शनिवार, 3 मई 2025

दिन के समान मनुष्य जीवन

दिन के समान मनुष्य जीवन

मनुष्य इस संसार में जन्म लेता है। मनुष्य का यह जीवन दिन के समान होता है, ऐसा हम कह सकते हैं। पूरे दिन को हम तीन भागों में बाँटते है- 
1 सूर्योदय काल यानी प्रातःकाल
2 मध्याह्न काल यानी दोपहर का समय
3 सूर्यास्त काल या संध्या काल यानी सांयकाल 
 इसी प्रकार मानव जीवन को भी तीन भागों में बाँटा जा सकता है- 
1 बाल्यकाल यानी बचपन
2 युवावस्था यानी जवानी का समय
3 वृद्धावस्था यानी बुढ़ापे का समय
           सूर्योदय अर्थात् सूर्य का उदय होना। इस समय वह लालिमा लिए हुए सभी के आकर्षण का केन्द्र बनता है। हम सबकी आशाओं का प्रतीक होता है। इस शैशवावस्था वाले सूर्य का स्तुतिगान हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुश: किया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय सूर्य का प्रकाश ब्रह्माण्ड को रात्रि के अन्धकार से मुक्त करके जीवों में नवजीवन का संचार करता है। सभी जीव-जन्तु अपने-अपने कार्यों में संलग्न होने लगते हैं। सूर्य का यह शैशव काल सम्पूर्ण प्रकृति को उल्लासित कर देता है। 
         इसी प्रकार हमारे मानव जीवन का बाल्यकाल भी बहुत मनभावन होता है। छोटा बच्चा सभी को अपनी छोटी-छोटी शरारतों से आकर्षित करता है। यह समय नवनिर्माण का होता है। इस अवस्था में सबको उससे आशा होती है कि बड़ा होकर वह कुछ करेगा। यहाँ उमंग होती है, उल्लास होता है और कुछ भी कर गुजरने का साहस होता है। बच्चा अपने माता-पिता के जीवन में खुशियों के साथ-साथ उनकी आशाओं का कारक भी बनता है। उसके भावी जीवन की नींव इसी समय में रखी जाती है।
             मध्याह्नकाल जिसे हम दोपहर कहते हैं, उस समय सूर्य अपने उत्कर्ष पर होता है। तब सूर्य की गर्मी व प्रकाश दोनों ही तीव्र होते हैं। इसे हम सूर्य की युवावस्था भी कह सकते हैं। तब सूर्य इतना अधिक तेजस्वी होता है कि उसके तेज को सहन नहीं किया जा सकता। उसकी ओर देख पाना बहुत कठिन होता है। उसकी गर्मी को झेलने में जीव असमर्थ हो जाते हैं। उसके प्रकाश को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि कभी धरा पर अन्धकार का साम्राज्य भी रहा होगा।
          उसी प्रकार मानव की युवावस्था भी होती है। जवानी में उसकी शक्ति और तेज अधिक होते हैं। इस समय वह ऊर्जावान होता है। अपने तेज और अपनी ऊर्जा के बल पर वह किसी भी समस्या से भिड़ जाता है। अपने बचपन से अब तक वह विद्यार्जन करके सेटल हो जाता है। तब वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के योग्य बन जाता है। विवाह करने के साथ-साथ वह अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्वों का निर्वहण बहुत तत्परता से करता है।
           दिन का अन्तिम समय सूर्यास्त का होता है। इस समय सूर्य अपने तेज व प्रकाश से हीन होकर अस्ताचल की ओर गमन करता है। यानी यह दिवस का अवसान होता है। अन्त की ओर जाने वाले सूर्य की पूजा नहीं की जाती। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय वह निर्बल हो जाता है। सभी  जीव-जन्तु अपने-अपने कार्यों को समाप्त करके अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। कहते हैं चढ़ती कला को सभी प्रणाम करते हैं। पूर्णमासी के चाँद की लोग पूजा करते हैं, उसके लिए खीर बनाने हैं और व्रत भी रखते है। 
           इसी तरह मानव अपने अन्तिम काल यानी वृद्धावस्था में हर प्रकार से शक्तिहीन हो जाता है। रिटायर होने के पश्चात उसमें खालीपन घर करने लगता है। तब तक बच्चे अपने-अपने घोंसलों में चले जाते हैं। वह स्वयं को असहाय एवं अकेला महसूस करने लगता है। उसे ऐसा लगने लगता है कि किसी को भी उसकी आवश्यकता नहीं रह गई है। इस तरह वह निराशा में डूबने लगता है। यह वही समय है जब वह अन्तिम पड़ाव की ओर अपने कदम बढ़ाने लगता है।
            इस प्रकार सूर्य अस्त हो जाता है, अगले दिन फिर से नई यात्रा की शुरूआत के लिए और फिर से आशा का प्रतीक बनने के लिए। यही मानव जीवन का भी क्रम होता है। तीनों अवस्थाओं को पार करता हुआ वह मृत्यु के पथ पर अग्रसर होता है अपने नवजीवन की खोज में। फिर से जीवन का वही क्रम दोहराया जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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