बुधवार, 7 मई 2025

लोभ रूपी शत्रु पर विजय

लोभ रूपी शत्रु पर विजय 

बाहरी शत्रुओं से मनुष्य अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करता रहता है। कभी बल का प्रयोग करता है, कभी अपने लिए मजबूत किले बनाता है। वह स्वयं को और सुरक्षित करने लिए कुत्तों को पालता है और अपने घर के बाहर सुरक्षा गार्ड नियुक्त करता है। इस प्रकार करके अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का प्रबन्ध करके सुख की सॉंस लेता है। दुर्भाग्य की बात है कि वह अपने स्वयं के शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए वह आजन्म प्रयास करता है परन्तु सफल नहीं हो पाता। वे शत्रु हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार। 
           अन्तस् के शत्रुओं में से आज हम लोभ या लालच के विषय में चर्चा करते हैं। मनुष्य का लालच उसे केवल सारा समय भटकाता रहता है। वह उसे किसी लायक नहीं छोड़ता। वह किसी एक वस्तु को पाने का लालच करता है, तो उसे पाने के तुरन्त बाद ही दूसरा लालच उसे घेरकर खड़ा हो जाता है। वह लालच के इस मकड़जाल में फँसा हुआ, बेबस होकर बस उससे मुक्त होने का उपाय तलाशता रहता है। परन्तु इसके चँगुल से बच निकलना मनुष्य के लिए सरल नहीं होता।
          वर्षों पहले इस विषय में एक कथा पढ़ी थी या किसी कक्षा में पढ़ाई थी। इस कथा के लेखक का नाम अब याद नहीं है। यह कहानी हृदय में एक गहरी  छाप छोड़ गई है। इस कहानी में लालच करने पर एक व्यक्ति को अपने प्राणों से ही हाथ धोना पड़ जाता है। यह हृदयस्पर्शी कथा आप सुधीजनों ने भी पढ़ी होगी और इस विषय पर मन्थन भी किया होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
           किसी समय एक व्यक्ति राजा के पास गया और उसने कहा, "वह बहुत गरीब है, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद की आवश्यकता है।"
          राजा बहुत दयालु था। उसने पूछा, "तुम्हें क्या मदद चाहिए?"
        आदमी ने कहा, "थोड़ा-सी जमीन दे दीजिए।"
       राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम दरबार में आना और तुम्हें जमीन दिखाई जाएगी। उस पर तुम दौड़ना और जितनी दूर तक तुम वहाँ दौड़ सकोगे, वह पूरा भूखण्ड तुम्हारा हो जाएगा। परन्तु यह ध्यान रखना कि जहाँ से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौटकर वापिस आना होगा। अन्यथा तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा।"
          राजा की बात सुनकर वह आदमी प्रसन्न हो गया क्योंकि उसकी मनोकामना पूर्ण होने वाली थी। ज्योंहि सुबह हुई वह आदमी सूर्योदय के साथ दौड़ने लगा, वह दौड़ता रहा और बस दौड़ता ही रहा। सूरज सिर पर चढ़ आया था, पर उस आदमी का दौड़ना नहीं रुक। वह हाँफता रहा, पर रुका नहीं। उसे लग रहा था कि थोड़ी-सी और मेहनत कर ले, तो फिर उसकी पूरी जिन्दगी आराम से बीतेगी।
          अब शाम होने लगी थी। आदमी को याद आया कि लौटना भी है, नहीं तो फिर कुछ नहीं मिलेगा। उसने देखा कि वह बहुत दूर चला आया था, अब बस उसे लौट जाना चाहिए। सूरज पश्चिम की ओर जा चुका था। उस आदमी ने पूरा दम लगाया कि वह किसी तरह लौट सके, पर समय तो तेजी से व्यतीत हो रहा था। उसे थोड़ी ताकत और लगानी होगी, वह पूरी गति से दौड़ने लगा। अब उससे दौड़ा नहीं जा रहा था। वह थककर गिर गया और उसके प्राणों ने उसका साथ नहीं दिया, वे उसे छोड़कर चले गए।
           राजा यह सब देख रहा था। अपने सहयोगियों के साथ वह वहाँ गया, जहाँ आदमी जमीन पर गिरा था। राजा ने उसे गौर से देखा, फिर सिर्फ इतना ही कहा, "इसे सिर्फ दो गज़ जमीन चाहिए थी। यह व्यर्थ ही इतना दौड़ रहा था। इस आदमी को लौटना था, पर लौट नहीं पाया। वह ऐसे स्थान पर लौट गया, जहाँ से लौटकर कोई वापिस नहीं आता।"
         मनुष्य को अपनी कामनाओं की सीमाओं का ज्ञान ही नहीं होता। उसकी आवश्यकताएँ तो सीमित होती हैं, परन्तु इच्छाएँ अनन्त होती हैं। उसकी ये इच्छाएँ कब लालच के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं, उसे पता ही नहीं चलता। उनको पूरा करने के मोह में मनुष्य कभी वापिस लौटने की तैयारी नहीं कर पाता। यदि ऐसा करने में वह सफल हो जाता है, तो कहानी वाले उस युवक की तरह उसे बहुत देर हो चुकी होती है। तब तक वह अपना सब कुछ दाँव पर लगा चुका होता है। उसके  पास शेष कुछ भी नहीं बचता।
          हम सभी लोग अन्धी दौड़ में भाग ले रहे हैं। इसका कारण भी शायद किसी को नहीं पता। अपने जीवन के सूर्योदय यानी युवावस्था से लेकर, अपने जीवन के संध्याकाल यानी वृद्धावस्था तक हम सभी
बिना कुछ समझे हुए भागते जा रहे हैं। इस बारे में विचार ही नहीं करते कि सूर्य अपने समय पर लौट जाता है। उसी प्रकार मनुष्य भी इस दुनिया से खाली हाथ ही विदा ले लेता है।
       हम मनुष्य भी महाभारत काल के अभिमन्यु की भाँति इस लालच के चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो जानते हैं, पर वापिस लौटना नहीं जानते। इसीलिए चारों ओर से आने वाले प्रहारों को न चाहते हुए भी झेलते रहते है। जीवन का सत्य मात्र यही है कि जो मनुष्य अपने लालच पर विजय प्राप्त करके लौटना जानते हैं, वही वस्तुतः में जीवन को जीने का वास्तविक सूत्र जानते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 6 मई 2025

मन बहुत ही चंचल

मन बहुत ही चंचल

मनुष्य का मन बहुत ही चंचल होता है। यह किसी के भी वश में नहीं आता। वास्तव में मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है। अभी यहाँ हमारे पास है और फिर पल भर में पूरे ब्रह्माण्ड की सैर करके वापिस लौटकर आ जाएगा। इसकी गति और इसकी सीमा का कोई ओरछोर नहीं है। इस बात से भी इसे कोई लेना-देना नहीं होता कि मनुष्य किस स्थान पर बैठा है या किसी परिस्थिति में है। इसका कार्य तो केवल भटकना और भटकाना है। यह व्यक्ति की रातों की नींद उड़ाकर उसे बैचेन कर देता है।
          चंचल मन का मतलब है कि एक ऐसा मन जो स्थिर न रहकर बार-बार इधर-उधर भटकता रहता है। वह आसानी से प्रभावित हो जाता है। हमारी इन्द्रियाँ बाहरी दुनिया के सुखद अनुभवों की ओर आकर्षित होती हैं। इससे मन का चंचल हो जाना स्वाभाविक होता है। चंचल मन का अर्थ करते हुए हम कह सकते हैं कि व्यक्ति का स्वभाव या उसके विचार आसानी से बदल जाते हैं। मन में अशान्ति और चंचलता का कारण यह भी है कि तन और मन के अन्दर अधिक मात्रा में ऊर्जा भरी हुई होती है। 
          भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भगवद्गीता' के छटे अध्याय में कहा है- 
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
अस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।
अर्थात् अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल है। यह मन केवल अत्यंत चंचल ही नहीं है  अपितु प्रमथनशील भी है। यह बड़ा बलवान है और किसी से भी वश में किया जाना असम्भव है। यह मन बड़ा दृढ़ भी है। ऐसे लक्षणों वाले इस मन का विरोध करना मैं वायु की भाँति दुष्कर मानता हूँ।
        जीवन पर्यंत यह हम सबको नाच नचाता रहता है। हम इसके चंगुल से बचने में स्वयं को असहाय अनुभव करते हैं। मन की प्रत्येक स्थिति का मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। हम सारे कर्म-कुकर्म इसी के इशारे पर करते हैं।  प्रसन्नता-अप्रसन्नता, अवसाद, उत्साह-निराशा, घृणा, राग-द्वेष, क्रोध आदि सभी अवस्थाओं का कारण यही मन है।
    यदि मन पर सद् विचारों की प्रबलता होती है तो मनुष्य सन्मार्ग पर चलता हुआ उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है। समाज, राष्ट्र, परिवार आदि के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहण करता है। परंतु यदि मन कुमार्गगामी हो जाए तो मानव पतन के मार्ग पर चल पड़ता है। वह राष्ट्रद्रोही, समाजद्रोही तथा परिवारद्रोही बन जाता है।
          अब सोचना यह है कि इसे वश में कैसे किया जाए? गीता में कहा है- 'अभ्यासेन वैराग्येन च' अर्थात् निरन्तर अभ्यास व वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो बार-बार यदि मन को गलत रास्ते पर जाने से रोकेंगे तो धीरे-धीरे सही रास्ते पर चलने का इसे अभ्यास हो जाएगा। दूसरा उपाय है इसे ईश्वर की आराधना में कठोरता पूर्वक लगाया जाए। तब इसमें विद्यमान कल्मष(बुराई) दूर होती है। यह शुद्ध और पवित्र बन जाता है। यदि इन उपायों को न अपनाया जाए तो फिर कहीं भी ठौर नहीं मिलता।         
           नियमित रूप से ध्यान और योग करने से मन शान्त होता है और विचारों पर नियन्त्रण बढ़ता है। प्राणायाम मन को शान्त करने और एकाग्रता को बढ़ाने में मदद करता है। योग मन और शरीर को शान्त करने में मदद करता है। नियमित व्यायाम करने से तनाव कम होता है और मन शान्त रहता है। खाली दिमाग में बुरे विचार आते हैं, इसलिए खुद को व्यस्त रखने के लिए कोई न कोई काम करें। अपने विचारों को लिखने से वे व्यवस्थित होते हैं और हम उन पर बेहतर तरीके से नियन्त्रण रख सकते हैं। 
         अपने विचारों और भावनाओं को दूसरों के साथ साझा करने से राहत मिल सकती है। अपने आप से प्यार करना और खुद को स्वीकार करना भी मन को शान्त रखने में सहायता करता है। पर्याप्त नींद लेने से भी मन शान्त रहता है। हर चीज में 'हाँ' नहीं कहना चाहिए। अपनी सीमाओं को जानना चाहिए। दूसरों को माफ करना और पुरानी बातों को भूलना सीखना चाहिए। अपने आप को स्वीकार करके और स्वयं से प्यार करना चाहिए। जो भी अच्छा नहीं लगता, उससे दूरी बनाकर रहना चाहिए। अपने लक्ष्यों को निर्धारित करके उन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए 
             इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि हम अपने मन के नियन्त्रण में हैं, न कि हमारा मन हमारे नियन्त्रण में है। मन में आने वाले सभी विचारों की द्वारपाल की तरह अच्छी तरह से खोज-खबर करने की आदत बना लेनी चाहिए। केवल उन्हीं विचारों को अपने मन में आने देना चाहिए जिन पर वर्तमान में ध्यान देने की आवश्यकता है। यह सत्य है कि मन ही हमें विनाश के गर्त में ढकेल सकता है और यही हमें आकाश की बुलन्दियों को छूने की सामर्थ्य भी देता है। चंचल मन यदि वश में हो जाता है तो हमारे शरीर रूपी रथ में सवार यात्री(आत्मा) को उसके गन्तव्य अर्थात् हमारे अन्तिम लक्ष्य की ओर ले जाता है। अन्यथा इस ब्रह्माण्ड की चौरासी लाख योनियों में मनुष्य भटकता रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 5 मई 2025

हर वस्तु की अपनी उपादेयता

हर वस्तु की अपनी उपादेयता 

मनुष्य के जीवन में हर वस्तु का अपना एक स्थान व उपादेयता होती है। उसे छोटी-छोटी वस्तुओं की भी आवश्यकता होती है और बड़ी-बड़ी वस्तुओं की भी जरूरत होती है। इसलिए किसी छोटी-से-छोटी वस्तु की भी कभी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। पता नहीं कब किस वस्तु की उसे आवश्यकता पड़ जाए। हो सकता है कि उसके बिना हमारा कोई सामान अधूरा रह जाए और हम संकट में फॅंस जाऍं। फिर तो बड़ी समस्या हो सकती है।
          रहीम जी ने इसी बात को बड़े सुन्दर शब्दों में उकेरा है -
      रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजै डारि।
      जहॉं काम आवै सुई, कहा करै तरवारि।।
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि बड़ों को देखकर छोटों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार काम नहीं करती। कहने का तात्पर्य यही है कि हर चीज का अपना-अपना उपयोग होता है।
        यह दोहा हमें सिखाता है कि हमें कभी भी किसी को छोटा या कम महत्वपूर्ण समझकर तिरस्कृत नहीं करना चाहिए, क्योंकि हर चीज और हर व्यक्ति का अपना महत्व होता है और हर स्थिति में हर चीज का उपयोग होता है। सुई और तलवार दोनों का अपना-अपना महत्व है। हम देखते हैं कि वस्त्रों की सिलाई के लिए हमेशा सुई का प्रयोग किया जाता हैं वहाँ तलवार का प्रयोग नहीं कर सकते। सी प्रकार युद्ध में तलवार का प्रयोग होगा, सुई का नहीं। अतः यह अन्तर समझना बहुत आवश्यक हो जाता है। अगर ऐसी मूर्खता करने की सोचेंगे तो जग में हँसी का पात्र बनेंगे।
           सामाजिक सद्भाव, एकता व धार्मिक सौहार्द का सन्देश देने वाले सुप्रसिद्ध कवि एवं महान समाज सुधारक सन्त कबीरदास जी ने इस विषय में बहुत सटीक कहा है -
      तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय।
       कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।।
अर्थात् कभी भी किसी को तुच्छ नहीं समझना चाहिए। जिस प्रकार पॉंवो में पड़ा एक छोटा-सा तिनका भी उड़कर जब आँख में चला जाता है तो वह भी आँख में गहरा घाव कर देता है।
            दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि तिनके जैसी तुच्छ चीज है, उसे हम फूँक मारकर हवा में उड़ा देते हैं। उसका कोई भी मूल्य हमारी नजर में नहीं होता। पर जब यही तिनका हमारी आँख में पड़ जाता है तो बड़ा कष्ट देता है। तब कितने समय तक आँख में लाली बनी रहती रहती है, उसमें असहनीय पीड़ा होने लगती है। हमें बहुत समय तक उपचार  स्वरूप ऑंखों में दवाई डालनी पड़ जाती है। तब जाकर कहीं वह नार्मल हो पाती है और हमें आराम मिलता है।
          हर वस्तु चाहे वह छोटी हो या बड़ी उसका अपना महत्त्व होता है। एक वस्तु के होते हुए हम दूसरी वस्तु को नजरअंदाज करने की मूर्खता नहीं कर सकते। हमें घर-परिवार में सभी वस्तुओं की आवश्यकता होती है। किसी एक के भी जरूरत के समय न होने पर हम परेशान हो जाते हैं। जो सामने पड़ता है उसी पर हम झल्लाने लगते हैं, चीखने और चिल्लाने लगते हैं। जब तक आवश्यक वस्तु को हम जुटा नहीं लेते हमें चैन से नहीं बैठ पाते हैं। हम बैचेन बने रहते हैं।
           मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका हर प्रकार के लोगों से वास्ता पड़ता रहता है। मनुष्य अपने जीवन में यह घमण्ड करके कभी नहीं रह सकता कि वह सबसे श्रेष्ठ है, उसे किसी भी दूसरे व्यक्ति की आवश्यकता जीवन में नहीं पड़ेगी। अपने जीवन में मिलने वाले हर प्रकार के लोगों की भी हमें आवश्यकता होती है। अगर हम यही सोचते रहेंगे फलॉं व्यक्ति बड़ा है केवल वही हमारे काम का है और अमुक व्यक्ति छोटा है तो हमें उसकी जरूरत क्योंकर पड़ने लगी? तो हम गलत सोचते हैं। 
           घर में कामवाली या नौकर के बिना हम एक दिन बिताने में असहाय अनुभव करते हैं। इसी तरह ड्राइवर, धोबी, माली, प्लम्बर, इलेक्ट्रिशियन, मिस्त्री आदि के बिना भी जिन्दगी नरक बन जाती है। इन सबकी समय-समय पर आवश्यकता हमें पड़ती रहती है। चाहे कोई स्वयं को कितना ही बड़ा धन्ना सेठ क्यों न समझे, समय पड़ने पर वह इन सबके बिना असहाय महसूस करता है। उसके काम अटक जाते हैं।
           मात्र केवल बड़े लोगों से दोस्ती करेंगे और छोटों का तिरस्कार करेंगे तो जीवन दुष्वार हो जाएगा। यही मानकर चलिए कि जीवन में हमें सबकी आवश्यकता होती है। इसलिए छोटे लोगों को भी उतना ही सम्मान दें। उन्हें अपने पैर की जूती की तरह न समझें।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 4 मई 2025

सज्जन व्यक्ति नारियल क फल केे समान

सज्जन व्यक्ति नारियल के फल के समान

सज्जन व्यक्ति नारियल के फल के समान ऊपर से कठोर दिखाई देते हैं पर मन से नारियल की मीठी गिरि की तरह मीठे अर्थात् सबका हित चाहने वाले होते हैं। उसके स्वादिष्ट व स्वास्थ्यवर्धक पानी की भाँति सरल तथा सहृदय होते हैं। दूसरी ओर दुर्जन व्यक्ति बोलचाल में बहुत अच्छे होते हैं परन्तु वास्तव में वे मीठी छुरी के समान होते हैं। उनकी तुलना आकर्षक बेर से की जाती है । जो ऊपर से सुन्दर  और अन्दर से कठोर होते हैं। 'हितोपदेश' के 'मित्र लाभ' से लिए गए इस श्लोक में कवि ने इसी भाव  को प्रकट किया है -
     नारिकेल समाकारा, दृश्यन्ते खलु सज्जना:।
      अन्ये बदरिकाकारा, बहिरेव मनोहरा:।। 
अर्थात् सज्जन व्यक्ति नारियल के फल के समान बाहर से कठोर होते हैं और अन्दर से गिरि के समान मधुर और कोमल होते हैं। इनके विपरीत दुष्ट लोग बेर के फल के समान केवल बाहर से कोमल और आकर्षक होते हैं और उनके भीतर गुठली रूपी कठोरता या कटुता रहती है।
           सज्जनों का हर कार्य निस्वार्थ होता है। वे देश, धर्म, परिवार और समाज के कार्य बिना किसी स्वार्थ के करते हैं। वे परोपकार के बदले में वे कुछ भी नहीं चाहते। सज्जनों के निःस्वार्थ स्वभाव के कारण वे समाज के प्रिय बन जाते हैं। इसके विपरीत यदि कोई उनका अहित भी करता है तो वे उसे क्षमा कर देते हैं। ऐसे व्यक्ति से अगर हमारी कोई इच्छा पूरी नहीं होती तो हमें यही सोचना चाहिए कि इसमें हमारी भलाई छिपी है।
          संस्कृत भाषा के महाकवि कालिदास ने अपने खण्ड काव्य 'मेघदूतम्' में कहा है -
  याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्‍धकामा:।।
अर्थात् गुणीजन से याचना करना अच्‍छा है। चाहे उनसे की गई प्रार्थना निष्‍फल ही रहे। अधम व्यक्ति से माँगना कभी भी अच्‍छा नहीं होता। चाहे वह सफल ही क्यों न हो जाए।
          इस गम्भीर उक्ति का यही अर्थ है कि सज्जन यदि हमारी मॉंग को ठुकरा देते हैं तो उसमें हमारा हित निहित होता है। यद्यपि उस समय हमें दुख अवश्य होगा कि हमारे कठिन समय पर उन्होंने हमारा साथ नहीं दिया। यदि वे हमारी सहायता कर देते तो उनका क्या बिगड़ जाता? पर समय रहते हमें उनका उद्देश्य समझ आ जाता है। तब ऐसा लगने लगता है कि हमारे प्रति उनकी सोच कितनी सकारात्मक थी। सज्जनों की न में भी हमारी भलाई के लिए होती है।
           इनके विपरीत होते हैं दुर्जन लोग। यदि दुर्जन लोग हमारी किसी इच्छा को पूर्ण करते हैं तो उसमें उनका स्वार्थ छुपा होता है। वे अपना लाभ सोचकर ही किसी के साथ अपना सम्बन्ध बनाते हैं। ऐसे लोग किसी के भी सगे नहीं होते। उनका साथ कभी भी लाभदायक नहीं कहा जा सकता। वे पहले मीठी-मीठी बातें करेंगे और फिर स्वार्थ सिद्ध होने पर ठोकर मार देते हैं। तब वे पहचानने से भी इन्कार कर देते हैं। इन लोगों की न मित्रता अच्छी होती है और न ही शत्रुता भली होती है।
             वे आगे आने वाले समय में हमें कठिनाई में फॅंसा सकते हैं। वे अपने किए उपकार के बदले कुछ ऐसा कर सकते हैं जो हमारे लिए हितकर नहीं होता। अथवा कुछ गलत कार्य करवाकर हमें फॅंसा सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि दुष्ट बेर के फल के समान ऊपर से मनभावन दिखाई देते हैं पर बेर की गुठली की तरह मन से कठोर या अहित करने वाले होते हैं। इसलिए उनकी मीठी या लच्छेदार बातों से बचकर रहना चाहिए। वास्तव में देखा जाए यही हमारे लिए हितकर होता है।
            सज्जनों का साथ हमेशा सुख, शान्ति, सफलता और यश आदि देता है। वे दूर तक साथ निभाते हैं। दुर्जनों की संगति सदैव दुख, निराशा, असफलता और अपयश आदि की ओर ले जाती है। इन लोगों के साथ सम्बन्ध सीमित समय तक ही निभाए जा सकते हैं। अब यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम सज्जनों के साथ रहना पसन्द करते हैं या दुर्जनों पर विश्वास करना चाहते हैं। भली-भाँति सोच विचार करके अपने लिए संगति का चुनाव करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 3 मई 2025

दिन के समान मनुष्य जीवन

दिन के समान मनुष्य जीवन

मनुष्य इस संसार में जन्म लेता है। मनुष्य का यह जीवन दिन के समान होता है, ऐसा हम कह सकते हैं। पूरे दिन को हम तीन भागों में बाँटते है- 
1 सूर्योदय काल यानी प्रातःकाल
2 मध्याह्न काल यानी दोपहर का समय
3 सूर्यास्त काल या संध्या काल यानी सांयकाल 
 इसी प्रकार मानव जीवन को भी तीन भागों में बाँटा जा सकता है- 
1 बाल्यकाल यानी बचपन
2 युवावस्था यानी जवानी का समय
3 वृद्धावस्था यानी बुढ़ापे का समय
           सूर्योदय अर्थात् सूर्य का उदय होना। इस समय वह लालिमा लिए हुए सभी के आकर्षण का केन्द्र बनता है। हम सबकी आशाओं का प्रतीक होता है। इस शैशवावस्था वाले सूर्य का स्तुतिगान हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुश: किया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय सूर्य का प्रकाश ब्रह्माण्ड को रात्रि के अन्धकार से मुक्त करके जीवों में नवजीवन का संचार करता है। सभी जीव-जन्तु अपने-अपने कार्यों में संलग्न होने लगते हैं। सूर्य का यह शैशव काल सम्पूर्ण प्रकृति को उल्लासित कर देता है। 
         इसी प्रकार हमारे मानव जीवन का बाल्यकाल भी बहुत मनभावन होता है। छोटा बच्चा सभी को अपनी छोटी-छोटी शरारतों से आकर्षित करता है। यह समय नवनिर्माण का होता है। इस अवस्था में सबको उससे आशा होती है कि बड़ा होकर वह कुछ करेगा। यहाँ उमंग होती है, उल्लास होता है और कुछ भी कर गुजरने का साहस होता है। बच्चा अपने माता-पिता के जीवन में खुशियों के साथ-साथ उनकी आशाओं का कारक भी बनता है। उसके भावी जीवन की नींव इसी समय में रखी जाती है।
             मध्याह्नकाल जिसे हम दोपहर कहते हैं, उस समय सूर्य अपने उत्कर्ष पर होता है। तब सूर्य की गर्मी व प्रकाश दोनों ही तीव्र होते हैं। इसे हम सूर्य की युवावस्था भी कह सकते हैं। तब सूर्य इतना अधिक तेजस्वी होता है कि उसके तेज को सहन नहीं किया जा सकता। उसकी ओर देख पाना बहुत कठिन होता है। उसकी गर्मी को झेलने में जीव असमर्थ हो जाते हैं। उसके प्रकाश को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि कभी धरा पर अन्धकार का साम्राज्य भी रहा होगा।
          उसी प्रकार मानव की युवावस्था भी होती है। जवानी में उसकी शक्ति और तेज अधिक होते हैं। इस समय वह ऊर्जावान होता है। अपने तेज और अपनी ऊर्जा के बल पर वह किसी भी समस्या से भिड़ जाता है। अपने बचपन से अब तक वह विद्यार्जन करके सेटल हो जाता है। तब वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के योग्य बन जाता है। विवाह करने के साथ-साथ वह अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्वों का निर्वहण बहुत तत्परता से करता है।
           दिन का अन्तिम समय सूर्यास्त का होता है। इस समय सूर्य अपने तेज व प्रकाश से हीन होकर अस्ताचल की ओर गमन करता है। यानी यह दिवस का अवसान होता है। अन्त की ओर जाने वाले सूर्य की पूजा नहीं की जाती। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय वह निर्बल हो जाता है। सभी  जीव-जन्तु अपने-अपने कार्यों को समाप्त करके अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। कहते हैं चढ़ती कला को सभी प्रणाम करते हैं। पूर्णमासी के चाँद की लोग पूजा करते हैं, उसके लिए खीर बनाने हैं और व्रत भी रखते है। 
           इसी तरह मानव अपने अन्तिम काल यानी वृद्धावस्था में हर प्रकार से शक्तिहीन हो जाता है। रिटायर होने के पश्चात उसमें खालीपन घर करने लगता है। तब तक बच्चे अपने-अपने घोंसलों में चले जाते हैं। वह स्वयं को असहाय एवं अकेला महसूस करने लगता है। उसे ऐसा लगने लगता है कि किसी को भी उसकी आवश्यकता नहीं रह गई है। इस तरह वह निराशा में डूबने लगता है। यह वही समय है जब वह अन्तिम पड़ाव की ओर अपने कदम बढ़ाने लगता है।
            इस प्रकार सूर्य अस्त हो जाता है, अगले दिन फिर से नई यात्रा की शुरूआत के लिए और फिर से आशा का प्रतीक बनने के लिए। यही मानव जीवन का भी क्रम होता है। तीनों अवस्थाओं को पार करता हुआ वह मृत्यु के पथ पर अग्रसर होता है अपने नवजीवन की खोज में। फिर से जीवन का वही क्रम दोहराया जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 2 मई 2025

ईश्वर की अराधना का प्रदर्शन

ईश्वर की आराधना का प्रदर्शन

इस संसार में ईश्वर ने हमें इसलिए भेजा था कि हम उसका स्मरण करते हुए भवसागर को पार करके मोक्ष प्राप्त करें। परमात्मा के साथ एकाकार होकर तदरूप हो जाएँ। पर बड़े अफसोस की बात है कि जीव के रूप में जन्म लेने के पश्चात हम दुनिया की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपने आने के उद्देश्य को ही भूल गए हैं। जबकि माता के गर्भ में रहते हुए, वहॉं के अन्धकार से घबराकर ईश्वर से प्रार्थना करते थे, "हे प्रभु! मुझे इस अन्धकार और कष्ट से मुक्ति प्रदान कीजिए। संसार में जाकर मैं सदैव आपका स्मरण करूॅंगा।"
         पर होता क्या है? इस दुनिया में आते ही जीव यहॉं की चकाचौंध में खो जाता है। उसे ईश्वर से किया गया अपना वादा भी विस्मृत हो जाता है यानी याद नहीं रहता। वह बस रंगरेलियॉं मनाने में मस्त होने लगता है। दुनिया के व्यापार में मग्न होकर ईश्वर से दूरी बनाने लगता है। ईश्वर की उपासना भी अपने जीवन में करनी चाहिए। इस विषय पर मनुष्य मौन साध लेता है। तब सोचता है कि प्रभु के स्मरण का समय अभी नहीं आया है। बहुत सारा जीवन पड़ा है हरि भजन के लिए।
           तब वह सोचता है कि अभी तो मैं व्यस्त हूॅं, कुछ समय बाद भगवान को याद कर लूॅंगा, उसका नाम जप लूॅंगा। अभी और दायित्व पूरे कर लें। ईश्वर का क्या है, उसे बुढ़ापे में जप लेंगे। परन्तु बड़े दुख की बात है कि वृद्धावस्था भी बीत जाती है। वह समय आ ही नहीं पाता और और मृत्यु सिर पर आकर खड़ी हो जाती है। उसकी इस असार संसार से विदाई की बेला आ जाती है। तब मनुष्य पश्चाताप करता है कि मैंने क्या कर डाला? उस समय कुछ नहीं हो सकता। यदि मनुष्य ईश्वर की उपासना निरन्तर करता रहे, तो उसे कभी घबराने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
          तब वह रो-रोकर प्रभु से अपने लिए थोड़े समय की मोहलत मॉंगता है। वह प्रार्थना करते हुए कहता है, " हे प्रभु! मुझे थोड़ा-सा समय दे दो ताकि मैं तुम्हारी अराधना करके अपना वचन निभा लूॅं।" परन्तु मनुष्य को तब पलभर के लिए भी समय का एक्सटेंशन नहीं मिल पाता।
          अपने जीवनकाल में ईश्वर की आराधना हम केवल प्रदर्शन के लिए करते हैं। हम चाहते हैं कि लोग हमें ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त कहें। इसके लिए अपने नाम के पत्थर लगवाते हैं। समय-समय पर भंडारे भी करवाते हैं। दूसरों को दिखाने के लिए मोटा दान भी करते हैं। पर यह सब समाज को दिखाने के लिए होता है। वास्तव में मन में भावना तो होती नहीं। सबसे बड़ी बात यह भी है कि लोग जायज-नाजायज हर प्रकार से धन कमाते हैं। फिर अपनी सफेदपोशी बनाए रखने के लिए समाज सेवा के नाम पर दान आदि के सब कार्य करते हैं।
             हमारा मन हमेशा चहुॅं ओर भटकता रहता है। कबीरदास जी ने बहुत ही कठोरता से हमें चेताने का प्रयास किया है-
       माला फेरत जुग भया मिटा न मन का फेर।
     कर का मनका छोड़कर मन का मनका फेर।।
अर्थात् कबीरदास जी कहना है कि वर्षों ईश्वर का भजन करते हुए बीत गए परन्तु हमारे मन से हेर-फेर की भावना समाप्त नहीं होती। मन पंछी की तरह ऊँची उड़ान भरता रहता है। उसे हम नियंत्रण में नहीं कर पाते बल्कि वह हमें जैसे नाच-नचाता है वैसे ही हम करते चले जाते हैं। इसलिए भगवद् भजन सच्चे मन से करो। उसके लिए हाथ में माला लेकर फेरने से कुछ नहीं होगा अपितु माला के मनकों को फेरना छोड़ कर अपने अन्तस् में चलने वाली साँसों की माला का सहारा लो और उस पर मन को एकाग्र कर सात्विकता से मालिक का ध्यान करो।
      बहुत ही सुन्दर शब्दों में कबीरदास जी ने हमारा मार्गदर्शन किया है। ईश्वर का निवास ब्रह्माण्ड के कण-कण में है, जर्रे-जर्रे में है। उसे पाने के लिए इधर-उधर ठोकरें खाने की आवश्यकता नहीं। हमें जंगलों में भटकने, तीर्थों में जाने, तथाकथित गुरुओं को माथा टेकने और तन्त्र-मन्त्र का सहारा लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह तो सदा ही हमारे पास है। जब भी हम उसे देखना चाहते हैं तो बहुत सरल उपाय है। अपने मन के अन्दर झाँककर उसके दर्शन कर सकते हैं।वहॉं पर पल भर में ही उसके दर्शन हो जाएँगे। 
        यद्यपि इस मार्ग पर चलना बहुत कठिन है पर असम्भव नहीं है। मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? सचमुच यदि वह ईश्वरमय होना चाहता है तो विश्व की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती। बस दुनिया की चकाचौंध से मन को हटाकर ईश्वर की ओर प्रवृत्त करना पड़ता है। ईश्वर की भक्ति का प्रदर्शन न करके सच्चे मन से और श्रद्धा से यदि उस प्रभु की अराधना की जाए तो वह अपने साधक का हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 1 मई 2025

हर स्थिति के लिए तैयार रहिए

हर स्थिति के लिए तैयार रहिए

मनुष्य जीवन में सदैव उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इसलिए उनका सामना करना उसकी विवशता है जाती है। घबरा कर अथवा परेशान होकर वह उनसे अपना मुॅंह नहीं मोड़ सकता। ये सब जीवन का एक भाग ही होते हैं। सदा अच्छा और मीठा हमारे हिस्से आए और कड़वा दूसरों के पास पहुॅंच जाए। ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। यह सर्व विदित सत्य है कि मनुष्य को अपने जीवन में हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। उसके जीवन में उतार-चढ़ाव क्रम से आते रहते हैं। उसे अपनी परेशानियों से दो-दो हाथ करने से घबराना नहीं चाहिए।
          इसी सत्य की भाँति यह भी उतना ही सत्य है कि अच्छे समय में तो सभी मित्रों-सम्बन्धियों का सहयोग मिलता है। मनीषी कहते हैं कि मक्खियॉं गुड़ पर ही आती हैं। इस बात को यहॉं लिखने का उद्देश्य मात्र इतना है कि यदि मनुष्य सुखी व सम्पन्न है अथवा उसका व्यापार उड़ान पर है या वह ऊॅंचे पद पर कार्यरत हैं, उसके पास तब तो चाटुकारों की लाइन लग जाती है। लोग उसकी प्रशस्ति गाने लगते हैं। उसके आगे-पीछे घूमने लगते हैं। उसके सभी बन्धु-बान्धव, जान पहचान वाले, पड़ौसी आदि किसी बहाने से उसके घर आने लगते हैं और उपहार लाना भी नहीं भूलते।
          इसके विपरीत जब वह दुखी या परेशानी में होता है तो सबसे पहले उसके बन्धु-बान्धव उसका साथ छोड़ देते हैं। उसके मित्र और पड़ौसी भी कन्नी काटने लगते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं वह कुछ मॉंग न ले। कहीं उसकी सहायता न करनी पड़ जाए। मनीषी कहते हैं कि दुखों के आने पर मनुष्य का साया भी उसका साथ छोड़ देता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि परेशानी के समय जब अपना साया भी साथ छोड़ देता है, उस समय दूसरे लोगों से क्या शिकवा शिकायत करना? 
         ऐसे विपरीत समय में अपने पास यदि कुछ बचाया हुआ संचित धन होगा तो कष्ट का समय थोड़ी सुविधा से गुजर जाता है। तब किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता ही नहीं होती। ऐसी अनचाही स्थितियों के लिए सबसे आवश्यक है कि धीरे-धीरे छोटी-छोटी बचत करके अपने धन को बचाया जाए। कहने का तात्पर्य है कि जितनी भी हमारी कमाई है उसमें से कुछ अंश आने वाले धूप-छाँव अर्थात् उत्कर्ष व अपकर्ष के समय के लिए बचाकर रखें। 
          वैसे तो हमारी जरूरतें हमेशा ही मुँह बाये खड़ी रहती हैं। न चाहते हुए भी अनचाहे खर्चे आकर हमारा बजट बिगाड़ देते हैं। फिर भी सभी समस्याओं से जूझते हुए मनुष्य को उनके सामने डटकर खड़े हो जाना चाहिए। हमारा प्रयास सदा यही होना चाहिए-
        ते ते पाँव पसारिये जेती लम्बी सौर।
अर्थात् मनुष्य के पास जितनी लम्बी चादर हो, उसे उतने ही पैर फैलाने चाहिएँ। अन्यथा उसके पैर चादर से बाहर निकल आते हैं।
         दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि अपने मित्रों, सम्बन्धियों अथवा पड़ौसियों आदि की होड़ करके जीवन को कष्टप्रद नहीं बनाना चाहिए। ईश्वर ने हमारे कर्मों के अनुसार हमें जितना दिया है, उसी में ही अपने जीवन की गाड़ी चलानी चाहिए और सन्तुष्ट रहने का प्रयास करना चाहिए। अन्यथा फिर इस संसार में खाली हाथ ही रह जाना पड़ता है। यानी यह तो जबरदस्ती कष्टों को न्योता देने वाली बात हो जाएगी। जहॉं तक हो सके ऐसी स्थिति से बचकर रहना चाहिए। अपने जीवन को अनावश्यक ही नरक नहीं बनाना चाहिए।
          कहते हैं न बूँद-बूँद से घट भर जाता है। इसी तरह जो भी थोड़ा-बहुत बचाऍंगे तो वह धीरे-धीरे इकट्ठा होकर हमारा सुरक्षा कवच बन जाएगा। इसके लिए  छोटी-छोटी बचत कर सकते हैं। बैंक में या डाकखाने में अपनी सुविधानुसार राशि की आर. डी. करवा सकते हैं। जब वह मैच्योर हो जाए तब उस राशि की एफ. डी. करवा सकते हैं। इस प्रकार धन बढ़ता रहता है। यह सबसे सुरक्षित तरीका है पैसा जोड़ने के लिए। अधिक ब्याज के लालच में अपने परिश्रम से कमाए धन को धूर्त या ठगी करने वाली कम्पनियों में निवेश करने से बचना ही श्रेयस्कर होता है।
            इस प्रकार अपने जीवन में सोच-विचार कर आगे कदम बढ़ाना चाहिए। एवं विध हम स्वयं को सुखी और समृद्ध बना सकते हैं। यह धन हमारा सुख-दुख का साथी बनकर हमें हर समय साथ निभाता है। यह हमें आत्मविश्वास से भर देता है जिससे जीवन में सफलता हमारे कदम चूमने लगती है। इस तरह हम अपने को हर स्थिति के लिए तैयार कर सकते हैं। अत: रास्ते में आने कठिनाइयों से जूझने के अपने सफल प्रयासों की बदौलत हम प्रसन्नतापूर्वक अपने जीवन की नौका संसार सागर के पार तैरा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद