मंगलवार, 6 मई 2025

मन बहुत ही चंचल

मन बहुत ही चंचल

मनुष्य का मन बहुत ही चंचल होता है। यह किसी के भी वश में नहीं आता। वास्तव में मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है। अभी यहाँ हमारे पास है और फिर पल भर में पूरे ब्रह्माण्ड की सैर करके वापिस लौटकर आ जाएगा। इसकी गति और इसकी सीमा का कोई ओरछोर नहीं है। इस बात से भी इसे कोई लेना-देना नहीं होता कि मनुष्य किस स्थान पर बैठा है या किसी परिस्थिति में है। इसका कार्य तो केवल भटकना और भटकाना है। यह व्यक्ति की रातों की नींद उड़ाकर उसे बैचेन कर देता है।
          चंचल मन का मतलब है कि एक ऐसा मन जो स्थिर न रहकर बार-बार इधर-उधर भटकता रहता है। वह आसानी से प्रभावित हो जाता है। हमारी इन्द्रियाँ बाहरी दुनिया के सुखद अनुभवों की ओर आकर्षित होती हैं। इससे मन का चंचल हो जाना स्वाभाविक होता है। चंचल मन का अर्थ करते हुए हम कह सकते हैं कि व्यक्ति का स्वभाव या उसके विचार आसानी से बदल जाते हैं। मन में अशान्ति और चंचलता का कारण यह भी है कि तन और मन के अन्दर अधिक मात्रा में ऊर्जा भरी हुई होती है। 
          भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भगवद्गीता' के छटे अध्याय में कहा है- 
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
अस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।
अर्थात् अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल है। यह मन केवल अत्यंत चंचल ही नहीं है  अपितु प्रमथनशील भी है। यह बड़ा बलवान है और किसी से भी वश में किया जाना असम्भव है। यह मन बड़ा दृढ़ भी है। ऐसे लक्षणों वाले इस मन का विरोध करना मैं वायु की भाँति दुष्कर मानता हूँ।
        जीवन पर्यंत यह हम सबको नाच नचाता रहता है। हम इसके चंगुल से बचने में स्वयं को असहाय अनुभव करते हैं। मन की प्रत्येक स्थिति का मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। हम सारे कर्म-कुकर्म इसी के इशारे पर करते हैं।  प्रसन्नता-अप्रसन्नता, अवसाद, उत्साह-निराशा, घृणा, राग-द्वेष, क्रोध आदि सभी अवस्थाओं का कारण यही मन है।
    यदि मन पर सद् विचारों की प्रबलता होती है तो मनुष्य सन्मार्ग पर चलता हुआ उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है। समाज, राष्ट्र, परिवार आदि के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहण करता है। परंतु यदि मन कुमार्गगामी हो जाए तो मानव पतन के मार्ग पर चल पड़ता है। वह राष्ट्रद्रोही, समाजद्रोही तथा परिवारद्रोही बन जाता है।
          अब सोचना यह है कि इसे वश में कैसे किया जाए? गीता में कहा है- 'अभ्यासेन वैराग्येन च' अर्थात् निरन्तर अभ्यास व वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो बार-बार यदि मन को गलत रास्ते पर जाने से रोकेंगे तो धीरे-धीरे सही रास्ते पर चलने का इसे अभ्यास हो जाएगा। दूसरा उपाय है इसे ईश्वर की आराधना में कठोरता पूर्वक लगाया जाए। तब इसमें विद्यमान कल्मष(बुराई) दूर होती है। यह शुद्ध और पवित्र बन जाता है। यदि इन उपायों को न अपनाया जाए तो फिर कहीं भी ठौर नहीं मिलता।         
           नियमित रूप से ध्यान और योग करने से मन शान्त होता है और विचारों पर नियन्त्रण बढ़ता है। प्राणायाम मन को शान्त करने और एकाग्रता को बढ़ाने में मदद करता है। योग मन और शरीर को शान्त करने में मदद करता है। नियमित व्यायाम करने से तनाव कम होता है और मन शान्त रहता है। खाली दिमाग में बुरे विचार आते हैं, इसलिए खुद को व्यस्त रखने के लिए कोई न कोई काम करें। अपने विचारों को लिखने से वे व्यवस्थित होते हैं और हम उन पर बेहतर तरीके से नियन्त्रण रख सकते हैं। 
         अपने विचारों और भावनाओं को दूसरों के साथ साझा करने से राहत मिल सकती है। अपने आप से प्यार करना और खुद को स्वीकार करना भी मन को शान्त रखने में सहायता करता है। पर्याप्त नींद लेने से भी मन शान्त रहता है। हर चीज में 'हाँ' नहीं कहना चाहिए। अपनी सीमाओं को जानना चाहिए। दूसरों को माफ करना और पुरानी बातों को भूलना सीखना चाहिए। अपने आप को स्वीकार करके और स्वयं से प्यार करना चाहिए। जो भी अच्छा नहीं लगता, उससे दूरी बनाकर रहना चाहिए। अपने लक्ष्यों को निर्धारित करके उन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए 
             इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि हम अपने मन के नियन्त्रण में हैं, न कि हमारा मन हमारे नियन्त्रण में है। मन में आने वाले सभी विचारों की द्वारपाल की तरह अच्छी तरह से खोज-खबर करने की आदत बना लेनी चाहिए। केवल उन्हीं विचारों को अपने मन में आने देना चाहिए जिन पर वर्तमान में ध्यान देने की आवश्यकता है। यह सत्य है कि मन ही हमें विनाश के गर्त में ढकेल सकता है और यही हमें आकाश की बुलन्दियों को छूने की सामर्थ्य भी देता है। चंचल मन यदि वश में हो जाता है तो हमारे शरीर रूपी रथ में सवार यात्री(आत्मा) को उसके गन्तव्य अर्थात् हमारे अन्तिम लक्ष्य की ओर ले जाता है। अन्यथा इस ब्रह्माण्ड की चौरासी लाख योनियों में मनुष्य भटकता रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें