया कि जो मुझे सच्चे मन से याद करता है और अपने काम को करते समय मेरा स्मरण करता है वही मुझे प्रिय होता है।
        मुख्य बात है कि ईश्वर मनुष्य की भावना को देखता है। दिखावे या रिश्वत वाली भावना को पसंद नहीं करता। वह हमारे अपने अंदर विद्ममान है। जब चाहो मन में झांको और उसे पा लो। ईश्वर को निश्छल, ईर्ष्या-द्वेष से रहित, सच्चे व ईमानदार लोग पसंद आते हैं। इसलिए हम अपने अंतस में जितना अधिक सद् गुणों का विस्तार करेंगे उतना ईश्वर के समीप जाएँगे।