रविवार, 4 मई 2025

सज्जन व्यक्ति नारियल क फल केे समान

सज्जन व्यक्ति नारियल के फल के समान

सज्जन व्यक्ति नारियल के फल के समान ऊपर से कठोर दिखाई देते हैं पर मन से नारियल की मीठी गिरि की तरह मीठे अर्थात् सबका हित चाहने वाले होते हैं। उसके स्वादिष्ट व स्वास्थ्यवर्धक पानी की भाँति सरल तथा सहृदय होते हैं। दूसरी ओर दुर्जन व्यक्ति बोलचाल में बहुत अच्छे होते हैं परन्तु वास्तव में वे मीठी छुरी के समान होते हैं। उनकी तुलना आकर्षक बेर से की जाती है । जो ऊपर से सुन्दर  और अन्दर से कठोर होते हैं। 'हितोपदेश' के 'मित्र लाभ' से लिए गए इस श्लोक में कवि ने इसी भाव  को प्रकट किया है -
     नारिकेल समाकारा, दृश्यन्ते खलु सज्जना:।
      अन्ये बदरिकाकारा, बहिरेव मनोहरा:।। 
अर्थात् सज्जन व्यक्ति नारियल के फल के समान बाहर से कठोर होते हैं और अन्दर से गिरि के समान मधुर और कोमल होते हैं। इनके विपरीत दुष्ट लोग बेर के फल के समान केवल बाहर से कोमल और आकर्षक होते हैं और उनके भीतर गुठली रूपी कठोरता या कटुता रहती है।
           सज्जनों का हर कार्य निस्वार्थ होता है। वे देश, धर्म, परिवार और समाज के कार्य बिना किसी स्वार्थ के करते हैं। वे परोपकार के बदले में वे कुछ भी नहीं चाहते। सज्जनों के निःस्वार्थ स्वभाव के कारण वे समाज के प्रिय बन जाते हैं। इसके विपरीत यदि कोई उनका अहित भी करता है तो वे उसे क्षमा कर देते हैं। ऐसे व्यक्ति से अगर हमारी कोई इच्छा पूरी नहीं होती तो हमें यही सोचना चाहिए कि इसमें हमारी भलाई छिपी है।
          संस्कृत भाषा के महाकवि कालिदास ने अपने खण्ड काव्य 'मेघदूतम्' में कहा है -
  याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्‍धकामा:।।
अर्थात् गुणीजन से याचना करना अच्‍छा है। चाहे उनसे की गई प्रार्थना निष्‍फल ही रहे। अधम व्यक्ति से माँगना कभी भी अच्‍छा नहीं होता। चाहे वह सफल ही क्यों न हो जाए।
          इस गम्भीर उक्ति का यही अर्थ है कि सज्जन यदि हमारी मॉंग को ठुकरा देते हैं तो उसमें हमारा हित निहित होता है। यद्यपि उस समय हमें दुख अवश्य होगा कि हमारे कठिन समय पर उन्होंने हमारा साथ नहीं दिया। यदि वे हमारी सहायता कर देते तो उनका क्या बिगड़ जाता? पर समय रहते हमें उनका उद्देश्य समझ आ जाता है। तब ऐसा लगने लगता है कि हमारे प्रति उनकी सोच कितनी सकारात्मक थी। सज्जनों की न में भी हमारी भलाई के लिए होती है।
           इनके विपरीत होते हैं दुर्जन लोग। यदि दुर्जन लोग हमारी किसी इच्छा को पूर्ण करते हैं तो उसमें उनका स्वार्थ छुपा होता है। वे अपना लाभ सोचकर ही किसी के साथ अपना सम्बन्ध बनाते हैं। ऐसे लोग किसी के भी सगे नहीं होते। उनका साथ कभी भी लाभदायक नहीं कहा जा सकता। वे पहले मीठी-मीठी बातें करेंगे और फिर स्वार्थ सिद्ध होने पर ठोकर मार देते हैं। तब वे पहचानने से भी इन्कार कर देते हैं। इन लोगों की न मित्रता अच्छी होती है और न ही शत्रुता भली होती है।
             वे आगे आने वाले समय में हमें कठिनाई में फॅंसा सकते हैं। वे अपने किए उपकार के बदले कुछ ऐसा कर सकते हैं जो हमारे लिए हितकर नहीं होता। अथवा कुछ गलत कार्य करवाकर हमें फॅंसा सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि दुष्ट बेर के फल के समान ऊपर से मनभावन दिखाई देते हैं पर बेर की गुठली की तरह मन से कठोर या अहित करने वाले होते हैं। इसलिए उनकी मीठी या लच्छेदार बातों से बचकर रहना चाहिए। वास्तव में देखा जाए यही हमारे लिए हितकर होता है।
            सज्जनों का साथ हमेशा सुख, शान्ति, सफलता और यश आदि देता है। वे दूर तक साथ निभाते हैं। दुर्जनों की संगति सदैव दुख, निराशा, असफलता और अपयश आदि की ओर ले जाती है। इन लोगों के साथ सम्बन्ध सीमित समय तक ही निभाए जा सकते हैं। अब यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम सज्जनों के साथ रहना पसन्द करते हैं या दुर्जनों पर विश्वास करना चाहते हैं। भली-भाँति सोच विचार करके अपने लिए संगति का चुनाव करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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