बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

सेवक की सजा मालिक को नहीं

 सेवक की सजा मालिक को नहीं

मनुष्य को उसके किए गए दोषपूर्ण कार्य की सजा अवश्य मिलती है। ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि दोष कोई और व्यक्ति करे, परन्तु उसकी सजा किसी अन्य को मिल जाए। इस प्रकार का चलन यदि हो जाए, तब सर्वत्र अराजकता का माहौल बन जाएगा। गलत काम करने वाला यदि बच जाए और उसके स्थान पर किसी निर्दोष को नाप नहीं सकते। अपने-अपने हिस्से की सजा ही मनुष्य को मिलती है।
         निम्न श्लोक में कवि ने इसी विषय पर कहा है-
       धीमात्रकोपाधिरशेषसाक्षी
             न लिप्यते तत्कृतकर्मलेशैः।
       यस्मादसङ्गस्तत एव कर्मभिः
            न लिप्यते किञ्चिदुपाधिना कृतैः॥
अर्थात् बुद्धि आत्मा की उपाधि है। बुद्धि जो भी इस जगत में व्यवहार (कार्य) करती है, आत्मा उस कर्म की साक्षी होती है। आत्मा बुद्धि द्वारा किये गये कर्मों को देखती है लेकिन उन कर्मों में लेशमात्र भी लिप्त नहीं होती। क्योंकि उपाधि द्वारा किये गये कर्म मूल को नहीं बाँध सकते। 
          इस श्लोक के कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर में रहने वाली आत्मा केवल द्रष्टा मात्र है। आत्मा बुद्धि के द्वारा किए गए शुभाशुभ कर्मों की साक्षी होती है। बुद्धि जो भी गलत या सही कर्म करती है, उससे उसका कुछ भी लेना देना नहीं होता। उपाधि यानी बुद्धि के कर्म मूल यानी आत्मा को नहीं बाँध सकते। यह सत्य है कि आत्मा उन कर्मों के लिए उत्तरदायी कदापि नहीं हो सकती। 
          कोई व्यक्ति अपने घर में यदि नौकर रखता है और उसने किसी प्रकार का कोई अपराध कर्म किया है। तब उस कर्म के लिए सजा उसे ही मिलेगी, उसका मालिक उसके लिए बिल्कुल जिम्मेदार नहीं होता। यदि नौकर ने गलती की है तो उसकी सजा उसी को ही मिलेगी, उसके मालिक को कदापि नहीं। इसका अर्थ यही हुआ कि वह मालिक किसी भी तरह दोषी नहीं माना जाएगा।
          कालजयी रामायण की कथा के रचयिता महर्षि वाल्मीकि अपने जीवन के।पूर्वकाल में राहजनी करते थे। यानी वे डाकू थे। उनका नाम रत्नाकर था। एक बार साधुओं की टोली वहाँ से जाने लगी, तो स्वभाव के अनुसार उन्होनें अपने साथियों के साथ लूटने के उद्देश्य से उन्हें रोका। साधुओं ने उनसे पूछा, "यह पापकर्म तुम किसलिए कर रहे हो?"
          रत्नाकर ने उत्तर दिया, "अपने परिवार का पालन करने के लिए।"
          साधु ने उनसे पूछा, "यह पापकर्म तुम जिन लोगों के लिए कर रहे हो, क्या वे इस कर्म में भागीदार होंगे?"
          उन्होंने कहा, "अवश्य ही मेरी पत्नी, मेरे माता-पिता और मेरे बच्चे साथ देंगे।"
           साधु ने कहा, "जाओ उनसे पूछकर आओ।"
           रत्नाकर ने हँसते हुए कहा, "मैं घर जाँऊ और तुम चले जाओ। तुमने मुझे मूर्ख समझा है क्या?"
            साधु ने कहा कि वे उन्हें रस्सी से बाँधकर चले जाएँ। रत्नाकर ने उनकी बात मान ली और घर चले गए। घर जाकर अपनी पत्नी से पूछा, तो उसने उत्तर दिया, "मेरा भरण-पोषण करना तुम्हारा दायित्व है। तुम पैसा कमाते हो, मुझे कोई लेना देना नहीं। मैं तुम्हारे पापकर्म में भागीदार नहीं बनूँगी।"
           रत्नाकर के माता-पिता और बच्चों ने भी उन्हें ऐसा ही कड़वा उत्तर दिया कि केवल वही अकेला अपने कर्मों के लिए जिम्मेदार है, वे सब नहीं। उनकी आँखें खुल गईं और वे साधुओं के चरणों में जाकर गिर गए। फिर वे पश्चाताप करने लगे और तप करने लगे।
           इस घटना को लिखने का उद्देश्य मात्र यही है कि मनुष्य जो भी स्याह-सफेद करता है, उसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी होता है। कोई अन्य उसके शुभाशुभ कर्म में भागीदार नहीं बन सकता। चाहे वे उसके माता-पिता हों, चाहे पति या पत्नी हो, चाहे उसके बच्चे या फिर उसके बन्धु-बान्धव कोई भी क्यों न हो, उसके कर्मों के फल से परे रहते हैं। यह भोग अकेले मनुष्य का ही होता है, जो उसे करता है।
           इस चर्चा का सार यही है कि जब मनुष्य के माता-पिता, बच्चे और पत्नी उसके दुष्कर्मों में भागीदार नहीं होते, तो एक सेवक का मालिक उसके पापकर्म का उत्तरदायी कदापि नहीं हो सकता। उस सेवक को अपने दोष की सजा स्वयं ही भोगनी पड़ती है। उसकी पत्नी और बच्चे भी जब उसके कर्मों के फल में हिस्सेदारी नहीं करते, तो उसका मालिक कैसे सजा पा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

चुगलखोर आँसू

चुगलखोर आँसू

खुशी का समय हो अथवा दुख से परेशानी हो, ये आँसू बिना कहे मनुष्य की आँखों से अनायास ही बहने लगते हैं। हर मनुष्य के जीवन में कुछ उत्तेजित करने वाली चीजें या घटनाएँ होती है, जो उसे यदा कदा रुला देती हैं। मनुष्य को किस कारण से रोना आता है, इसके उत्तर बहुत अलग-अलग हो सकते हैं। रोने के उदगम के बारे में बातें बहुत-सी हैं और अनिश्चित भी हैं। यह एक अनुसन्धान का विषय है।
          जब कभी मनुष्य को चोट लगती है, तो उसकी आँखों से आँसू आ जाते हैं। जब वह किसी भी कारण से दुखी होता है, तब भी ये आँसू आते हैं। जब मनुष्य शरीरिक रूप से या मानसिक रूप से परेशान होता है, तब भी आँसू उसके साथी बन जाते हैं।वृद्धावस्था में जब मनुष्य अशक्त हो जाता है, कोई कार्य करने की स्थिति में नहीं रहता, तब भी ये आँसू उसका दामन नहीं छोड़ते। 
          जब विवशता में किसी से अपनी सेवा करवानी पड़ जाए, तब भी ये आँसू नहीं थमते। जो मनुष्य बहुत अधिक भावुक होता है, जरा-सी बात हो जाने पर उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। उदास करने वाला संगीत बजाया जाए तो आँसू आ धमकते हैं। किसी फिल्म का कोई सीन दिल को छू जाए, तब भी आँसू आ जाते हैं। इसी प्रकार पुस्तक पढ़ते-पढ़ते भी आँसू मनुष्य के साथी बन जाते हैं।
          मनुष्य कभी-कभी किसी भी कारण से बहुत दुखी होता है, उस समय उसका कोई प्रियजन उसके सिर पर या कन्धे पर सान्त्वना प्रदर्शित करने के लिए हाथ रखता है, तो उसका गला रुँध जाता है और आँखों से आँसू ढलक जाते हैं। अपने किसी प्रिय के वियोग में ये आँसू थमने का नाम नहीं लेते। अपने से दूर गए यानी परदेस गए या परलोक गए बन्धु-बान्धवों को याद करते समय आँसू साथ निभाते हैं।
          जब मनुष्य जीवन में हताश या निराश होता है और उसे उस परेशानी से उबरने के कोई रास्ता नहीं दिखाई देता, तब दुखी होकर रोता है, परमपिता परमात्मा से वह गिला-शिकवा करता है। व्यवसाय में या नौकरी पर काले बादल मण्डराने लगते हैं, तब कोई उपाय न सूझने पर वह रोता और बिलखता है। असफलता या पराजय का सामना होने पर भी मनुष्य की आँसू आँखों से निकले बिना नहीं रहते।
          बहुत समय से माँगी गई किसी मन्नत के पूर्ण होने पर आँसू छलक जाते हैं। खेल या किसी अन्य प्रतियोगिता में सफल होने पर भी आँखें नम हुए बिना नहीं रह पातीं। जब मनुष्य को उसके परिश्रम का मनचाहा फल मिल जाता है, तब भी आँखों से निकलने वाले ये आँसू चुप नहीं रहते। अपने किसी प्रियजन से बहुत समय के पश्चात मिलने पर भी खुशी के मारे आँसू निकल जाते हैं। 
          वास्तविक जीवन  में रोना बहुत अलग तरह का होता है। मगरमच्छ वाले आँसुओं से किसी भी सज्जन व्यक्ति को सहजता से धोखा दिया जा सकता है और मनुष्य अपना न बनता हुआ काम उससे सरलता से निकलवा सकता है। वैसे तो यह बात मानवीय मूल्यों के अनुसार गलत सोच है, परन्तु स्वार्थवश कुछ लोग ऐसे काम करते हैं। किसी की गई गलती का अहसास होने पर पश्चाताप स्वरूप मनुष्य की आँखों से आँसू निकल जाते हैं।
           कभी-कभी शारिरिक रोग मायूसी का कारण बन जाते हैं। विटामिन की कमी, स्ट्रोक, थायरॉयड समस्या, लो बल्ड शुगर लेवल के कारण भी रोना आता है। रोने के पीछे एक अहं कारण डिप्रेशन भी होता है। उसमें मनुष्य ऋण लगता है, तो रोता ही चला जाता है। उसे अपने ऊपर नियन्त्रण ही नहीं रहता। कभी-कभी लोग थोड़े समय में ही डिप्रेशन से बाहर आ जाते हैं तो कभी तनाव कम ही नहीं होता है।
          आँसुओं के चुगलखोरी करने के बहुत से कारणों को यहाँ सार रूप से लिखा है। इनके अतिरिक्त भी और कई कारण हो सकते हैं, जब ये आँसू मनुष्य की आँखों से बाहर निकलकर गंगा-यमुना बहाने लगते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि चाहे मनुष्य का सुख-समृद्धि का समय हो या फिर दुख-परेशानी का काल, दोनों ही अवस्थाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने से ये आँसू नहीं चूकते। आँसू रूपी ये मोती अवसर मिलते ही मनुष्य की आँखों से बाहर निकलने की फिराक में रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

जीवन का शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष

 जीवन का शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में शुक्लपक्ष यानी उजला अंश और कृष्णपक्ष यानी काला अंश दोनों ही होते हैं। इन दोनों को मिलाकर ही किसी मनुष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व बनता है। यदि मनुष्य के विषय में समग्र जानकारी प्राप्त करनी हो, तो उसके दोनों पक्षों पर विचार करना अनिवार्य होता है। अन्यथा उसके विषय में एकत्र की गई जानकारी को पूर्ण नहीं कहा जा सकता। वह अधूरी रह जाती है।
          मनुष्य जब घर-परिवार, देश, धर्म, समाज और राष्ट्र के हित के कार्य करता है, तो वह उसके जीवन का शुक्लपक्ष होता है। जब वह इनके विपरीत कार्य करता है, तो वह उसके जीवन का कृष्णपक्ष होता है। इस पक्ष में मनुष्य किसी भी कारण से आ तो जाता है, पर इसमें से बाहर निकल पाना असम्भव होता है। ये कार्य तो कोयले की दलाली जैसे होते हैं, जो भी इन्हे छू लेता है, उसका दामन दागदार हो जाता है।
          मनुष्य केवल अपना शुक्लपक्ष यानी अच्छा-अच्छा ही सबको दिखाना चाहता है। अपना कृष्णपक्ष यानी काला अथवा बदसूरत हिस्सा सारी दुनिया से छिपाकर रखना चाहता है। वह चाहता है कि लोग उसके जीवन के शुक्लपक्ष को ही देखकर उसके बारे में अच्छी-अच्छी धारणा बनाएँ। वह कभी नहीं चाहता कि उसके जीवन के कृष्णपक्ष को देखकर लोग उसे तिरस्कृत करें या अनदेखा करें।
         मनुष्य भूल जाता है कि चिरस्थायी रामकथा को लिखने वाले महर्षि वाल्मीकि के पहले डाकू होने की बात को लोग भूल नहीं पाते। महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य अँगुलीमाल का पूर्वकाल में डाकू होना लोग याद करते रहते हैं। संस्कृत भाषा के विश्व में सुप्रसिद्ध महाकवि कालिदास का पूर्व में महामूर्ख होना लोग विस्मृत नहीं कर पाते। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास को खोजने पर मिल जाते हैं।
          मनुष्य अपनी सफेदपोशी बनाए रखना चाहता है। मनुष्य चाहता है कि वह जायज या नाजायज किसी भी तरह से धन को कमा ले, किसी को कानोकान उसकी भनक भी नहीं लगनी चाहिए। एक बार पर्याप्त धन कमा लेने के बाद कौन पूछता है कि उसने धन कैसे कमाया? वह सोचता है कि उस धन का दान करके या अपने नाम के पत्थर लगवाकर वह महान बन जाएगा। परन्तु वास्तविक जीवन में ऐसा सम्भव नहीं हो पाता। 
           मनुष्य का यश या अपयश, उसके शुभाशुभ कर्मों का लेखा-जोखा होता है, जो उससे पहले ही उस स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ वह जा रहा होता है। मुँह के सामने शायद उसका लिहाज करके कोई कुछ न कहे, पर उसकी पीठ के पीछे सब लोग उसके कर्मों पर चर्चा करते हैं, उनका पिष्टपेषण कर डालते हैं। दुनिया तो किसी से नहीं डरती, वह सच्चाई का पोषक होती है, नीर-क्षीर विवेकी होती है। लोगों को किसी के फटे में टाँग अड़ाने की बुरी आदत होती है। 
           उजले या शुभकर्म करने वाले लोगों को घर-परिवार, समाज और ईश्वर का डर होता है। इसलिए वे कभी गलत काम करने की सोचते भी नहीं हैं। शुभकार्यों को करते हुए वे अपने जीवन में मस्त रहते हैं। जीवन में यदि किसी वस्तु की कमी भी हो, तो उसके लिए परेशान नहीं होते। उन्हें ईश्वर पर भरोसा होता है कि वह सब ठीक कर देगा। यही उनकी मस्ती का प्रमुख कारण होता है।
          काले कारनामे करने वाले मनुष्य घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के बनाए नियमों के विरुद्ध कार्य करते हैं। ये लोग कहते हैं कि वे किसी से भी नहीं डरते। परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत होती है। इन लोगों को दिन के उजाले में भी डर लगता है। ये लोग न्याय-व्यवस्था के दोषी होते हैं, जो कभी भी उसके हत्थे चढ़ जाते हैं। तब उनकी सारी होशियारी धरी की धरी रह जाती है।
            मनुष्य के विवेक पर निर्भर करता है कि वह दुनिया को अपना कौन-सा पक्ष दिखाना चाहता है? मेरे विचार में यदि मनुष्य का कोई कृष्णपक्ष है भी, तो वह कभी उसे नहीं दिखाना चाहता। वह केवल अपना शुक्लपक्ष ही दुनिया को दिखाकर वाहवाही लूटना चाहता है। सार रूप में मैं यही कहना चाहती हूँ कि मनुष्य समाज के समक्ष अपना जो भी रूप प्रकट करना चाहता है, उसके अनुरूप उसे कर्म भी करने चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

घर में झगड़े का कारण

 घर में झगड़े का कारण

घर के सभी सदस्यों में कभी न कभी किसी बात को लेकर मनमुटाव हो जाता है। फिर यही झगड़े का कारण बन जाता है। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य ऐसे घर की कल्पना करता है, जहाँ सभी परिवारी जन मिल-जुलकर परस्पर प्रेम से रहते हैं। बड़े छोटों के सिर पर अपना वरद हस्त रखते हैं और छोटे बड़ों की आज्ञा का पालन करते हैं। इस प्रकार ऐसे घर में देवताओं का वास माना जाता है, और घर स्वर्ग की भाँति सुख से पूर्ण कहा जाता है।
           घर में चार सदस्‍य होते हैं, तो यह सम्भव है कि किसी भी मुद्दे पर सबकी राय अलग-अलग हो। मतभेद होना कोई बड़ी बात नहीं है। यह मतभेद जब मनभेद का रूप लेकर झगड़े का कारण बन जाता है, तो बात चिन्ताजनक हो जाती है। अक्‍सर देखने में आता है कि कई घरों में न चाहते हुए भी अक्‍सर लड़ाई-झगड़े होते हैं। झगड़े के कारण कई लोगों को मानसिक तनाव की समस्‍या से गुजरना पड़ता है।
         आर्थिक पक्ष झगड़े का प्रमुख कारण होता है। अक्सर पैसे को लेकर घर पर तनातनी होती रहती हैं। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने पर मनुष्य अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाता। धन का अभाव में मनुष्य के सारे कार्य स्थगित हो जाते हैं। वह केवल दो जून रोटी का जुगाड़ किसी तरह करने का प्रयास करता है। अतः घर के सदस्य एक-दूसरे को बुरा-भला कहते रहते हैं।
          पति-पत्नी में झगड़े के कई कारण होते हैं। दोनों में से एक का कम पढ़ा होना, रंग-रूप में कमतर होना, पत्नी की आय पति से अधिक होना। इसे हम मिस मैच विवाह भी कह सकते हैं। ऐसी स्थितियों में एक-दूसरे को नापसन्द करने के कारण परस्पर छींटाकशी होने से घर का माहौल प्रभावित होता है। कई बार पति अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए पत्नी पर घर से बाहर जाकर अय्याशी करने का आरोप लगाता है।
           विवाहेत्तर सम्बन्ध चाहे पति का हो अथवा पत्नी का, झगड़े का कारण बनते हैं। कोई भी मनुष्य अपने साथी के इस प्रकार के सम्बन्ध को सहन नहीं कर पाता। इसलिए उनके झगड़े दिन-प्रतिदिन बढ़ते रहते हैं। इससे घर का वातावरण बोझिल हो जाता है। इस सम्बन्ध का अन्त अलगाव यानी तलाक होता है। धन की कमी या अन्य कोई कमी तो सहन की जा सकती है, पर चरित्र की इस कमी को कोई भी साथी बर्दाश्त नहीं कर पाता।
           अनेक बार पिता और पुत्र में झगड़ा हो जाता है, माता और बेटी में झगड़ा हो जाता है। इसका कारण बच्चों की मनमानी कही जा सकती है। बच्चे सोचते हैं कि वे बड़े हो रहे हैं और उनके माता-पिता उन्हें समझते नहीं हैं। वे बस कूप मण्डूक ही हैं। और दूसरी ओर माता-पिता का मानना है कि पढ़-लिखकर बच्चों के दिमाग खराब हो गया है। वे सोचते हैं कि वे बहुत बड़े हो गए हैं। वे अपने बराबर किसी को समझदार समझते ही नहीं हैं।
          बड़े दुर्भाग्य की बात है कि सास-बहू में झगड़ा प्रायः घरों में होता रहता है। यह लड़ाई सारी प्रभुत्व की होती है। सास घर पर बना अपना एकाधिकार छोड़ना नहीं चाहती। वह सोचती है कि कल की आई लड़की को वह घर की जिम्मेदारी कैसे सौंप दे। बहू सोचती हैं कि घर उसका भी उतना है, जितना सास का है। फिर एक-दूसरे की कमियाँ निकालने के कारण झगड़े होते हैं। इसके अतिरिक्त दहेज को लेकर भी बहू को प्रताड़ित किया जाता है।
          कभी-कभी भाई-बहन या भाई-भाई में भी झगड़ा हो जाता है। धन-सम्पत्ति को लेकर प्रायः विवाद होते रहते हैं। इसलिए उत्तराधिकार का झगड़ा भाई-बहनों में परस्पर दूरियाँ बना दता है। बेटी या बेटा कोई भी माता-पिता की सम्पत्ति से अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता। भाई सोचते हैं कि बहन को कुछ क्यों दें और बहन सोचती हैं कि वह अपने अधिकार का प्रयोग क्यों न करे। एक भाई दूसरे भाई से अधिक हड़पना चाहता है।
         झगड़ा अक्सर किसी गलतफहमी के कारण हो जाता है। एक-दूसरे से खुलकर बातचीत न करने की वजह से भी झगड़ा हो जाता है। कई बार घर के सदस्यों के बीच लड़ाई इसलिए भी हो जाती है, क्योंकि वे अनजाने में ही किसी बात का बतंगड़ बना देते हैं। कभी कभार घर के किसी सदस्य का चिल्लाकर बोलना भी झगड़े का कारण बन जाता है। इनके अतिरिक्त भी कई और कारण हो जाते हैं, जिनसे घर का माहौल बोझिल हो जाता है।
          सांसारिक भौतिक वस्तुओं के पीछे इन्सान पागल हुए रहते हैं। जबकि सब जानते हैं कि दुनिया को छोड़ते समय सब यहीं रह जाना है, चाहे वह धन-सम्पत्ति हो या रिश्ते हों। सबको इनके लिए झगड़ना नहीं चाहिए। मिल-जुलकर, प्यार से अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। पता नहीं कौन पहले दुनिया को छोड़ेगा और कौन बाद में। उस समय पश्चाताप करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। इसलिए अपने लालच और अहं का त्याग करके हर मनुष्य को सद्भावना से जीवन व्यतीत करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

मन की बात मन में

 मन की बात मन में

मनुष्य के साथ बहुधा ऐसा होता है कि वह बहुत कुछ कहना चाहता है, पर उसकी बात उसके मन में ही रह जाती है। समय बीत जाने के बाद वह सोचता है कि उसे ऐसे कहना चाहिए था या वैसे कह देना चाहिए था। पर अब तो कुछ भी नहीं हो सकता। तब तक वह कहने का अवसर खो चुका होता है। अपने मन की बात को दूसरों के समक्ष प्रकट न कर पाने के कई कारण हो सकते हैं।
           बड़ों का सम्मान करना एक कारण हो सकता है। माता-पिता अथवा गुरुजनों के सम्मान के कारण  मनुष्य उन्हें उत्तर नहीं दे पाता। उसे लगता है कि यदि उन्हें पलटकर जवाब दिया गया, तो कहीं वे इसे अपना अपमान न समझ लें। इसलिए वह उस समय चुप लगा जाता है। शायद बड़े लोग मनुष्य की इस चुप्पी को उसकी भूल मानकर लानत-मलानत करते हैं।
         मनुष्य जिससे प्यार करता है, उसे ठेस न लगे या उसे बुरा न लग जाए, यह सोचकर वह अपने मन को मारकर खामोश हो जाता है। अपने प्रियजन का दिल दुखाने के विषय में वह स्वप्न में भी कभी सोच नहीं सकता। यह मनुष्य का दुर्भाग्य है कि इस चक्कर में कभी-कभी वह कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। अपने प्यार को बचाने के लिए वह अपनी अवमानना सहन कर जाता है।
            जो मनुष्य अपने रिश्तों का सम्मान करता है, वह उन्हें किसी भी शर्त पर कभी बिगड़ने नहीं देना चाहता। रिश्ते न बिगड़ जाएँ, इसलिए वह गम खा लेता है। परन्तु वह किसी से कुछ नहीं कहता। अपने रिश्तों को वह सहेजकर रखना चाहता है। यदि कोई छोटी-मोटी बात उनमें हो भी जाए, तो उसे दरकिनार कर देता है। सच कहा जाए तो रिश्ते इसी प्रकार निभाए जाते हैं। समय आने पर उनकी दूरी मिट जाती है।
         मन की बात को न कह सकने का कारण डर भी हो सकता है। डर के कारण मनुष्य सामने वाले को जानते-बुझते हुए कुछ कह नहीं पाता। वह अपनी सफाई में बहुत कुछ कहना चाहता है, पर वह डर के कारण बोलने में असमर्थ हो जाता है। वहाँ मानो उसकी घिघ्घी बँध जाती है और वह मौन रह जाता है। यह डर उसके अवसाद का कारण बन जाता है। इस तरह मनुष्य का डर जीत जाता है और वह स्वयं हार जाता है।
        जब किसी बन्धु-बान्धव की मृत्यु हो जाती है, तब मनुष्य सोचता है कि जाने वाला तो चला गया, अब इसके बारे में कुछ कहने का कोई लाभ नहीं। इसलिए बहुत कुछ जानते हुए भी वह चुप रह जाता है। यह मनुष्य की समझदारी होती है, जो वह मृतक की छीछालेदर नहीं करता। वह उसके सारे रहस्यों को अपने मन के किसी कोने में ही दफन कर देता है। उन्हें प्रकट नहीं करता।
       किसी का दिल दुखाना जब मनुष्य को  अच्छा नहीं लगता, तब वह मौन साध लेता है। प्रत्येक मनुष्य अपने परिवारी जनों और प्रियजनों के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। वह नहीं चाहता कि उसकी किसी भी बात से उन्हें चोट पहुँचे। इसलिए वह अपने मन की बात को प्रकट नहीं करता। वह यही चाहता है कि उसके अपने सदा प्रसन्न रहें। तभी वह कड़वा घूँट स्वयं पीकर सबको खुशियाँ देता है।
       यदि मनुष्य को किसी व्यक्ति से लाभ मिलता होता है, तब वह उसके सामने अपना मुँह नहीं खोलता। उस समय उसकी हर अच्छी-बुरी बात को वह सहन कर लेता है, पर पलटकर उसे जवाब नहीं देते। वह उसकी हाँ में हाँ मिलता रहता है। उसके पीछे कारण यही होता है कि वह उस व्यक्ति को नाराज करके वह अपना अहित नहीं करना चाहता। इसलिए वहाँ मौन ही उसका अस्त्र होता है।
          इस प्रकार मनुष्य सही होते हुए भी दूसरे लोगों से कुछ नहीं कह पाता। कई बार मनुष्य की यह चुप्पी उसे भारी पड़ जाती है। लोग उसे गलत समझने की भूल करने लगते हैं। तब उसे कुछ न बोलने का खामियाजा भुगतना पड़ जाता है। इसलिए हर मनुष्य को चाहिए कि वह उचित समय पर अपने मन की बात बिना डरे कह डाले। इससे उसे अपने मन को मारकर पश्चाताप नहीं करना पड़ेगा। सत्य बात को कहने से उसके मन को सन्तोष होगा।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

मृत्यु मनुष्य का मित्र

  मृत्यु मनुष्य का मित्र

मनुष्य के जन्म लेने से लेकर इस संसार से विदा लेने तक मृत्यु सदा उसके साथ रहती है। वह मनुष्य का साथ पल भर के लिए भी नहीं छोड़ती। वह एक मित्र की तरह सदा उसके साथ-साथ चलती है यानी मृत्यु का साया सदैव मनुष्य के साथ ही रहता है या उसके ऊपर मँडराता रहता है। यह सत्य है कि चाहकर भी इससे वह कभी अलग नहीं हो सकता। कोई भी सम्बन्ध मनुष्य के साथ मृत्यु की तरह इतना समय तक साथ नहीं निभा पाता।
           मनीषी कहते हैं कि परछाई हमेशा मनुष्य के साथ ही चलती है। इसलिए वह अपने आस-पास अपनी परछाई को देखता है। समुद्रशास्त्र और सूर्य अरुण संवाद के अनुसार जब आत्मा मनुष्य को छोड़कर जाने लगती है, तब उसकी परछाई भी उसका साथ छोड़ देती है। कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति की परछाई तो उस समय भी होती है, लेकिन मरणासन्न व्यक्ति की दृष्टि अपनी परछाई को देख नहीं पाती है। उस समय उसकी आँखों में परछाई देखने की शक्ति समाप्त हो जाती है।
          मृत्यु कोई डरावनी वस्तु नहीं है। वह मनुष्य की विश्राम स्थली है। जिस प्रकार मनुष्य दिनभर परिश्रम करके थक जाता है, तब रात होने पर सो जाता है। प्रातःकाल तरोताजा होकर फिर से अपने काम में जुट जाता है। उसी प्रकार सारा जीवन मनुष्य सुख-दुख के थपेड़ों को खाता हुआ थक जाता है। तब वह मृत्यु की गोद में जाकर सो जाता है। फिर जागने के उपरान्त वह अपने नए जीवन की यात्रा के लिए तैयार हो जाता है।
            विकिपीडिया के अनुसार मृत्यु कोई शब्द नहीं है। महाभारत ग्रन्थ के अनुसार मृत्यु एक परम पवित्र मंगलकारी देवी है। सामान्य भाषा में किसी भी जीवात्मा अर्थात् प्राणी के जीवन के अन्त को मृत्यु कहते हैं। सामान्यतः वृद्धावस्था, लालच, मोह, रोग, कुपोषण के फलस्वरूप होती है। मुख्यत: मृत्यु के 101 स्वरूप होते है, लेकिन यह 8 प्रकार की मुख्य होती है। जिसमे बुढ़ापा, रोग, दुर्घटना, अकस्माती आघात, शोक, चिन्ता और लालच मृत्यु के मुख्य रूप है।
            मृत्यु उतनी ही सत्य है, जितना मनुष्य का इस संसार में जन्म लेना होता है। मनुष्य जन्म लेता है, धीरे-धीरे बड़ा होता है। वह पढ़-लिखकर योग्य बनता है। फिर कोई नौकरी करता है या व्यवसाय। उसके उपरान्त विवाह करके अपनी गृहस्थी बसता है। फिर बच्चों का पालन-पोषण करता है। उनके सैटल हो जाने पर, उनका विवाह करता है। तब तक वह स्वयं वृद्धावस्था की ओर कदम रख देता है। तदुपरान्त समय बीतते उसके इस संसार से विदा होने का समय आ जाता है यानी वह मृत्यु की गोद में चल जाता है।
        कहते हैं मृत्यु आने से नौ महीने पहले से ही कुछ ऐसी घटनाएँ होने लगती हैं, जो मृत्यु का संकेत देती हैं। यह संकेत इतने सूक्ष्म होते हैं कि मनुष्य अपनी प्रतिदिन की जिन्दगी में उन पर ध्यान ही नहीं दे पाता। जब मृत्यु एकदम करीब आ जाती है, तो पता लगता है कि कई काम तो अधूरे ही रह गए हैं।  ऐसी स्थिति में अन्तिम क्षणों में मन भटकने लगता है, तब मृत्यु कष्टदायक हो जाती है। 
           पुराणों का कथन है कि मृत्यु के समय यदि मनुष्य का मन शान्त और इच्छाओं से मुक्त होता है, तब वह बिना कष्ट के प्राण त्याग देता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा को परलोक में सुख की अनुभूति होती है। सयाने लोगों को ऐसा भी कहते सुना है कि मृत्यु के समय मनुष्य की जैसी वृत्ति होती है, उसे उसी के अनुरूप नया जन्म मिलता है। इसीलिए उस समय उसके पास बैठकर बन्धुजन किसी धर्मिक ग्रन्थ का पाठ करते हैं या फिर ईश्वर के नाम का जाप करते हैं।
            इस प्रकार मनुष्य के जीवन की यह साइकिल या एक चक्र समाप्त हो जाता है। यानी मनुष्य की मृत्यु उसके जीवन चक्र की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस प्रकार भी कह सकते हैं कि मृत्यु एक जन्म के अन्त और दूसरे जन्म के आरम्भ की एक प्रक्रिया है। जीवन का अन्त समय सुधारने के लिए अभी से ईश्वर का नाम स्मरण करने का अभ्यास करना चाहिए। ताकि उस समय पश्चाताप न करना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

पति-पत्नी में विश्वास

 पति-पत्नी में विश्वास

घर-परिवार का आधार पति और पत्नी दोनों ही होते हैं। इनके सम्बन्धों में परस्पर विश्वास और पारदर्शिता का होना बहुत ही आवश्यक होता है। जब तक ये दोनों एक-दूसरे के प्रति समर्पित भाव से रहते हैं, तब तक इनकी गृहस्थी की गाड़ी बहुत ही सुन्दर ढंग से चलती रहती है। यदि इनमें से एक भी मनमानी करने लगे अथवा टेढ़ी चाल चलनी लगे, तब गृहस्थी में धीरे-धीरे घुन लगने लगता है।
          पति-पत्नी के रिश्ते लम्बे समय तक प्रेमपूर्वक तभी चलते हैं, जब वे दोनों विश्वास की मजबूत डोर से बँधे रहते हैं। उन दोनों में दो जिस्म एक जान वाला रिश्ता होना चाहिए। घर में पति कहे कि वह कमाता है, तो धन पर उसका अधिकार है। वह जैसे चाहे उसे खर्च करे। पत्नी कहे कि वह कमाती है, तो धन उसका है। वह उसे घर में खर्च नहीं करेगी। इस तरह तो गाड़ी नहीं चलती।
           पति-पत्नी जब तेरे और मेरे की बोली को छोड़कर हमारे वाली भाषा बोलने लगें, तब जाकर उनके रिश्ते मजबूत होने लगते हैं। इसका यही अर्थ होता है कि उन दोनों में एक गहरी सोच पनपने लगी है। ऐसी गृहस्थी में कलह-क्लेश नहीं होता। यहाँ प्यार का साम्राज्य होता है। यह बात दोनों को सदा याद रखनी चाहिए कि पति और पत्नी का रिश्ता रक्त सम्बन्ध नहीं होता। इसे आपसी सूझबूझ से दृढ़ बनाया जा सकता है।
          किसी कवि ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में पति के द्वारा किए गए विश्वासघात के विषय में कहा है-
कलत्रं  पृष्टतः कृत्वा  रमते  यः  परस्त्रियः।अधर्मश्चापदस्तस्य  सद्यः  फलति  नित्यशः।
अर्थात् अपनी पत्नी के पीठ पीछे छिपकर जो व्यक्ति दूसरों की स्त्रियों से अनैतिक प्रेमसम्बन्ध बनाते हैं, अपने  इस अधार्मिक कृत्य के फल स्वरूप वे शीघ्र ही  सदा के लिये आपदाग्रस्त हो जाते हैं।
           पत्नी से छिपकर किसी भी कारण से पुरुष यानी पति जब विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाता है, तब वह उसी ही समय अपनी गृहस्थी में विष घोलने का कार्य करने लगता है। सयाने कहते हैं-
     इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते।
पति चाहे कितना भी यत्न कर ले, यह सम्बन्ध कभी न कभी मुखर हो उठता है। उस समय आपसी विश्वास की धज्जियाँ उड़ जाती हैं।
          यह सत्य है कि जितना पुरुष इस नाजायज सम्बन्ध के लिए दोषी होता है, उतनी ही दोषी वह स्त्री भी होती है, जो इसमें बराबर की भागीदार होती है। ऐसी स्त्री की स्वयं की गृहस्थी को बर्बाद होने से कोई नहीं बचा सकता। इस प्रकार ये लोग दो-दो घरों के बिखराव का कारण बनते हैं।नित्य प्रति होने वाले झगड़ों के कारण घर टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं। जिसके लिए दोषी वे स्वयं होते हैं।
           पति अथवा पत्नी किसी एक की गलती के कारण घर टूटने की कगार पर आ जाता है। उन लोगों का परस्पर सम्बन्ध विच्छेद होने पर उनके मासूम बच्चे पिसते हैं, जिनका कोई दोष नहीं होता। वे दोनों तो शायद अपनी-अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ जाते हैं, पर उनके बच्चे वहीं कहीं पीछे छूट जाते हैं। वे बेचारे आगे नहीं बढ़ पाते। माँ के पास रहते हैं, तो पिता की याद में तड़पते हैं। यदि पिता के पास रहते हैं, तो माँ की याद में ये आँसू बहाते हैं।
           यदि पति-पत्नी दोनों फूँक-फूँक कर अपना कदम बढ़ाएँ, तब इस समस्या से बचा जा सकता है। दोनों का ही जीवन एक खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए। वे जब चाहें एक-दूसरे को सरलता से पढ़ सकें। उन दोनों में किसी भी तरह का कोई छिपाव-दुराव नहीं होना चाहिए। उन्हें अपने मोबाइल को लॉक करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। न ही उन्हें किसी के पीछे जासूस लगाने पढ़ें।
           मैं किसी और लोक की बात नहीं कर रही। बहुत से घरों में इस प्रकार का व्यवहार देखने को मिलता है। उन लोगों को देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वे दोनों अपने इस रिश्ते के प्रति संवेदनशील हों। आपस में प्यार और विश्वास को बनाने के लिए दोनों ईमानदारी से प्रयत्न करें। तभी उन दोनों में विश्वास की महीन रेखा सुदृढ़ हो सकती है। अपनी गृहस्थी को आदर्श बनाने के लिए पति और पत्नी दोनों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद