बुधवार, 23 अप्रैल 2025

आयु से परिपक्वता का लेना-देना नहीं

आयु से परिपक्वता का लेना-देना नहीं

एक आयु के पश्चात मनुष्य को परिपक्व हो जाना चाहिए। उसे बचकानी हरकतें करने से बचना चाहिए। यदि मनुष्य ऐसा नहीं करता है तो वह अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में हंसी का पात्र बनता है। कोई भी उसे सीरियसली नहीं लेता बल्कि मसखरा या जोकर समझकर उसको अनदेखा करते हैं। कुछ समय मन बहलाने के लिए तो ठीक है पर अधिक समय तक उसे सहन करना कठिन हो जाता है। तब उसे उन सब पर क्रोध आता है। वह सोचता है कि सभी लोग मूर्ख हैं जो उसका सम्मान नहीं करते।
          मनुष्य को आयु के बढ़ने के साथ-साथ स्वयं की ओर ध्यान देना आरम्भ करना चाहिए। उसे अनावश्यक तनाव लेने से बचना चाहिए। हर परिस्थिति में शान्त रहने का प्रयास करना चाहिए। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह जो भी कर रहा है, वह अपनी स्वयं की शान्ति के लिए है। तभी वह स्वयं के लिए जीना प्रारम्भ करता है। सबसे आवश्यक बात यह है कि उसे दूसरों से अपनी तुलना करनी बन्द कर देनी चाहिए। इसका कारण यही है कि हर व्यक्ति की कार्य करने की सामर्थ्य और स्थितियॉं भिन्न होती हैं।
          मनुष्य को अपनी जरूरतों और इच्छाओं के बीच का अन्तर समझ लेना चाहिए। अपनी चाहतों को, अपनी प्रसन्नता को भौतिक सांसारिक वस्तुओं के साथ जोड़ना उचित नहीं होता। इन वस्तुओं के पीछे भागना मृगतृष्णा के समान है। एक वस्तु की कामना करना और उसे यत्नपूर्वक प्राप्त कर लेने के बाद दूसरी ही इच्छा मुॅंहबाये खड़ी हो जाती है। तो कब तक इस छलावे में जिया जा सकता है। कभी तो अपनी अनावश्यक कामनाओं से किनारा करना ही पड़ेगा। तभी तो घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास सम्भव हो सकता है।
           हर व्यक्ति अपने हिसाब से ठीक होता है। यही सोचना चाहिए कि हर व्यक्ति की अपनी-अपनी सोच है। किसी को उसके आधार पर सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए अपने रिश्तों से  अधिक उम्मीद करना त्याग देना चाहिए। उसके स्थान पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। यही सोच बनानी चाहिए कि कोई हमारे लिए कुछ कर दे ठीक है और यदि न करें तो भी हम पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। इस प्रकार की मानसिकता जब मनुष्य बना लेता है तब वह मस्त रहना सीख जता है।
          किसी को भी दुनिया में यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है कि आप कितने अधिक बुद्धिमान हैं। अतः दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना छोड़ देना चाहिए। समाज को स्वयं ही यह समझने दीजिए कि आप बहुत योग्य हैं। जब लोग आपसे व्यवहार करेंगे तो वे स्वयं ही आपकी बुद्धिमत्ता का लोहा मानने लगेंगे। इसलिए सब समय पर छोड़ दीजिए। यह मानकर चलिए कि हीरा खुद होकर कभी किसी को अपना मूल्य नहीं बताता बल्कि जौहरी स्वयं ही उसे देख-परखकर उसका मूल्यांकन कर लेता है।
            इन सबसे भी बढ़कर मनुष्य को अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। दूसरों को बदलने का प्रयास करना छोड़ देना चाहिए। इसके स्थान पर स्वयं की ओर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। आत्मोद्धार के लिए प्रयास करना श्रेयस्कर होता है। यही सोचना चाहिए कि जब मनीषी समाज में लोगों को नहीं बदल पाते तो फिर हम कैसे यह कार्य कर सकते हैं? समझदारी इसी में है कि जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाए। 'छोड़ो जाने दो' वाली उक्ति को समझकर सीख लेना चाहिए। तब मन को कष्ट नहीं होता।
           लोग क्या कहते हैं, क्या करते हैं? इसकी चिन्ता में अपना समय व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। जिन्होंने नहीं समझना उनके लिए अपना समय और शक्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जानते-बूझते भी अज्ञ यानी मूर्ख बन जाते हैं। उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। इसका कारण है कि सोए हुए व्यक्ति को तो जगाया जा सकता है पर जो ऑंख बन्द करके सोने का अभिनय कर रहा हो, उसे किसी भी तरह नहीं जगाया जा सकता। उसे उसी अवस्था में छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए। 
           समझदार होने या परिपक्व होने की आयु में व्यक्ति को अनावश्यक ही रूठना, मानना या नखरे नहीं दिखाने चाहिए। उसे इन भावों से ऊपर उठ जाना चाहिए। उसकी आयु को देखते हुए शायद मुॅंह पर उसे कोई कुछ न कहे पर वह अपना सम्मान दूसरों की नजरों में खो देता है। घर-परिवार के सदस्य अथवा बन्धु-बान्धव उसके ऐसे व्यवहार के कारण उसे अनदेखा करने लगते हैं। तब उसे उन सब पर क्रोध आने लगता है और वह अनर्गल प्रलाप करने लगता है। यह स्थिति किसी भी प्रकार से अच्छी नहीं कही जा सकती।
           आयु से परिपक्वता का कोई लेना-देना नहीं है। यदि मनुष्य अपना मान-सम्मान बनाए रखना चाहता है तो उसे स्वयं पर नियन्त्रण रखना चाहिए। छोटे-बड़े को यथोचित आदर और मान देना चाहिए। उसे अपने मन की संकीर्णता का त्याग करके विशाल हृदय बनना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह समय का सदुपयोग कर सकता है। अपनी रुचि का कार्य कर सकता है। स्वाध्याय करने में समय व्यतीत कर सकता है। ईश्वर की उपासना में  मन लगा सकता है। जनहित के कार्य करके समाज को दिशा दे सकता है। 
            जीवनकाल में मनुष्य यदि इन छोटी-छोटी बातों पर गहनता से विचार करने लगे तो वास्तव में वह परिपक्व लोगों की श्रेणी में गिना जाता है। उसे हर स्थान पर महत्त्व दिया जाता है। उससे विचार-विमर्श किया जाता है। इस प्रकार उसका इहलोक और परलोक संवर जाता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

मर्यादाओं का पोषक मध्यम वर्ग

मर्यादाओं का पोषक मध्यमवर्ग 

समाज और देश में जो नैतिकता बची हुई है उसका श्रेय मध्यमवर्गीय परिवारों को ही जाता है। नैतिकता और मर्यादा से परे ऐसे बहुत से सारे कार्य होते हैं जिनका प्रभाव सिर्फ मध्यमवर्गीय परिवारों पर होता है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि समाज और परिवार का भय सिर्फ उन्हीं को ही होता है और आत्मग्लानि का भाव भी उन्हें ही अधिक होता है।  
           बेटी ससुराल वालों के अत्याचारों से परेशान होकर मायके में शरण लेती है। अपने पति के दुर्व्यवहार के कारण या उसके विवाहेत्तर सम्बन्धों के चलते अपने माता-पिता के पास आ जाती है। कभी  पति या पत्नी में किसी समस्या के कारण सन्तान न होने पर पत्नी को दोषी मानकर उसे मायके जाने के लिए विवश कर दिया जाता है। इनमें से कोई भी कारण हो सकता है जब किसी लड़की को अपने पति या ससुराल को छोड़ना पड़ जाता है। इन सब कारणों के अतिरिक्त किन्हीं अपरिहार्य कारणों से तलाक लेना पड़ जाता है। इन सब परिस्थितियों में लड़की का जीना समाज दुश्वार कर देता है। उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता है, समाज का डर दिखाया जाता है। हालात कैसे भी रहते हों, उस पर ही हर हाल में सामंजस्य स्थापित करने के लिए दबाव बनाया जाता है।
           यदि हम उच्चवर्णीय परिवारों की ओर देखें तो पता चलता है कि वे इन सभी बन्धनों से मुक्त हैं। वहॉं शायद इन सब नियमों  के मायने ही अलग हैं। पति-पत्नी दोनों ही अपने आचार-व्यवहार के प्रति उदासीन प्रतीत होते हैं। इनके अतिरिक्त टीवी और फिल्म जगत के नायक-नायिकाओं की ओर मध्यमवर्ग टकटकी लगाए देखता रहता है। उनके जैसे जीवन मूल्यों को अपनाना चाह कर भी समाज के डर से मन मसोस कर रह जाता है। फिर अपने कदम समेट लेता है।
          उच्चवर्ग के अतिरिक्त नव धनाढ्य वर्ग भी सभी वर्जनाओं को तोड़कर लम्बी उड़ान भरना चाहता है। वह कहीं दूर आगे निकल जाना चाहता है। उसके लिए किसी सामाजिक नियम अथवा मर्यादा की अवहेलना करना मामूली-सी बात बन जाती है। ऐसा करते हुए उसे किसी प्रकार का अपराधबोध भी नहीं होता। वह इन सबसे परे अपनी ही मौज-मस्ती में व्यस्त रहता है। उसकी बला से यह दुनिया भाड़ में जाए।
          निम्नवर्ग अपनी दैनन्दिन समस्याओं से ही सदा जूझता रहता है। वह अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए जोड़-तोड़ में लगा रहता है। उसे दो समय का खाना भी प्रतिदिन मिल जाए तो वही उसके लिए बहुत होता है। ऐसी स्थिति में संस्कार या मर्यादा जैसे शब्द उसे भारी भरकम प्रतीत होते हैं। इनके विषय में यदि वह सोचने लगे तो उलझकर ही रह जाएगा।
           तुलसीदास जी ने रामायण में एक स्थान पर बहुत ही सत्य कहा है - 
           समरथ को नहीं दोष गोसाईं
इसका यही अर्थ हुआ कि समर्थ या शक्ति सम्पन्न व्यक्ति को कोई दोष नहीं दिया जाता। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सारे सामाजिक नीति नियम और परम्पराओं को मानने की आशा केवल निर्बल व्यक्ति से ही की जाती है। शक्तिशाली व्यक्ति किसी परम्परा अथवा नियम को मानने या न मानने के लिए बाध्य नहीं होता। उस पर किसी का कोई जोर नहीं चलता। यदि वह किसी पर अन्याय करता है या समाज विरोधी कार्य करता है तब भी समाज उसका विरोध न करके उसकी हॉं में हॉं मिलाता है।
           विवाहेतर सम्बन्ध चाहे स्त्री के हों या पुरुष के, हमारे समाज में हेय समझे जाते हैं। ऐसे सम्बन्धों वाले स्त्री और पुरुष का व्यवहार कुछ ज्यादा ही मधुर होता है। वे अपने आश्रितों का अधिक ध्यान रखते हैं ताकि उनका विश्वास बना रहे। उन पर कोई अविश्वास न कर सके। 
           यहॉं भी मध्यमवर्ग ऐसे सम्बन्धों को कदापि सहन नहीं कर सकता। जबकि आर्थिक युग में उच्चवर्ग में ये सम्बन्ध आम होने लगे हैं। वे लोग इसकी परवाह भी नहीं करते और न ही कोई किसी पर अंगुली उठाता है। सभी अपने में मस्त रहते हैं। अपनी समस्याओं में उलझा निम्नवर्ग अपनी दो जून की रोटी कमाने की जद्दोजहद में लगा रहता है। उसे इन सबसे कोई लेना-देना नहीं होता।
            भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, हेराफेरी, दूसरे का गला काटना आदि समाज विरोधी कार्य मध्यमवर्ग के लिए बहुत निम्न स्तर के कार्य होते हैं। इन कार्यों में लिप्त पाए जाने पर यदि न्याय व्यवस्था के दोषी बनकर जेल की हवा खानी पड़ जाए तो उनके लिए  मृत्यु तुल्य होता है। उन्हें लगता है कि वे किसी को मुॅंह दिखाने लायक नहीं रहे।
           इसके विपरीत उच्चवर्ग और निम्नवर्ग के लोगों के जमीर पर इन सबका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे धड़ल्ले से समाज विरोधी इन गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं। उच्चवर्ग के लोग ये सब करने में अपनी शान समझते हैं। उनके लिए यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। निम्नवर्ग अपनी मजबूरियों के कारण ऐसे कार्य करता है। उसे लगता है दो रोटी ही तो खानी हैं चाहे कहीं भी रहकर मिल जाऍं।
           अपवाद सर्वत्र हो सकते हैं। हर वर्ग के व्यक्तियों की अपनी अलग सोच हो सकती है। मेरे इस विश्लेषण का तात्पर्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुॅंचाना नहीं है। समाज के विभिन्न लोगों के विचारों को पढ़ने और उनसे मिलने के उपरान्त ही ऐसा लिखा है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 21 अप्रैल 2025

सुखमय वृद्धावस्था के लिए

सुखमय वृद्धावस्था के लिए

अपनी वृद्धावस्था के लिए अथवा अपने आने वाले जीवन के लिए समय रहते ही योजना बना ली जाए, यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सुखमय वृद्धावस्था के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। प्रयास यही रहना चाहिए कि अपने सभी सामाजिक दायित्वों और जिम्मेदारियों को अपनी रिटायरमेंट तक पूरा कर लिया जाए। इससे वृद्धावस्था में अनावश्यक तनाव नहीं रहता।
           मनुष्य अपने जीवनकाल में अथक परिश्रम करके अपने लिए एक आशियाना बनाता है। वह यही सोचता है कि अपने परिवार के साथ वहॉं सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करेगा। अपने नाती-पोतों के साथ खेलते हुए वह अपना बचपन जीएगा। खून-पसीने से बनाए गए उस घर को जीते-जी बच्चों को नहीं सौंपना चाहिए। यथासम्भव अपने स्वयं के स्थायी आवास पर ही रहना चाहिए ताकि स्वतन्त्रतापूर्वक अपने जीवन का आनन्द लिया जा सके।
           अपना बुढ़ापा सुरक्षित करने के लिए हर सम्भव प्रयास करना आवश्यक है। अपने जीवित रहते परिश्रम से कमाकर जोड़े हुए बैंक बैलेंस, भौतिक सम्पत्ति और व्यापार आदि को अपने पास ही रखना चाहिए। अतिमोह में पड़कर किसी के भी नाम पर करने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए। हो सकता है कि बच्चे सुनहरे सपने दिखाऍं कि वे वृद्धावस्था में आपकी सेवा करेंगे, आपका हर प्रकार से ध्यान रखेंगे। इसलिए अपनी धन-सम्पत्ति उनके नाम पर कर दें। 
           बच्चों के इस प्रकार के बहकावे में नहीं आना चाहिए, उनके मगरमच्छ वाले ऑंसुओं को अनदेखा करना चाहिए। यहॉं एक बात कहना चाहती हूॅं कि बच्चों को यदि सचमुच आपके सहारे या सहयोग की आवश्यकता है तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता अवश्य करनी चाहिए।  उन्हें निराश नहीं करना चाहिए।
          समय बदलने के साथ बच्चों की प्राथमिकता भी बदल सकती हैं। अतः अपने बच्चों के इस वादे पर बिल्कुल निर्भर नहीं रहना चाहिए। हो सकता है कि भविष्य में वे चाहकर भी आपके लिए कुछ न कर पाऍं। साथ ही यह भी सम्भावना हो सकती है कि वे अपने ही देश में अन्यत्र किसी प्रदेश में या विदेश में अपनी नौकरी अथवा व्यवसाय के कारण बस जाऍं। तब आपको यहॉं अकेले ही जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है।
             अपने बाद जीवनसाथी को किसी का मोहताज बनाकर नहीं छोड़ना है बल्कि समय रहते वसीयत बनवा लेनी चाहिए कि उनके पश्चात सारी धन-सम्पत्ति का वारिस उनकी पत्नी होगी। उसके बाद वह सब बच्चों में बराबर बॉंट दी जाएगी। इससे भी बढ़कर यह आवश्यक है कि अपने जीवनसाथी को आपकी धन-सम्पत्ति के विषय में पूरी जानकारी होनी चाहिए। उसे अपने लेन-देन, बैंक अकाउंट, इन्श्योरेन्स, इन्वेस्टमेंट आदि के बारे में बताइए। जिससे समय आने पर उसे किसी का मुॅंह न ताकना पड़े। उस समय वह दृढ़ता और साहस के साथ विपरीत परिस्थितियों का सामना कर सके।
             जहॉं तक हो सके अपने बच्चों के जीवन में अनावश्यक दखलअंदाजी न करें। सलाह भी उनके मॉंगने पर ही दें तो अच्छा रहेगा। यदि बच्चे आपके परामर्श को अनसुना कर देते हैं तो उसे अपनी ईगो का विषय बनाकर अनावश्यक तूल नहीं देनी चाहिए। उन्हें अपने तरीके से जीवन जीने दीजिए और आप अपने तरीके से जीवन व्यतीत कीजिए। ऐसा करने से घर में सदा ही सुख-शान्ति बनी रहती है। अन्यथा घर युद्ध का मैदान बन जाता है और अनावश्यक वाद-विवाद होने लगता है। यह सोचना चाहिए कि आपने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जी लिया है तो बच्चों को भी अपना जीवन जीने की आजादी मिलनी चाहिए।
           अपनी वृद्धावस्था का आधार बनाकर किसी से सेवा करवाने अथवा सम्मान पाने का कभी प्रयास नहीं करना चाहिए। बहुत समय तक बेचारा बनकर सहानुभूति नहीं बटोरी जा सकती। अपने जीवन को उल्हासपूर्वक जीने का प्रयत्न करना चाहिए। स्वयं प्रसन्न रहकर दूसरों को भी प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। उन लोगों को अपने मित्र समूह में शामिल करना चाहिए जो आपके जीवन को प्रसन्न देखना चाहते हों, यानी सच्चे हितैषी हों। 
          सबसे अहं है अपने स्वास्थ्य का स्वयं ध्यान रखना। समय-समय पर चिकित्सीय परीक्षण करवाते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त घर का बना सादा और पौष्टिक भोजन खाना चाहिए। स्वास्थ्य रहने के नियमों का पालन करना चाहिए यानी वाक, योगासन, हल्का-फुल्का व्यायाम करना चाहिए। यथासम्भव अपने कार्य स्वयं ही करने की आदत बनानी चाहिए। छोटे-मोटे कष्टों-परेशानियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उम्र के साथ-साथ छोटी-मोटी शारीरीक परेशानियॉं चलती ही रहती हैं।
            किसी के साथ भी अपनी तुलना करके स्वयं को दुखी नहीं करना चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी-अपनी सामर्थ्य होती है। किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। कोई कुछ सहायता कर दें तो ठीक है और यदि न करें तो किसी के समक्ष रोना नहीं रोना चाहिए। दूसरों की बातें अवश्य सुननी चाहिऍं पर निर्णय अपने विचारों के आधार पर ही लेना चाहिए। जहॉं तक हो सके किसी भी तरह के टकराव को टालकर तनाव रहित जीवन को जीने का प्रयास करना चाहिए।
           अपने साथ कुछ ऐसे मित्रों को जोड़ना चाहिए जिनके साथ आप सहज अनुभव कर सकें। उनके साथ कभी-कभी पार्टी कीजिए, लंच या डिनर पर जाइए और पिकनिक का कार्यक्रम बनाइए। प्रतिवर्ष किसी तीर्थस्थल अथवा हिल स्टेशन पर यात्रा के लिए जाइए। इससे आपको जीने का आनन्द आएगा। आप स्वयं को उत्साहित, ऊर्जावान और तरोताजा महसूस करेंगे। यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिए कि जब तक आप स्वयं अपने लिए जीना शुरू नहीं करते हैं निश्चित मानिए तब तक आप जीवित नहीं हैं।      
             इस असार संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। इसलिए जीवन में कुछ भी सदा के लिए नहीं रह सकता। यानी कि सुख, दुख, चिन्ता, परेशानी भी नहीं। किसी से भी अनावश्यक याचना नहीं करनी चाहिए और न ही किसी का मुॅंह ताकना चाहिए। अपना समय व्यतीत करने के लिए धर्म ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए, बागवानी भी की जा सकती है। ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। प्रार्थना केवल ईश्वर से करनी चाहिए कि वह जीवन में आपको सदा स्वस्थ रखे और धैर्य व साहस दे।                                                                 

रविवार, 20 अप्रैल 2025

जीवन का सार

 जीवन का सार

मनुष्य इस संसार में सीमित समय के लिए आता है।उसे यह समझ लेना चाहिए कि जितने साल तक वह अपना जीवन जी चुका है, उसका उसके बाद का शेष जीवन अब कुछ ही वर्षों का बच गया है। इसलिए प्रसन्न रहने के लिए उसे जीवन में कई परिवर्तन लाने चाहिए। उसे स्वयं के लिए समय निकालना चाहिए। जिन कार्यों को वह अभी तक अपनी व्यस्तता के कारण पूर्ण नहीं कर सका, उन पर उसे ध्यान देना चाहिए। तभी उसका जीवन सुखमय हो सकता है।
          सबसे पहले मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि यह संसार मरणधर्मा है। यहॉं कोई भी सदा के लिए नहीं रहने वाला। आज उसका कोई प्रियजन दुनिया से विदा ले रहा है, तो कल उसका भी नम्बर आने वाला है। किसी के चले जाने से संसार का कोई काम नहीं रुकता। सृष्टि पहले की ही भॉंति चलती रहती है। दो-चार दिन रोने-धोने के पश्चात घर-परिवार के लोग, पड़ोसी, बन्धुजन सभी अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाऍंगे। वे मौज-मस्ती, खाने पहनने में मस्त रहेंगे।  
         यथासम्भव स्वयं के लिए समय निकालता चाहिए। अपनी भागदौड़ वाली जिन्दगी में अपने और अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल सके। उस समय कार्यक्षेत्र की व्यस्तता की मजबूरी रही थी, परन्तु अब समय मिला है, तो उसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए। बच्चों के और अपने जीवनसाथी के साथ क्वालिटी टाइम बिताने का प्रयास करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार शापिंग करिए, यात्रा पर जाइए और बन्धु-बान्धवों के पिकनिक पर जाइए। इसके अतिरिक्त कभी-कभी फाइव स्टार होटल में रहने के स्थान पर प्रकृति की गोद में रहने जाइए। रिसोर्ट में रहने का अनुभव लीजिए। इससे जीवन में और भी आनन्द आएगा।
          यह बात स्मरण रखने योग्य है कि हमारे सामने कोई व्यक्ति चाहे पैसे, पावर और पोजीशन वाला क्यों न हो, किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। कोई किसी को कुछ नहीं देने वाला। सबको अपनी कमाई पर ही सन्तोष करना होता है। जहॉं अपना स्वार्थ सिद्ध होता हो, लोग उसी से ही अपना सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास करते हैं। जब स्वार्थ की पूर्ति हो जाती है, तब वे पहचानने से ही इन्कार कर देते हैं। फिर ऐसे इन लोगों को क्योंकर भाव देकर महान बनाना।
          लोगों के अच्छे कार्यों और विचारों की खुले दिल से प्रशंसा करनी चाहिए। ऐसा करने से मन को वास्तविक आनन्द मिलता है।‌ ऐसे लोगों से सदा दूरी बनाकर रखनी चाहिए, जो अपनी बुरी आदतों और जड़ मान्यताओं को दूसरे लोगों पर थोपने का यत्न करते हैं। ऐसे लोगों को सुधारने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कोई जीवन की दौड़ में एक कदम पीछे करे, तो उससे दस कदम पीछे हट जाना चाहिए। एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य को स्वयं से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, अन्य किसी से नहीं। अपनी प्रसन्नता को इसलिए बलि नहीं चढ़ाना चाहिए कि लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे। यानी चार लोगों को खुश रखने के लिए स्वयं का मन नहीं मारना चाहिए।
          किसी गलत व्यक्ति के सामने अपने आप को सही साबित करने के स्थान पर मौन रहना उचित होता है। इससे अपनी मानसिक शान्ति बनी रहती है। मनुष्य को खुद से प्यार करना चाहिए। अपने दुख और कठिनाइयों को उजागर नहीं करना चाहिए। लोग सामने सहानुभूति दिखाते हैं, पर पीठ पीछे मजाक उड़ाते हैं। जो अपना होता है वह स्वयं ही बिना कहे दूसरे की परेशानी समझ जाता है, उसे कहना नहीं पड़ता। बाकी लोगों के समक्ष अपने मन की बात कहने से बचना चाहिए।
          हम बड़े-बड़े शोरूम में जाते हैं या मॉल में जाते हैं, वहॉं बिना मोलभाव किए जरूरत का ब्रॉंडेड सामान खरीद कर ले आते हैं। परन्तु हम रेहड़ी पटरी वालों से मोलभाव करते हैं। हम जानते हैं कि उन मंहगे स्थानों पर ठगे जा रहा हैं, फिर भी परवाह नहीं करते। जो बेचारे कम कीमत पर हमें सामान बेचते हैं, उन्हें हम बुरा-भला कहते हैं। इस ठगने-ठगाने के विषय में मुझे कबीरदास जी का एक दोहा स्मरण हो रहा है -
     कबीरा आप ठगाइये और न ठगिये कोय।
    आप ठगै सुख ऊपजे और ठगे दुख होय।। 
कबीरदास जी ने बहुत अच्छी बात कही है कि स्वयं बेशक ठगे जाइए, परन्तु किसी को ठगना अच्छी बात नहीं है। जब हम ठगे जाते हैं, तो सुख की उत्पत्ति होती है यानी मन में सन्तोष होता है कि हमने किसी का अहित नहीं किया। किन्तु जब हम दूसरे को ठगते हैं तो दुख होता है। हमारा मन हमें कचोटता है।
          जीवन काल में अपने और अपने घर-परिवार पर हम हजारों-लाखों रुपये खर्च कर देते हैं। यदि हो सके तो किसी जरूरतमन्द व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए। उसकी समय पर आवश्यकता पूरी होगी, तो उसके मन से निकली दुआ हमारे लिए बहुत उपयोगी होती है। वैसे भी हमारे मनीषी दान का बहुत महत्व बताते हैं। वे हमें सुपात्र को दान देने के लिए सदा प्रेरित करते रहते हैं। 
            जीवन बहुत ही अमूल्य है। हर पल को मस्ती के साथ बिताइए। सुख या दुख केवल अपने ही हैं, जितनी जल्दी मनुष्य यह सार समझ ले, उसे दुनिया के थपेडों से डर नहीं लगता। यह निश्चित है कि समय कैसा भी हो बीत जाता है। आत्मिक सुख के लिए मानवता की सेवा, जीवों पर दया और प्रकृति की सेवा करनी चाहिए। अपने ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए और सबसे बढ़कर ईश्वर की उपासना में भी समय व्यतीत करना चाहिए। अनन्त का मार्ग इन्हीं उपायों से मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

घर में बुजुर्ग सामंजस्य बनाए

बुजुर्ग घर में सामंजस्य बनाऍं

घर-परिवार में सभी सदस्यों को सामंजस्य बनाकर रखना चाहिए। घर में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी रहते हैं। इसलिए केवल घर के बच्चों और युवाओं का ही नहीं अपितु बुजुर्गों का भी दायित्व बनता है कि वे समय और परिस्थितियों को देखते हुए अपने व्यवहार में परिवर्तन लाऍं। इससे घर में सुख और शान्ति का साम्राज्य बना रहता है। बड़ों को चाहिए कि वे बच्चों को अपना आशीर्वाद दें। छतनार वृक्ष बनकर बच्चों को शीतल छाया प्रदान करें। इसी से बुजुर्गों का मान बढ़ता है।
          इसके विपरीत यदि घर के बुजुर्ग अपनी हठधर्मिता का त्याग नहीं करना चाहते, तब घर में परेशानियॉं बढ़ने लगती हैं। घर का वातावरण बोझिल होने लगता है। उस समय बुजुर्ग बच्चों को बोझ लगने लगते हैं। वे कुछ भी करके उनसे छुटकारा पाने के उपाय सोचने लगते हैं। यह स्थिति किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराई जा सकती। उन्हें यह सोचना चाहिए कि उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जी लिया है। अब बच्चों को भी उनके हिस्से की स्वतन्त्रता देनी चाहिए।
          कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि बच्चे माता-पिता की आवश्यकताओं को समझकर उन्हें पूर्ण करने का प्रयास करें। वे निश्चित करें कि उन्हें समय पर नाश्ता-खाना इत्यादि मिलता रहे। जब वे बीमार हों, तो उन्हें समय पर डॉक्टर को दिखाकर दवाई उपलब्ध करवा दें। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखें। वृद्धावस्था के कारण उनके माता-पिता शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। अतः उनके साथ ऐसा व्यवहार न करें, जिससे वे स्वयं को असहाय समझें। उनके मान-सम्मान पर ऑंच नहीं आनी चाहिए।
           दूसरी ओर आयुप्राप्त होते माता-पिता बच्चों की समस्याओं को समझें और यथासम्भव उनकी सहायता करें। यदि उनके बेटा-बहू दोनों नौकरी करते हों, तो घर बैठे वे बच्चों की देखभाल कर सकते हैं। इसके लिए बच्चों पर अहसान जताना बिल्कुल अच्छी बात नहीं है। यदि घर रहते हुए वे बच्चों का गृहकार्य करवा दें तो बच्चों को भी आराम हो जाता है। घर के छोटे-छोटे कार्यों में  सहयोग करके उनका समय बचा सकते हैं। बुजुर्ग बच्चों पर अनावश्यक दबाव न बनाऍं बल्कि अपने अनुभवों से घर में एक सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण करें।
           बुजुर्ग यदि अपने पूर्वाग्रह का त्याग करके बच्चों की समस्याओं को समझने लगें तो वे घर में अपने स्वाभिमान को बचा सकते हैं। बच्चे भी अपने ऐसे माता-पिता का सम्मान करते हैं। घर में अनावश्यक ही चिल्लाना अथवा बिना कारण बात-बेबात लड़ाई-झगड़ा करना उन्हें शोभा नहीं देता। अपने बच्चों की हर आने-जाने वाले के समक्ष बुराई करने से बचना चाहिए। जब उन्हें बच्चों के साथ ही रहना है तो उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वे बच्चों का अपमान किसी के सामने न करें। इससे उनका अपना सम्मान भी कम होता है। यदि कोई छोटी-मोटी बात घर में हो जाती है, तो अनदेखा करना चाहिए।
           इसके अतिरिक्त अपने दुराग्रही स्व‌भाव के कारण उन्हें नित्य प्रति समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उनके अड़ियल रवैए के कारण धीरे-धीरे बच्चे उनसे मुॅंह मोड़ने लगते हैं। उनकी परवाह करना कम कर‌ देते हैं। एक समय ऐसा आता है जब बच्चे उनके व्यवहार के कारण परेशान होकर उनसे दूरी बनाने लगते हैं। उस समय वे घर में अकेले पड़ जाते हैं। इस तरह घर में उनके मध्य एक अबोलापन परसने लगता है। उसका असर बुजुर्गों पर अधिक होता है। यह किसी भी तरह से अच्छी बात नहीं कही जा सकती।
           यदि बच्चे माता-पिता के व्यवहार के कारण उनसे विमुख होने लगते हैं, तब बुजुर्ग सारा दोष उन्हें देने लगते हैं। उस समय उन्हें याद करवाने का प्रयत्न करते हैं कि उनके पालन-पोषण में उन्होंने कितने कष्ट उठाए। उन्हें योग्य बनाने के लिए अपने किए गए बलिदानों की दुहाई देते हैं। वे अपने बच्चों के जीवन में आने वाली कठिनाइयों को समझना ही नहीं चाहते। वे बच्चों के जीवन की व्यस्तता में उन्हें मानसिक तनाव देने का कार्य बखूबी करते हैं। इस प्रकार जब बच्चे उनसे बहुत दुखी हो जाते हैं तब वे अपने माता-पिता की अवहेलना करने लगते हैं। बुजुर्गों को ऐसी परिस्थितियॉं घर में उत्पन्न करने से बचने की आवश्यकता होती है।
          बुजुर्ग माता-पिता को थोड़ा समझदारी का परिचय देना चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को सदा दोष नहीं देना चाहिए। यदि वे कोई सलाह-मशवरा बच्चों को दें और बच्चे उसे न मानें अथवा अनसुना कर दें, तो उन्हें इस बात का घर कोई इश्यू नहीं बनाना चाहिए। एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी के अन्तर के कारण यह स्वाभाविक होता है। हर पीढ़ी को माता-पिता समझाते हैं पर बच्चे उस पर अक्षरशः पालन नहीं करते। उन्होंने ने भी अपने समय में माता-पिता की शत-प्रतिशत बातों को नहीं माना होगा। फिर आज वे अपने बच्चों से ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
         समय और परिस्थितियों की मॉंग यही है कि बुजुर्ग अपने बच्चों पर विश्वास करें और बच्चे उनकी उम्मीदों पर खरे उतरें। घर-परिवार में यह एक आदर्श स्थिति होती है कि बुजुर्ग हंसते-मुस्कुराते रहें और बच्चे उनके अनुभवों का लाभ उठाऍं। यह तभी सम्भव हो सकता है जब बुजुर्ग अपनी हठधर्मिता का त्याग करें। बच्चों पर अनावश्यक अंकुश लगाने का प्रयास न करें। घर में परस्पर मिलजुलकर प्यार और अपनेपन से रहें। 
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

बेटा नहीं बहू घर की धुरी

बेटा नहीं बहू घर की धुरी

सुनने में शायद यह अजीब लगे पर वास्तविकता यही है कि घर की धुरी बहू ही होती है, बेटा नहीं। घर में आने वाली सभी खुशियों की चाबी बहू के हाथों में ही होती है। अब तक यही कहा जाता रहा है कि पुरुष का काम मात्र धन कमाना है और औरत का काम घर-गृहस्थी सम्हालना, आने वाले मेहमानों की देखभाल करना होता है। इसलिए पुरुष को घरेलू काम-काज करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। सदियों से यह बात उसे घुट्टी में पिलाई जाती है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त पुरुष इसे पत्थर की लकीर समझने लगते हैं।
          आज के समय में इन विचारों में कुछ परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों को सकारात्मक कहा जा सकता है। आज स्त्रियाॅं भी घर को सम्हालने के साथ-साथ कमाने लगी हैं। दोनों ही क्षेत्रों में वे अपना लोहा मनवाने लगी हैं। वे पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं। जब वे घर और ऑफिस दोनों क्षेत्रों में निपुणता के साथ कार्य कर सकती हैं तो पुरुष क्यों नहीं कर सकताॽ इक्कीसवीं सदी का यह ज्वलन्त प्रश्न है। वाकई यह विचारणीय विषय है।
           इतनी जागरूकता होने के बावजूद भी बहुत से पुरुष अभी तक घर-परिवार और ऑफिस दोनों जिम्मेदारियों को निभाने में असफल हो रहे हैं अथवा वे निभाना नहीं चाहते। इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि वे इनसे दूर भाग रहे हैं। वे अपनी पत्नी का सहयोग करने से पल्ला झाड़ रहे हैं।आज भी पति, सास-ससुर, बच्चे और घर के अन्य सदस्य स्त्री पर ही आश्रित रहते हैं। उसे ही उन सबकी देखभाल के साथ-साथ रिश्तेदारों और मेहमानों के साथ ही बरतना पड़ता है।
            ससुराल में आज भी उसे बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता। उसे दूसरे घर से आया हुआ कहकर घर के अहं फैसलों से उसे दूर रखा जाता है। उसे कभी दहेज के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है, तो कभी कामचोर या स्वार्थी कहकर‌ तानें दिए जाते हैं। उसकी स्थिति मात्र काम करने वाली से अधिक नहीं समझी जाती। उसे कमाने की मशीन समझ लिया जाता है। उसे सुविधा देने के नाम पर सबके मुॅंह बिगड़ जाते हैं। उसके कार्यों की प्रायः घरों में आज भी सराहना नहीं की जाती।
              माता-पिता के द्वारा सबके समक्ष कहा यही जाता है कि बेटा हमारी बहुत सेवा करता है। जबकि यह सत्य नहीं है। बेटा तो बस ऑफिस से आकर मात्र यह पूछकर कि समय से खाना खा लिया और उनका हालचाल पूछकर अपने दायित्व को पूरा हुआ मान लेता है। उधर माता-पिता इसे ही अपनी देखभाल मानकर खुश हो जाते हैं। जबकि उनके लिए खाना-नाश्ता बनाना, उनके कपड़ों की धुलाई, घर की साज-सज्जा आदि सभी कार्य घर की बहू ही करती है।
            वे लोग अपनी बहू की न तो प्रशंसा करते हैं और न ही उसे कभी कोई क्रेडिट देते हैं। उसके कार्यों में उसकी सहायता करना, वे अपनी शान के विरुद्ध समझते हैं। यद्यपि उनकी यह सोच‌ सरासर गलत है। वैसे देखा जाए तो उनके बेटे को तो यह भी ज्ञात नहीं होता कि उसके माता-पिता कौन-सी दवाई लेते हैंॽ किस समय दवा खाते हैंॽ वे किस तरह का खाना खाते हैंॽ उनकी दैनन्दिन आवश्यकताऍं क्या हैंॽ अब प्रश्न यह उठता है कि इस सबका ध्यान कौन रखता है ॽ
            इन सबकी जानकारी उनकी बहू को ही रहती है, चाहे वह नौकरी करती हो अथवा घर पर ही रहकर घरेलू कार्य करती हो। घर में यदि नौकर विद्यमान भी है तो उसे समय-समय पर उन बुजुर्गों के खान-पान सम्बन्धी निर्देश देती रहती है। उन्हें फोन करके समय पर भोजन करने और दवाई लेने के लिए कहती रहती है। उनके बीमार पड़ने पर अपने कार्यालय से छुट्टी लेकर उनकी सेवा करती है। उन्हें डॉक्टर के पास ले जाती है। प्रायः पुरुष तो अपने काम का बहाना बनाकर इन झंझटों से छुटकारा पा लेते हैं।
            हमारे भारतीय परिवारों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि बेटे की शादी करते ही माताऍं घर-गृहस्थी से संन्यास ले लेती हैं चाहे उनकी आयु कम ही क्यों न हों और वह पूर्णतया स्वस्थ क्यों न हों। वे अपना समय व्यर्थ की बैठकबाजी में, टी वी देखने में व्यतीत करने लगती हैं परन्तु अपनी बहू का सहयोग करना नहीं चाहतीं। घरेलू बहू तो फिर भी कैसे न कैसे घर चला लेती है पर समस्या का सामना कामकाजी बहू को करना पड़ता है। घर और दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारियों को सम्हालते हुए उसका धैर्य जवाब देने लगता है।
           इन समस्याओं के फलस्वरूप ही घरों में विघटनकारी स्थितियाॅं उत्पन्न होने लगती हैं। घर में होने वाले कलह-क्लेश से बचने के लिए अन्ततः बच्चे उसी शहर में अलग घर लेकर उसमें अपना बसेरा बना लेते हैं। नहीं तो दूसरे शहर में अपनी बदली करवाकर घर से दूर चले जाते हैं। उन दुखद परिस्थितियों में माता-पिता अपने गिरेबान में नहीं झॉंकते। बल्कि अपनी बहू को ही दोषी देते हैं और कोसते हैं। न उन्हें अपने बेटे का दोष दिखाई देता और न ही अपना।
              मेरा अपना मानना यह है कि यदि घर में माता-पिता थोड़ा अपना बड़प्पन दिखाऍं तो यह ऐसा भी कोई कठिन कार्य नहीं है अपने परिवार को सम्हालना। आज के समय लड़के और लड़कियॉं दोनों ही पढ़कर नौकरी या अपना व्यवसाय करने लगे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए उन्हें अपने विचारों में थोड़ा बदलाव लाने की आवश्यकता है। बेटे-बेटी में अन्तर करने अथवा उनके कामों को बॉंटने के स्थान पर दोनों को ही घर-बाहर के कार्यों में निपुण बनाना चाहिए।
            जिन घरों के बच्चों को अपनी नौकरी के कारण देश में कहीं अन्यत्र अथवा विदेश में जाना पड़ता है, उनकी बात अलग है। परन्तु अपने घर में  होने वाली अनावश्यक रोक-टोक या झगड़ों से परेशन होकर यदि बहू-बेटे को अलग होना पड़े तो गलत है। केवल बच्चों का ही दायित्व नहीं है कि वे घर को जोड़कर रखें अपितु बड़ों का उत्तरदायित्व अधिक होता है। यदि छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया जाए तो परिवार को एकसूत्र में बॉंधकर रखा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

उपार्जित धन की अवधि

उपार्जित धन की अवधि निश्चित 

मनीषी कहते हैं कि लक्ष्मी बहुत ही चंचल होती है। 'कबीर बानी' में कबीरदास जी का एक सबद है - 
  माया महा ठगनी हम जानी।
  तिरगुन फाँसि लिये कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
 केसव के कमला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
 पंडा के मूरत होइ बैठी तीरथहू में पानी।
 जोगी के जोगिन होइ बैठी, काहू के कौड़ी कानी।
 भक्तन के भक्तिन होइ बैठी, ब्रह्मा के ब्रह्मानी।
 कहैं कबीर सुनो भाई साधो, 
  यह सब अकथ कहानी।।
         इस सबद के अनुसार लक्ष्मी एक स्थान पर टिककर नहीं रहती। वह यहाँ वहाँ भ्रमण करती रहती है। यदि उसे चोरी, जुआ, अन्याय और धोखे से कमाया जाए, तब लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है। फिर शीघ्र ही साथ छोड़कर, अँगूठा दिखाकर अन्यत्र चली जाती है। इसलिए मनुष्य को अन्याय से कभी धन कमाने का न प्रयास करना चाहिए और न ही सोचना चाहिए।
           पैसे या धन की प्रधानता प्राचीन काल यानी हर काल में ही रही है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हर व्यक्ति को अपने जीवन को चलाने के लिए बहुत सारा धन चाहिए होता है। वह दुनिया के सारे ऐश्वर्य जुटा लेना चाहता है, ताकि उसका परिवार सुख-सुविधा से रहे। उन्हें किसी वस्तु की कमी न रहे। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मनुष्य को धन के अभाव में अपने जीवन का निर्वाह कर पाना असम्भव-सा प्रतीत होता है। 
         आजकल मनुष्य के मन में पैसे की भूख इतनी अधिक बढ़ गई है कि वह जायज-नाजायज किसी भी तरह से शीघ्र ही धन कमा लेना चाहता है। रातों रात धनवान बनना चाहता है। ऐसा नहीं है कि आज ही के समय में इस प्रकार के अनैतिक कार्यों से धन कमाने को होड़ लगी हुई है बल्कि प्राचीन काल में भी अनेक लोग अनुचित मार्गों से धन कमाया करते थे। चोरी, डकैती, सेंधमारी जैसे अनुचित मार्ग कुछ लोग अपनाते थे। सत्य बात यह है कि उस समय उन लोगों को समाज हेय दृष्टि से देखा करता था।
           'चाणक्यनीति:' में आचार्य चाणक्य का इस विषय में कथन है-
       अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति।
       प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति।।
अर्थात् अन्याय के द्वारा उपार्जित यानी कमाया हुआ धन दस वर्ष तक ही मनुष्य के पास टिकता है। ग्यारहवें वर्ष में मूल सहित वह सब नष्ट हो जाता है।
         कहने का अर्थ यही है कि अन्याय से कमाया धन एक निश्चित अवधि तक ही मनुष्य के पास स्थिर रहता है, उसके बाद वह नष्ट होने लगता है। अतः मनुष्य को अन्यायपूर्वक धन अर्जित करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यदि वह ऐसा करता है, तो धन उस व्यक्ति का अधिक समय तक साथ नहीं निभाता। पापकर्म द्वारा कमाया गया यह धन अपने साथ कई बुराइयों को भी लेकर आता है। इनके चलते धन की बर्बादी होती है तथा घर में रोग अपना स्थायी डेरा जमा लेते हैं।
        अनुचित तरीके से कमाने वाले लोगों के घर के सदस्यों का परस्पर व्यवहार कटु होने लगता है। वे लोग एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसन्द नहीं करते। वे आपस में एक-दूसरे पर सन्देह की नजर से देखने लगते हैं। उन सबमें छत्तीस का आंकड़ा रहता है। ऐसे घरों के बच्चे भी अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते। वे बहुत ही घमण्डी और अनुशासनहीन हो जाते हैं। ऐसे वे बच्चे अपने माता-पिता का सम्मान तक नहीं करते। उनकी दृष्टि में वे केवल एटीएम कार्ड होते हैं, जिससे मनचाहा पैसा लेकर खर्च किया जा सकता है। 
          इसीलिए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि पैसा कमाने के लिए लालची लोग अन्याय और पापकर्म करते हैं। दूसरों को कष्ट देकर कमाया गया धन अधिक समय तक सुख नहीं देता। ऐसे लोग चाहे कितना भी धन कमा लें लेकिन इन्हें मानसिक शान्ति नहीं प्राप्त होती। इनका मन सदा विचलित रहता है। इनका मन कभी न कभी इन्हें गलत कामों के लिए धिक्कारता है। ऊपर से वे कितना शान्त दिखने का प्रयास करें परन्तु चेहरे पर परेशानी के भाव आ ही जाते हैं।
         इसके विपरीत जो लोग धर्मानुसार धन कमाते हैं, वे भले ही समाज की दृष्टि में अभावों में जीवन व्यतीत कर रहे हों, उनका घर अधिक साधन सम्पन्न न हों परन्तु मन की शान्ति उनके पास होती है। उनके घर में वास्तव में स्वर्ग होता है। वहॉं के लोगों में परस्पर प्यार होता है। वे सामंजस्यपूर्वक रहकर जीवन व्यतीत करते हैं। वे आचार्य चाणक्य इसीलिए हमें समझा रहे हैं कि सदा धर्म के अनुसार ही धन को कमाना श्रेयस्कर होता है अन्यथा भविष्य में कई प्रकार के कष्ट भोगने पड़ सकते हैं।
            लोभ के चलते किए गए गलत कार्य निश्चित ही मनुष्य को कड़वा फल प्रदान करते हैं। उस समय मनुष्य को बहुत कष्ट होता है, जिसे सहन करना उसके लिए कठिन हो जाता है। तब मनुष्य ईश्वर को दोष देता है कि वह उसके साथ अन्याय कर रहा है। जबकि ईश्वर बड़ा ही दयालु और न्याय करने वाला है। बड़ी ही सरलता से अपने दोष ईश्वर पर डालकर हम सब अपने अहं को झूठी तसल्ली देने का प्रयास करते हैं।
           धन सदा ही सात्विक तरीकों से कमाना चाहिए। उसी में बरकत होती है। शुद्ध कमाई के धन से खरीदे गए अन्न को खाकर परिवारी जनों के मनोमस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। ऐसे ही घर स्वर्ग के समान सुन्दर होते हैं जो सबके हृदयों पर अपनी छाप छोड़ते हैं। अन्याय से धन कमाने वाले की लोग परोक्ष में निन्दा करते हैं। इसलिए मनुष्य को स्वयं ही विचार करना है कि वह किस मार्ग का अनुगामी बनना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद